मकोका का मकड़जाल
किसी का आपपर लगाया एक आरोप ही, इस कानून के तहत आपको महीनों और कभी-कभी तो सालों जेल में सड़ाने के लिए पर्याप्त है. मकोका नाम के इस मकड़जालरूपी कानून की भयावहता और इसमें फंसे लोगों की विवशता पर अजित साही और राना अय्यूब की दो महीने लंबी पड़ताल
करीब 11 साल पहले 24 फरवरी, 1999 को महाराष्ट्र सरकार ने एक कानून लागू किया. इसका मकसद था, अंडरवर्ल्ड से जुड़े अपराधों के लगातार ऊपर जाते ग्राफ को रोकना. वह ऐसा दौर था जब पैसेवाले और ताकतवर लोगों की डर के मारे घिग्घी बंधी रहती थी. पैसा वसूली के लिए उन्हें पहले धमकी भरे फोन आते थे और फिर धमकी देनेवाले लोग वसूली के लिए उनके दफ्तरों, दुकानों और घरों में घुस आया करते थे. जिन्होंने पैसा देने से इनकार किया उनमें से कई पर हमले हुए. हालात जान लेने तक पहुंच गए. इसका सबसे चर्चित उदाहरण रहा मायानगरी में टी-सीरीज नाम का साम्राज्य खड़ा करनेवाले गुलशन कुमार का, जिन्हें 1997 में दिनदहाड़े गोली मार दी गई.
पोटा में इकबालिया बयान सिर्फ उसे देनेवाले आरोपी के खिलाफ ही सबूत माना जाता था. मकोका इससे भी आगे निकल गया है. इसके तहत किसी आरोपित का इकबालिया बयान मामले की सुनवाई के दौरान उसके ही नहीं बल्कि दूसरे आरोपितों, मदद पहुंचाने वालों और साजिश रचने वालों के खिलाफ भी सबूत के तौर पर मान्य होता है
ऐसे में जब इस तरह का कानून आया तो स्वाभाविक ही था कि सभी इसपर रजामंदी जताते. नब्बे के दशक में मुंबई में अंडरवर्ल्ड की लड़ाई खुलकर सड़क पर आ चुकी थी. फरार डॉन दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन के गैंग आपसी दुश्मनी में एक-दूसरे का ज्यादा से ज्यादा खून बहाने पर आमादा थे. 1997 में माफिया हिंसा में 20 लोगों ने जान गंवाई और अगले साल यह आंकड़ा दोगुने से भी ज्यादा हो गया. मगर अंडरवर्ल्ड को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. जसे कई टहनियों के गिरते रहने के बावजूद पुराना बरगद फैलता रहता है, वैसे ही मुंबई के अंडरवर्ल्ड में नए-नए माफिया डॉन पैदा होते जा रहे थे.
हताशा में सरकार ने अनधिकृत तौर पर इस सबसे पार पाने का एक गैरकानूनी तरीका ढूंढ़ निकाला. यह तरीका था, संदिग्ध गैंगस्टरों का पुलिस इंस्पेक्टरों के जरिए खात्मा यानी ‘एनकाउंटर’ करना. इससे सुधरा तो कुछ नहीं, उल्टे स्थिति और भी अराजक हो गई. आरोप लगे कि प्रतिद्वंद्वी गैंग एक-दूसरे के लड़कों को खत्म करने के लिए इन एनकाउंटर विशेषज्ञों को पैसा देने लगे हैं.
बिना रुके ऊपर और ऊपर जाता अपराध का ग्राफ राज्य की भाजपा-शिवसेना सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक सरदर्द बन गया था. 1999 आ गया था और विधानसभा चुनाव सर पर थे. ऐसे में महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अध्यादेश जारी किया गया. सरकार का तर्क था कि 1860 में बनी भारतीय दंड संहिता यानी आइपीसी माफिया जगत से जुड़े अपराधों पर लगाम लगाने के लिए नाकाफी है. कुछ समय बाद विधानसभा में इसे पारित कर कानून की शक्ल दे दी गई. और इस तरह अंग्रेजी में इसका संक्षिप्त नाम बना एमसीओसीए जो अब मकोका के नाम से प्रचलित हो गया है. कानून में कहा गया कि इसका मकसद ‘संगठित अपराध को रोकना व उसपर लगाम लगाना है और यह संगठित अपराध से जुड़े गिरोहों की आपराधिक गतिविधियों की रोकथाम के लिए है..’
