Home | तहक़ीक़ात | संस्कृति के नाम पर

संस्कृति के नाम पर

image

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोशल इंजीनियरिंग परियोजना के तहत बच्चों को मेघालय से कर्नाटक लाया जा रहा है और उन्हें उनकी मूल संस्कृति से काटकर हिंदुत्व की घुट्टी पिलाई जा रही है. संजना की तहकीकात. सभी फोटो: एस राधाकृष्णा 

कर्नाटक के 35 स्कूलों और मेघालय के चार जिलों में की गई तीन महीने की गहन पड़ताल के दौरान तहलका ने पाया कि साल 2001 से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सोशल इंजीनियरिंग की एक ऐसी परियोजना पर काम कर रहा है जिसके तहत अब तक मेघालय के कम से कम 1600 बच्चों को कर्नाटक में लाकर उन्हें कन्नड़ और तथाकथित भारतीय संस्कृति का पाठ पढ़ाया जा रहा है. मेघालय से लाए जाने वाले इन बच्चों के नवीनतम बैच में कुल 160 बच्चे थे जिन्हें संघ के करीब 30 कार्यकर्ताओं द्वारा सात जून को 50 घंटे का सफर तय करके बंगलुरु लाया गया था.

संघ के कार्यकर्ता तुकाराम शेट्टी ने तीन महीनों के दौरान तहलका के सामने बेबाकी से स्वीकार किया कि यह संघ और इसकी सहयोगी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे एक बड़े अभियान का हिस्सा है 

इस परियोजना के मुख्य संचालक संघ के कार्यकर्ता तुकाराम शेट्टी ने तीन महीनों के दौरान तहलका के सामने बेबाकी से स्वीकार किया कि यह संघ और इसकी सहयोगी संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे एक बड़े अभियान का हिस्सा है. उनका कहना था, ‘संघ ने इलाके में अपने विस्तार और ईसाई मिशनरी समूहों से निपटने के मकसद से एक दीर्घकालिक योजना बनाई है. ये बच्चे इसी का एक हिस्सा हैं. आने वाले समय में ये बच्चे हमारे मूल्यों का अपने परिवार के सदस्यों में प्रसार करेंगे.’ बचपन से ही संघ से जुड़े रहे शेट्टी कर्नाटक के दक्षिण कन्नडा जिले से ताल्लुक रखते हैं और उन्होंने अपने जीवन के तकरीबन आठ वर्ष मेघालय में, वहां की भौगौलिक स्थिति और संस्कृति का अध्ययन करने में बिताए हैं.

अगर मेघालय की बात की जाए तो ये देश के उन गिने-चुने राज्यों में है जहां ईसाई समुदाय कुल जनसंख्या का करीब 70 फीसदी होकर बहुसंख्यक समुदाय की भूमिका में है. बाकी 30 फीसदी में करीब 13 फीसदी हिंदू हैं और 11.5 फीसदी यहां के मूल आदिवासी हैं. सबसे पहली बार ईसाई मिशनरी यहां उन्नीसवीं सदी के मध्य में आए थे. व्यापक स्तर पर धर्मातरण के बावजूद आदिवासियों की एक बड़ी आबादी अभी भी अपने मूल धर्मों से जुड़ी हुई है और इसमें कहीं न कहीं धर्म परिवर्तन करने वालों के प्रति नाराजगी भी है. संघ, आदिवासियों की इसी नाराजगी का फायदा उठाना चाहता है और जैसा कि शेट्टी मानते हैं कि बच्चे और उनकी शिक्षा इसकी शुरुआत है.

बंगलुरु से करीब 500 किलोमीटर दूर उप्पूर में स्थित थिंकबेट्टू हायर प्राइमरी एंड सेकंडरी स्कूल उन 35 स्कूलों में से है जहां इन बच्चों को पढ़ाया जा रहा है. 2008 में छह से सात साल की उम्र के 17 बच्चों को मेघालय से यहां लाया गया था. स्कूल के प्रधानाध्यापक के कहने पर ये बच्चे एक-एक कर खड़े होते हैं और अपना परिचय स्थानीय कन्नड भाषा में देते हैं. मगर अध्यापक महोदय खुद अपना परिचय देने से ये कह कर इनकार कर देते हैं कि ‘आप बच्चों को देखने आए हैं, वे आपके सामने हैं. अगर मैं आपको अपना नाम बताऊंगा तो आप उसे मेरे खिलाफ इस्तेमाल करेंगीं.’ बस इतना पता चल पाता है कि वो एक पूर्व बैंक कर्मचारी हैं और कोने में खड़ी निर्मला नाम की महिला उनकी पत्नी है.

