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जिसकी करनी उसी की कथनी

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समझौता एक्सप्रेस और मालेगांव में हुए बम धमाकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक शामिल थे, स्वामी असीमानंद का इकबालिया बयान यह साबित करता पहला पुख्ता कानूनी सबूत है. 42 पन्नों का यह दस्तावेज नफरत की एक डरावनी कहानी कहता है. आशीष खेतान की रिपोर्ट

18 दिसंबर, 2010. दिल्ली की तिहाड़ जेल से नव कुमार सरकार नाम के एक व्यक्ति को लेकर सीबीआई की एक टीम तीस हजारी कोर्ट पहुंची. स्वामी असीमानंद के नाम से जाने जाने वाले 59 साल के इस शख्स को वहां मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट दीपक डबास के सामने पेश किया जाना था. असीमानंद 2007 में हैदराबाद स्थित मक्का मस्जिद में हुए उस बम विस्फोट का मुख्य आरोपित है जिसमें नौ लोगों की मौत हो गई थी. पिछले लगभग 48 घंटों के दौरान कोर्ट में उसकी यह दूसरी पेशी थी. इससे पहले 16 दिसंबर को असीमानंद ने मजिस्ट्रेट से प्रार्थना की थी कि कई आतंकी हमलों में उसकी भागीदारी से संबंधित उसका इकबालिया बयान रिकॉर्ड किया जाए. उसने यह भी कहा था कि वह ऐसा किसी डर, दबाव या लालच के बिना कर रहा है. कानून के हिसाब से चलते हुए मजिस्ट्रेट ने असीमानंद से कहा था कि वह अपने फैसले पर एक बार फिर विचार कर ले. इसके बाद उन्होंने उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया था ताकि वह पुलिस के किसी दखल या असर से दूर रहे.

असीमानंद ने मजिस्ट्रेट से कहा, 'मैं जानता हूं कि मुझे मौत की सजा हो सकती है, मगर मैं फिर भी इकबालिया बयान देना चाहता हूं'

18 दिसंबर को असीमानंद की फिर से पेशी हुई. लेकिन उसका इरादा बदला नहीं था. मजिस्ट्रेट ने हुक्म दिया कि उनके स्टेनोग्राफर को छोड़कर हर कोई उनके चैंबर से बाहर चला जाए. अब असीमानंद को बोलना था. उसने कहा, 'मैं जानता हूं कि मुझे मौत की सजा हो सकती है, मगर मैं फिर भी इकबालिया बयान देना चाहता हूं.'

इसके बाद अगले पांच घंटों के दौरान जो हुआ वह अप्रत्याशित था. असीमानंद ने विस्तार से बताया कि किस तरह वह और चंद हिंदूवादी नेता सिलसिलेवार तरीके से किए गए कई बम धमाकों की योजना बनाने और उसे अंजाम देने में शामिल थे. उसके इस बयान से इस मामले की वे सारी कड़ियां जुड़ती नजर आ रही थीं जो पिछले दो वर्षों के दौरान उजागर हुई थीं. पहली, 2008 में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, दयानंद पांडे, ले. कर्नल श्रीकांत पुरोहित और कुछ दूसरे लोगों की गिरफ्तारी. दूसरी, पांडे के लैपटॉप से 37 ऑडियो टेपों की बरामदगी जिनमें ये सारे लोग अपनी आतंकी गतिविधियों के बारे में चर्चा करते सुनाई दे रहे थे और सबसे हालिया, 2007 के अजमेर शरीफ धमाके में राजस्थान एटीएस की चार्जशीट. असीमानंद का यह इकबालिया बयान जांच एजेंसियों के लिए इस मामले के सबसे अहम सबूतों में से एक है.

आपराधिक प्रक्रिया संहिता यानी सीपीसी की धारा 164 कहती है कि किसी मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया इकबालिया बयान कानूनी तौर पर सबूत माना जाए. इस लिहाज से असीमानंद का बयान बहुत अहम है जिसका असर बहुत दूर तक जाएगा. 1992 में जब मुंबई में सिलसिलेवार बम धमाके हुए तो देश में इस तरह की यह पहली वारदात थी. उसके बाद से स्थितियां कुछ ऐसी बदलीं कि ज्यादातर लोगों को यही लगने लगा कि हर आतंकी धमाके के पीछे किसी मुसलमान का हाथ होता है. कुछ हद तक यह पूर्वाग्रह पुलिस और खुफिया एजेंसियों का भी रहा. जब भी कोई बम धमाका होता, मीडिया और सरकार के जबर्दस्त दबाव के चलते सुरक्षा एजेंसियां गहन जांच करके असल अपराधियों को पकड़ने की बजाय कट्टरपंथी संगठनों से जुड़े मुस्लिम नौजवानों को उठा लेतीं और उन्हें आतंक का मास्टमाइंड घोषित कर देतीं. मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भी बिना कोई सवाल किए इन एजेंसियों द्वारा दी जाने वाली जानकारियों को ज्यों का त्यों छाप देता. इससे मुसलिम समुदाय में निराशा  तो थी ही, बेचैनी और गुस्सा भी था. लेकिन नागरिक समाज के कुछ लोगों और तहलका जैसे चंद मीडिया संगठनों के अलावा किसी को भी हिम्मत नहीं हुई कि वह इस पूर्वाग्रह पर कोई सवाल उठाता. साध्वी प्रज्ञा और ले. कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी के बाद यह नजरिया कुछ-कुछ बदला, मगर ज्यादातर लोगों द्वारा इन्हें छोटे-मोटे अपवाद कहकर खारिज किया जाता रहा. अब असीमानंद का इकबालिया बयान इस पूर्वाग्रह पर कहीं तगड़ी चोट करता है.

