‘क्या मैं कोई दीमक हूं जिसने बिहार को खा लिया?’
यह उतरती ठंड का मौसम है, लेकिन पटना में चल रही सर्द हवा से इसका एहसास नहीं हो रहा. हम बिहार विधानसभा में विपक्ष की नेता राबड़ी देवी के सरकारी निवास पर हैं. यहां कंपकंपाती सर्दी से राहत दिलाने के लिए एक अलाव जल रहा है. इसके पास ही गर्म कपड़ों से ढके-मुंदे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव बैठे हैं. एक व्यक्ति उनके पैरों की मालिश कर रहा है. ‘इन दिनों पैर कड़े हो जाते हैं.’ लालू फुसफुसाते हुए कहते हैं. बगल में दूसरा व्यक्ति लालू के लिए खैनी मल रहा है. कागजों के बंडल के साथ तीसरा सहायक भी यहीं खड़ा है. अलग-अलग आंकड़ों वाले इन कागजों में नीतीश कुमार के विकास के दावों की हवा निकालने की तैयारी है. मकर संक्रांति के दिन उनके यहां दही चिउड़े, आलू चोखा और तिल के लड्डू खाने के लिए इकट्ठे हुए लोगों की तादाद तकरीबन 300 थी जो उन दिनों से काफी कम है जब वे बिहार के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. वैसे लालू आज भी अपने पुराने अंदाज में ही दिख रहे हैं लेकिन उन्हें इस बात का एहसास जरूर है कि इस साल होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव उनकी सबसे कठिन परीक्षा साबित होने जा रहे हैं. तहलका से बातचीत में लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, उनके विकास के दावे और खुद उनपर लगे आरोपों से जुड़े सवालों के जवाब दे रहे हैं :
नीतीश कुमार शासन में हो रहे बिहार के विकास पर क्या कहेंगे?
आप जिन आंकड़ों के आधार पर यह बात कह रहे हैं उनको सीएसओ (केंद्रीय साख्यिकी संगठन) वापस ले चुका है. खेती-बाड़ी बिहार का मूल धंधा है, पिछले तीन साल से इस क्षेत्र की विकास दर नकारात्मक है. ऐसे में आप बिहार की गुजरात से तुलना कैसे कर सकते हैं? क्या आपने रातों-रात विकास कर लिया? मैं बच्चा नहीं हूं. मैंने 15 साल तक सरकार चलाई है, क्या मुझे नहीं पता कि चीजें कैसे दिखाई जाती हैं?
तो क्या इस मामले में सिर्फ भ्रम फैलाया गया है?
क्या नीतीश कुमार के पास जादू की छड़ी है जिसे घुमाकर वे सब-कुछ बदल देंगे? ऐसा लग रहा है कि अब मनमोहन सिंह और बराक ओबामा को नीतीश कुमार से सीख लेनी चाहिए. और, नीतीश कुमार को नोबल पुरस्कार मिलना चाहिए. जोरदार विकास का भ्रम मीडिया और सरकार के बड़बोलेपन से पैदा हुआ है. बिहार में ऐसा होने में काफी वक्त लगेगा. यहां किस्से-कहानियों की बात नहीं चल रही है.
अपने शासन के बारे में क्या कहेंगे? आपके पास तो 15 साल थे.
बिहार एक जटिल राज्य है. यहां आपको पता होना चाहिए कि सबको साथ लेकर कैसे चला जाए. मैंने बेइज्जती बर्दाश्त की. मैं जेल गया. वे कहते हैं कि मैंने चारा खा लिया. क्या मैं कोई दीमक हूं जिसने बिहार को खा लिया? मैंने गरीबों को आत्मस्वाभिमान दिया. रेल मंत्री रहते हुए जो कर सकता था वह सब किया. मेरे हर काम को अब ये लोग बर्बाद करना चाहते हैं. करने दो..
ऐसा लगता है कि नीतीश ने आपके अनुभवों से सबक लिया है?
नीतीश ऊंची जातियों के हाथ का खिलौना हैं. बिहार चलाने के लिए बहुत कुछ चाहिए. नीतीश भी यह सीखेंगे. मैं कमजोर और गरीब लोगों की आवाज हूं. आपने अभी देखा होगा मेरे यहां खाने पर कैसे लोग आए थे. लालू के अलावा उन्हें कौन इज्जत देगा. लालू अभी खत्म नहीं हुआ है.
अब क्या करने वाले हैं?
हम सड़कों पर उतरेंगे, लोगों को बताएंगे कि बढ़ती महंगाई के लिए केंद्र और राज्य दोनों सरकारें जिम्मेदार हैं. आप देखेंगे कि लालू किस मिट्टी का बना है और यह भी कि विकास के दावे कितने खोखले हैं.




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