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सितारों की जरी और एक परी

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शूटिंग के दौरान ट्रैफिक को नियंत्रित करने से लेकर आज की दुनिया की सबसे चर्चित फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर की सह-निर्देशिका तक के लवलीन टंडन के सफर पर तुषा मित्तल का आलेख

बात 1998 की है. दीपा मेहता अपने देशी-विदेशी अभिनेताओं की मिश्रित टोली के साथ अपनी फिल्म अर्थ  की शूटिंग के लिए यहां पहुंच चुकीं हैं और सितारों की एक झलक पाने की आस रखने वालों से चांदनी चौक की गलियां जल्द ही पट जाने वाली हैं. फिल्म के एक दृश्य में आमिर खान को पुरानी दिल्ली के आसमान में पतंग उड़ानी है. लेकिन उससे पहले इस इलाके के सारे टीवी और डिश एंटेना हटाने होंगे क्योंकि आजादी से पहले तो भारत में टीवी का कोई चलन था ही नहीं.

मेरी उम्र की ज्यादातर लड़कियों को कयामत से कयामत तक और मैंने प्यार किया जैसी रोमांटिक फिल्में पसंद थीं लेकिन मेरे लिए रोमांस का कोई मतलब ही नहीं था

ठीक इसी समय फिल्म स्कूल से अभी-अभी ही निकलीं लवलीन टंडन को अपने करियर का पहला असली काम दिया गया. लवलीन को जामा मस्जिद से लाल किले तक के सारे एंटीना हटवाने थे. इससे पहले तक उन्हें फिल्म यूनिट की सदस्य के तौर पर ट्रैफिक रोकने जैसे छोटे-मोटे काम ही दिए गए थे. ‘ये मेरे लिए बेहद रोमांचित करने वाला अनुभव था, मैं हमेशा से उन लोगों के साथ काम करना चाहती थी जो किसी महत्वपूर्ण काम को अंजाम दे रहे हों. आप जब फिल्म स्कूल से निकलते हैं तो आपको लगता है कि आप कुछ खास करने के लिए हैं और आप मानते हैं कि जो काम किया जाए उससे सामाजिक सरोकार भी जुड़े हों. आप ये भी सोचते हैं कि फिल्म निर्देशक के साथ फिल्म सेट पर आपका बौद्धिक विचार-विमर्श भी हो. लेकिन वास्तव में ऐसा होता कुछ नहीं. जब मुझे एंटेना हटवाने वाला काम दिया गया तो मुझे पहली बार लगा कि फिल्म में मेरा भी कुछ योगदान है’ लवलीन कहती हैं.

इस वक्त की सबसे चर्चित फिल्म जिसे स्लमडॉग मिलियनेयर की इस सह-निर्देशक को आज भी इस बात का फख्र है कि उन्होंने अपनी जिंदगी का पहला ‘असाइनमेंट (एंटेना हटवाने वाला)’ रिकॉर्ड समय में पूरा किया था - मात्र एक दिन और एक रात में - वो भी लोगों की मर्जी से. लवलीन बताती हैं, ‘मैं हर एक घर में गई, लोगों के  साथ चाय पी और उन्हें शॉट के बारे में समझाया. यदि आप लोगों के साथ अच्छे से घुलमिल जाएं तो लोग खुशी-खुशी आपकी मदद को राजी हो जाते हैं.’

पूर्वी दिल्ली की रहने वालीं और वहीं पली-बढ़ीं 35 वर्षीय लवलीन ने बतौर कास्टिंग डायरेक्टर काम करना तो मीरा नायर की मॉनसून वेडिंग से शुरू किया मगर अभिनेताओं आदि के बारे में जानकारी रखने का शौक उन्हें किशोरावस्था से ही था. अपने पुराने दिनों को याद करते हुए वे कहती हैं, ‘मेरे लिए बचपन में सैकड़ों लोगों के  साथ बैठकर फिल्म देखना सबसे रोमांचक अनुभव हुआ करता था. भारत में बनी हर फिल्म के बारे में मैं जानती थी. यहां तक कि केवल एक शॉट देखकर ही मैं फिल्म के बारे में सबकुछ बता सकती थी.’ पुराने समय को याद करते हुए लवलीन कहती हैं, ‘लेकिन पहले का बॉलीवुड बिल्कुल अलग हुआ करता था. इसमें समानांतर सिनेमा था, क्षेत्रीय सिनेमा था और साथ में अमिताभ बच्चन की फिल्में भी थीं. इन सब वजहों से ही शुरुआती वर्षों में मेरा इस तरफ झुकाव हुआ.’

