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'मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं है'

image रजत शर्मा, चेयरमैन, इंडिया टीवी

रजत शर्मा को टेलीविज़न शो ‘आप की अदालत’ से पहले बतौर अखबारी पत्रकार कम ही लोग जानते थे। 16 साल बाद, आज उनका खुद का न्यूज़ चैनल टीआरपी की दौड़ में सबसे आगे है। हरिंदर बवेजा के साथ बातचीत में शर्मा ने सफलता के अपने ही तरीकों से लेकर अपने प्रतिद्वंदियों तक पर बेबाकी से अपने विचार रखे।

आखिरी पायदान से शीर्ष तक का सफर...अपनी यात्रा के बारे में कुछ बताएं?

बहुत मुश्किलों भरी थी ये. आज से चार साल पहले जब मैंने इंडिया टीवी शुरू करने का फैसला किया था तब मेरे दोस्तों ने मुझसे कहा कि मैं एक ऐसे बाज़ार में छलांग लगाने जा रहा हूं जो पहले से ही खचाखच भरा हुआ है। एनडीटीवी, स्टार, आज तक, ज़ी, सहारा और डीडी जैसे न्यूज़ चैनल पहले से ही स्थापित थे। लेकिन मेरा विश्वास उन दर्शकों पर था जिन्होंने मेरे पूरे टेलीविज़न करियर के दौरान मेरा साथ दिया था। मुझे यकीन था कि अगर मैं अपना चैनल शुरू करता हूं तब भी वे मेरा साथ देंगे। इसमें काफी समय और ऊर्जा लगी। इस दौरान कई डरावने पल भी आए, जब मुझे लगा कि शायद मैं इसे कर ही न पाऊं। तीन मौकों पर मुझे तनख्वाहें देने के लिए अपनी संपत्ति तक को बेचना पड़ा। 20 सालों के करियर में मैंने जो भी कमाया था वो सब धीरे-धीरे गायब होने लगा। लेकिन परिस्थितियां बदली। जब पहला विदेशी निवेशक सामने आया तो उसने कंपनी की कीमत 300 करोड़ आंकी, अगले ने 600 करोड़ और अब निवेशक इसे 1000 करोड़ का बताते हैं। आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि संकट के जो पल थे उनसे गुज़रना बेकार नहीं गया।

आज तक और स्टार जैसे अपने निकट प्रतिद्वंदियों को पछाड़ने का आपका फार्मूला क्या है?

मैं अपनी संपादकीय टीम से कहता रहता हूं कि टीवी का दर्शक वर्ग किसी क्रिकेट के खेल की तरह होता है। एक समय था जब टेस्ट मैच काफी पसंद किए जाते थे, गावस्कर हीरो थे। इसके बात सीमित ओवरों के क्रिकेट का जमाना आया और कपिल के रूप में नया सितारा चमका। अब ज़माना टी-20 का है। आज मैं ये थोड़े ही कह सकता हूं कि मुझे सुनील गावस्कर बन कर टी-20 खेलना है। ‘काँटेंट’ को समय के साथ बदलना ही होता है फिर भले ही इसमें मीडिया के दूसरे साथियों की आलोचना क्यों न झेलनी पड़े। हमारे प्रतिस्पर्धी इसे लोकप्रियता की होड़ का नाम दे सकते हैं लेकिन हमारा असल सरोकार तो दर्शक से ही होता है। अगर दर्शक टी-20 देखना चाहते हैं तो मैं उन्हें टेस्ट मैच थोड़े ही दिखा सकता हूं।

आलोचनाओं पर आते हैं...हिंदी चैनलों की सबसे ज्यादा आलोचना इस बात के लिए हो रही है कि उनकी काँटेंट का स्तर काफी गिर गया है।