इस बयान के मुताबिक 2006 और 2008 में मालेगांव और 2007 में समझौता एक्सप्रेस, अजमेर शरीफ और मक्का मस्जिद में बम धमाके करने वाले कोई मुसलिम नौजवानों ने नहीं किए थे बल्कि यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारकों की एक टीम थी. जितना दुखद इन धमाकों में बेगुनाहों का मरना है उससे भी चिंताजनक यह है कि अपनी आदत के मुताबिक पुलिस ने इन मामलों के संबंध में कई मुसलिम नौजवानों को उठाया और उन्हें जेल में रखकर यातनाएं दीं. इससे जनमानस में यह डर पैदा हुआ कि देश में इस्लामी आतंक का एक नेटवर्क बन गया है. इनमें से कई नौजवान कई साल जेल में बिताने के बाद छूट गए. कुछ आज भी जेल में हैं. उनकी जवानी और भविष्य पर ग्रहण लग चुका है.

' मैंने बताया कि अजमेर ऐसी जगह है कि वहां की दरगाह में हिंदू भी काफी संख्या में जाते हैं, इसलिए अजमेर में भी एक बम रखना चाहिए '

असीमानंद ने अपना अपराध कबूल क्यों किया यह जानना दिलचस्प है. उसका कहना है कि जेल में बंद मुसलिम नौजवानों में से एक के साथ हुई मुलाकात ने उसकी अंतरात्मा को झिंझोड़ दिया. असीमानंद ने जज से कहा, 'सर, जब मैं हैदराबाद की चंचलगुड़ा जिला जेल में था, तो मेरे साथ कलीम नाम का एक नौजवान भी वहां था. कलीम के साथ बातचीत के दौरान मुझे पता चला कि उसे पहले मक्का मस्जिद धमाके के मामले में गिरफ्तार किया गया था और इसलिए उसे डेढ़ साल जेल में रहना पड़ा. जेल में रहने के दौरान कलीम मेरी बहुत मदद करता था. वह पानी, खाना आदि लाकर मेरी सेवा किया करता था. कलीम के अच्छे व्यवहार ने मुझे द्रवित कर दिया. मेरी अंतरात्मा ने मुझसे कहा कि मैं इकबालिया बयान दूं ताकि वास्तविक दोषियों को सजा हो सके और किसी निर्दोष को दंड न भुगतना पड़े.'

असीमानंद के यह बात कहने पर मजिस्ट्रेट ने अपने स्टेनोग्राफर को भी बाहर जाने के लिए कह दिया ताकि इकबालिया बयान बिना किसी दिक्कत के जारी रह सके. इसके बाद हिंदी में लिखे गए 42 पन्नों के इस हस्ताक्षरित बयान में, जिसकी एक प्रति तहलका के पास है, असीमानंद ने हिंदूवादी आतंकी नेटवर्क की कार्यशैली के बारे में विस्तार से बताया है. उसके मुताबिक धमाकों में सिर्फ अभिनव भारत सरीखे छोटे-मोटे कट्टर हिंदूवादी संगठन शामिल नहीं थे. असीमानंद की मानें तो संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार ने भी कथित तौर पर कुछ संघ प्रचारकों को खुद चुनकर उन्हें ये आतंकी हमले करने के लिए पैसा दिया था. मजिस्ट्रेट को दिए बयान में उसने कहा है.

'2005 में शबरी धाम में इंद्रेश जी, जो आरएसएस की कार्यकारिणी समिति के सदस्य हैं, हमें मिले थे. उनके साथ में आरएसएस के सभी बड़े पदाधिकारी भी थे...इंद्रेश जी ने हमको बताया कि आप जो बम का जवाब बम की बात करते हो वह आपका काम नहीं है...उन्होंने बताया कि आप जो सोच रहे हैं हम लोग भी इस विषय पर सोचते हैं. सुनील को इस काम के लिए जिम्मेदारी दिया गया है. इंद्रेश जी ने कहा कि सुनील को जो मदद चाहिए वो हम करेंगे.'

असीमानंद ने आगे यह भी बताया है कि कैसे इंद्रेश ने जोशी को उसकी आतंकी गतिविधियों के लिए पैसा दिया और ऐसे लोग भी मुहैया करवाए जिन्हें बम रखने का काम करना था. असीमानंद ने इस योजना में अपनी भूमिका भी स्वीकार की और बताया कि किस तरह उसने कुछ संघ प्रचारकों और दूसरे हिंदू कट्टरपंथियों को मालेगांव, हैदराबाद और अजमेर में बम धमाकों को अंजाम देने के लिए प्रोत्साहित किया. (तहलका ने इंद्रेश कुमार से इस मसले पर कई बार बात करने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि वे हमें वापस फोन करेंगे, मगर उनका फोन नहीं आया.)

2002 में गुजरात के अक्षरधाम मंदिर पर मुसलिम आत्मघाती हमलावरों के हमलों के बाद  असीमानंद को बम का जवाब बम से देने की सूझी

मक्का मस्जिद और अजमेर धमाकों में संघ के प्रचारकों की भूमिका है, इसके सबूत तो हर नई गिरफ्तारी के साथ बढ़ ही रहे हैं. अब असीमानंद का इकबालिया बयान मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस में हुए बम धमाकों में हिंदू कट्टरपंथियों की भागीदारी का पहला प्रत्यक्ष सबूत है. सीबीआई ने जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सबूत जमा किए हैं उन्हें जोड़ने पर पता चलता है कि मुसलमानों और उनके धर्मस्थलों पर आतंकी हमले करने की एक व्यापक रणनीति 2001 के आसपास बनाई गई.