कानून के साथ एक बयान जारी किया गया, जिसमें इसे बनाने के पीछे के कारण और इसके मकसद बताए गए थे. इसमें कहा गया था, ‘कुछ साल से संगठित अपराध हमारे समाज के लिए एक बहुत गंभीर खतरे के रूप में उभरा है. इसकी कोई राष्ट्रीय सीमा नहीं है और भाड़े पर हत्या, वसूली, तस्करी, मादक द्रव्यों के व्यापार, अपहरण और हवाला आदि जैसी गतिविधियों से मिलनेवाला अवैध पैसा इसके लिए ईंधन का काम कर रहा है.’
‘संगठित अपराध से पैदा होनेवाला अवैध और काला धन अकूत है और इसका हमारी अर्थव्यवस्था पर काफी बुरा असर हुआ है. यह देखा गया कि संगठित अपराधी गिरोह आतंकी गुटों के साथ मिल कर उस आतंकवाद का पोषण कर रहे हैं, जिसके तार राष्ट्रीय सीमाओं के पार तक फैले हुए हैं. यह मानने का कारण था कि संगठित अपराधी गिरोह राज्य में सक्रिय हैं और इसलिए उनकी गतिविधियों से निपटने की फौरन जरूरत थी.’
‘यह पाया गया कि मौजूदा कानूनी ढांचा यानी दंड और प्रक्रियाओं से जुड़े कानून और न्याय व्यवस्था संगठित अपराध की समस्या को रोकने या फिर उसपर लगाम लगाने के लिए अपर्याप्त हैं. इसलिए सरकार ने फैसला किया कि एक विशेष कानून बनाया जाए, जिसमें सख्त और ऐसी गतिविधियों के लिए डर पैदा करनेवाले प्रावधान हों.’
ऊपर लिखे गए शब्दों में साफ है कि अहम बात ‘सख्त और ऐसी गतिविधियों के लिए डर पैदा करनेवाले प्रावधान’ है. क्या थे मकोका में इस तरह के प्रावधान? और पिछले 11 साल में इस कानून का असर क्या रहा है? सरकार का यह तर्क स्वाभाविक ही है कि मकोका काफी असरदार रहा है. आखिरकार सड़कों पर होने वाली गैंगवार अब बीते वक्त की बात हो चली है. वसूली की घटनाओं का सुर्खियों में आना तो कम से कम नाटकीय रूप से कम हो गया है. शूटरों के भी लोगों के घरों या फिर दफ्तरों में घुस आने के वाकये अब उतने ज्यादा नहीं होते. और मुंबई पुलिस के इंस्पेक्टर भी एनकाउंटरों में गैगस्टरों को नहीं मार गिरा रहे. मगर दक्षिण मुंबई की सत्र अदालतों, जहां चार विशेष जज सिर्फ मकोका से जुड़े मामलों की सुनवाई करते हैं, की हदों से बाहर सिर्फ कुछ ही लोग जानते हैं कि इस कानून के गलत इस्तेमाल के चलते किस तरह कई जिंदगियों और परिवारों को भारी तकलीफें उठानी पड़ी हैं. और दुर्भाग्य से ऐसा काफी हद तक इस कानून के ‘सख्त’ और ‘डर पैदा करनेवाले प्रावधानों’ की वजह से ही हुआ है.
महाराष्ट्र में पुलिस अच्छी तरह से यह जानती है कि मकोका के तहत गिरफ्तार लोगों को आसानी से जमानत नहीं मिल सकती और इसलिए बिना यह परवाह किए कि आरोपित के खिलाफ दर्ज किया गया मामला मकोका कानून की जरूरी जरूरतों को पूरा करता भी है या नहीं, महाराष्ट्र पुलिस मनमाने तरीके से लोगों को इस कानून के तहत गिरफ्तार कर रही हैदो महीनों के दौरान सौ मामलों की पड़ताल करके तहलका के इस अंक में हम आपके सामने आठ आरोपितों की अजीबोगरीब कहानियां लेकर आए हैं. इनमें से सात ऐसे हैं, जिन्हें मकोका के तहत महीनों या फिर सालों जेल में काटने पड़े और आखिर में उन्हें रिहा कर दिया गया, क्योंकि अदालतों के मुताबिक उनके खिलाफ कोई सबूत ही नहीं था. इनमें मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर आरएस शर्मा जसे ताकतवर लोग तक शामिल हैं. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि ऐसा लगता है जसे शर्मा को गलत तरीके से आरोपित बनाया गया.
