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लाठी का लोकतंत्न

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मायावती के राज वाले उत्तर प्रदेश में विरोध के हर लोकतांत्निक तरीके पर एक अघोषित रोक लगी हुई है जिसका खामियाजा समाज के हर तबके को उठाना पड़ रहा है. हिमांशु बाजपेयी की रिपोर्ट

‘हम लोग जवाहर भवन से निकल कर नदवां की तरफ जा रहे थे. हजरतगंज चौराहे के पास पुलिस ने हमें रोका और दाहिने से होकर जाने को कहा. हम मान गए और आगे बढ़ गए. फिर अचानक लाठियां चलने लगीं. पुलिस ने हमें चेतावनी तक नहीं दी’उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके हजरतगंज चौराहे के एक छोर पर महात्मा गांधी की प्रतिमा है जिसपर पिछले कई दशकों से लोकतंत्न बचाने की गुहार लगाई जाती रही है. चौधरी चरण सिंह से लेकर मुलायम सिंह यादव तक इस प्रतिमा के नीचे बैठकर अपने विरोध को स्वर देते रहे हैं. यहां से चंद कदम की दूरी पर ही प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत यानी विधानसभा है, पर लोकतांत्निक तरीके से उठाई गई किसी भी आवाज को आजकल वहां पहुंचने की इजाजत नहीं है. मायावती के सत्ता में आने के बाद से ही इस तरह की आवाजें उठाने पर अघोषित रोक लग चुकी है. इसका खामियाजा कभी छात्न और शिक्षक भुगतते हैं तो कभी राजनीतिक कार्यकर्ता. केवल इस साल जनवरी में ही विधानसभा के सामने करीब दस बार अलग-अलग आंदोलनों पर बर्बर तरीके से लाठियां भांजी जा चुकी हैं.

बीते साल पांच सितंबर को जब पूरा देश शिक्षकों को नमन कर रहा था, उत्तर प्रदेश में उनपर  लाठियां बरसाई जा रही थीं . ये संविदा शिक्षक थे जिनकी मांग थी कि उन्हे स्थायी किया जाए. इससे पहले भी फरवरी, 2009 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने कानून की छात्नाओं को सड़क पर गिरा-गिराकर पीटा था. पुलिस ने उनके साथ जमकर बदसलूकी भी की थी जिसकी तस्वीरें देखकर पूरा देश शर्मसार हुआ था. इसके बाद से ही उत्तर प्रदेश का आम आदमी इस बात को समझने लगा था कि माया के राज में और कुछ मिले न मिले लाठी मिलनी तय है.

नए साल में भी प्रदेश के आमजन को पुलिसिया लाठियों और सरकारी प्रकोप से निजात नहीं मिल पाई. अपने खिलाफ हुआ हर राजनीतिक या गैर-राजनीतिक प्रदर्शन सरकार को नागवार गुजरा है. इससे मायावती के राज मे लोकतांत्निक अधिकारों के दमन को लेकर शुरू हुई बहस में उफान आ गया है. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश के महासचिव अशोक मिश्र कहते हैं-‘नए साल के पहले महीने में ही मुख्यमंत्नी ने जनता की आवाज को दबाने के लिए लाठी चार्ज, फर्जी मुकदमे, एनकाउंटर की धमकी, अवैध गिरफ्तारी जैसे सभी सरकारी हथकंडे इस्तेमाल कर डाले हैं. मायावती अपने खिलाफ कोई भी आवाज नही सुनना चाहतीं.’

