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'मज़बूत संसद ही तानाशाही का इलाज है'

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सत्तासीन गठबंधन को अलविदा कहने से ठीक पहले पीएमएल(एन) के अध्यक्ष और पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की हरिंदर बवेजा से बातचीत.

मुशर्रफ की रवानगी के बाद आप खुद को विजेता महसूस कर रहे हैं?

ये कोई निजी दुश्मनी नहीं है। ये एक राष्ट्रीय मुद्दा था, ये तो पाकिस्तान का दुर्भाग्य है कि इसकी आज़ादी के 62 सालों में से 33 सैन्य शासन की भेंट चढ़ गए। जब भी कोई सैन्य तानाशाह सत्ता में आया उसने संविधान की धज्जियां उड़ाई। उसने क़ानून का सम्मान नहीं किया और इस बार तो मुशर्रफ ने जजों को ही जेल में डाल दिया। ये निहायत ही दुखद और परेशान करने वाली बात है। मैं फिर से कहना चाहता हूं कि इसमें कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है।

एक बात बताइए, निर्वासन के सालों में एक राजनेता के तौर पर आपने खुद को कैसे संभाले रखा?

मेरे ख्याल से लोकतंत्र की जड़ें मेरे भीतर, मेरी सोच में, मेरे दिमाग में, मेरे दिल में, मेरे विचारों में मजबूत हो रही थीं। मैं बहुत गहराई से लोकतंत्र से जुड़ा हूं, इसलिए मुझे लगता है कि अब मुझे अपना समय ये सुनिश्चित करने में लगाना चाहिए कि आगे से हमारी व्यवस्था, लोकतंत्र और राजनीतिक ढांचे पर किसी तरह का कोई ख़तरा पैदा न हो। एक तानाशाह को इस बात की परवाह नहीं होती कि कौन प्रधानमंत्री है, कौन राष्ट्रपति। वो सारी शक्ति हाथ में लेने की कोशिश करता है यहां तक कि प्रधानमंत्री और संसद के अधिकार भी। वो इन्हें छीन लेते हैं और सर्वशक्तिमान बन जाते हैं। मैं अपनी बची-खुची ज़िंदगी व्यवस्था को मजबूत करने और ये सुनिश्चित करने में लगाना चाहता हूं कि कोई भी संविधान से इतर कोई क़दम न उठाए और साथ ही सेना भी अपनी छावनियों में रहे।

क्या मुशर्रफ को सुरक्षित रास्ता देना भी डील का हिस्सा है?

इसमें किसी तरह की डील नहीं है। ये बिल्कुल साफ है, पाकिस्तान की जनता ने 18 फरवरी को अपना फैसला दे दिया था। मेरे ख्याल से सत्ताधारी गठबंधन का प्रदर्शन इसके कुछ सहयोगियों की इच्छा के बावजूद आशा के अनुरूप नहीं रहा है। 

तो फिर मुशर्रफ के पद छोड़ने की वजह क्या रही, क्योंकि अक्सर ये कहा जाता था कि "एक कमांडो कभी रिटायर नहीं होता।"

वो कैसा कमांडो है ये आप जानते ही हैं। ये बात भारत से अच्छी तरह कौन जानता होगा। इसलिए जितना कम बोलें उतना बेहतर। संसद ने अपनी सर्वोच्चता स्थापित कर दी है और मेरे ख्याल से ये बहुत अच्छी बात है। कम से कम संसद तो संप्रभु है। दुनिया के सामने ये बात साबित हो गई है अगर संसद शक्तिशाली और संप्रभु है तो वो किसी भी तानाशाह से निपट सकती है।

आप कह रहे हैं कि किसी डील की बात पर विश्वास मत कीजिए। तो क्या ये माना जाए कि मुशर्रफ पर मुकदमा चलेगा?