इसके बाद बच्चों से हाल ही में याद किया गया एक श्लोक सुनाने को कहा जाता है. घुटे सिर वाले ये बच्चे अध्यापक के सम्मान में गुरुर्बृह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर:.. का पाठ करने लगते हैं. जिस हॉल में ये सब हो रहा है दरअसल वही इनके शयन, अध्ययन और भोजन, तीनों कक्षों का काम करता है. मेघालय के चार जिलों - रिभोई, वेस्ट खासी हिल्स, ईस्ट खासी हिल्स और जंतिया हिल्स से कर्नाटक में संघ से जुड़े विभिन्न स्कूलों में लाए गए ये बच्चे मूलत: खासी और जंतिया आदिवासी समुदायों से संबंध रखते हैं. परंपरागत रूप से खासी आदिवासी सेंग खासी और जंतिया आदिवासी नियाम्त्रे धर्म को मानते हैं.

जबरन थोपी जा रही दूसरी संस्कृति के तहत इन बच्चों जो किताबें दी जाती हैं वे बंगलुरू स्थित संघ के प्रकाशन गृहों में छपती हैंमंद्य जिले के बीजी नगर में स्थित श्री आदिचुंचनगिरी हायर प्राइमरी स्कूल के प्रधानाचार्य मंजे गौड़ा कहते हैं, ‘अगर ये बच्चे मेघालय में ही रहते तो ये अब तक तो ईसाई बन चुके होते. संघ इन्हें बचाने का प्रयास कर रहा है. जो शिक्षा बच्चे यहां प्राप्त करते हैं उसमें मजबूत सांस्कृतिक मूल्य स्थापित करना शामिल होता है. जब ये यहां से वापस अपने घर जाएंगे तो इन संस्कारों का अपने परिवारों में प्रसार करेंगे.’ जिन सांस्कृतिक मूल्यों की बात गौड़ा कर रहे हैं उनमें धार्मिक मंत्रोच्चार, हिंदू तीज त्यौहारों का ज्ञान और मांसाहारी भोजन, जो कि मेघालय में अत्यधिक प्रचलित है, से इन बच्चों को दूर रखना शामिल है.

मगर इससे होगा क्या? शेट्टी तहलका को बताते हैं कि छोटी उम्र में भारत के सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ाव और अनुशासन तो दरअसल पहला कदम है. ‘यह महत्वपूर्ण है कि ये बच्चे इन मूल्यों को कच्ची उम्र में आत्मसात करें. ये इन्हें हमारे और नजदीक और ईसाइयों की जीवन पद्धति से और दूर ले जाएगा. हम उन्हें श्लोक सिखाते हैं जिससे कि वे ईसाई धर्मगीतों को न गाएं. हम उन्हें मांस से दूर कर देते हैं ताकि वे अपने धर्म में रची-बसी जीव-बलि की परंपरा से घृणा करने लगें’ वे कहते हैं, ‘अंतत: जब संघ उनसे कहेगा कि गाय एक पवित्र जीव है और जो इसे मारकर खाते हैं उनका समाज में कोई स्थान नहीं है तो तो ये बो उसे मानेंगे.’ क्या इन बच्चों को आरएसएस के भावी झंडाबरदारों की भूमिका के लिए तैयार किया जा रहा है, इस सवाल पर शेट्टी केवल इतना कहते हैं कि वे किसी न किसी रूप में ‘परिवार’ का हिस्सा रहेंगे और इस बारे में समय ही बताएगा.

तहलका ने कई स्कूलों का दौरा किया और पाया कि विभिन्न स्कूलों में सिखाये जा रहे सांस्कृतिक मूल्यों में तो कोई खास फर्क नहीं है मगर आरएसएस की विचारधारा में कोई कितनी गहरी डुबकी लगाएगा ये इस बात पर निर्भर करता है कि वह बच्चा पढ़ता कौन से स्कूल में है. जो बच्चे मजबूत आर्थिक स्थिति वाले परिवारों से संबंध रखते हैं वे ऐसे स्कूलों में रहते हैं जहां पढ़ने और रहने की समुचित व्यवस्था होती है क्योंकि उनके परिवार इसका खर्च उठाने की स्थिति में होते है. इन अपेक्षाकृत सुविधासंपन्न स्कूलों में अनुशासन उतना कड़ा नहीं होता. मगर उत्तर-पूर्वी राज्य से आए इन बच्चों में से जितनों से हमने मुलाकात की उनमें से करीब 60 फीसदी कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने वाले थे जो उप्पूर के थिंकबेट्टू जैसे नाम-मात्र की सुविधाओं और कड़े अनुशासन वाली व्यवस्था में रहते हैं.