21 जनवरी को केंद्रीय कर्मचारियों के बराबर वेतन और भत्ते को लेकर प्रदर्शन कर रहे राज्य कर्मचारियों और शिक्षकों पर तीन अलग-अलग जगहों पर लाठी चार्ज हुआ. इसमें दो सौ से ज्यादा लोग घायल हुए. लखनऊ की कड़कड़ाती ठंड में बिलकुल नजदीक से प्रदर्शनकारियों पर पानी की मोटी धार मारी गई. डीआईजी और डीएम तक महिलाओं पर डंडा बरसाते दिखाई दिए. ‘भैया बहुत मारे हैं, औरतनौ का नाहिं छोड़िन..’ लाठी चार्ज में घायल राधारानी पाण्डे पीड़ा भरे स्वर में बताती हैं, ‘हम लोग जवाहर भवन से निकल कर नदवां की तरफ जा रहे थे. हजरतगंज चौराहे के पास पुलिस ने हमें रोका और दाहिने से होकर जाने को कहा. हम मान गए और आगे बढ़ गए. फिर अचानक लाठियां चलने लगीं. पुलिस ने हमें चेतावनी तक नहीं दी.’ मगर पुलिस का कहर लाठी चार्ज के बाद भी नहीं थमा. उसने इसके बाद जवाहर भवन मे घुसकर वहां मौजूद राज्य कर्मचारियों की भी पिटाई कर डाली. इंदिरा भवन-जवाहर भवन कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष सतीश पाण्डेय बताते हैं- ‘पुलिस ने पहले निहत्थे कर्मचारियों पर पानी बरसाया, फिर उनपर लाठियां भांजीं और जब इससे भी  मन नहीं भरा तो उसने जवाहर भवन में घुसकर जो मिला उसे पीट दिया.’ अंदाजा लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में लोकतांत्निक अधिकारों के प्रयोग की राह कितनी भयभीत करने वाली है.

एक ही महीने में इतनी दमनकारी घटनाओं के बावजूद उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह कहते हैं कि लाठी चार्ज पूरी तरह वैधानिक है और इसका स्वरूप भयावह ही होता है. हालांकि प्रकाश इस बात को भी बिना किसी हिचकिचाहट के मानते हैं कि पुलिस बल का राजनीतिक प्रयोग पूरे देश में होता है.

भारतीय संविधान हड़ताल की अनुमति देता है लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार का अलिखित संविधान नहीं. पुलिस से पिटने के बाद जब राज्य कर्मचारी 22 जनवरी से हड़ताल पर चले गए तो लखनऊ के जिलाधिकारी अमित घोष का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उन्होंने कृषि भवन में घुसकर कैमरों के सामने ही एक हड़ताली कर्मचारी को तमाचा जड़ दिया. इसके बाद इस कर्मचारी को न सिर्फ निलंबन झेलना पड़ा बल्कि  हिरासत में भी रहना पड़ा. हालांकि सरकारी आतंक के चलते बाद में वह तमाचा खाने की बात ही भूल गया. विधानपरिषद में इस मामले में कलेक्टर को क्लीनचिट देते हुए नेता सदन स्वामी प्रसाद मौर्य का कहना था - ‘जब कर्मचारी कहता है कि जिलाधिकारी ने उसे थप्पड़ मारा ही नही तो कैसी जांच? ’

उत्तर प्रदेश सरकार का तानाशाही रूप राज्य कर्मचारियों पर लाठी चार्ज के मामले में ही नहीं जाहिर होता है. उत्तर प्रदेश में सरकार के खिलाफ कोई भी प्रदर्शन हो, कायदे-कानून को ताक पर रखकर प्रदर्शनकारियों पर लाठियां चलना तय बात है. पुलिस हर कीमत पर प्रदर्शनकारियों की आवाज दबाना चाहती है. 19 जनवरी को हुए समाजवादी पार्टी के जनांदोलन में पुलिस ने सपा कार्यकर्ताओं की जिस भीड़ पर लाठी चलाई उसमें महिलाएं और वृद्ध भी थे. इस मुद्दे पर सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव का कहना था, ‘सपा के आंदोलन को नाकाम करने के लिए प्रदेश सरकार ने बर्बरता की सभी हदें पार कर दी हैं. निहत्थे कार्यकर्ताओं को पीटा गया है. आम जनता में सरकार के प्रति भय व्याप्त है और कोई भी कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा.’ 22 जनवरी को भी प्रदेश के महोबा जिले के करबई नगर में एक छात्न की दुर्घटना में मौत के बाद घटना-स्थल पर पहुंचने वाले प्रधानाचार्य और शिक्षकों पर लाठी चार्ज हुआ जिसमें उन्हें गंभीर चोटें आईं. बाद में 29 जनवरी को जब ये मामला विधान परिषद में उठा तो सदन के नेता सिर्फ इतना कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि पुलिस ने केवल हलका बल प्रयोग किया था. 25 जनवरी को डायवर्सिटी आंदोलन के तहत शहीद स्मारक पर इकट्ठा होकर राज्यपाल को ज्ञापन देने जा रहे बीएस-4 पार्टी के कार्यकर्ताओं को भी पुलिस की लाठियों का स्वाद चखना पड़ा. 1 फरवरी को फिर छह सूत्नीय मांगों को लेकर विधान भवन घेरने जा रहे सैंकड़ों वित्त विहीन शिक्षकों को शहीद स्मारक पर ही लाठी चार्ज करके और पानी की धार छोड़कर रोकने का प्रयास किया गया. 