आगे जाकर बॉलीवुड के प्रति उनका ये झुकाव एक जुनून में बदल गया. उन्होंने फिल्मों का संग्रह करना शुरू कर दिया. वो भी बाकायदा लेबलों के साथ. जैसे - राजेश खन्ना, दो रास्ते, 1961. उस फिल्म और उसके हीरो का खुमार तब तक रहता जब तक कि कोई नया अभिनेता या फिल्म चर्चा में न आ जाते. अपनी इस आदत के बारे में वे कहती हैं, ‘मैंने ये कभी नहीं सोचा कि इस तरह से मैं एक प्रकार से जानकारियों का एक बैंक बना रही हूं. ये सब मेरे लिए एक खेल की तरह था. लेकिन इस आदत की वजह से मुझे अपना करियर चुनने और अभिनेताओं और निर्देशकों और उनका काम समझने में भी खासी आसानी हुई.’

मशहूर ब्रितानी फिल्मकार सारा गैवरों की फिल्म ब्रिक लेन में कास्टिंग डायरेक्टर के तौर पर काम करने के दौरान लवलीन ने सतीश कौशिक को एक मुख्य भूमिका के लिए चुना था. चरित्र में उतरने के लिए लवलीन ने किस तरह कौशिक की मदद की उसे याद करते हुए कौशिक बताते हैं, ‘लंबे समय से मेरी छवि हास्य कलाकार की बनी रही है लेकिन लवलीन को पक्का यकीन था कि मैं उस चरित्र में बिल्कुल फिट हूं. उसने मुझे बेहद प्रोत्साहित किया और उस चरित्र के मुताबिक ढलने में भी मेरी बहुत मदद की. ऐसी भूमिका मैं हमेशा से करना चाहता था और ये लवलीन की वजह से संभव हो पाया.’

‘आप लोगों की रोजमर्रा की घटनाएं उठाते हैं और उन्हें कैमरे के सामने इस तरह से पेश करते हैं कि वो लोगों को उनके वास्तविक अनुभवों से भी परे ले जाएं’ सिल्वर स्क्रीन की ओर अपने आकर्षण की लवलीन कुछ इस तरह से व्याख्या करती हैं. और उनका यही नजरिया उनकी पसंदीदा फिल्मों के चुनाव में भी झलकता है. ‘मेरी उम्र की ज्यादातर लड़कियों को कयामत से कयामत तक और मैंने प्यार किया जैसी रोमांटिक फिल्में पसंद थीं लेकिन मेरे लिए रोमांस का कोई मतलब ही नहीं था. मेरी प्राथमिकता तो ऐसी फिल्में थी जो कुछ हटके हों. सामाजिक मसलों पर आधारित हों’ गुरुदत्त और हम किसी से कम  नहीं के ऋषि कपूर उन्हें बेहद पसंद हैं. इसके अलावा बिमल रॉय की बंदिनी (क्योंकि इसमें भारतीय समाज और क्रांति की बात की गई थी) और साहिब बीबी और गुलाम  उनकीं पसंदीदा फिल्में हैं. यहां तक कि उनके सेल फोन की कॉलर ट्यून भी साहिब बीबी.. से ही ली गई है. फिल्म क्यों उन्हें इतनी पसंद है पूछने पर जवाब मिलता है - ‘मैं साहिब बीवी.. के हरिंदर नाथ चट्टोपाध्याय को कभी नहीं भूल सकती, ये मेरा पसंदीदा चरित्र है क्योंकि ये पागल है और बिना फिल्म का हिस्सा बने इसे जोड़ने का काम करता है.