नहीं, ऐसा नहीं है। हमने न्यूज़ की परिभाषा बदल दी है। अगर लोग आज भी सोचते हैं कि फीता काटते नेता और संसद में भाषण देना ही ख़बर हैं तो वो दिन बीत गए। हिंदी के न्यूज़ चैनलों पर आरोप लग रहे हैं लेकिन अगर आप सभी बड़े अख़बारों के मुखपृष्ठ पर नज़र डालें तो आपको आईपीएल नज़र आएगा। सच्चाई ये है कि दो शीर्ष साप्ताहिक पत्रिकाएं भारतीय महिलाओं की यौन अभिरुचियों पर कवर स्टोरी छाप चुकी हैं, लेकिन उन्हें तो कोई कटघरे में खड़ा नहीं करता। तहलका को छोड़कर, जो कि एक अपवाद रहा, लगभग सभी लोकप्रिय पत्रिकाओं में आईपीएल को प्रमुखता दी गई। अगर आप पुरानी परंपरा के हिसाब से चलेंगे तो इस हफ्ते की कवर स्टोरी महंगाई होनी चाहिए थी। इसी तरह से टेलीविज़न न्यूज़ चैनलों की भी विषयवस्तु बदल गई है।

राजनीतिक तबके के विचारों की आप किस हद तक परवाह करते हैं?

बहुत ज्यादा। जिस तरह से राजनेता लोगों के प्रति जवाबदेह हैं उसी तरह हम भी हैं। हमारा काम ही है राजनीतिज्ञों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना। इसी सोच से प्रेरित होकर “आप की अदालत” का जन्म हुआ था। आज 16 साल बाद भी ये प्रोग्राम उतना ही पसंद किया जाता है। इंडिया टीवी इसी फॉर्मूले पर आधारित है। इसकी कोशिश है कि लोग जनता के प्रति जवाबदेह बनें, चाहे वो राजनेता हों, फिल्म स्टार हों या फिर क्रिकेटर।

अगर मैं ये कहूं कि इंडिया टीवी भूत-प्रेत का पर्याय बन गया है तो आप क्या कहेंगे?

ये छह महीने पहले की बात है। उसके बाद से हमने भूत-प्रेत की एक भी कहानी नहीं दिखाई है।

लेकिन आपने टीआरपी की सीढ़ियां चढ़ने के लिए इसका सहारा लिया है।

नहीं, हमने ऐसा नहीं किया। उन दिनों इसी तरह की कहानियां आती थीं। और लोग इन्हें पसंद करते थे। उदाहरण के लिए पिछले हफ्ते हमने पाया कि 51 फीसदी दर्शकों ने इंडिया टीवी देखा क्योंकि हमने विष्णु का इंटरव्यू दिखाया था, जो कि पहले राजेश तलवार के यहां काम करता था। हमारे रिपोर्टर ने उसे नेपाल में कहीं ढूंढ़ निकाला था। पिछले हफ्ते हमें रेटिंग में सबसे ऊपर जगह मिलने की वजह रही आरुषि हत्याकांड पर हमारी विस्तृत कवरेज। इसमें भूत-प्रेत या सांप-नागिन की कोई भूमिका नहीं थी। किस्मत से दूसरे ख़बरिया चैनलों ने वही पुराना फॉर्मूला अपनाया। शाहरुख ख़ान के शो पांचवीं पास... में लालू प्रसाद यादव मेहमान बन कर आए। ये राजनीति और मनोरंजन का शानदार मेल था। हम लोगों की पसंद के मुताबिक चल रहे हैं।

आप ख़बरों के बाज़ार में हैं या मनोरंजन के?

हम सिर्फ और सिर्फ ख़बरों के बाज़ार में हैं। मगर इन दिनों मनोरंजन भी बड़ी ख़बर बन गया है। समय बदल रहा है। आईपीएल क्रिकेट है, मनोरंजन नहीं। लालू एक राजनेता हैं, जनता के प्रतिनिधि, आप उन्हें मनोरंजनकर्ता नहीं कह सकते। इंडिया टीवी एक न्यूज़ चैनल है, आप इसे मनोरंजन चैनल नहीं कह सकते।

सामाजिक जिम्मेदारियों पर क्या कहेंगे? क्या इंडिया टीवी खैरलांजी में हुई हत्याओं पर कोई अभियान चलाएगा?