ऐसा लगता है कि मध्य प्रदेश के तीन संघ प्रचारक सुनील जोशी, रामचंद्र कालसांगरा और संदीप डांगे-इस पूरी साजिश के केंद्र में थे. इन तीनों का दुस्साहस जैसे-जैसे बढ़ता गया, उन्होंने दूसरे राज्यों, खासकर महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान से अपने जैसे विचार रखने वाले उग्र हिंदुओं की भर्ती शुरू की. ज्यादातर नए लोग संघ, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद से थे. कुछ सदस्य अभिनव भारत, जय वंदे मातरम और वनवासी कल्याण आश्रम जैसे छोटे संगठनों से भी आए.

जोशी, कालसांगरा और डांगे ने यह सावधानी बरती कि कोर ग्रुप से बाहर के किसी सदस्य को योजना की पूरी जानकारी न हो. यानी ऐसे हर सदस्य को सिर्फ अपने हिस्से के काम के बारे में पता होता था. डांग में वनवासी कल्याण आश्रम चलाने वाले असीमानंद का सुनील जोशी से पहला संपर्क 2003 में हुआ. मगर आतंकी हमले की इस साजिश में वह सक्रिय रूप से मार्च, 2006 में शामिल हुआ.

हिंदुत्व की यह व्यापक आतंकी साजिश 2008 में सबसे पहले तब उजागर हुई थी जब मालेगांव बम धमाके में महाराष्ट्र एटीएस के तत्कालीन मुखिया हेमंत करकरे ने 11 हिंदू कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया था. इसमें सैन्य खुफिया तंत्र की नासिक इकाई में तैनात ले. कर्नल पुरोहित, जम्मू में शारदा पीठ चलाने वाला स्वयंभू धर्मगुरु दयानंद पांडे और पहले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में रह चुकी साध्वी प्रज्ञा शामिल थी.

मगर इसी साल मुंबई में इस्लामी जेहादियों द्वारा किए गए हमले में करकरे शहीद हो गए और इसी के साथ इस मामले की जांच भी पटरी से उतर गई. महाराष्ट्र एटीएस के नए मुखिया केपी रघुवंशी बने, मगर उनकी टीम रामचंद्र कालसांगरा और संदीप डांगे को गिरफ्तार करने में विफल रही और इसकी बजाय उन्हें आरोप पत्र में उन्हें छोटा-मोटा खिलाड़ी बताया गया.

जांच ने मई, 2010 में एक बार फिर रफ्तार पकड़ी जब अजमेर बम धमाके की जांच कर रही राजस्थान एटीएस ने संघ के दो प्रचारकों देवेंद्र गुप्ता और लोकेश शर्मा को गिरफ्तार किया. गुप्ता बिहार के मुजफ्फरपुर में संघ का प्रचारक था. उसने जोशी, कालसांगरा और डांगे को मदद मुहैया करवाई. उसने कालसांगरा और डांगे को तब संघ के कार्यालयों में शरण भी दिलवाई जब वे जांच एजेंसियों से भागे-भागे फिर रहे थे.

लोकेश शर्मा, जोशी का करीबी था. उसी ने वे दो नोकिया मोबाइल फोन खरीदे थे जिन्हें मक्का मस्जिद और अजमेर शरीफ पर हुए बम धमाकों में ट्रिगर की तरह इस्तेमाल किया गया. शर्मा से हुई पूछताछ में ही पहली बार यह बात निकलकर सामने आई थी कि आतंक की इस साजिश में संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार भी शामिल हैं. राजस्थान एटीएस और सीबीआई की संयुक्त जांच में यह बात भी सामने आई कि महाराष्ट्र एटीएस ने 2008 में जिन लोगों को गिरफ्तार किया था उनमें से प्रज्ञा सिंह ठाकुर को छोड़कर सभी इस खेल के छोटे-मोटे मोहरे थे और इस साजिश में मुख्य भूमिका कथित रूप से इंद्रेश कुमार, कालसांगरा और डांगे से मिलकर बने कोर ग्रुप की ही थी.

जून, 2010 में सीबीआई ने भरत रितेश्वर नाम के एक गवाह से पूछताछ की. स्वामी असीमानंद का करीबी रितेश्वर गुजरात के वलसाड़ जिले के रहने वाला है. उसने सीबीआई को बताया कि सुनील जोशी इंद्रेश का चेला था और आतंकी हमले करने के लिए उसे जोशी ने सिर्फ सहमति ही नहीं बल्कि दूसरी कई तरह की सहायता भी दी थी. 19 नवंबर, 2010 को सीबीआई ने हरिद्वार के एक गुप्त ठिकाने पर छापा मारा और स्वामी असीमानंद को गिरफ्तार किया जो 2008 में साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी के बाद से ही फरार चल रहा था. इस गिरफ्तारी से कई और गुत्थियां सुलझीं.