खास बात ये है कि ज्यादातर स्कूल जिनमें इन बाहरी बच्चों को रखा गया है कर्नाटक के उस तटीय इलाके में स्थित हैं जो हाल के कुछ वर्षों में सांप्रदायिक हिंसा के केंद्र में रहा है. इनमें से कुछ स्थान हैं पुत्तूर, कल्लाड्का, कॉप, कोल्लुर, उप्पूर, डेरालाकट्टे, दक्षिण कन्नडा में मूदबिद्री और उडुपी और चिकमंगलूर जिले. इनके अलावा बच्चों को प्रभावशाली आश्रमों द्वारा चलाए जा रहे सुत्तूर के जेएसएस मठ, मांड्या के आदिचुंचनगिरी और चित्रगुड़ा के मुरुगराजेंद्र जसे स्कूलों में भी रखा गया है.

खास बात ये है कि ज्यादातर स्कूल जिनमें इन बाहरी बच्चों को रखा गया है कर्नाटक के उस तटीय इलाके में स्थित हैं जो हाल के कुछ वर्षों में सांप्रदायिक हिंसा के केंद्र में रहा है

मगर मेघालय के ये नन्हे-मुन्ने हजारों किलोमीटर दूर कर्नाटक में कैसे आ जाते हैं? इन्हें वहां से लाने का तरीका क्या है? तहलका ने जिस भी बच्चे या उसके माता-पिता से बात की सबका कहना था कि ये सब किये जाने के पीछे सबसे बड़ा हाथ तुकाराम शेट्टी का है.

आरएसएस से संबद्ध संस्था सेवा भारती के पूर्व कार्यकर्ता शेट्टी जंतिया हिल्स के जोवाई में स्थित ले सिन्शर कल्चरल सोसाइटी के सर्वेसर्वा हैं. हालांकि इस संगठन को तो कोई इसके मुख्यालय से बाहर ही नहीं जानता है किंतु तुकाराम या बह राम - मेघालय में शेट्टी इस नाम से भी जाने जाते हैं - का नाम यहां बच्चा-बच्चा जानता है. साफ है कि संगठन तो आरएसएस से जरूरी दूरी प्रदर्शित करने का जरिया भर है. राजधानी शिलॉंग से लेकर दूरदराज के गांव तक सभी जानते हैं कि बच्चों को कर्नाटक ले जाने वाला असल संगठन संघ ही है. इस संस्था के जंतिया हिल्स जिले में तीन दफ्तर हैं - जोवाई, नरतियांग और शॉंगपॉंग. इसके अलावा सेवा भारती और कल्याण आश्रम जैसे संगठन भी हैं जो बच्चों की पहचान करने और उन्हें कर्नाटक भेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

स्थानीय सेंग खासी स्कूल में अध्यापक और कल्याण आश्रम में रहने वाले योलिन खरूमिनी कहते हैं, ‘हमसे उन परिवारों की पहचान करने के लिए कहा जाता है जो ईसाई नहीं बने हैं और जिनका अपने मूल धर्म से काफी जुड़ाव है. साधारणत: ये परिवार ईसाइयों के बारे में अच्छा नहीं सोचते. इनके सामने बच्चों को कर्नाटक में पढ़ाने का प्रस्ताव रखा जाता है. हम उन्हें हमेशा ये भी बताते हैं कि उनके बच्चों को सेंग खासी या नियाम्त्रे की परंपराओं के मुताबिक ही शिक्षा दी जाएगी.’ खरूमिनी की खुद की भतीजी कर्डमोन खरूमिनी भी कर्नाटक के मंगला नर्सिंग स्कूल में पढ़ती है.

कॉप (जिला उडुपी) के विद्यानिकेतन स्कूल की दसवीं कक्षा में पढ़ रही खतबियांग रिम्बाई विस्तार से बताती है कि कैसे 200 बच्चों को विभिन्न गांवों से बंगलुरु लेकर आया गया था. ‘हमें कई समूहों में बांटकर बड़े बच्चों को उनका इंचार्ज बना दिया गया. फिर शिलॉंग से हमें टाटा सूमो में बिठाकर ट्रेन पकड़ने के लिए गुवाहाटी ले जाया गया’ वो कहती है. बंगलुरु में उन्हें विभिन्न स्कूलों में भेजने से पहले आरएसएस के कार्यालय ले जाया गया था.

एक चौंकाने वाली बात तहलका को शिलॉंग के एक संघ कार्यकर्ता प्रफुल्ल कोच और थिकबेट्टू स्कूल के प्रमुख ने ये बतायी कि इस बात का हमेशा ध्यान रखा जाता है कि एक ही परिवार के दो बच्चों को हमेशा अलग-अलग स्कूलों में भर्ती किया जाए. ‘अगर वे साथ नहीं हैं तो उन्हें अनुशासित करना आसान होता है. अगर हमें उन्हें बदलना है तो उन पर नियंत्रण रखना ही होगा. उनका घर से जितना कम संपर्क रहे उतना ही बढ़िया.’

