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‘भारत-पाकिस्तान बातचीत न हो तो सिर्फ आतंकवादी ही खुश होंगे’

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पाकिस्तान की पूर्व सूचना मंत्री शेरी रहमान, शांतनु गुहा रे को बता रही हैं कि यदि भारत और पाकिस्तान बात नहीं करेंगे तो स्थिति फिर से वही ढाक के तीन पात जैसी हो जाएगी -

भारत 2008 में हुए मुंबई हमले के बाद से रुकी हुई बातचीत को फिर से शुरू करने के लिए खुद को तैयार कर रहा है. पाकिस्तान के लिए बातचीत कितनी अहम है?

बातचीत करना अच्छी बात है, इससे कोई नुकसान नहीं होता. मुझे मालूम है कि पुणे में हुए धमाके और पाकिस्तान से इसके संबंध होने की आशंका के कारण माहौल में तल्खी आई है, लेकिन अगर भारत के पास असरदार सबूत हैं तो वह सबसे पहले उन्हें सामने रखे और पाकिस्तान को उनपर कार्रवाई करनी होगी. मुझे लगता है कि अहम मुद्दों पर किसी भी उपलब्धि तक पहुंचने में वक्त लगेगा. फिर भी बातचीत एक अच्छा कदम तो है ही. मुझे नहीं लगता कि (बातचीत के) एजेंडे पर किसी एक पक्ष का ज्यादा नियंत्रण होगा.

लेकिन यह पीछे हटने जैसी बात है क्योंकि पाकिस्तान की जिद थी कि वह समग्र बातचीत से कम पर राजी नहीं होगा?

पाकिस्तान सरकार पहले ही कह चुकी है कि किसी भी पक्ष के लिए बातचीत की कोई पूर्व शर्त नहीं है. बेहतर है कि हम बारीकियों में न पड़ें. आप बातचीत को हटा दीजिए तो हम वापस शून्य पर आ जाएंगे.. यह निश्चित तौर पर पाकिस्तान के हित में नहीं है.

बातचीत पर अब भी मुंबई हमले का साया मंडरा रहा है. जनमत का असर नीतियों के निर्माण पर तो पड़ता ही है. और अब एक अनजान से संगठन लश्कर-ए-तैयबा अल अलमी ने पुणे धमाकों में अपना हाथ होने का दावा किया है.

अच्छा होगा हम बार-बार मुंबई और पुणे की बात न करें. आपके पास एक मुंबई है. हमारे यहां पूरे पाकिस्तान में कई छोटी-छोटी मुंबई हो रही हैं. हमने 5,000 से अधिक लोगों को खोया है और आतंकवाद से लड़ने पर 36 अरब डॉलर खर्च किए हैं. भारत और पाकिस्तान को वही रास्ते फिर से खोजने की जरूरत नहीं है जिनपर वे पहले चल चुके हैं. उन्हें समग्र बातचीत करनी चाहिए जिसमें वे कश्मीर और दूसरे मसलों समेत हर चीज पर बात कर सकें.

लेकिन कट्टरपंथियों का अपना एजेंडा है. भाजपा और शिवसेना बातचीत नहीं चाहते और हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर सैयद सलाहुद्दीन की मांग है कि कश्मीर एजेंडा का हिस्सा हो.

तो हम क्या करें? शीतयुद्ध छेड़ दें और परमाणु ताकत से लैस दो देशों के बीच फौजी दखलअंदाजी की मांग करें? बातचीत से दूर भागकर हम द्विपक्षीय तरीकों से आगे बढ़ने की किसी भी संभावना को खत्म कर देंगे. अगर दोनों देश आपस में बात नहीं करते हैं तो इससे सिर्फ आतंकवादी ही खुश होंगे. चरमपंथी हमसे लगातार कहे जा रहे हैं कि भारत, उसके लोगों, उसके सिनेमा, उसके खेल, आईपीएल और लगभग हर भारतीय चीज का बहिष्कार करें. लेकिन इस सारे मनमुटाव के बावजूद द्विपक्षीय व्यापार पिछले दो वर्षो में बढ़ा है और यह एक सकारात्मक संकेत है. पुणे के बम धमाके भारत-पाकिस्तान को नजदीक आने से रोकने की प्रक्रिया को भंग करने के लिए की जा रही लगातार कोशिशों का हिस्सा हैं..

लेकिन क्या बातचीत से नतीजे निकलेंगे?

ईमानदारी से कहूं तो मुझे नहीं लगता कि हमें सिर्फ यही सोचकर बातचीत करनी चाहिए कि इससे क्या हासिल होगा. कूटनीति में अकसर यह होता है कि बातचीत न हो रही हो तो एक छोटे पड़ोसी को लगता है कि उसे नजरअंदाज किया जा रहा है. इस बड़े मनोवैज्ञानिक पहलू को ध्यान में रखने की जरूरत है. मुझे लगता है कि (एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाने का) उकसावा कितना भी बड़ा हो तब भी हमें बातचीत जारी रखनी चाहिए. अगर दोनों पड़ोसियों के बीच भरोसा और विश्वास बनता है तो पाकिस्तान की सेना पर भी अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर आतंकवादी समूहों के खिलाफ काम करने का दबाव पड़ेगा, जिसमें से अधिकतर को उसी ने पैदा किया है. 

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