लवलीन मानती हैं कि मीरा ने ही उनकी जिंदगी सही मायनों में बदली है. वे कहती हैं कि मीरा की वजह से ही उन्हें वो रास्ता मिला जिससे वे खुद की फिल्में बनाने से पहले बड़े निर्देशकों के साथ काम करके कुछ सीख सकती थीं

बैंडिट क्वीन वो फिल्म थी जिसे देखकर पहली बार लवलीन को एहसास हुआ था कि वो सिर्फ और सिर्फ फिल्में ही बनाना चाहती हैं. इस बारे में वो कहती हैं, ‘इस फिल्म में घटनाओं और समाज का बहुत ही विस्तृत चित्रण है. मैं उस दौर में हर फिल्म की तुलना इसी फिल्म से किया करती थी. दरअसल ये मेरी तरह का सिनेमा था.’ उनका इरादा भी कुछ इसी तरह की फिल्में बनाने का है. स्लमडॉग मिलियनेयर की सफलता ने आज उन्हें उस मुकाम पर पहुंचा दिया है जहां वे इस तरह योजनाओं पर काम करने के बारे में सोच सकती हैं. हालांकि लवलीन को पहले इस फिल्म में बतौर कास्टिंग डायरेक्टर ही लिया गया था. लेकिन फिल्म की पृष्ठभूमि के बारे में इनकी बारीक समझ और हिंदी संवाद लिख सकने की कुशलता के चलते डैनी बोएल ने ठीक शूटिंग शुरू होने से पहले उन्हें फिल्म का सह-निर्देशक भी बना दिया. लवलीन बताती हैं कि उन्हें फिल्मों में ज्यादा सक्रिय भागीदारी पसंद है. स्लमडॉग.. के निर्माण के दौरान उनकी अपने सहकर्मियों, खासकर फिल्म के डायरेक्टर डैनी बॉएल और दूसरे विदेशी सहयोगियों से अच्छी-खासी बहस होती थी. ‘यहां यदि कोई प्रसिद्ध निर्देशक आता है तो लोग उस की हर बात मानने को तैयार हो जाते हैं बहस की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती’ लवलीन कहती हैं, ‘डैनी को मेरी ये बात पसंद आई कि मैं निर्भीक हो के उन्हें राय दे सकती हूं, उनसे सवाल कर सकती हूं.’ उदाहरण के तौर पर बॉएल इस फिल्म में मुंबई के दंगों के चित्रण के दृश्यों में हिंदू दंगाइयों को श्रीराम के चित्र वाली टी-शर्ट पहने हुए दिखाना चाहते थे. लेकिन लवलीन ने जब इन दृश्यों को फिल्माने का इससे बेहतर और संवेदनशील तरीका सुझया तो न सिर्फ बॉएल उनसे सहमत हुए बल्कि उन दृश्यों को ठीक लवलीन के बताए तरीके से ही फिल्माया गया. बल्कि टंडन तो इससे भी एक कदम आगे जा कर कई विदेशी फिल्मों में काम करने से सिर्फ इसलिए मना कर चुकीं हैं क्योंकि उनके मुताबिक वो फिल्में हमें एक ऐसे देश के रूप में दिखाना चाहती थीं जो अभी भी 1930 की दुनिया में जीने वाला भुखमरी से पीड़ित तीसरी दुनिया का देश हो.’

लवलीन की हमेशा ये कोशिश होती है कि जितना हो सके फिल्म को वास्तविकता के करीब रखा जाए. यही वजह थी कि जब स्लमडॉग.. में उन्हें झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों के चरित्र के लिए कलाकारों की जरूरत थी तो उन्होंने पूर्वी बांद्रा की झुग्गियों का रुख किया. वे बताती हैं, ‘मैं इन बच्चों के साथ काम करने को उत्सुक थी और इसीलिए मैंने उन्हें एक-तिहाई दृश्य हिंदी में फिल्माने के लिए तैयार किया. मैंने एक स्क्रेच टेप पर जब इन बच्चों को फिल्माया तो मेरी टीम के सभी लोग हतप्रभ थे. क्योंकि हिंदी के प्रयोग ने मानो इन दृश्यों में जान डाल दी थी.’

स्लमडॉग.. के हिंदी संस्करण में संवाद खुद उन्होंने ही लिखे हैं. सच्चाई को बरकरार रखते हुए फिल्मों के दृश्यों में जान डाल देना ही शायद लवलीन की वो खूबी है जो उन्हें औरों से जुदा करती है. ‘उनके पास अपना ही नजरिया है और दुनिया के बारे में कहने के लिए भी काफी कुछ है.’ लवलीन के बारे में मीरा नायर बताती हैं, ‘मॉनसून वेडिंग में कलाकारों के चयन के समय वो मेरा दाहिना हाथ थी. जब इस फिल्म के लिए किसी कलाकार का चयन नहीं हो पाया तो वो ऐसे ही सड़क पर पैदल चली गई. एक जगह रामलीला हो रही थी वहां जाकर उसने सीता की भूमिका निभाने वाली लड़की को नौटंकी स्टाईल में सीता की भूमिका के लिए तैयार कर लिया.’