इंडिया टीवी अकेला चैनल है जिसने अभियानों को सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में चलाया है। मैं आपको तमाम उदाहरण दे सकता हूं। मैं विनम्रता से कुछेक के बारे में आपको बताता हूं। एक जादूगर बच्चे को हर महीने 60,000 रूपए का एक इंजेक्शन लगना था। हमारी स्क्रीन पर एक अपील तीन घंटों तक प्रसारित हुई और इसके बाद चेकों की बरसात होने लगी। मुंबई में अनाथ बच्चों के लिए एक सामाजिक संस्था थी। एक दिन भवन के मालिक ने उन्हें निकाल फेंकने का फैसला कर लिया। इंडिया टीवी वहां पहुंचा और वहां से सीधा प्रसारण शुरू कर दिया। अंतत: मालिक को अपना फैसला बदलना पड़ा। जब पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोत्तरी की घोषणा की गई, हम दिन भर दिखाते रहे कि इस बढ़ोत्तरी का लोगों पर क्या असर पड़ने वाला है। जब भी सामाजिक, राजनीतिक या फिर दर्शकों के हितों के लिए लड़ने की बात आएगी दर्शक हमेशा हमारी जिम्मेदारी को महसूस करेंगे। इसीलिए इंडिया टीवी ने अब अपनी टैग लाइन बनाई है “आपकी आवाज़”। जनता की आवाज़ बनना ही हमारा लक्ष्य है।

लेकिन ये बात तो सच है कि टीआरपी की लड़ाई में अपने प्रतिस्पर्धियों से आगे निकलने के लिए इंडिया टीवी ने भूत प्रेत का सहारा लिया?

इंडिया टीवी ने समय की जरूरतों के हिसाब से खुद को बदला है। एक समय था जब हमने उड़ीसा के एक गांव में चुड़ैल के घूमने की ख़बर दिखाई थी। हमने अपने दर्शकों को खबर के माध्यम से बताया कि ये महज़ अंधविश्वास है।

लेकिन इस बात से तो आप सहमत होंगे कि ये कोई ख़बर नहीं है?

ये खबर ही है। मान लीजिए ठाणे में ये अफवाह है कि वहां कोई भूत घूम रहा है जो लोगों की हत्या कर रहा है। हम लोगों को बताते हैं कि ये कोई भूत नहीं है बल्कि कोई हत्यारा है जो ऐसा कर रहा है। हम इस तरह की ख़बरें लोगों को जागरुक करने के लिए दिखाते हैं।

आप कह रहे हैं कि लोग जो चाहते हैं आप वही दिखाते हैं। पर आप को नहीं लगता कि आपको खुद भी एक मानक स्थापित करने की जरूरत है?

इस देश का एजेंडा क्या है? क्या ये सिर्फ नेताओं को गाली देते रहना है? क्या सिर्फ लंबे-लंबे भाषण और फीते कटते हुए दिखाए जाएं? हमने मानक तय किए हैं। आज मैं आपसे पूरे गर्व के साथ ये कह सकता हूं कि हमारे पीछे सात चैनल हमारे नक्शेक़दम पर चल रहे हैं। वे हमारी काँटेंट ही नहीं बल्कि चैनल को प्रमोट करने का तरीका भी अपना रहे हैं। ये चैनल हमारे ग्राफिक्स, सेट्स, संगीत और विजुअल्स...सब की नकल कर रहे हैं। आज हम ट्रेंडसेटर बन चुके हैं। इसी वजह से हमें इतनी संख्या में लोग पसंद कर रहे है, लोग असल को देखना पसंद करते हैं, नकल नहीं।

क्या आपका कोई फॉर्मूला है?