मैं बदला लेने में यकीन नहीं रखता। मुशर्रफ और मेरे बीच कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं हैं। ये सब जो हो रहा है उसका निजी बातों से कोई लेना देना नहीं है। 

लेकिन उन्होंने दो बार संविधान के साथ छेड़छाड़ की, ये तो व्यक्तिगत नहीं है?

मैं उसी बात पर आने वाला था। राज्य और देश के साथ क्या हुआ किसी न किसी को तो ये जवाब देना ही होगा कि वो ये सब क्यों करते रहे। इसलिए मेरी सोच है कि किसी को तो इसका जवाब देना होगा, किसी की तो जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। आखिर उन्हें देश को एक बार जवाब तो देना ही होगा कि उन्होंने ये सब क्यों किया। मेरे ख्याल से देश के इतिहास में पहली बार जजों को घर में नज़रबंद किया गया। उन्होंने दो बार संविधान को तोड़ा-मरोड़ा, दो बार आपातकाल थोपा, उन्हें हर हाल में इसका जवाब देना होगा।

वो पलट कर कह सकते हैं कि अपने आखिरी भाषण में उन्होंने सारे जवाब दे दिए हैं।

नहीं, कोई भी इसे स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने अपने भाषण में किसी बात का जवाब नहीं दिया। 

यानी आपका कहना है कि जवाब अदालत में ही देना होगा।

किसी को जवाबदेह ऐसे ही बनाया जा सकता है। 

कहा जा रहा है कि मुशर्रफ-विरोध ही पीपीपी और आपकी पार्टी के बीच जुड़ाव की अहम वजह है। विशेषज्ञों की नज़र में असली परीक्षा तो अब शुरू हुई है।

मेरे ख्याल से असली परीक्षा तो 18 फरवरी के बाद ही शुरू हो गई थी। ये गठबंधन कुछ निश्चित वजहों से बना था। पहली वजह थी जजों की बहाली, दूसरी वजह थी संसद को सर्वशक्तिमान बनाना। तीसरी वजह थी संविधान को उसके 1973 के स्वरूप में फिर से स्थापित करना। ये कुछ मुख्य वजहें थी जिनकी वजह से गठबंधन अस्तित्व में आया था और दोनों मुख्य पार्टियों के बीच एक समझौता हुआ था। मेरे ख्याल से असली चुनौती तो वही थी। सरकार चलाना, कैबिनेट में शामिल होना, आसानी से मंत्री बन जाना और टीवी पर आ जाना कोई चुनौती नहीं है। ये दोनों ही पार्टियों के हित में नहीं बल्कि देश के हित में है। और अगर देश को फायदा होता है तो हम सबका भी फायदा होगा। मेरा स्पष्ट रूप से मानना है कि जिस उद्देश्य के लिए गठबंधन का निर्माण हुआ था उसे हासिल करना चाहिए।

जजों की बहाली पर क्या चल रहा है?

फिलहाल यही मुख्य मुद्दा है। पिछले पांच महीनों से ये अहम मुद्दा बना हुआ है। और आप जो असल परीक्षा की बात कर रही हैं वो असल परीक्षा यही है। ज़रदारी ने तीसरी बार ये वादा दोहराया है। और अगर गठबंधन को जारी रखना है तो उन्हें अपना वादा निभाना पड़ेगा।

लेकिन ज़रदारी स्पष्ट रूप से इस मुद्दे पर अपना क़दम खींचते दिख रहे हैं।

मैं इस पर कुछ नहीं बोलना चाहता हूं क्योंकि हमने उन्हें कुछ और वक्त दिया है। देखिए आगे क्या होता है। 

क्या इस समय सीमा को आगे भी बढ़ाया जा सकता है या फिर ये पूर्णविराम होगा?

अगर कोई विशेष हालात नहीं बनते हैं तो...