' हम चारों की बैठक में मैंने सुझाव दिया कि महाराष्ट्र के मालेगांव में 80 प्रतिशत मुसलिम रहते हैं इसलिए पहला बम वहीं रखना चाहिए '

नव कुमार उर्फ स्वामी असीमानंद मूल रूप से प. बंगाल के हुगली जिले में स्थित कुमारपुकुर नाम के एक गांव का रहने वाला है. यह वही गांव है जहां रामकृष्ण परमहंस भी पैदा हुए थे. 1971 में हुगली से बीएससी करने के बाद मास्टर डिग्री लेने के लिए नव कुमार बर्धमान जिले में रहने लगा. वैसे तो वह स्कूली दिनों से ही संघ की गतिविधियों में शामिल रहा था लेकिन पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान वह संघ का सक्रिय सदस्य बन गया. 1977 में उसने संघ द्वारा पुरुलिया और बांकुरा जिले में चलाए जा रहे वनवासी कल्याण केंद्र में काम करना शुरू कर दिया. 1981 में उसके गुरु स्वामी परमानंद ने उसे स्वामी असीमानंद नाम दिया.

इसके बाद 1988 से 1993 तक असीमानंद अंडमान और निकोबार स्थित वनवासी कल्याण आश्रम में रहा. 1993 से 1997 के बीच आदिवासियों में हिंदू धर्म का प्रचार करने के लिए उसने देश भर की यात्राएं कीं. 1997 में वह गुजरात के डांग जिले में स्थायी तौर पर काम करने लगा. यहां उसने शबरी धाम नाम का एक आदिवासी कल्याण संगठन खोल लिया था. असीमानंद को इलाके में अपने उन्मादी अल्पसंख्यक विरोधी भाषणों और ईसाई मिशनरियों के खिलाफ अपने अभियानों के लिए जाना जाता था.

असीमानंद के बारे में माना जाता है कि वह संघ नेतृत्व के करीब है. अतीत में शबरी धाम में आयोजित विभिन्न धार्मिक आयोजनों में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, संघ के पूर्व मुखिया केएस सुदर्शन और वर्तमान मुखिया मोहन भागवत भी शामिल हो चुके हैं. असीमानंद के कबूलनामे के अनुसार 2002 में जब मुसलिम आत्मघाती हमलावरों ने गुजरात के अक्षरधाम मंदिर पर हमला किया और उसमें कई भक्त मारे गए तो पहली बार उसे लगा कि इन आतंकी हमलों का जवाब ऐसे ही हमलों से दिया जाना चाहिए. उसके शब्दों में, '2002 से हिंदू मंदिरों पर मुसलिम द्वारा बम अटैक हो रहे थे. इससे मैं बहुत विचलित रहता था. मैं इसे बारे में वलसाड के भरत भाई से चर्चा करता रहता था.'

2003 में असीमानंद सुनील जोशी और प्रज्ञा सिंह ठाकुर के संपर्क में आया. वह इन लोगों के साथ अकसर इस्लामी आतंकवाद पर चर्चा किया करता. उसका कहना है कि जब मार्च, 2006 में बनारस के संकटमोचक मंदिर पर आतंकी हमला हुआ तो उसे लगा कि अब बहुत हो चुका. अपने बयान में उसने कहा है, 'मार्च 2006 में प्रज्ञा सिंह, मनोज उर्फ सुनील जोशी और भरत भाई शबरी धाम आए  हुए थे. संकटमोचन मंदिर में हुए बम ब्लास्ट से हम सभी विचलित थे और हमने तय कर लिया कि इसका जवाब हमें देना चाहिए.'

असीमानंद ने जोशी को 25,000 रु. दिए ताकि इनसे वह धमाकों के लिए जरूरी इंतजामात कर सके. उसने जोशी और रितेश्वर को गोरखपुर भेजा. वहां उनकी भाजपा के फायरब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ से इस काम के लिए मदद लेने की योजना थी. कहा जाता है कि अप्रैल, 2006 में जोशी ने आदित्यनाथ के साथ एक गोपनीय बैठक की, लेकिन इसका खास फायदा नहीं हुआ. उसके शब्दों में, 'सुनील जोशी ने कहा कि आदित्यनाथ से कोई मदद नहीं मिली.'

लेकिन इससे असीमानंद के कदम डिगे नहीं. वह अपनी योजना पर आगे बढ़ता गया. जून, 2006 में असीमानंद, रितेश्वर, साध्वी प्रज्ञा और जोशी फिर से वलसाड में रितेश्वर के घर पर मिले. इसका नतीजा काफी दूर तक जाने वाला था. इसमें पहली बार जोशी अपने साथ अपने चार सहयोगियों को लेकर पहुंचा--डांगे, कालसांगरा, लोकेश शर्मा और अशोक उर्फ अमित. असीमानंद के शब्दों में 'मैंने सबको बताया कि बम का जवाब बम से देना चाहिए. मुझे मीटिंग में महसूस हुआ कि ये लोग पहले से ही इस विषय में कुछ सोच रहे हैं और कर ही रहे हैं.'

आगे असीमानंद ने कहा है, 'मीटिंग के बाद हमने भोजन किया और उसके बाद मैं, सुनील, भरत भाई और प्रज्ञा सिंह अलग से एक जगह पर बैठे. बाकी चार लोग अलग से बैठे थे. हम चारों की बैठक में मैंने सुझाव दिया कि महाराष्ट्र के मालेगांव में 80 प्रतिशत मुसलिम रहते हैं इसलिए नजदीक से ही हमारा काम शुरू होना चाहिए और पहला बम वहीं रखना चाहिए. फिर मैंने कहा कि स्वतंत्रता के समय हैदराबाद के निजाम ने पाकिस्तान के साथ जाने का निर्णय लिया था इसलिए हैदराबाद को भी सबक सिखाना चाहिए. फिर मैंने बताया कि अजमेर ऐसी जगह है कि वहां की दरगाह में हिंदू भी काफी संख्या में जाते हैं इसलिए अजमेर में भी एक बम रखना चाहिए जिससे हिंदू डर जाएंगे और वहां नहीं जाएंगे. मैंने यह भी बताया कि अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में भी बम रखना चाहिए.'

