‘मैं खुद नहीं चाहता कि दस साल का बच्चा इश्किया देखे’
इश्किया के निर्देशक अभिषेक चौबे से गौरव सोलंकी की बातचीत
उत्तर प्रदेश का एक आम लड़का जब अपने घर पर बताता है कि उसे फिल्में बनानी हैं तो क्या प्रतिक्रिया होती है?
मेरा घर यूपी के आम घर जैसा नहीं है. मैं अपने छोटे से परिवार में अपने मां-पिताजी के साथ रहता था. तब मैं चौदह साल का था. सबसे पहले पिता जी को बताया था. वे हंस दिए. उन्हें लगा कि मुझे हीरो बनना है. तब मैंने कहा कि नहीं, डायरेक्टर बनना है. हंसी-मजाक होता रहा इसके बारे में. एक-दो बार पूछ लिया था कि कैट के फॉर्म निकल गए हैं, एमबीए नहीं करना है क्या? मैंने कहा कि नहीं. फिर बोले कि जो करना है, करो. ऐसा कुछ नाटकीय नहीं हुआ.
आपको क्या उससे भी पहले से लगता रहा था कि फिल्में बनानी हैं?
हां, मुझे बहुत पहले से लगता रहा था. मुझे कोई अंदाजा नहीं था कि यह काम क्या होता है, कैसे होता है, पर यह हमेशा लगता था कि इसमें मजा आएगा. मेरा पूरा परिवार फिल्मों का बहुत शौक़ीन था. हम हर फिल्म देखते थे. कोई अच्छी लगती थी तो तीन-चार बार भी देखते थे. जब मैंने उन्हें अपने शौक के बारे में बताया तो शायद इसीलिए उन्हें अंदर से अच्छा ही लगा था.
इश्किया के बाद जिंदगी में क्या बदला है? बहुत-सारी प्रशंसा तो मिल ही रही होगी?
कुछ ख़ास नहीं बदला. बस सोने को ज्यादा मिल रहा है और अगले हफ्ते एक हफ्ते की छुट्टी मनाने जा रहा हूं. प्रशंसा मिल रही है, पर जो चीज सबसे ज्यादा उत्साहवर्धक है, वह यह कि तटस्थ प्रतिक्रियाएं नहीं हैं. जिन्हें पसंद नहीं आ रही, वे भी उतनी ही कठोर आलोचना कर रहे हैं जितनी मीठी तारीफ है. यही काम तो एक फिल्म को करना चाहिए.
विशाल से कब मिले थे पहली बार? इतनी अच्छी ट्यूनिंग कैसे हो गईं?
शायद दिसंबर, 2001 में. मैं इंडस्ट्री में किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढ़ रहा था जो ईमानदार हो, जिसमें अहंकार न हो. उन्हीं दिनों विशाल से मिला. साथ ही हमारा बैकग्राउंड भी एक जैसा है. हम दोनों यूपी से हैं, दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से पढ़े हैं. सिनेमा को लेकर हमारा नजरिया भी एक जैसा था. जैसे हम दोनों सोचते थे कि जिस तरह हिंदी फिल्मों में संवाद बोले जाते हैं, उस तरह दुनिया में कोई बात नहीं करता. मैं यहां गालियों की बात नहीं कर रहा. जो भाषा हम इस्तेमाल करते हैं वह नकली होती है. ऐसी तीन-चार और चीजें थी. साथ ही हम प्रोफेशनली एक दूसरे की मदद कर रहे थे.
विशाल ने ओमकारा के समय कहा था कि उनमें अभी बहुत गुस्सा है. क्या वह गुस्सा भी कॉमन था?
(हंसते हैं) यह वैसा गुस्सा नहीं है कि दुनिया ने मेरे साथ कुछ गलत किया है. यह एक कलाकार का गुस्सा है. जैसे कोई कवि भी गुस्सैल कविता लिख सकता है. कभी-कभी गुस्सा आना जरूरी भी है.
फिल्म इंस्टीट्यूट कितने जरूरी लगते हैं आपको?