एक ही महीने में इतनी दमनकारी घटनाओं के बावजूद उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह कहते हैं कि लाठी चार्ज पूरी तरह वैधानिक है और इसका स्वरूप भयावह ही होता है. हालांकि प्रकाश इस बात को भी बिना किसी हिचकिचाहट के मानते हैं कि पुलिस बल का राजनीतिक प्रयोग पूरे देश में होता है. वहीं राज्य कर्मचारियों पर हुए लाठी चार्ज पर उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ वकील सतीश शुक्ला कहते हैं- ‘यह संविधान के अनुच्छेद 9 और 21 का उल्लंघन है. जिनकी रक्षा करना राज्य का दायित्व है. उस दिन वहां महिला पुलिस भी मौजूद नहीं थी.’ यहां एक अहम बात यह भी है कि उत्तर प्रदेश मे लोकतांत्निक अधिकारों के दमन के लिए और जनता की आवाज को खामोश करने के लिए लाठी ही अकेला जरिया नहीं है. 18 जनवरी को इलाहाबाद में पुलिस उत्पीड़न से त्रस्त एक मजदूर नेता राजकुमार निषाद अपने साथियों के साथ जब डीआईजी चंद्रप्रकाश के पास फरियाद लेकर पहुंचे तो वे मानसिक उत्पीड़न के शिकार होकर शारीरिक उत्पीड़न का शिकार होते-होते रह गए. निषाद के मुताबिक डीआईजी साहब ने उनसे पूछा कि वे किस जाति के हैं? उनके  मल्लाह कहने पर डीआईजी साहब भड़क गए और गालियों के साथ उनके एनकाउंटर की भी धमकी देने लगे. बाद में निषाद और उनके पांच साथियों के खिलाफ धारा 323, 504 के तहत मामला भी दर्ज कर लिया गया जिसकी शिकायत मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से की है. पीयूसीएल के राष्ट्रीय सचिव चितरंजन सिंह बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद, सोनभद्र और चंदौली आदि कई जिलों मे आम जनता को नक्सली बताकर एनकाउंटर कर देने की धमकी देना या फर्जी मुकदमे में फंसा देना पुलिस की आदत बन गई है. सबसे ज्यादा मुश्किल तो इस क्षेत्न में सक्रिय वाम धारा की पार्टियों और किसान मजदूर संगठनों के लिए है’.