असीमानंद के मुताबिक सब इन जगहों को निशाना बनाने पर सहमत हो गए. इसके बाद असीमानंद ने कहा है, 'सुनील जोशी ने भी सुझाव दिया कि इंडिया-पाकिस्तान के बीच में चलने वाली समझौता एक्सप्रेस में केवल पाकिस्तानी ही यात्रा करते हैं इसलिए समझौता एक्सप्रेस में भी बम ब्लास्ट करना चाहिए. इसकी जिम्मेदारी जोशी ने स्वयं ली. उसने यह भी बताया कि समझौता एक्सप्रेस में बम ब्लास्ट सिम कार्ड की मदद से नहीं हो सकता. उसके लिए कुछ कैमिकल्स की जरूरत पड़ेगी जिनकी व्यवस्था डांगे करेगा.'

' जोशी ने बताया कि पेपर देखते रहना, कुछ अच्छा खबर मिलेगा. तीन-चार दिन बाद मक्का मस्जिद में बम ब्लास्ट की खबर आई '

असीमानंद की स्वीकारोक्ति और भी विस्तार में जाती है,  'जोशी ने बताया कि बम ब्लास्ट करने के लिए तीन ग्रुप होने चाहिए. एक ग्रुप आर्थिक मदद और बाकी व्यवस्था करेगा. एक ग्रुप बम के सामान के संग्रह का काम करेगा और तीसरा ग्रुप बम रखने का काम करेगा. सुनील ने यह भी कहा कि एक ग्रुप का आदमी दूसरे ग्रुप के बारे में नहीं जानेगा और पूछताछ भी नहीं करेगा क्योंकि यदि एक भी व्यक्ति पकड़ा गया तो सब पकड़े जाएंगे.'

गुस्से और नफरत की आग अब एक हद से आगे चली गई थी. आठ सितंबर, 2006 को डेढ़ बजे महाराष्ट्र के मालेगांव में चार बम फटे. सांप्रदायिक तनाव के लिहाज से संवेदनशील माने जाने वाले इस कस्बे में जिस दिन यह घटना हुई उस दिन शुक्रवार तो था ही,शब-ए-बरात का पर्व भी था. तीन बम हमीदिया मस्जिद के कंपाउंड और बड़ा कब्रिस्तान में फटे जबकि चौथा मुशावरत चौक पर.

पहले तीन बमों में से एक हमीदिया मस्जिद और बड़ा कब्रिस्तान के गेट पर रखा गया था, दूसरा भीतर कंपाउंड में बनी पार्किंग में रखी एक साइकिल पर और तीसरा कंपाउंड के भीतर ही बने हुए वजूखाने के सामने बने पावर सप्लाई रूम की दीवार पर. चौथा बम मुशावरत चौक पर एक खंभे के पास खड़ी एक साइकिल पर रखा गया था. इस चौक पर बहुत भीड़भाड़ रहती है. यानी हमला बहुत सुनियोजित था. बम एक के बाद एक करके फटे. 30 लोग मारे गए और 312 से भी ज्यादा घायल हुए.हरकत में आते हुए महाराष्ट्र एटीएस ने हमले के 90 दिन के भीतर मालेगांव से नौ मुसलमानों को पकड़ा. इनमें से आठ प्रतिबंधित संगठन सिमी के सदस्य थे. मालेगांव से ही ताल्लुक रखने वाले तीन मुसलमानों को फरार बताया गया. इन पर कठोर कानून मकोका के प्रावधान लगाए गए. 21 दिसंबर, 2006 को महाराष्ट्र सरकार ने यह मामला सीबीआई के सुपुर्द कर दिया. उसी दिन एटीएस ने उपरोक्त नौ लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए थे. इस तरह देखा जाए तो सीबीआई को एक तरह से सुलझाया हुआ मामला दे दिया गया था क्योंकि मामले की जांच करके आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके थे.

एक साल पहले सीबीआई ने इस मामले में एक पूरक आरोपपत्र दाखिल किया, मगर वह कोई स्पष्ट सबूत पेश करने में असफल रही. इस तरह चार साल से भी ज्यादा समय से मालेगांव के ये छह मुसलमान जेल में बंद हैं. असीमानंद का कबूलनामा इस बात को वजन देता लगता है कि ये नौजवान निर्दोष थे और उन्हें सिर्फ इसलिए गिरफ्तार किया गया था ताकि जनता को यह दिखाकर बहलाया जा सके कि मामले के दोषी पकड़े जा चुके हैं.

असीमानंद के मुताबिक इस हमले का वास्तविक मास्टरमाइंड सुनील जोशी था और यह असीमानंद ही था जिसने उसे मालेगांव में धमाका करने के लिए राजी किया था. असीमानंद ने मजिस्ट्रेट से कहा है,  'दीवाली पर उसी साल सुनील मुझसे मिलने शबरी धाम आया. तब तक मालेगांव का बम ब्लास्ट हो चुका था. सुनील ने मुझे बताया कि मालेगांव में जो बम ब्लास्ट हुआ है वो हमारे आदमियों ने किया है. मैंने सुनील को कहा कि अखबार में तो खबर आई है कि कुछ मुसलिम लोगों ने यह किया है और कुछ मुसलिम पकड़े भी गए हैं. मैंने सुनील से पूछा कि हमारे किन लोगों ने यह ब्लास्ट किया है तो सुनील ने बताने से मना कर दिया.'