मकोका सैकड़ों आरोपियों के लिए लंबी अंधेरी सुरंग साबित हुआ. इसके तहत आरोप लगने पर आरोपित को तब तक अपराधी माना जाता है, जब तक कि वह खुद को बेकसूर साबित नहीं कर देता. ऐसे में इसके दुरुपयोग की गुंजाइश व्यापक हो जाती है, क्योंकि अभियोजन पक्ष को आरोपित का दोष साबित करने के लिए उसके इकबालिया बयान के अलावा किसी और सबूत की जरूरत ही नहीं होती. और अगर आखिर में जज इस तरह के इकबालिया बयान को मानने से इनकार कर भी दे तो भी आरोपित कुछ महीनों से लेकर सालों तक की जेल काट चुका होता है, क्योंकि मकोका लग जाने पर उसकी जमानत लगभग नामुमकिन हो जाती है.
मगर मकोका का सबसे मुख्य और विवादास्पद प्रावधान है एसपी या डीएसपी रैंक से ऊपर के किसी अधिकारी के सामने दिए गए आरोपित के इकबालिया बयान की अदालत में सबूत के तौर पर मान्यता. इससे पहले 1987 में बने टाडा और 2002 में बने पोटा जैसे आतंकवाद निरोधी कानूनों में भी निर्दोष लोगों को फंसाने के लिए इसी तरह के प्रावधानों का जम कर गलत इस्तेमाल हुआ था. यही वजह थी कि 1995 में टाडा और 2004 में पोटा खत्म हो गये.
मकोका, पोटा से भी ज्यादा सख्त कानून है. पोटा में इकबालिया बयान सिर्फ उसे देनेवाले आरोपी के खिलाफ ही सबूत माना जाता था. मकोका इससे भी आगे निकल गया है. इसके तहत किसी आरोपित का इकबालिया बयान मामले की सुनवाई के दौरान उसके ही नहीं बल्कि दूसरे आरोपितों, मदद पहुंचानेवालों और साजिश रचनेवालों के खिलाफ भी सबूत के तौर पर मान्य होता है. इस प्रावधान के चलते मकोका के तहत आरोपित किए गए सैकड़ों लोगों की जिंदगियां दु:स्वप्न हो गईं. लोग जेल में सड़ते रहे, सिर्फ इसलिए क्योंकि उनके ही मामले के किसी दूसरे आरोपित ने अपने इकबालिया बयान में कथित तौर पर उनका नाम ले लिया था.
मानवाधिकारों के लिए लड़ रहे लोग लंबे समय से कहते रहे हैं कि भारतीय साक्ष्य कानून, 1872 पुलिस को दिए गए बयान को सबूत के तौर पर मान्यता नहीं देता, इसलिए मकोका जैसे मामलों में इस तरह के बयान को सबूत के तौर पर इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए. यह जगजाहिर है कि पुलिस यंत्रणाओं के जरिए जबर्दस्ती इकबालिया बयान रिकॉर्ड करती रहती है. मकोका के तहत आरोपित बनाए गए कई लोगों ने भी जज से यह बात कही, जिसके बाद अदालत ने उनके बयानों को सबूत के तौर पर अमान्य घोषित कर दिया.
ऐसा नहीं कि कानून में इस तरह के प्रावधान नहीं हैं कि इकबालिया बयान किसी दबाव में न दिया-लिया जाए. ‘इकबालिया बयान खुले माहौल में उसी भाषा में रिकॉर्ड हो, जिसमें किसी व्यक्ति से पूछताछ हुई है और वैसे ही जैसे वह असल में दिया गया हो,’ कानून साफ-साफ कहता है, ‘पुलिस अधिकारी को जिस व्यक्ति से पूछताछ की जा रही है, उसे यह समझना चाहिए कि वह इकबालिया बयान देने के लिए बाध्य नहीं है.’
