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'मुझे नकल मर्डर बनानी पड़ी ताकि ओरिजिनल गैंगस्टर बना सकूं'

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फिल्म निर्देशक अनुराग बसु से गौरव सोलंकी की बातचीत

हम मलाड की एक बहुमंजिला इमारत की छत पर अनुराग बसु से मिले. भिलाई में पला-बढ़ा एक मध्यवर्गीय बंगाली लड़का, जो बीस से थोड़ा ही ऊपर होगा, जब उसने टीवी का मशहूर सीरियल तारा बनाया. बाद में और भी बहुत-से मशहूर धारावाहिक और फिल्में. लेकिन इतना ईमानदार कि यह कहने से पहले एक पल को भी नहीं झिझकता कि उसे 'नकल' मर्डर बनानी पड़ी ताकि अपनी असल गैंगस्टर बनाने को मिले. बाद में हमने समोसे खाए और बरफी  की बातें कीं. नि:स्वार्थ प्यार की, राम जैसे किरदारों के बोरिंग होने की, एक्यूट ल्यूकीमिया से उबरने के बाद उनके जीवन के बदलने की, राजकुमार हीरानी की फिल्मों के पहले दिन के शो के लिए उतावला रहने की, काइट्स  की, राकेश रोशन के लोकतंत्र की और महेश भट्ट की बातें, जो चाहते हैं कि उनके सब निर्देशक एक ही तरह की फिल्में बनाते रहें. अनुराग की फिल्मों की तरह ही उनकी बातों में भी दुर्लभ बेबाकी है, बेचैनी है, लेकिन एक व्यावहारिक संतुलन भी है. उनकी फिल्मों का अपना कोई एक अलग और स्पष्ट रंग भले ही न हो (और वे ऐसा चाहते भी हैं), लेकिन उनकी फिल्में हिंदी सिनेमा को उम्मीद का एक पक्का रंग देती हैं. हम उस प्यारे रंग को सीधे आपसे बात करने देते हैं.

फिल्म बनाते हुए यह मुझे सबसे महत्वपूर्ण लगता है कि आप फिल्म की खूबसूरती, उसकी ऐस्थेटिक्स भी बरकरार रखें और वह लोगों को भी अच्छी लग रही हो. फिल्म मनोरंजक हो, समांतर फिल्म न हो. हमारे यहां राजकुमार हीरानी ने ही इस फॉर्मूले को क्रैक किया है. वे ऐसी फिल्में बना रहे हैं, जिनकी आलोचक भी तारीफ करेगा, फिल्मकार भी, दर्शक भी. अपनी फिल्मों से मैं भी वही जगह ढूंढ़ रहा हूं. लेकिन पता नहीं कि मिलेगा क्या! जिस दौर में मैं इंडस्ट्री में आया, यहां लोग किसी विदेशी फिल्म की डीवीडी ही देते थे बनाने को. अगर आपको बनानी है तो कोई और विकल्प ही नहीं है. मेरे पास गैंगस्टर की स्क्रिप्ट थी पहले से और बनाना भी चाहता था, लेकिन गैंगस्टर को कोई निर्माता बना नहीं रहा था क्योंकि वो ओरिजिनल थी. उसे बनाने के लिए मुझे पहले एक नकल बनानी पड़ी, मर्डर. खुद को साबित किया मर्डर में, उसका ठप्पा लग गया, तब मैं अपनी ओरिजिनल फिल्में बना पाया. वह अजीब दौर था. लोग डंके की चोट पर नकल बना रहे थे. मैंने स्क्रीनप्ले लिखकर 'मर्डर' को मूल फिल्म से थोड़ा-बहुत अलग किया लेकिन बीज तो प्रेरित ही था.