अनुराग कश्यप के लिए लवलीन हमेशा से उनकी खास सलाहकार रहीं हैं. अनुराग बताते हैं, ‘उनकी सिनेमा की समझ हॉलीवुड और बॉलीवुड से परे जाती है. मैं अपनी हर फिल्म के बारे में उनसे चर्चा करता हूं. और ये उम्मीद भी करता हूं वो अपनी ही तरह की बढ़िया और मौलिक फिल्में बनाएंगी.’

स्लमडॉग.. से चर्चा में आईं इस सह-निर्देशक का कहना है, ‘मैं एक पूरी तरह से स्वतंत्र सिनेमा का निर्माण करना चाहती हूं. मेरी इसमें कोई रुचि नहीं है कि मुझे फलां स्टार के साथ ही काम करना है और फिल्म को चलाने के लिए छह गाने होने ही चाहिए. मैं प्रोडक्शन कंपनी के बनाए ढांचों और शर्तो पर काम नहीं करना चाहती.’ हालांकि वे व्यावसायिक सिनेमा के  विरोध में नहीं हैं. वे स्लमडॉग.. को भी मसाला फिल्म की श्रेणी में ही रखती हैं. लेकिन वे फिल्म निर्माण के समय खुद ही निर्णय लेना चाहती हैं. इस बारे में लवलीन का मानना है कि उन्हें नहीं लगता कि बॉलीवुड में उनकी ये मुराद पूरी हो सकती है.

उन्हें विषयवस्तु की जटिलता और उसकी परतें आकर्षित करती हैं वे कहती हैं, ‘मेरे अभिभावकों की पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण था कि जितना हो सके उतना सादा जीवन गुजारा जाए लेकिन आज सोच पूरी तरह से बदल चुकी है. जिस तरह के बदलाव आज हो रहे हैं वो सब मुङो आकर्षित करते हैं और इन्हें मैं सकारात्मक  बदलावों के तौर पर देखती हूं.’

अभी तक के करियर में उन्होंने प्रमुख रूप से अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों के लिए ही काम किया है. लवलीन के करियर का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव मॉनसून वेडिंग रही. इस फिल्म में वो बतौर सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर जुड़ी थीं लेकिन फर्स्ट असिस्टेंट डायरेक्टर का पैर टूट जाने से उसकी भी सारी जिम्मेदारी उन्हें ही निभानी पड़ी. इस बारे में वे बताती हैं, ‘30 दिन तक मुङो 65 कलाकारों को उनके शादी वाले मेकअप और कपड़ों के साथ संभालना था और साथ में अगले दिन की तैयारी भी करनी पड़ती थी.’ इसे देखते हुए मीरा नायर ने अंत में फिल्म की कास्टिंग डायरेक्टर की जगह उनका नाम दिया. लवलीन मानती हैं कि मीरा ने ही उनकी जिंदगी सही मायनों में बदली है. वे कहती हैं कि मीरा की वजह से ही उन्हें वो रास्ता मिला जिससे वे खुद की फिल्में बनाने से पहले बड़े निर्देशकों के साथ काम करके कुछ सीख सकती थीं.

इस सबके बावजूद जब उन्हें द टर्मिनल के लिए स्टीवन स्पीलबर्ग का फोन आया तो पहले तो वे इस पर यकीन ही नहीं कर सकीं. वे बताती हैं, ‘मैंने सोचा कि कोई मुझे एम टीवी बकरा बना रहा है.’ स्पीलबर्ग ने उनसे पूछा कि वे आखिर इतनी अच्छी अंग्रेजी आखिर कैसे बोल लेती हैं. लवलीन कहती हैं, ‘असल में ये सब संगत का असर होता है. हमारे पास एआर रहमान जैसे प्रतिभावान कलाकार तो पहले से ही थे लेकिन सारी दुनिया अब उनके बारे में जान रही है.’ उन्हें उम्मीद है कि अब भारतीय फिल्मकार भी सपनीली फिल्मों के दायरे से बाहर खुले दिमाग से सोचेंगे. 

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