बाल न्याय कानून-2000 कहता है कि बच्चों के कानूनी स्थानांतरण के लिए इस तरह के सहमति पत्र अनिवार्य है. मगर इस कानून का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है

तहलका को एक ही परिवार के ऐसे कई बच्चे अलग-अलग स्कूलों में मिले - खतबियांग का भाई सप्लीबियांग रिंबाई केरल के कासरगॉड में स्थित प्रशांति विद्या निकेतन में पढ़ता है जबकि वो कर्नाटक में विद्या निकेतन स्कूल में पढ़ रही है. विद्यानिकेतन के ही एक और छात्र रीन्बॉर्न तेरियांग की बहन मैसूर के जेएसएस मठ स्कूल में पढ़ रही है. मंद्य के अभिनव भारती बॉइज हॉस्टल के बेद सिंपली की बहन विद्यानिकेतन में पढ़ती है. मंद्य जिले के आदिचुंचनगिरी स्कूल में पढ़ने वाले इवानरोई लांगबांग की भी बहन डायमोन्लांकी शिमोगा के वनश्री स्कूल में पढ़ती है. यहां ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिलता जिसमें एक ही परिवार के दो या ज्यादा बच्चों को एक साथ पढ़ने दिया जा रहा हो. ऐसा क्यों किया जा रहा है पूछने पर ये बच्चे कुछ बोल ही नहीं पाते.

जब तहलका ने बच्चों के परिवारवालों से पूछा कि वे अपने बच्चों को अलग-अलग क्यों रख रहे हैं तो उनका जवाब था कि इस बारे में उन्हें काफी बाद में जाकर पता लगा. खतबियांग और सप्लीबियांग की बड़ी बहन क्लिस रिंबाई बताती हैं, ‘जब वे गए थे तो हमें बस इतना पता था कि वे बंगलुरु जा रहे हैं. हमें स्कूल के बारे में कुछ पता ही नहीं था. ये तो काफी बाद में हमें पता लगा कि वे अलग कर दिये गए हैं और बंगलुरू में नहीं है. खतबियांग ने हमें ये भी बताया कि वो फिर से कक्षा सात में ही पढ़ रही है.’ जंतिया हिल्स में रहने वाला रिंबाई परिवार काफी समृद्ध है और बच्चों के पिता कोरेन चिरमांग आरएसएस से सहानुभूति रखने वालों में से हैं जिन्होंने अपने बच्चों के अलावा और भी कई बच्चों को कर्नाटक भेजने में अहम भूमिका निभाई है. ‘वे पहले काफी सक्रिय रहा करते थे मगर हाल ही में काफी बीमार होने की वजह से आरएसएस के साथ दूसरे गांवों में नहीं जा पा रहे हैं.’ क्लिस कहती हैं.

अपने भाषा, संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान और वातावरण से दूर रहने का इन छोटे-छोटे बच्चों पर अलग-अलग तरीके से असर पड़ रहा है. जिन स्कूलों में भी तहलका गया वहां के हॉस्टल वॉर्डन, अध्यापकों और स्वयं बच्चों ने ये स्वीकारा कि मेघालय के उनके गांव और कर्नाटक के उनके स्कूलों की हवा-पानी में काफी अंतर होने की वजह से बच्चों को तरह-तरह की शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. चमराजनगर के दीनबंधु चिल्ड्रंस होम के सचिव जीएस जयदेव के मुताबिक मेघालय से आए छ: साल के तीन बच्चों - शाइनिंग लामो, सिबिनरिंगखेल्म और स्पिड खोंगसेइ - के शरीर पर कर्नाटक की भीषण गर्मी की वजह से लंबे समय तक जबर्दस्त चकत्ते रहे. थिंकबेट्टू स्कूल में भी कई बच्चे हमें ऐसे मिले जिनकी त्वचा पर कई महीनों से वहां रहने के बावजूद जलने के निशान साफ देखे जा सकते थे. नागमंगला में आदिचुंचनगिरी मठ द्वारा चलाए जाने वाले संस्कृत कॉलेज में पढ़ने वाले मेघालय के 11 बच्चों में से सबसे बड़े आयोहिदाहुन रैबोन ने तहलका को बताया कि मेघालय से आने वाले तीन छोटे बच्चे पिछले काफी समय से बीमार चल रहे हैं क्योंकि उन्हें स्कूल में दिया जाने वाला खाना रास नहीं आ रहा है.