मैं अपने संपादकीय दल के साथ रोज़ाना होने वाली बैठकों में कहता हूं कि “जाओ और खुद को झोंक दो”। ऐसी स्टोरी मत करो जिससे मुझे, चीफ प्रोड्यूसर को या तुम्हें खुशी मिलती हो। ऐसा करो कि जिससे दर्शकों को खुशी मिले। यही मेरा फॉर्मूला है। दर्शक के लिए करो, उनके लिए बोलो।

आपके पास न्यूज़ और इन्वेस्टिगेशन के लिए लंबा-चौड़ा बजट है।

जब हमने इन्वेस्टिगेशन पर ध्यान देना शुरू किया तो हमारे ऊपर “स्टिंग चैनल” का ठप्पा लग गया। जब हमने इसे रोक दिया तो लोग कहने लगे, रोका क्यों? ये तेज़ी से बढ़ने, नंबर वन होने की दुश्वारियां हैं। पिछले साल हमारी तरक्की की रफ्तार 110 फीसदी रही। हमारे प्रतिद्वंदियों की रही महज़ 2-4 फीसदी। लोग इस फॉर्मूले को जानना चाहते हैं। फार्मूला ये है कि मैं दिन में 18 घंटे अपने न्यूज़रूम में ही बिताता हूं, मैं अभी भी स्टोरी लिखता हूं। मैं गर्व से कह सकता हूं कि इस देश में ऐसा कोई नहीं है जो एक चैनल का मालिक होते हुए भी स्क्रिप्ट लिखता हो और तीन घंटे की प्रोग्रामिंग और प्रोमोज़ भी करता हो।

शक्ति कपूर के स्टिंग ऑपरेशन की ये कह कर आलोचना हुई थी कि ये लोगों के निजी  जीवन में ताकाझांकी थी। आपको लगता है कि वो एक ग़लती थी?

नहीं, मुझे इस पर फख्र है। पिछले हफ्ते हमारे एक प्रतिद्वंदी ने कास्टिंग काउच पर एक कार्यक्रम चलाया। छह महीने पहले ही पूर्व में नंबर एक रहे एक चैनल ने भी इसे उठाया था। मुझे फिल्म इंडस्ट्री या फिर मीडिया की तरफ से होने वाली आलोचनाओं की चिंता नहीं थी। मेरे ख्याल से ये फिल्म इंडस्ट्री में आने को लालायित युवा लड़कियों को चेतावनी देने के लिए उठाया गया एक सही क़दम था।

आपको टीआरपी के लिए कुछ भी करने और व्यावसायिक सफलता की अंधी दौड़ में ख़बरों को दरकिनार करने का दोषी ठहराया जा सकता है।

मेरी रुचि कभी भी व्यावसायिक सफलता पाने में नहीं रही। मुझे पैसे ने कभी आकर्षित नहीं किया। लोगों का प्यार और लोकप्रियता ही हमेशा से मेरी कमज़ोरी रही हैं।

आपको नहीं लगता कि आपने “काँटेंट” का स्तर गिरा दिया है?

बिल्कुल नहीं। अगर हमारी सामग्री इतनी घटिया है तो फिर बाकी सात चैनल इसकी नकल क्यों कर रहे हैं? जब भी लोग मुझसे टीआरपी की दौड़ में शामिल होने के बारे पूछते हैं तो मुझे बहुत आश्चर्य होता है। क्या आप सचिन तेंदुलकर से कभी पूछते हैं कि वो इतने सारे रन क्यों बनाते हैं? मेरा काम एक ऐसे चैनल की स्थापना है जो रेटिंग्स में शीर्ष पर हो। इस पर मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं है।

आज तक, स्टार न्यूज़ जैसे प्रतिस्पर्धियों में आपको क्या अच्छा लगता है और वो क्या चीज़ है जो आपको चिंता में डालती है?