18 फरवरी, 2007 यानी भारत-पाक शांति वार्ता के तहत पाकिस्तानी विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी के भारतीय दौरे की पूर्व संध्या पर दिल्ली से लाहौर के बीच चलने वाली भारत-पाक समझौता एक्सप्रेस के दो डिब्बों में आधी रात को दो भीषण बम धमाके हुए. तब ट्रेन दिल्ली से 80 किमी दूर पानीपत के पास दिवाना से गुजर रही थी. ट्रेन में ही एक और बम भी रखा गया था, मगर वह नहीं फटा. 68 लोग मारे गए और दर्जनों घायल हुए. शांति वार्ता को इस घटना से बड़ा झटका लगा.

जांच के दौरान पता चला कि इन तीन डिब्बों में चुपके से तीन सूटकेस रखे गए थे. इनके भीतर डेटोनेटर, टाइमर, विस्फोटकों से भरी लोहे की छड़ें और पेट्रोल और केरोसीन से भरी बोतलें रखी हुई थीं. शक की सुई तुरंत पाकिस्तान आतंकियों की तरफ घूमी. अलग-अलग जांच एजेंसियों ने अलग-अलग नाम लिए. इनमें मुख्य थे पाकिस्तान स्थित हरकत उल जिहाद इस्लामी यानी हूजी और लश्कर ए तैयबा. भारत ही नहीं बल्कि अमेरिकी विदेश विभाग ने भी इस हमले को इन दोनों संगठनों का संयुक्त अभियान बताया. हरियाणा पुलिस को पता चला कि धमाके में इस्तेमाल हुआ कुछ सामान इंदौर से खरीदा गया था, मगर जल्दी ही मामले की जांच ठंडी पड़ गई.

नवंबर, 2008 में महाराष्ट्र एटीएस ने नासिक की एक अदालत को बताया कि ले. कर्नल पुरोहित ने 2006 में जम्मू-कश्मीर से 60 किलो आरडीएक्स खरीदा था और संदेह है कि इसका कुछ हिस्सा समझौता एक्सप्रेस में हुए बम धमाकों में इस्तेमाल किया गया है. मगर एटीएस इस दावे की पुष्टि में सबूत पेश करने में नाकाम रही और अपने रुख से पीछे हटने पर मजबूर हो गई. हरियाणा पुलिस की एक टीम पुरोहित और मालेगांव धमाके के दूसरे आरोपितों से पूछताछ करने मुंबई पहुंची, मगर उसे ऐसे कोई सबूत नहीं मिल पाया है, जो उनका संबंध समझौता एक्सप्रेस में हुए धमाकों से जोड़ पाते. जुलाई, 2010 में समझौता एक्सप्रेस में हुए धमाकों की जांच एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) को सौंप दी गई. हालांकि अब भी कुछ सवाल हैं जिनका जवाब नहीं मिल पाया है, फिर भी असीमानंद की यह स्वीकारोक्ति समझौता एक्सप्रेस में हुए धमाकों के संबंध में कई जवाब दे देती है.

'फरवरी, 2007 में सुनील जोशी और भरत भाई, भरतभाई के घर से मोटरसाइकिल से बलपुर नामक स्थान पर एक शिव मंदिर में आए. मैं पहले से ही वहां पर मौजूद था. हमने यह पहले ही तय कर रखा था कि शिवरात्रि के दिन वहां मिलना है. वहां सुनील ने मुझे बताया कि एक -दो दिन में ही कुछ अच्छी खबर मिलेगी. फिर वो अपने घर चले गए और मैं शबरीधाम आ गया. उसके दो तीन दिन बाद मैं फिर भरत भाई के घर गया जहां पर सुनील और प्रज्ञा पहले से मौजूद थे. तब तक समझौता बम ब्लास्ट की खबर पेपर में आ चुकी थी. मैंने सुनील को बताया कि समझौता एक्सप्रेस की घटना तो हो चुकी है और तुम तो यहीं पर बैठे हो. जवाब में उसने बताया कि ये हमारे ही लोगों ने किया है.'

आगे असीमानंद बताता है, 'सुनील जोशी ने हमसे भारत भाई के घर में हैदराबाद में बम ब्लास्ट करने के लिए 40,000 रु लिए. इसके एक-दो महीने के बाद सुनील जोशी ने मुझे फोन किया और बताया कि पेपर देखते रहना, एक-दो दिन में कुछ अच्छा खबर मिलेगा. तीन-चार दिन बाद हैदराबाद की मक्का मस्जिद में बम ब्लास्ट की खबर अखबार में आई. उसके सात-आठ दिन बाद सुनील जोशी एक तेलुगू न्यूजपेपर लेकर शबरीधाम में आ गया. उसमें मक्का मस्जिद में हुई घटना का चित्र भी था. मैंने सुनील को बताया कि पेपर में आया है कि कुछ मुसलिम लोग पकड़े गए हैं. सुनील ने फिर कहा कि यह हमारे लोगों ने ही किया है.'

2006 के मालेगांव बम धमाकों की तरह ही 17 मई, 2007 को शुक्रवार था. दोपहर के डेढ़ बजे 4,000 से ज्यादा मुसलिम हैदराबाद में चारमीनार के नजदीक स्थित मक्का मस्जिद में नमाज के लिए इकट्ठा हुए और तभी मस्जिद के भीतर वुजू खाना के पास एक बम धमाका हो गया. मस्जिद के उत्तरी दरवाजे की तरफ एक और बैग पड़ा हुआ था. रैगजीन के इस नीले बैग में भी आईईडी (उच्च क्षमता का विस्फोटक पदार्थ) था. संयोग से यह बम नहीं फट पाया.