इन बच्चों के ऊपर उन्हें अपने घरों से यहां लाए जाने का जबर्दस्त मानसिक प्रभाव भी पड़ रहा है. जिन भी स्कूलों में तहलका जा सका उनमें स्कूल के अधिकारियों ने बच्चों को बुलाकर उन्हें कन्नड में अपना परिचय देने का आदेश दिया. स्कूल के संचालकों के लिए तो ये बड़े गर्व की बात थी कि बाहर से आए ये बच्चे उनकी भाषा को इतने अच्छे तरीके से बोल पा रहे हैं. किंतु बच्चों पर अब तक सीखा सब कुछ भूलने का क्या असर हो रहा है इसकी शायद किसी को कोई परवाह नहीं. विभिन्न स्कूलों के अधिकारियों का दावा है कि मेघालय से आए बच्चे दूसरे बच्चों के साथ अच्छे से घुल-मिल गए हैं मगर सच तो ये है कि ऐसा हो नहीं रहा है. बच्चों से कुछ मिनटों की बातचीत में ही हमें पता लगता है कि कैसे स्थानीय बच्चे उनके अलग तरह के नाम और शक्लों को लेकर उनका मजाक बनाते हैं और इसलिए वे अपने जैसे बच्चों के साथ ही रहना पसंद करते हैं.

हमने एक कक्षा में पाया कि जहां स्थानीय बच्चे एक बेंच पर चार के अनुपात में बैठे हुए थे वहीं मेघालय से आए छ-सात बच्चे एक-दूसरे के साथ बैठने की कोशिश में बस किसी तरह बेंच पर अटके हुए थे. जहां इन बच्चों की संख्या काफी कम है वहां ये अपने में ही गुम रहने लगे हैं. बड़े बच्चों के लिए स्कूल की भौगोलिक स्थिति भी काफी निराश करने वाली है. बंगलुरु से करीब 150 किमी दूर नागमंगला में नवीं कक्षा में पड़ रहा इवानरोई लांगबांग अपनी निराशा कुछ इस तरह व्यक्त करता है, ‘हमें बताया गया था कि में बंगलुरु में पढ़ूंगा. ये तो यहां आने के बाद मुझे पता चला कि ये बंगलुरु से काफी दूर है. यहां हम चाहरदीवारी से बाहर नहीं जा सकते और अगर कभी चले भी जाएं तो उसका कोई फायदा नहीं क्योंकि बाहर वैसे भी कुछ है ही नहीं.’

इन बच्चों को मेघालय से लाकर पूरी तरह से कन्नड़ भाषी माहौल में डुबो देने का नतीजा छमराजनगर में स्थित दीनबंधु चिल्ड्रन होम में देखा जा सकता है. यहां की केयरटेकर छह साल के एक बच्चे की प्रगति को बयान करते हुए कहती है, ‘सिबिन को यहां रहते हुए अभी दो ही महीने हुए हैं पर उसने काफी कन्नड़ सीख ली है. एक बार उसके घर से फोन आया तो उसने सवालों के जवाब कन्नड़ में देने शुरू कर दिए जो कि जाहिर है कि घरवालों की समझ में बिल्कुल नहीं आई.’ असंवेदनहीना देखिए कि इसके बाद केयरटेकर इतनी जोर से हंसती है जैसे कि यह कोई मजाक की बात हो.

फिर वह कहती है, ‘45 मिनट तक वह महिला जो कि शायद उसकी मां होगी, कोशिश करती रही. सिबिन के पास कोई जवाब नहीं था क्योंकि वह अपनी भाषा भूल गया था.’ इसके बाद वह सिबिन को बताने लगती है कि रात के भोजन को कन्नड़ में क्या कहते हैं.

इस तरह से देखा जाए तो ये बच्चे जो शारीरिक और मानसिक नुकसान झेल रहे हैं वह सामान्य बोर्डिंग स्कूलों के बच्चों से अलग है. इन बच्चों को यहां लाने के पीछे का उद्देश्य कहीं बड़ा है यह कोच जैसे संघ कार्यकर्ता भी मानते हैं. सवाल उठता है कि इतनी छोटी उम्र के बच्चों को इनके मां-बाप आखिर क्यों इतनी दूर भेज रहे हैं? मेघालय के आठ गांवों की अपनी यात्रा के दौरान तहलका ने पाया कि ऐसे लोगों में से ज्यादातर गरीब हैं जो इस उम्मीद में अपने बच्चों को संघ को सौंप देते हैं कि उनकी देखभाल अच्छी तरह से हो सकेगी. इसका उनसे वादा भी किया जाता है. अक्सर ऐसे बच्चों का कोई बड़ा भाई या बहन पहले ही इस तरह के स्कूलों में पढ़ रहा होता है.