मुझे उनका जुझारूपन अच्छा लगता है। एकाध मौकों को छोड़ दिया जाए तो हम स्वस्थ प्रतिस्पर्धी रहे हैं। हमारा नंबर एक पर काबिज होना ऐसा था मानो हरभजन ने श्रीसंथ को थप्पड़ मार दिया हो। इससे पहले हमारी लड़ाई में दुर्भावना नहीं थी। मैं अवीक सरकार की तहेदिल से इज़्ज़त करता हूं जो इस समय स्टार न्यूज़ के मुखिया हैं। मैं अरुण पुरी का सम्मान करता हूं जो आज तक के प्रमुख हैं। इन लोगों ने भारतीय पत्रकारिता को नये-नये आयाम दिये हैं। अवीक सरकार ने ‘टेलीग्राफ’ की शुरुआत की और अरुण पुरी ने ‘इंडिया टुडे’ की। ये लोग पुरोधा हैं। जब हम उनके चैनलों को ऐसा करते हुए देखते हैं तो कष्ट होता है। लेकिन हम इस गंदे खेल में शामिल नहीं होंगे। हम न तो कोई जवाब देंगे न मखौल उड़ाएंगे और न ही उन्हें गालियां देंगे।

Comments (58 posted)

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suresh bishnoi 22/07/2008 14:36:36
रजत साहब के जज़्बे को सलाम !
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bhodhisattva 24/07/2008 11:48:53
Rajatji! Raat ko kuchh blue film type ka bhi masala dikhao. TRP danadan badegi.
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अतुल श्रीवास्तव 25/07/2008 14:55:21
शमिंदगी होनी भी नहीं चाहिए, क्योंकि आप के शमिंदा होने से कुछ होने वाला नहीं, शमिंदा तो हम हैं, आपको एक अच्छा और बडा पत्रकार मानते थे पर अब पता चला कि आप टीआरपी में नंबर वन रहने के लिए कुछ भी कर सकते हैं, दूसरे कमेंट में बोिधस्तव ने ठीक ही लिखा है टीआरपी बढाने के लिए आप कोई ब्लू फिल्म टाईप का मसाला दिखाआे, रजत जी आप नहीं शमिंदा तो हम हैं, आपके न्यूज चेनल के मौजूदा स्वरूप को देखकर.
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जलज 26/07/2008 05:16:47
रजत जी, आप मानें या न मानें अब टीवी चैनलों पर न्‍यूज कम और लटके झटके ज्‍यादा आते हैं जिन्‍हें न देखने पर कोई बौद्धिक नुकसान नहीं होता कि आज सबसे बड़ी खबर से वंचित रह गया। मेरा मानना है कि यदि कोई भी भारतीय 15 दिन लगातार हिंदी के कथित न्‍यूज टीवी चैनल न देखें तो उसका कोई नुकसान होगा। अब गिने चुने चैनल ही है जो न्‍यूज दिखाते हैं। केवल टीआरपी के लिए तो लोगों के घरों में, होटलों में कैमरे लगवा दीजिए और वहां से सीधे प्रसारण किजिए रात की रंगंनियां, ब्‍लू फिल्‍में‍ दिखाइए मजा आ जाएगा। टीआरपी एक ही दिन में धड से बढ़कर चांद पर पहुंच जाएगी जिसे कोई छू नहीं सकेगा। आत्‍ममंथन कीजिए कि आपके चैनल ने देश को क्‍या दिया। विदेशों में घटिया न्‍यूज से हमारी छवि अभी भी सांप व मदारी वाले देश की है जबकि हम आर्थिक महासत्ता और एशिया में राजनीतिक ताकत के रुप में उभरना चाहते हैं। लेकिन लोग देखते है‍ कि इस देश में तो भूत, चुड़ैल, पति पत्‍नी के झगड़े और निजी मामलों को जमकर उछाला जाता है तो वह देश क्‍या प्रगति करेगा। यदि सात चैनल आपका अनुसरण कर रहे हैं तो आप ही फिर मुख्‍यधारा को बदलने का बीडा क्‍यों नहीं उठाते। सात चैनल यदि भाड़ में जाना चाहते हैं तो आप खुद क्‍यों जा रहे हैं।
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Iqbal 26/07/2008 19:45:41
maine to news dekhna hi band kar diya hai. yahan par khabar samajhne ki jagah insaan ulajh jata hai, sabko meri yahi rai hai ki ab radio suna jaaye. dus minure mein poori khabar!
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santoshsingh 28/07/2008 10:21:45