शेष भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें जिसकी कथनी उसी की करनी-2

Comments (21 posted)

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Swati Mishra 22/02/2011 13:42:39
Tehlka ki team ko badhaiee ke unhonne itni badhya report tayar ki.Magar pura bayan padh kar yeh Aabhas hota hai ke swami ji suniyojit dhang se R.S.S ko bacha rahe hain.Q ki woh puri Aatankwadi ghatnaon ko kewal teen logo ki karastani bata rahe hain.Aur aisa lagta hai ke sunil Joshi ki maut aur swami ji ki giraftari ke sath hi Bhagwa Aatankwad ka network khatm ho gaya.Jab ki aisa hai nahi.SANGH ki neev hi muslim duwesh par rakhi gayee hai.Is liye sakhol janch ki jarurat hai.Is bat ki bhi janch honi chahiye ke sang apne gundon ko aakhir kis jang ke liye tayyar kar raha hai?Har shakha me hathyaron ki training Q di jati hai?Agar BHARAT ko bachana hai to sang jaise sangathno par kada pratibandh lagna chahiye.CONGRESS jaise Dhongi Dharm-nirpeksh sangathno ne is ki sarkar se mang karni chahiye.Warna hamara ram hi malik hai.
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Swati Mishra 21/02/2011 21:09:38
Akhir sach bahar aa hi gaya.thanks to HEMANT KARKARE,jinho ne pehli bar desh ko asal khatre se hame awgat karaya.Warna ham kisi hindu ko Aatank wadi samajhna bhi paap samajhte the.Agar ham nishpakshta se dekhen to Atankwad ki jaden hamare caste system me nazar aati hian.Varn wevastha hi Aatankwad ka mool hai.isko hame nasht karna hoga.Dusri baat yeh ke agar ham desh hit ki bat karte hain to hame yeh nahi dekhna chahiye ke aatankwadi ka DHRAM kya hai wo koi bhi dharm se ho uski ninda karni chahiye.
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ashok gupta 17/02/2011 21:27:03
on one hand you blame rss for blasts, on the other hand you say that rss is in collusion with isi.what nonsense.on one hand swami aseemanand is shown to hate muslims so much that he planned blasts,then it is said that his mind changed due to service of a muslim boy. are terrorists like that
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Piyush Chohan 16/02/2011 15:17:35
Tehelka, we appreciate and give you great salute to your effort in bringing the truth to the screen. people were smelling something rotten between the cook and cooked out and your operation has given enough language to this fact. you have your job done now turn comes for system (political/social)to work further on this and bring culprit to the face of word. this bloody america has not business except taliban and so.
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Anil Singh 07/02/2011 13:01:46
Asima Nand k byan k baad, mujhe lagta hai ki kahin RSS aur ISI me gathjod to nahi hai. Tahelka ko is ki bhi jaanch karni chahiye. Gud job Tahlka
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Prachi 07/02/2011 11:24:20
My Name Is Prachi Ghade Mera Yah Kahena Hain Ki Sirf Tahelka Hi Aesa News Chanell Hain Jo Polytistion Ke Dabav Me Nahi Nahi Ya Unse Juda Nahi Hain Mujhe Ye Sunkar Bahut Achha Laga Ki Aapne Kai Hindustaniyo Ki Akhen Khol Di Or Ek Bat Jo Mujhe Khatak Rahi Hain Ki Ye News Jitne Bhi Hindi News Chanell Hain Uspe Kyun Nahi Bata Rahi Kya YE Sab Bike Hue Hain Ya Fir Ye Sub RSS ke Hain Kyuki RSS Cort Me Ek Kes Dalna Chahta Hain Ki Ye Bat Kayse Lik Hui Ye Shayad Ye Nahi Jante Ki Lik Ho Jane Ke Bat Inka Kya Anjam Bhugatna Padenga Inko Inhe To Lagta Hain Ki Asimanan Ke Bayan Se RSS Or Sabhi Hindutwadi Sansthao Par Ban Na Lag Jaye/ Ban Jarur Lagna Chahiye Jayse Ki Simi Par Lagaya Hain Plz May Sabhi Hindustanio Se Recvest Karta hun ki RSS ke Khilaf Aawaj Uthaye Or Sarkar se Kahe Ki RSS Jayse Sabhi Sansthao Par Ban Laga De Taki Koi Bhartiya In Kamino Ka Shikar Na Ho May Tahalka Dhanyawad Deti hun or RSS Jayse Sabhi Sansthao par ban lage sarkar se hun aam logo ki taraf se gujarish kare dhanyawad
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zubair 06/02/2011 10:59:54
Aakhir is andaaz ke dhamake (jis tarah ke dhamako me swami ji jaise logon ki antar atma jhijhkor uthi)9/11 ke baad zyada zor shor shru ho gaye, shayad bush (MOSAD) ke paropagande se sabak liya aur dhamako ke baad saikadon logon ko graftaar kiya gaya, phir bhi dhamako ka silsila badastoor jari raha, wajah saaf hai asal mujrim azaad they unhe inaam diye ja rahe they aur aatankwad phal phool raha tha, bhaiyon sachchai bardasht karna seekhlo dekh ka bhavishya acha hoga aur hamari aane wali naslo ke liye khubsurat hindustan chhor ke jayenge.
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शैलेन्द्र कुमार 29/01/2011 14:26:20
असीमानंद और विनायक में अंतर क्या है जहाँ विनायक ने ३० वहां असीमानंद ने ३५ साल गरीबों और आदिवासियों की सेवा में समर्पित कर दिए दोनों मामलों में राज्य उनके खिलाफ है दोनों पर देशद्रोह और आतंकवाद के आरोप है ऊपर टिप्पणी देने वाले समझदार लोगो ने तहलका को ही न्यायाधीश मान लिया है तो अब मुक़दमा चलने की जरूरत ही क्या है
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shaikh latif 28/01/2011 21:36:49
tehelka ka thanking logo ka samne sachae likar aye.
jo bhe beguna hai un ko reha karne keliye
tehelka agge bhe kuch karenga ase hum tehelka se asha rakte hai.
tehelka he ak aysa sadan hai jeskay zariye se sachi malom hote hai. daniywad
i am indian
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shailendra kumar 28/01/2011 17:39:10
श्रीमान असीमानंद ने गवाही दबाव में दी थी इसका सबूत है मजिस्ट्रेट द्वारा अपने स्टेनो को बाहर निकालकर सीबीआई अधिकारी टी राजाह बालाजी(एएसपी) के सामने गवाही लेना
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राजेश 27/01/2011 13:36:06
@अमित जी
सच्चाई बहुत कड़वी होती है. इसी वजह से आपका मुंह कड़वा हो गया. सच्चाई स्वीकारें.
अच्छी जानकारी के लिए तहलका का धन्यवाद
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uttam 26/01/2011 10:41:39
bade afsos ki bat hai ki kuch so-called secular log jhuthi izzat pane ke liya hindu dharam ko badnam kar rahe hain. Lekin ye bat 100% sahi hai ki Hindustan jab tak hi secular h jab tak isme hindu jyada hai, jis din musalman jyada ho jayenge us din wo in so-called secular logon ko hi sabse pahle islam kabool karwayenge, ye bat me guarantee ke sath kahta hun.