बारीकी से पड़ताल करने पर पता चलता है कि इस समूची प्रक्रिया में झूठ के कई ताने-बाने हैं. इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

मां-बाप ने लिखित रूप में अपनी सहमति दे दी है

जब तहलका ने कर्नाटक के इन स्कूलों का दौरा कर उनसे वे कागजात मांगे जो ये साबित कर सकें कि इन बच्चों का एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरण कानूनी है तो हमें गांव के मुखिया रैंगबा शनांग द्वारा हस्ताक्षरित पत्र दिखाए गए जिसमें लिखा गया था कि इनके परिवारों की माली हालत बहुत खराब है. इसके साथ ही हमें बच्चों के जन्म और जाति प्रमाणपत्र भी दिखाए गए. मगर किसी भी स्कूल ने कोई ऐसा पत्र नहीं दिखाया जिस पर बच्चे के मां-बाप के दस्तखत हों और जिसमें साफ तौर पर जिक्र हो कि बच्चे को किस स्कूल के सुपुर्द किया जा रहा है. मेघालय में भी तहलका जिन लोगों से मिला उनमें से भी किसी के पास इस तरह के हस्ताक्षरित सहमति पत्र की कॉपी नहीं थी. बाल न्याय कानून-2000 कहता है कि बच्चों के कानूनी स्थानांतरण के लिए इस तरह के सहमति पत्र अनिवार्य है. मगर इस कानून का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है. इस तरह से देखा जाए तो ये बच्चों की तस्करी जैसा है.

स्कूलों में सेंग खासी और नियाम्त्रे धर्मों की शिक्षा दी जाती है

खासी और जंतिया जनजाति में ईसाई धर्म अपना चुके लोगों और बाकियों के बीच तनातनी रहती है. संघ द्वारा ध्यान से ऐसे बच्चों को चुना जाता है जो गरीब घरों से हैं और अब तक ईसाई नहीं बने हैं. स्वेर गांव की बिए नांगरूम कहती हैं, ‘मुझसे कहा गया कि अपनी बेटी को धर्म परिवर्तन से बचाने का एक ही रास्ता है कि उसे बाहर भेज दो. अगर मैंने ऐसा नहीं किया तो चर्च मेरे बच्चों को ले जाएगा और उन्हें पादरी और नन बना देगा. मैं बहुत डरी हुई थी इसलिए मैं अपनी बेटी को वहां भेजने के लिए राजी हो गई.’ छह साल बीत चुके हैं मगर बिए को अब भी उस स्कूल के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है जहां उसकी बेटी पढ़ रही है. उसके पास कुछ है तो बस बेटी की कक्षा का एक फोटो. वह कहती है, ‘अगर मुझे पता चल भी जाए कि वह कहां है तो मेरे पास उस तक पहुंचने और उसे वापस लाने लायक पैसा नहीं है. पर मैं दूसरे बच्चे को कभी भी वहां नहीं भेजूंगी.’

बिए का टूटा-फूटा घर, जिसमें वह अपनी मां और तीन दूसरे बच्चों के साथ रहती है, उसकी गरीबी की कहानी कह देता है. इससे ये भी संकेत मिलता है कि आखिर क्यों लोग चाहकर भी अपने बच्चों को वापस नहीं ला पाते. दरअसल उनके पास इतना भी पैसा नहीं होता. कई लोगों का तहलका से कहना था कि उनके बच्चे संघ के जिन स्कूलों में पढ़ रहे हैं वहां उनके धर्म की शिक्षाएं दी जाती हैं. मोखेप गांव के जेल चिरमांग के घर में तहलका को फ्रेम में लगी एक फोटो दिखी. इसमें जेल की बेटी रानी चिरमांग को उसके स्कूल के संरक्षक संत श्री बालगंगाधरनाथ सम्मानित करते हुए नजर आ रहे थे. हमने जेल से पूछा कि भगवा चोले में नजर आ रहे ये संत कौन हैं तो उसका जवाब था कि वे एक सेंग खासी संत हैं जो उस स्कूल को चलाते हैं. उसकी आवाज में जरा भी शंका नहीं थी. बाद में पता चला कि उसका पति डेनिस सिहांगशे संघ का कार्यकर्ता है जिसने माना कि अपनी बेटी का उदाहरण देकर उसने कई दूसरे लोगों को अपने बच्चों को इन स्कूलों में भेजने के लिए राजी किया है. डेनिस के शब्दों में ‘लोगों की संघ के बारे में गलत धारणा है. मैं हमेशा उन्हें यही कहता हूं कि संघ उन्हें अच्छी शिक्षा और संस्कृति देगा.’

ज्यादातर मां-बाप इससे अनजान होते हैं कि इन स्कूलों में उनकी संस्कृति के बजाय किसी और ही चीज की घुट्टी पिलाई जा रही है. जबरन थोपी जा रही दूसरी संस्कृति के तहत इन बच्चों जो किताबें दी जाती हैं वे बंगलुरू स्थित संघ के प्रकाशन गृहों में छपती हैं. जेएसएस स्कूल की लाइब्रेरी भारतीय संस्कृति प्रकाशन से छपकर आईं उन किताबों से भरी पड़ी है जो संघ की विचारधारा पर आधारित हैं. इनमें सेंग खासी या नियाम्त्रे धर्म की शिक्षाओं का कोई अंश नजर नहीं आता.