'मर्डर', 'गैंगस्टर' के बाद 'लाइफ इन अ मैट्रो' लेकर भी मैं भट्ट साहब के पास ही गया था लेकिन वे एक ही तरह की फिल्में बनाना चाहते थे, उनसे हटना नहीं चाहते थे. उन्होंने खुद अलग अलग तरह की फिल्में बनाई हैं, लेकिन वे नहीं चाहते कि उनके निर्देशक अलग अलग तरह की फिल्में बनाएं. इसीलिए मैं 'मैट्रो' बाहर ले के गया. मैं उनके ढांचे में नहीं ढला. लेकिन उनसे सीखा बहुत कुछ. कोई भी फिल्म पूरी देखने के बाद जो वो समझते हैं ना फिल्म को, वो उनका एरियल व्यू कमाल का है. अब भी फिल्में बनाने के बाद मैं कई बार उनकी नजर से ही देखना चाहता हूं अपनी फिल्म को, उससे डीटैच होके.
'काइट्स' के बाद मीडिया ने जितना कहा, मैं उतना दुखी या असंतुष्ट नहीं था. ऐसी बातें बाहर आईं कि मैंने जैसे अपनी ही फिल्म को डिसऑन कर दिया है. ऐसी बात नहीं है. फिल्म मैंने ही बनाई है. किसी का कोई हस्तक्षेप हुआ है तो इसीलिए ना कि मैंने होने दिया है. जैसी भी बनी, जैसी भी प्रतिक्रियाएं आईं, लेकिन फिल्म तो वह मेरी ही है. मैं बहुत गरमदिमाग और जिद्दी इंसान हूं. मैं इससे नाखुश था कि जिस तरह से शुरू की थी, फिल्म वैसी नहीं रही और प्रमोशन में इतनी बड़ी बन गई.

बहरे-गूंगे की कहानी सुनते ही लगता है कि कोई डार्क फिल्म होगी लेकिन बरफी के साथ ऐसा नहीं है, यह जिंदगी का जश्न मनाने की कहानी है
फिल्म बरफी का एक दृश्यलेकिन ऐसा भी नहीं हुआ कि मेरे दो साल पूरे पानी में चले गए. मैंने बहुत कुछ पाया है उस फिल्म से. दुनिया में पहचान मिली. उससे पहले मुझे बाहर कोई नहीं जानता था. मैट्रो और गैंगस्टर की यहां आलोचकों ने बहुत तारीफ की लेकिन बाहर के अखबारों ने एक लाइन तक नहीं लिखी उनके बारे में. फिल्म रेटिंग की वेबसाइट 'रोटन टॉमेटो' में देखिए, अभी भी उसके 82 प्रतिशत वोट हैं. बड़े बड़े आलोचक, न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट वगैरा, जिनके आलोचकों के मैं रीव्यू पढ़ता हूं, उन्होंने अच्छा रीव्यू किया. मुझे उम्मीद नहीं थी इसकी, क्योंकि बीच की फिल्म थी वो. ना बॉलीवुड थी, न हॉलीवुड, बीच की खिचड़ी थी वो. 'काइट्स' के बाद जानबूझकर चुनिंदा रीव्यू पढ़े मैंने. स्टार कितने दिए हैं, यह पूछकर पढ़ता था. मैंने फिल्म के बारे में खराब चीजें पढ़ी ही नहीं, इसलिए डिप्रेशन नहीं हुआ. नकारात्मकता नहीं आने दी अपने अन्दर. क्योंकि जिस चीज पर आप इतनी मेहनत करते हैं, लोग उसे उड़ा देते हैं तो आप पर, आपके अगले काम पर उसका बहुत बुरा असर पड़ता है. मैं इसलिए नाराज था कि 'काइट्स' के बारे में हमने ठीक तरह से लोगों को पहले बताया नहीं. लोग कुछ और सोच कर आए और उन्हें कुछ और मिला. हमें तो पता था कि हम क्या बना रहे हैं. राकेश रोशन से बड़ा 'मासी' प्रोड्यूसर इस देश में नहीं है. इसलिए ऐसा नहीं है कि हमें पता नहीं था. लेकिन करते करते, जिस तरह से शुरू हुई थी, वो नहीं रही, पैन इंडिया बड़ी फिल्म बन गई और लोगों को भी वही बताया जाने लगा.

