‘मायावती कहती थीं, तुम्हारे मुसलमान गद्दार हैं’
उर्दू दैनिक नई दुनिया के संपादक शाहिद सिद्दीकी कभी मुलायम सिंह के करीबी थे. चुनावों से पहले पाला बदलते हुए बसपा में जाकर उन्होंने कइयों को हैरान कर दिया. मगर पिछले दिनों उन्हें बसपा से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. हरिंदर बवेजा के साथ बातचीत में सिद्दीकी ने कहा कि वे कभी बसपा सुप्रीमो मायावती की मंडली का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे क्योंकि फिर उन्हें भी फूहड़ बनता पड़ता. बातचीत के मुख्य अंश :
बसपा से निकाले जाने का कोई दुख?
बसपा से जुड़ना मेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल थी. मैंने सोचा था कि दलित, पिछड़ों, गरीबों और अल्पसंख्यकों के लिए काम करूंगा. अल्पसंख्यकों की हालत तो भारत की राजनीति में अनाथों जैसी है, खासकर मुसलमानों की. मुझे लगा कि दलित-मुस्लिम गठजोड़ से हम भारत में एक नई राजनीति शुरू कर सकते हैं. पर बसपा में नीतियों पर कोई चर्चा ही नहीं होती. तानाशाही चलती है. मायावती असुरक्षित महसूस करती हैं इसीलिए वे छोटी सी आलोचना से भी डर जाती हैं.
मायावती असुरक्षा क्यों महसूस करती हैं?
मेरे ख्याल से वे बतौर महिला और बतौर दलित, दोनों तरह से असुरक्षा महसूस करती हैं. इंदिरा गांधी और जयललिता सहित शीर्ष पर बैठने वाली ज्यादातर महिला नेताओं के साथ ऐसा रहा है.
आप कहना चाहते हैं कि महिलाओं को असुरक्षा होती ही है?
नहीं. मैं कहना चाहता हूं कि महिला होने की वजह से उन्हें निशाना बनाया जाता है क्योंकि राजनीति में पुरुषों का वर्चस्व है. इसमें आने वाली महिलाएं किसी पुरुष की वजह से ही आई हैं.
आप कांशीराम की तरफ इशारा..
(बीच में ही) मैं किसी की तरफ इशारा नहीं कर रहा हूं. अपने शब्द मेरे मुंह में मत डालिए.
मायावती की कार्यप्रणाली के बारे में बताएं.
मैं कांशीराम जी को 1982 और मायावती जी को 1984 से जानता हूं. जाति व्यवस्था के बारे में कांशीराम को देश के किसी भी समाजशास्त्री से ज्यादा जानकारी थी. मैंने उन्हें भी पनपते देखा है और उनकी छाया में मायावती जी को भी. उत्तर प्रदेश में बसपा को खड़ा करने में मायावती का ही योगदान है. लेकिन सत्ता ने उन्हें भ्रष्ट कर दिया है. वे कार्यकर्ताओं से दूर हो चुकी हैं. अब सिर्फ पैसे वालों के साथ ही उठती-बैठती हैं. कार्यकर्ता मुझसे आकर कहते हैं कि एक बार बहनजी से मिलवा दीजिए. मैं कहता हूं कि मैं खुद उनसे नहीं मिल सकता. उन्हें किसी से कुछ भी सुनना पसंद नहीं है. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को मैंने उनके सामने कांपते हुए देखा है. पहले तो दलित संगठनों के साथ बातचीत भी करती थीं पर काफी समय पहले यह प्रक्रिया भी बंद हो गई. किसी को नहीं पता कि उनके सलाहकार कौन हैं. वे इतना असुरक्षित महसूस करती हैं कि अपना भाषण भी लिखकर पढ़ती हैं. वे हमेशा मुझसे कहती थीं, ‘मीडिया में जाओगे तो फंस जाओगे’.
क्या वे मीडिया से डरती हैं या उन्हें लगता है कि मीडिया के बिना भी उनका काम चल जाएगा?
दोनों, उन्हें मीडिया से डर लगता है क्योंकि उनके मुताबिक इसमें ऊंची जातियों का प्रभुत्व है. और उनके हिसाब से वे मीडिया के विरोध के बावजूद जीती हैं इसलिए उन्हें मीडिया की जरूरत नहीं है.
आप भले ही उन्हें घमंडी कहें मगर यह तो मानेंगे कि वे जमीन से जुड़ी नेता हैं?
जमीन से जुड़ी नेता वे 20 साल तक थीं. अब सत्ता की चमक ने उन्हें बंधक बना लिया है. कार्यकर्ता उनसे मिल नहीं सकता. यहां तक कि जनरल सेक्रेटरी होने के बावजूद मैं उनसे नहीं मिल सकता था.
17 महीनों में मायावती से कितनी बार बात हुई?
सिर्फ तीन बार. वह भी बड़ी मेहनत के बाद.
क्या मायावती, राहुल गांधी से डरी हुई हैं?
हां, वे डरी हुई हैं और डरना भी चाहिए. दलित बसपा से इस उम्मीद से जुड़े कि पार्टी उन्हें हजारों साल के शोषण से मुक्ति दिलाएगी. पर मायावती ज्यादातर टिकट बड़ी जातियों और पैसे वालों को दे रही हैं. पैसा देकर टिकट पाने वाले ये लोग अपने निवेश का मुनाफा चाहते हैं. उन्हें दलितों की कोई परवाह नहीं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके वोट आने तो पक्के हैं ही. उधर, दूसरी पार्टियों की सोच है कि जब उन्हें किसी कीमत पर दलितों के वोट नहीं मिलेंगे तो फिर उनकी भलाई के लिए काम क्यों करना? दोनों तरफ से दलित ही पिस रहे हैं.
क्या मायावती अपने उम्मीदवारों से पैसा लेती हैं?
मैंने एक भी पैसा नहीं दिया था. लेकिन मैं सबसे सुनता था कि ‘हम तो इतना देकर आए हैं’. गलत तरीके से पैसा कमाए बिना आप बसपा में नहीं रह सकते.
आपको इसी तरह की पार्टियों का अनुभव है. अमर सिंह का मुलायम सिंह पर कितना प्रभाव था?
आर्थिक मामले उनके हाथ में रहते हैं. अमर सिंह के खिलाफ टिप्पणी करने वाले को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ती है. मुलायम सिंह जी उन पर अंधश्रद्धा रखते हैं. पैसे का जुगाड़ कर सकने वालों की हर पार्टी में पूछ है.
सपा छोड़ने का कोई दुख है?
बिल्कुल है. वहां मुझे कहीं ज्यादा इज्जत और आजादी हासिल थी. मुलायम सिंह जी और अमर सिंह जी से मेरे काफी अच्छे रिश्ते थे. लेकिन उन्होंने मुसलमान नेताओं को जागीर समझना शुरू कर दिया था. वे इमाम बुखारी से मिलने गए तो मैंने जाने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि वोट पाने के लिए उन्हें दाढ़ीवाले की जरूरत है. मायावती भी मुझसे कहतीं थीं, ‘तुम्हारे मुसलमान गद्दार हैं. वोट नहीं देते’.




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Comments (4 posted):
aapne alpshankhak kee baat ki kiya kya hai aape unke liye ?
unko dar kyo nahi lagega yaha to log avsar dekhte hai.
aap sirf ek awsarwadi neta hain
jab tak aap bahanji ki aad me maal kamate rahe tab tak kuch nahi bola aaj kah rahe hain ki bahan ji bhrast hain
yeh to wohi bat hui jis thali me khaya usi me ched kiya
aap jaise longo se samaj kya ummeed karega
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