बच्चे निराश्रित और असहाय हैं

गैरआदिवासी समाज में पिता के परिवार को छोड़ देने से परिवार को निराश्रित माना जाता है. मगर मेघालय के आदिवासी समाज में ऐसा अक्सर देखने को मिलता है कि पुरुष किसी दूसरी स्त्री के साथ रहने लगते हैं और बच्चों की जिम्मेदारी मां संभालती है. अगर मां की मौत हो जाती है तो बच्चे को रिश्तेदार पालते हैं.

बच्चों को खुद को अच्छी तरह से नए माहौल के मुताबिक ढाल लिया है

जब बच्चे मेघालय छोड़ रहे होते हैं तो न तो उन्हें और न ही उनके मां-बाप को ये पता होता है कि उन्हें आखिरकार कहां ले जाया जाएगा. कमजोर आर्थिक हालत और स्कूलों में सुविधाओं के अभाव के चलते मां-बाप का बच्चों से सीधा संपर्क नहीं हो पाता. संघ मां-बाप को बताता है कि उनके बच्चे खुश हैं और नए माहौल में काफी अच्छी तरह से ढल गए हैं. मगर हकीकत कुछ और ही होती है. विद्या निकेतन में छठवीं का छात्र रापलांग्की ढकार इंतजार कर रहा है कि उसके चाचा आएंगे और उसे घर ले जाएंगे. वह कहता है, ‘हम तभी वापस जा सकते हैं जब हमारे घर से लोग यहां आएं और हमें अपने साथ ले जाएं. हर साल जब पढ़ाई खत्म होती है तो हम सुनते हैं कि हमें वापस ले जाया जाएगा. मगर दो साल हो गए हैं.’

तहलका जिन बच्चों से मिला उनमें से सिर्फ दो ही ऐसे थे जिन्हें घर लौटने का मौका मिला था. रापलांग्की के कस्बे रालिआंग में जब तहलका ने उसके चाचा से पूछा कि वे अपने भतीजे को लेने क्यों नहीं गए तो वे हैरान हो गए. उनका कहना था, ‘मुझे तो इसमें जरा भी शंका नहीं थी कि मेरा भतीजा अच्छी तरह से वहां रम गया है. जोवाई में संघ की हर बैठक में हमें आश्वस्त किया जाता है कि बच्चे खुश और स्वस्थ हैं.’

बच्चों और उनके अभिभावकों के बीच सीधा संपर्क यानी फोन कॉल अभिभावकों की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है. अगर मां-बाप बच्चे की पढ़ाई का खर्चा उठाने में असमर्थ हों तो बच्चों को मठों द्वारा चलाए जा रहे ऐसे स्कूलों में रखा जाता है जिनकी तुलना किसी अनाथाश्रम से की जा सकती है. यहां फोन की कोई सुविधा नहीं होती जैसा कि श्री आदिचुंचनगिरी मठ द्वारा संचालित हॉस्टल में देखने को मिलता है.

मगर संघ को इससे कोई मतलब नहीं. उसके लिए यह सब एक बड़े उद्देश्य के लिए चलाई जा रही प्रक्रिया का हिस्सा है. एक ऐसी प्रक्रिया जो न सिर्फ बच्चों के लिए शारीरिक और मानसिक यातना पैदा कर रही है बल्कि मेघालय की एक पीढ़ी को उसकी मूल संस्कृति से दूर भी ले जा रही है.    

Comments (44 posted)