rajat sahab ke jujbo ko hum salaam kurte hai......leharo k anukul to sabhi thairte hai...lehro k pratikul tairane wala hi sacche bahabur kahlata hai.....once again i salute.....rajat sahab....!!!
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vinod dongre 30/07/2008 09:09:57
rajat ji, your dare is really admirable. but pay you kind attension on the comments given by the readers of tehelka/ thanks.
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Pushpendra Singh 30/07/2008 12:29:17
रजत जी आप न्यूज़रुप में 18 घंटे काम करते हैं ये अच्छी बात हैं लेकिन बाकी चैनलों के मालिकों के बारे में आपकी जानकारी अधूरी हैं। सिर्फ आप ही मालिक होते हुए भी स्क्रिप्ट नहीं लिखते, बल्कि राजदीप सरदेसाई, प्रणव राय और अजित अंजुम जैसे दिग्गज लोग आज भी स्क्रिप्ट लिखते और फिल्ड में रिपोर्टिंग करते देखे जाते हैं। आप तो सिर्फ कमरे में कैद होकर बिना वजह हर ख़बर को ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव बताते हैं। हर खबर पर एक्सक्लूसिव तो ऐसे लिख देते हैं जैसे या तो आप किसी और चैनल को देखते ही नहीं हैं या फिर आप गलतफहमी की एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहां आपको लगता हैं कि पूरी दुनिया सिर्फ आपका ही चैनल देख रही हैं। आपके चैनल में फालतू की ख़बरे कैसे दिखाई जाती हैं इसकी ताजा मिसाल बताता हूं। मंगलवार को आपके चैनल ने दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेटर आंद्रे नैल को आदमखोर क्रिकेटर के रुप में पेश किया। पहली बात ये पत्रकारिता हैं ही नहीं, दूसरा आपके जैसे सम्मानित पत्रकार के चैनल में इस तरह की बेहद घटिया ख़बर आपका ही नाम खराब करती हैं। बेशक आपको अभी फर्क नहीं पड़ेगा,लेकिन आने वाले समय में लोग सिर्फ न्यूज़24 और एनडीटीवी जैसे चैनल ही देखेंगे, जहां वाकई में न्यूज़ को न्यूज़ की तरह ही पेश किया जाता हैं, क्रिकेटर को आदमखोर और हर ख़बर को ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव नहीं। रही बात आपके 18 घंटे तक न्यूजरुम में काम करने की। तो आपकी जानकारी के लिए बता दू कि आपके ही चैनल के लोग इस बात को झूठा बताते हैं।
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pravin 31/07/2008 10:12:07
nahi rajat sharma sharm hame aani chahiye ki hum abhisapt hain tumhare india t.v ko dekhane ke liye..patrakarita ko bhandgiri me tabdil karne ke liye tumhara naam sunahare akchharoon me likha jayega...JAI HINND
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kanchan 03/08/2008 05:41:36
whenever there will be the talks of worst channel which shows all kinds of rubbish and shit in the name of news, it will be RAJAT SHARMA's IndiaTV.it's tag line says badalte bharat ki tasveer but it's bringing all the changes for worst.it is a blot in the name of news channel which one should avoid.i always used to think that it's India tv which is responsible for bringing shameless and poor tasted contents in the name of news and Mr Rajat Sharma himself has acknowledged this fact in this Interview.his claims clearly convey his willingness and ability to stoop to any low to win the TRP race.India TV should be banned for polluting environment of hindi tv news media.
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