कई मामलों में अभियोजन पक्ष ने इसपर गौर करने की जहमत नहीं उठाई. आपको जानकर हैरत होगी कि ऐसे मामले बड़ी संख्या में हैं जहां आखिरकार जज ने आरोपित को इसलिए बरी कर दिया या मामला आइपीसी के तहत चलाने को कहा क्योंकि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि अपराध आर्थिक लाभ के लिए किया गया
कानून के मुताबिक आरोपित का बयान लिखनेवाले पुलिस अधिकारी को फिर इसे चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट को भेजना होगा, जो 24 घंटे के भीतर आरोपित से मिलेगा और इसकी जांच करेगा कि क्या उसने यह बयान अपनी मर्जी से दिया है. अक्सर आरोपितों ने ऐसे मौके पर मजिस्ट्रेट को बताया कि उन्हें उनके द्वारा हस्ताक्षरित दस्तावेज पढ़ने को ही नहीं दिया गया या उनसे जबर्दस्ती दस्तखत करवाए गए या फिर उनके दस्तखत कोरे कागज पर ले लिए गए.
मकोका का दूसरा डरावना पहलू है, जमानत से जुड़े सख्त प्रावधान. कानून कहता है कि किसी आरोपित को जमानत तभी दी जा सकती है, जब अदालत को यह तसल्ली हो जाए कि यह मानने की पर्याप्त वजहें हैं कि वह संबंधित अपराध का दोषी नहीं है. यह आश्चर्यजनक है. इसका सीधा-सीधा मतलब है कि तथाकथित अपराध चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो, मुलजिम को तब तक जमानत नहीं मिल सकती, जब तक आरोपपत्र दायर नहीं होता या सुनवाई खत्म नहीं हो जाती या फिर अदालत को स्पष्ट तौर पर यह नहीं लगता कि आरोपित को फंसाया गया है.
बचाव पक्ष के वकील कहते हैं कि कानून लागू होने के बाद अब तक 11 साल में एक फीसदी आरोपितों को भी ट्रायल कोर्ट से जमानत नहीं दी गई है. कई जमानत याचिकाएं तो हाइकोर्ट तक ने ठुकरा दीं. मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर आरएस शर्मा जैसे कई लोगों को तो लंबे समय तक जेल में रहने के बाद जमानत पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाने पड़े. शर्मा के मामले में तो मकोका के जमानत संबंधी प्रावधानों ने शीर्ष अदालत को भी नाराज-सा कर दिया. शीर्ष अदालत ने लिखा, ‘इससे आगे हमारा विचार है कि जमानत देने संबंधी अदालत की शक्ति पर पाबंदियों को एक हद से ज्यादा नहीं ले जाया जाना चाहिए.’
मगर करीब 11 सालों से इन पाबंदियों की हर हद को लांघा जा रहा है. महाराष्ट्र में पुलिस अच्छी तरह से यह जानती है कि मकोका के तहत गिरफ्तार लोगों को आसानी से जमानत नहीं मिल सकती और इसलिए बिना यह परवाह किए कि आरोपित के खिलाफ दर्ज किया गया मामला मकोका कानून की जरूरी जरूरतों को पूरा करता भी है या नहीं, महाराष्ट्र पुलिस मनमाने तरीके से लोगों को इस कानून के तहत गिरफ्तार कर रही है.
उदाहरण के लिए, मकोका कहता है कि इसे सिर्फ उन्हीं पर लगाया जा सकता है, जो संगठित अपराध गिरोह के सदस्य होने के आरोपित हों और लगातार गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त रहे हों. मगर ऐसे अजीब मामले देखने को मिलते रहे हैं, जहां पुलिस ने दोहरे हत्याकांड के आरोपित 11 सदस्यों के एक परिवार को ही अपराधी गिरोह ठहरा दिया, ताकि उनपर मकोका लगाया जा सके और उनकी जमानत न होने पाए.