JAI BHARAT MATA
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Ahmed 25/01/2011 19:26:19
MAI YEH NAHI KAHTA KI SAARE MUSALMAN DOODH KE DHULE HAIN AUR NA KI SAARE HINDU MAGAR JO NEWS AA RAHI HAI IS PER HAM SAB LOGON KO SOOCHNA CHAHIYE KYUNKI YEH HAMARE DESH KI SURAKSHA KA MATTER HAI BUT "TRUTH IS ALWAYS BITTER" HUM NUTRAL HO KAR KYUN NAHI SOCHTE HAIN? PURUSH WOH HAI JO SACH KA SAMNA KAR SAKE I RESPECT TEHELKA ALWAYS.
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m.iqbal 25/01/2011 12:10:14
great job tahelka. if someone says that you lost respect , i will say that you have gained thousand time more respect after this incident.I hope you will do the jobs like this, in future also, to protect the truth.
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Rupinder 23/01/2011 20:20:39
Kya congress aur kya BJP sab ek hi thaali ke chatte patte hain. Koi party sahi nahi hai.
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Rinku 22/01/2011 23:48:44
@ sanjay nagia

Bhai sach ko sunne ki himmat honi chahiye. Sach bolne wala chahe Tehlke ho ya koi aur.

So jo sach bolte hain unki respect kijiye.

Yeh jaruri nahi ke jo hamesha aapke haq mein hi bole, wahi sahi ho.
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Rupinder 22/01/2011 23:33:34
I Salute to tehlka for such a wonderful job...

Dharam ki aad mein apraadh karne walon ka asli chehra benkaab karne ke liye aap badhayi ke paatar ho.

Shabaash. Aapne sach ka saath diya.
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sanjay nagia 22/01/2011 03:34:11
तहलका के प्रति जो इज़्ज़त मान मे थी आज समाप्त हो गई,,सब कुच्छ प्रायोजित लग रहा हे गोपनीय दसतवेज तहलका के पास केसे आया?
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rakesh sain 21/01/2011 17:59:50
Church hai Swami Asmimanand ki girftari k pichhe.Swami ji ne Gujrat may Christian missioneries k napaak iradon ko nakaam kr diya or lakhon ki sankhya may converted Christians dobara Hindu bane.Feb, 2006 may Swami ji ne Shabrikumbh ka aayojan karvaya, jismay 10 lakh vanvaasiyon ne hissa liya or vanvaasi samaaj apni sanskriti se juda. Church ki najron may Swami ji tab se hee khatak rahe hain.
Church k gundon ne Orissa may Swami Laxmnanand ji ki hatya kr di thi. Laxmanand ji bhi conversion k khilaf kaam kar rahe thay. Jab se Sonia Gandhi (jo Christian hai) Congress ki pardhaan bani hai tab se desh may Christianon ka utpaat badha hai. Swami ji ko bhi Church k ishaare par fansaya gaya hai.Dhikkar hai aisi sarkaar par.
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Surendra Mohan 20/01/2011 17:52:21
इस महीने दिल्ली में एक मंदिर गिराया गया
इस महीने दिल्ली में एक मस्जिद गिराई गई

मस्जिद के लिये एक निर्वाचित सरकार की मुखिया गिड़गिडा कर माफी मांगती रही. सारे धर्म निरपेक्षता के ठेकेदार अपनी दुकान सजा कर बैठ गये. चौबीस घंटे के अंदर मस्जिद की जगह पर बाड लगाकर वक्फ को सोंप दी गई. लेकिन मंदिर के लिये सारे बेशर्म धर्म निरपेक्षता के नाम पर स्यापा करने वाले शुतुर्मुर्गों की जमात ने अपनी गर्दनें जमीन के अन्दर घुसा ली. क्यों? आप लोग इतने कुन्द दिमाग क्यों हैं?

घिन आती है आपकी इस धर्म निरपेक्षता के नाम पर की जाने वाली बेशर्मी पर
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