अपने विदाई भाषण में मुशर्रफ ने आगे भी देश को अपनी सेवाएं देने का प्रस्ताव रखा। क्या आपको उनकी कोई जरूरत होगी?
मुझे तो ये मज़ाक ही लगता है। 

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन को डर है कि मुशर्रफ के जाने से एक राजनीतिक शून्य पैदा हो जाएगा।

राजनीतिक शून्य सिर्फ तानाशाही के दौर में पैदा होता है। लगता है भारत कारगिल के खलनायक मुशर्रफ को भूल गया है। तानाशाही के दौर में सबसे ज्यादा राजनीतिक शून्यता होती है।

और भारत के साथ शांति प्रक्रिया? क्या आप भारतीयों को शांति प्रक्रिया के प्रति आश्वस्त करना चाहेंगे?

शांति प्रक्रिया हर हाल में जारी रहनी चाहिए। लगे हाथ मैं भारत से ये अपील भी करना चाहूंगा कि वो कश्मीर समस्या का हल ढूंढ़े। इस पर सबसे ज्यादा गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है। कश्मीरी जनता की रज़ामंदी के बिना इस समस्या को सुलझाया नहीं जा सकता। 

भारत की चिंता की एक वजह ये भी है कि अमेरिका के मुताबिक काबुल में भारतीय दूतावास पर हुए हमले में आईएसआई का हाथ है। क्या आईएसआई अभी भी बेलगाम ताकत है, जिसकी सरकार के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है?

ये कोई स्वतंत्र संस्था नहीं है। ये सरकार के अधीन है और आगे भी रहनी चाहिए। इसकी कोई वजह ही नहीं है कि आईएसआई को स्वतंत्र संस्था होना चाहिए। हम ये सुनिश्चित करना चाहेंगे कि आईएसआई पर सरकारी नियंत्रण रहे।

तो फिर काबुल धमाके को लेकर आईएसआई पर लगे आरोपों पर क्या कहेंगे?

मेरे ख्याल से पाकिस्तान सरकार ने इससे जुड़े सबूतों की मांग की है। और अगर कोई सबूत है तो उसकी जानकारी सरकार को होनी चाहिए। आरोप-प्रत्यारोप तो काफी लंबे समय से चले आ रहे हैं। जब तक कोई पुख्ता गवाह और सबूत न हो ऐसी चीजों से बचना चाहिए। 

और आप एक ऐसे राष्ट्रपति के बारे में क्या कहेंगे, जो पूर्व सेनाध्यक्ष था और जिसे अंत में खुद उस सेनाध्यक्ष का ही समर्थन नहीं मिला जिसे उसने खुद मनोनीत किया था?

मेरे ख्याल से जनरल कियानी ने नियमों का पालन किया है और हर सेनाध्यक्ष को इस देश में ऐसा ही करना चाहिए। उन्होंने ये सुनिश्चित किया कि वो राजनीति में दखलंदाजी बिल्कुल नहीं करेंगे। इसलिए अगर मुशर्रफ उनसे सहायता की उम्मीद कर रहे थे तो ये उनकी भूल थी। मेरे ख्याल से जनरल कियानी ने बिल्कुल सही क़दम उठाया। 

और सेना ने उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया, इस पर क्या कहेंगे?

मुझे बहुत अजीब लगा। मुझे नहीं पता कि उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर देने का फैसला सेना ने किया या फिर सरकार ने। ये ऐसा सवाल है जिसका जवाब मिलना चाहिए।

हमारे गृहमंत्रालय ने हाल ही में कहा कि भारत मुजफ्फराबाद के रास्ते व्यापारिक मार्ग खोलना चाहता है लेकिन पाकिस्तान इसके लिए राजी नहीं हुआ।

ये तो मैं पहली बार सुन रहा हूं, पाकिस्तान सरकार की ओर से मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं मिली है।

आखिरी सवाल, क्या हम निकट भविष्य में आपके मंत्रियों को वापस सरकार में देखेंगे?

सिर्फ उसी हालत में जब जजों की बहाली होगी।

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