कानून में ‘जारी गैरकानूनी गतिविधि’ की भी व्याख्या की गई है: किसी पर मकोका तभी लगाया जा सकता है जब पिछले दस साल के दौरान उसपर उसी प्रकृति के अपराध के लिए कम से कम दो आरोपपत्र दायर किए गए हों. अदालतों के लिए इन दो आरोपपत्रों को संज्ञान में लेना जरूरी है. मगर मामला-दर-मामला हमने पाया कि पुलिस ने ऐसा न होने के बावजूद मकोका लगा दिया. रियल स्टेट के बड़े कारोबारी महेंद्र अग्रवाल का मामला इसका सिर्फ एक उदाहरण है. इनमें से ज्यादातर मामलों में आरोपितों को जेल में सड़ना पड़ा और उनकी जमानत तक नहीं हो सकी. आखिर में महीनों या सालों बाद अदालत ने उन्हें बरी कर दिया.
कानून साफ-साफ आरोपितों के मकसद की भी बात करता है. मकोका में कहा गया है कि इसके तहत आरोपित किए जाने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति ने तथाकथित अपराध अनुचित तरीके से अपने या किसी दूसरे व्यक्ति के लिए आर्थिक या दूसरे फायदे या फिर बगावत भड़काने के लिए किया हो. आर्थिक लाभ का उल्लेख अहम है, क्योंकि यह कानून जिन आपराधिक गुटों पर लगाम लगाने के लिए बना वे मुख्य तौर पर वसूली से और काले धन को वैध बनाकर अवैध कमाई कर रहे थे. कानून बनानेवालों ने यह प्रावधान इसलिए रखा ताकि इसका दुरुपयोग उन लोगों पर न हो जिन्होंने कोई हिंसक अपराध आर्थिक लाभ के लिए न किया हो. ऐसे आरोपितों के लिए आइपीसी ही पर्याप्त थी.
लेकिन इसके बावजूद कई मामलों में अभियोजन पक्ष ने इसपर गौर करने की जहमत नहीं उठाई. आपको जानकर हैरत होगी कि ऐसे मामले बड़ी संख्या में हैं जहां आखिरकार जज ने आरोपित को इसलिए बरी कर दिया या मामला आइपीसी के तहत चलाने को कहा क्योंकि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि अपराध आर्थिक लाभ के लिए किया गया.मगर आखिरी फैसला आने से पहले आरोपित को लंबे समय तक बगैर जमानत जेल में सड़ना पड़ गया. साफ है कि मुंबई पुलिस ने इस कानून को अक्सर मनमाने तरीके से इस्तेमाल किया. सिर्फ इसलिए कि लोगों को जेल में डाला और डाल कर ज्यादा से ज्यादा वक्त तक वहां रखा जा सके. मुंबई पुलिस के कमिश्नर डी शिवनंदन यह करीब-करीब मानते हुए दिखते हैं जब तहलका से इंटरव्यू में वे कहते हैं कि 1998 में जेल भेजे जानेवाले लोगों की संख्या 50 थी मगर 1999 में मकोका पारित हुआ और उस साल यह संख्या बढ़कर 642 हो गई.
इसलिए बचाव पक्ष के वकीलों और निर्दोष करार दिए गए लोगों सहित कई लोग अब मांग कर रहे हैं कि इस कठोर कानून में यह सुनिश्चित करने के और भी कठोर प्रावधान होने चाहिए कि इसका पालन सही तरीके से हो रहा है या नहीं. सबसे ज्यादा यह सुझाव दिया जा रहा है कि पुलिस को जवाबदेह बनाया जाए. सुझाव तो यहां तक दिया जा रहा है कि आरोपितों को गलत तरीके से फंसानेवाले पुलिसकर्मियों को भी जेल भेजा जाए.
कई इससे सहमति जताएंगे. मगर कई शायद यह भी कह सकते हैं कि ऐसा मकोका तक ही क्यों सीमित रखा जाए?
यहां हम ऐसे ही कुछ लोगों मामले आपके सामने रख रहे हैं जिन्हें मकोका के तहत जेल में रहना पड़ा लेकिन बाद में उन्हें निर्दोष करार दिया गया
व्यथा कथा 1- निर्दोष साबित होने तक दोषी
व्यथा कथा 2- व्यवसायी, स्क्वैश प्रेमी, मकोका पीड़ित
व्यथा कथा 3 - अतीत के आगे-पीछे





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Comments (2 posted):
but Vaytha file is not oppning
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