चूंकि मैं किसी फिल्म स्कूल में नहीं पढ़ा, इसलिए मुझे तो लगता है कि जरूरी नहीं हैं. लेकिन वे आपको बहुत-कुछ सिखाते तो हैं ही. मैं जब बंबई आया तो मुझे तो फिल्म में इस्तेमाल होने वाले रॉ स्टॉक और वीडियो में इस्तेमाल होने वाली बीटा टेप के बीच का फर्क भी नहीं पता था. मैंने सब नौकरी करके सीखा है. बॉस को कॉफी पकड़ाने से शुरू करके.
लेखक और निर्देशक, दोनों तरह से काम करने में क्या फर्क रहा?
मेरे लिए जरूरी है कि अगर मुझे निर्देशन करना है तो कहानी लिखने में भी मैं शामिल रहूं. लिखना भावनात्मक रूप से ज्यादा चुनौती भरा है. जबकि निर्देशन में आपको बहुत सारे लोगों को एक साथ मैनेज करना पड़ता है.
क्या यह सही है कि अधिकांश हिंदी फिल्मों की स्क्रिप्ट अंग्रेजी में लिखी जाती है? आप किस भाषा में लिखते हैं?
हां यह सही है. हमारे यहां स्क्रिप्ट में निर्देश अंग्रेजी में होते हैं और डायलॉग देवनागरी में. बहुत से लोग तो उन्हें भी रोमन में लिखते हैं. असल में इसका कारण भाषाई नहीं, तकनीकी है. लेकिन मेरे पास कोई हिंदी में स्क्रिप्ट लाता है तो मुझे कोई समस्या नहीं होगी.
फिल्म की भाषा जिस तरह की थी उसे लेकर सेंसर बोर्ड के साथ टकराव की संभावनाएं भी थी. उसका कैसा रुख रहा?
बहुत प्यारा. हमने एडल्ट सर्टिफिकेट मांगा जो उन्होंने दे दिया. मैं खुद नहीं चाहता कि आठ या दस साल का बच्चा इश्किया देखे.
आपकी और विशाल की फिल्में अपने आपराधिक परिवेश के लिए कहीं भी अपराधबोध से ग्रस्त नहीं होतीं. आपके अपराधी चरित्न कभी अपने गुनाहों के कारण कोई सजा नहीं पाते. क्या आपको नहीं लगता कि सिनेमा की कोई सामाजिक जिम्मेदारी होनी चाहिए?
वह तो जरूर होनी चाहिए. मगर अपराधी हमेशा अपने किए की सजा नहीं पाता. मैं ओथेलो की कहानी आज के परिवेश में दिखाने के लिए मध्यमवर्गीय परिवार तो नहीं चुन सकता था. मैं शहरी लोगों को यूपी का वह नेता दिखाना चाहता हूं जो बीच रास्ते में ट्रेन को वापस घुमवा सकता है. मैं उसका पक्ष नहीं ले रहा. आप थोड़ा गहराई से देखेंगे तो यही पाएंगे.
आपकी पसंदीदा फिल्में कौन-सी हैं?
सत्या, खामोश, गरम हवा, जाने भी दो यारों. कुछ छोटी छोटी फिल्में हैं जैसे सारा आकाश. आजकल अनुराग कश्यप और दिबाकर की फिल्में पसंद हैं.
इश्किया कुछ गिनी-चुनी फिल्मों में से है जो छोटे शहरों में भी पसंद की जा रही है..
हां, मुझे बहुत गुस्सा आता है. हम न उनके लिए फिल्म बना रहे हैं और न उनके बारे में. मुझे किसी ने बताया कि उत्तरप्रदेश के शहरों के किसी हॉल में जब गोरखपुर और फैजाबाद का नाम आता है तो लोग इतना चिल्लाते हैं कि आप अगले तीन चार डायलॉग नहीं सुन सकते. मैं उनके लिए दस और फिल्में बनाऊंगा.
अपराध और यूपी के बिना भी?
हां, बिल्कुल. मैं जवान हूं इसलिए बंदूकें और गैंगस्टर मुझे रोमांचित करते हैं, पर मैं जल्दी ही इससे बाहर आ जाऊंगा. मैं बस सड़क पर चलने वाले आदमी की फिल्में बनाना चाहता हूं.




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