आपने जैसी फिल्म बनाई है, उसे उस तरह से लाने की हिम्मत होनी चाहिए. जो बनाई है, उसी तरह से उसी फिल्म को प्रमोट करने की, लेकिन प्रमोशन के टाइम पे लोग डर जाते हैं - 'नहीं यार, इसे और तरीके से पेश करते हैं ताकि लोग और देखने आएं.' और जब आपकी फिल्म महंगी खरीदी बेची जाती है तब आपका मुख्य लक्ष्य पहले 3 दिन के दर्शक होते हैं. तब आप ऐसे प्रोमो बनाते हैं ताकि कुछ भी करके कमाल की ओपनिंग लग जाए. लेकिन मेरा हमेशा यही मानना है कि आप फिल्म के लिए सच्चे रहो. जैसी फिल्म है, वैसा ही ट्रेलर और प्रमोशन होना चाहिए. 'काइट्स' का विषय राकेश जी ने मुझे दिया था. कहानी से ही फिल्म तय हो जाती है. निर्देशक का काम है उसे निखारना. मैंने और राकेश जी ने, सबने मिलके स्क्रीनप्ले लिखा. उस कहानी को जितना रोचक बनाया जा सकता था, बनाया. और डायरेक्शन में कोई हस्तक्षेप नहीं था. शूटिंग में ऐसा नहीं था कि राकेश जी पूरे समय पीछे बैठे रहते थे. वह फिल्म बहुत लोकतांत्रिक ढंग से बनी है. इस तरह के लोकतांत्रिक वातावरण में मैंने इससे पहले काम नहीं किया था जहां 3-4 लोग बैठ के फैसले लेते हों. लेकिन यह सब स्क्रिप्ट के लेवल तक ही था.

हां, जिस तरह की आजादी मैंने भट्ट साहब के यहां इंजॉय की थी, कि आप ही लिखें, डायरेक्ट करें, कैसे भी बनाएं, यहां ऐसा नहीं था. यह भी नहीं था कि राकेश जी के यहां काम के ढंग का मुझे पता नहीं था और बनते-बनते पता चला. मुझे पता था कि वहां इस तरीके से ही फिल्म बनेगी, इसलिए मैंने भी उसी तरीके से बनाई. लेकिन उसके बाद मैंने यह भी तय किया कि अगली बार से हमेशा अपने मन से ही काम करूंगा, ऐसे सिस्टम में नहीं करूंगा. फिल्म डेमोक्रेटिक ढंग से नहीं बन सकती, उसमें तानाशाही ही चलती है. एक के दिमाग से ही काम हो पाता है. यह लोकतांत्रिक सेटअप खराब नहीं है. यशराज में, विधु के यहां भी ऐसे ही बनती हैं फिल्में, लेकिन मैं इसमें फिट नहीं बैठता. मुझे लगता है कि मेरे किरदार अपने रिश्तों में, प्रोफेशन में, या जीवन में ठीक से परिभाषित नहीं रहते क्योंकि मैं खुद ही ठीक से परिभाषित नहीं हूं. मेरे आसपास के लोग भी नहीं हैं, हम सब कनफ्यूज्ड हैं. मैं जब बारहवीं में पढ़ रहा था, मुझे पता नहीं था कि बम्बई आऊंगा, ग्रेजुएशन किया तो मुझे पता नहीं था कि डायरेक्टर बनना है. मैं रिलेशनशिप में भी यहां से वहां बहुत पहले से गुलाटी मारता था. वह मेरा व्यक्तित्व दिखता है शायद. सबमें कमियां या ऐब होते हैं, मैं उन्हें छिपाना नहीं चाहता. मैं अपनी फिल्मों में राम की कहानी नहीं दिखाना चाहता. ऐसे किरदार मुझे बोरिंग लगते हैं.

मर्डर से पहले मैं एक एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर से गुजरा था. उसी ने मुझे जोड़ा उस कहानी से. जैसा जीवन आप जी रहे होते हैं, आप वैसी ही कहानियां चुनते हैं अपने आसपास से. इसीलिए अब बरफी बन रही है. उस वक्त मैं कभी बरफी न बनाता. बीमारी के बाद मेरा फोकस बदल गया, पहले प्राथमिकताओं का क्रम था - पैसा, काम, घर, परिवार, प्यार. अब काम अंत में आ गया, पैसा भी. पहले परिवार और घर. हालांकि अब पैसा ज्यादा कमा रहा हूं. पैसे के पीछे भागो तो कभी हाथ में नहीं आता. नहीं भागो तो अपने आप आता है. लेकिन सिर्फ ये प्राथमिकताएं ही बदली हैं. बाकी कुछ नहीं बदला. बाकी तो आज भी कभी कभार सिगरेट पी लेता हूं. नहीं पीनी चाहिए मुझे.