avatar
rajnesh 13/07/2009 07:42:35
is tarah ke cultural transformation sekoi faayada nahi hone waala hai.tehelka aise khoj ko aur majbooti se saamne laye kyonki isme keval child smuugling kaa mamalaa nahi hai balkiek baat ye saamne aa rahi hai ki sangh yaa koi bhi dharm prasarak goot kis tarah apne vicharon ko failaane ke liye bacho ko0 bhi nahi baksh rahe hain.
Reply Thumbs Up Thumbs Down
-2
Report as inappropriate
avatar
Rajinder Dahiya 28/08/2011 04:22:16
i am totally against this type of journalism which is against the people of the country there is nothing wrong in the work of rss they are educating the poor childern and they are saving them from transforming into a criminal. we send our children to hostels so there is nothing wrong.
thelka is just writing against hindus to make it popular among so called social persons
rajinder dahiya
avatar
lucky 13/09/2011 11:58:06
why tahlaka is not understanding the values of great hindu personalities like ACHARYA CHANAKYA,SWAMI VIVEKANANDA,SWAMI DAYANAND SARASWATI,MAHATMA GANDHI and many more. when so ever the people of india are in slavery movement by other community there is always stands a GREAT PERSON. Bharat had never been great personalityless. we must understand it....
avatar
sumit 20/07/2009 07:11:06
Baccho ko hindu sanskriti ka hi to shikshan diya ja raha hai...isme burai kya hai...is kam ke liye to rss ko badhai deni chahiye. aur aap lo aaise likh rahe ho ki jaise rss bachho ko aatankwad ki training de rahi hai...rss hindutwa ka shikshan de to wo criminal aur isai jo dharmantar karrahe hai wo legal???
This article is a perfect example of negative journalism.
Sanjana ji lagta hai ki aap ne jarur english medium/ convent school se shiksha li hogi jaha isaio ne aapko isai sanskriti ka shikshan diya hai...
avatar
NITIN 22/05/2011 07:42:22
sumt g mai apse sahmat hu aap sahi kah arhe hai.ye neg patrakarita hai
avatar
Anand kumar dutta 22/07/2009 15:45:30
Sanjana ji aap Tehelka ki patrakar hain yahi nishpakshta ki pahli pahchan hai. Magar is report ne iski sakh par thoda saa batta laga diya hai. Agar aap isi tarah ki ek report isai mishnario ke dharmantaran par karen to, sakh per laga batta shayed hat jaye
avatar
Niraj Kumar 23/07/2009 07:41:21
Are you getting money or donation from misinories...!!!

Your one sided writing always creates such suspitions...
avatar
Mnaoj Kureel 29/07/2009 11:15:37
RSS agar Meghalya ke bachchon ko agar Bhartiya sanskirti padha raha hai to ismein galat kya hai???yeh story is tarah kyun batai gayi hai jaise RSS koi deshdroh ka kaam kar raha hai.madarson ki tarah yahan aatankwadi taiyaar to nahin kiye jate...apne desh se pyar karna sikhana kya galat hai??
avatar
Rakesh Sain 30/07/2009 09:10:49
ek sahi kaam ko galat trike se pesh kiya gya hai.desh ke lakhon bachche videshon men padhte hain, agar aapki drishti se dekha jaye to unki bhi sanskriti bhrasht ho rahi hogi. mother tressa ke missionery school men sabhi rajyon ke bachche padhte hain, aapne kabhi un par swaliya nishaan kyon nahin lagaly? lagta hai jaise aapke reporter sangh ke prati poorvagrah rakhte hain. report padhkar hansi aur aapki soch par taras aa raha hai.
avatar
ramgopal 30/07/2009 10:36:29
thanks, vakayi tehelka jaisi khoji patarkarita ne sngh ke itni door chal rahe sewakaryon ki jaankari sabko dee hai. dekhne ke liye apni aankh chahiye, jaise Ram ki aankhon men vibhishan ko bhagwan tatha uske bhai Ravan ko apni maut najar aai.aap aage bhi aisi jaankari dete raha karen, samjhne waale ab samajhdaar ho gaye hain, aajkal to log kisi ko pattar nahin likhte, aapne to itna bara lekh likh diya.itni mehnat ke liys fir se dhanyawad.
avatar
varun 01/08/2009 04:53:47
India Got Independent because of violences done to British Administer, but coward people of non-violences has taken credit of India's independent. ALL Indian HISTORY,Indian government teaches in schools & colleges is totally wrong and the syllabus is made by anti-hindu & anti-BHARAT people like J.NEHARU & Congress.If Nehru were not allowed to become first PM of India, today all was different, the India constitution was totally different,all Muslim were sent to Pakistan,the flag,the national anthem and politic were different. JAI HINDU NATION bharat. at any cost we make india a hindu nation.new constitution(equal right to all people),new flag(In flag hanuman)new national(vedic) anthem.
avatar
Mazumdar 01/08/2009 07:11:57
इतनी अच्छी जानकारी के लिए सदर धन्यवाद .......

कम से कम देश मे कोई तो है जिसने देश के लिए सोचा

वरना बाकी सब तो अंग्रेज़ो और मुल्लों के गुलाम हैं...इस देश में ....

पुनः धन्यवाद इतनी अच्छी जानकारी देने के लिए....
avatar
Sandeep 27/08/2009 20:55:41
Whats wrong in that whn entire East india is going to convert in Christian & Muslim religion, Whats wrong in that why people dont talk abt it, whn missionary schools converts Dalits into Christianity, Which is NAKED truth.
1 2 3 4 5 next total: 41 | displaying: 1 - 10

Post your comment

  • Bold
  • Italic
  • Underline
  • Quote

Please enter the code you see in the image:

Captcha
  • email Email to a friend
  • print Print version
  • Plain text Plain text
Rate this article
3.30