इन दिनों बरफी की कहानी के बारे में इस डर से नहीं बताना चाह रहा कि कहीं मैं सारी कहानी, या अन्दरूनी परतें न बता दूं कहते कहते. उसमें आपस में जुड़े हुए हुक हैं. उस कहानी का आपको पता न हो, तभी देखने का मज़ा आएगा. बहरे गूंगे से डार्क फिल्म लगती है, क्योंकि आमतौर पर ऐसे किरदारों की ऐसी ही फिल्में बनती हैं, लेकिन यह फिल्म जिन्दगी का जश्न मनाने की कहानी है. हमें वे बेचारे लगते हैं, लेकिन उन्हें नहीं लगता कि वे बेचारे हैं. पहले कुछ छोटी कहानियां लिखी थीं. उनसे इश्क हो गया मुझे. काइट्स के बाद उन्होंने फिल्म का शेप लिया. कहानी से मिलते जुलते किरदारों से मैं मिला हूं. बीमार पड़ने से पहले तक मैं बहुत स्वार्थी था, पैसे के पीछे भागता था. लेकिन बीमारी के बाद कुछ बदलाव आया, कुछ एनजीओज़ से जुड़ा. नज़रिया बदला. मैं न बदलता तो शायद यह कहानी मेरे दिमाग में नहीं आती. मुस्कान नाम का डिसएबिलिटी स्कूल है भिलाई में. वहां गया था. वहीं से मेरा मुख्य किरदार निकला.

मरफी रेडियो का एक विज्ञापन था ना, उसमें जो बच्चा था. फिल्म में मेरे मुख्य किरदार की मां वैसा ही बच्चा चाहती है - मरफी बेबी. जो बच्चा होता है, उसका नाम मरफी रखा जाता है. त्रासदी यह कि उसकी मां रेडियो से शॉक लगने से ही मरती है. मरफी ठीक से बोल नहीं पाता और अपने अस्पष्ट उच्चारण में जब अपना नाम बोलता है तो वह बरफी जैसा सुनता है. धीरे-धीरे सारा शहर उसे बरफी ही कहने लगता है. हम सबमें इतना कपट भर गया है, निस्वार्थ प्यार तो चला ही गया है. भिलाई के उस स्कूल में मैंने देखा कि उनके बीच में वह निस्वार्थ प्यार है. मुट्ठी भर धूप और आसमान के साथ वे जी लेते हैं. इतनी शुद्ध प्रेमकहानी हम करते नहीं. इससे पहले मैंने भी कहां की है? बरफी मेरी पिछली फिल्मों से इतनी अलग है कि काइट्स से बरफी के सैट पर आने के बाद चार पांच दिन मुझे बहुत दिक्कत हुई. समझ ही नहीं आ रहा था कि कैमरा एंगल कैसे लगाऊं मैं.

जिस दिन रणबीर का आखिरी शॉट था और मैंने शॉट से पहले घोषणा की कि यह आखिरी शॉट है तो सारी यूनिट भावुक हो गई थी. ऐसा मैंने इससे पहले कभी किसी फिल्म में नहीं देखा. लोगों की आंखों में आंसू आ गए थे. पता न अहीं ये रणबीर ने किया है या किरदार ने, लेकिन वो पूरी यूनिट का लाड़ला बन गया था. जहां तक प्रियंका की बात है, बरफी की शुरुआत में ही आप भूल जाएंगे कि यह लड़की प्रियंका चोपड़ा है. यह करना बहुत बड़ी बात है. इलियाना शुरू में डर रही थी कि दो बड़े सितारों के साथ लान्च होके वो छिप न जाए. लेकिन धीरे-धीरे उसका डर चला गया. मेरे सेट पर थियेटर जैसा माहौल होता है. कोई बड़े छोटे का क्रम नहीं है. हम तो मेकअप वैन्स पर भी अभिनेताओं का नाम नहीं लिखते. रणबीर कपूर का नाम नहीं, किरदार का नाम लिखते हैं. बाहर आप कोई भी हों लेकिन जब आप सेट पर आएंगे तो सबके बराबर ही होंगे.

 

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