मायावती की पार्टी बसपा में उनके अलावा और किसी सदस्य को मुंह खोलने की इजाजत नहीं है और अब शायद वे ऐसी ही उम्मीद उत्तर प्रदेश की जनता से भी रखती हैं. उनके बेलगाम नौकरशाह जनता की आवाज को दबाने के लिए कोई भी हथकंडा अपनाने से नहीं चूक रहे. लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति डा रूपरेखा वर्मा कहती हैं- जनांदोलनों के अवसर और दायरा संकुचित करने की शुरुआत हालांकि बहुत पहले ही हो चुकी थी लेकिन इस बार हमें सरकार का सबसे कुरूप चेहरा देखने को मिला है. सरकार शायद यह भूल जाती है कि डर जितनी जल्दी दिल में समाता है, उससे जल्दी निकल भी जाता है’. 2007 का विधानसभा चुनाव मायावती ने समाजवादी पार्टी के अराजक शासन और लचर कानून व्यवस्था के मुद्दे पर लड़ा था. उस दौरान मायावती का चुनावी नारा था- चढ़ गुंडन की छाती पर मुहर लगाओ हाथी पर. भारी जीत के बाद उनसे एक सख्त प्रशासन की उम्मीद लगाई जा रही थी. लेकिन वे सिर्फ अपनी जनता के लिए ही सख्त साबित हुई हैं. सपा शासन में बाहुबलियों के आतंक से त्नस्त होकर जनता ने बसपा को विकल्प के रूप में चुना था. लेकिन बसपा के राज में बाहुबली आतंक की जगह सरकारी आतंक ने ले ली है. लखनऊ विश्वविद्यालय के पाश्चात्य इतिहास विभाग के अध्यक्ष डा. प्रमोद कुमार कहते हैं- ‘पता नहीं मायावती इस बात को कैसे भूल गईं. विश्व का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि लोकतंत्न में जब भी जनता की आवाज़ को दबाया गया है, सरकारें चली गईं हैं. भारत का आपातकाल इसका सबसे बड़ा उदहारण है.’ प्रमोद वाल्टेयर के प्रसिद्ध कथन को भी दोहराते हैं- ‘हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत न होऊं, किंतु मैं अभिव्यक्ति के आपके अधिकार का सम्मान करूंगा.’ बाबा साहेब अंबेडकर को देश के संविधान का जनक बताते हुए मायावती हमेशा खुद को उनकी परंपरा से जोड़ती तो रही हैं. किंतु उन्हीं बाबा साहेब ने देश को संवैधानिक अधिकारों का जो अमूल्य उपहार दिया था, उसकी मायावती को तनिक भी परवाह हो, ऐसा लगता नहीं है.   ’ 

Comments (13 posted):

Anil Pandey on 18/02/10 07:51:19
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बहुत ही बढि़या रिपोर्ट
satish on 18/02/10 09:40:09
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Excellent News
Arpita Sarkar on 18/02/10 10:17:38
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First of all many congratulations Himanshu for your dynamic start with Tehlka. A very relevant issue rather a burning one which despite coming under scanner for many times failed to incite action against culprits. Mayawati's government has come out to be no different than Samajwadi's reign. Immoral use of police force is the easiest and best-justified way for the government rule democracy and people's basic fundamental right. In the mid-way Human Rights activities too have been largely futile as they themsleves are one big sphere of victims.

Regards
Arpita
babita on 18/02/10 06:46:56
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kya baat hai himashu ji tehlka me pahuch kar tehlka ke hi andaaz me ho liye.. ek toh tehlka.com aur upar se aap ka shahar, ab toh bas aisi hi sacchaiyon se tehlka macha karega.. very nice and very bold. hats off!
Manish Kumar on 18/02/10 08:04:02
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kavi him, aapko aapke pahle report ke chapne par bahut-bahut badhai. maine aapki lathi ka loktantra padhi. bahut hi accha laga, asha aur dua hai ki aap aise hi aage badhte rahein aur apni lekhani ka jadoo bikherte rahein.
aapka so called chota seth.
ambris kumar on 19/02/10 02:49:36
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पहली रपट से बढ़िया शुरुवात .
vivek rai on 19/02/10 01:09:18
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himanshu bhai aapka report ki tareef jitni hi ki jaye utni hi kam hai ..
tahelka jaisi sanstha join karne ke liye aapko badhai ..
lage rahiye ..
ajit pandey on 21/02/10 06:01:21
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bahut shandar....iss dhardar report ke liye badhai...? issi tarah likhte raheye....
shreesh shukla on 26/02/10 06:05:33
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bahut achhi report hai . umeed hai aage bhi aisi hi report dete rahenge.
jitendra on 27/02/10 05:24:59
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reporter ko dikkat sirf is baat ka hai ki ye sab ek dalit "mayawati" ke dwara kiya jaa reha hai! satta me jo v rahega use ye sab karna hi padega! kyonki 'chhatra' agar baato se maan hi jate to kya dikkat thi.
sourabh jain on 14/03/10 11:47:53
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himanshu bhai dher sari badhaiyan, tehlka join karne ki aur usse zyada aapke apne shahar me jane ki...'Lathi ka Loktantra' padhkar bahut hi achchha laga, itni achcchi reporting k liye sadhuwad, lage raho....
ravi shukla on 04/04/10 02:28:54
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unique report hai sari sachchai ki pol khol ke rakh dee hai.
Avinash on 08/05/10 04:19:31
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Abey jintendra,
jada mayavati ke bhakt mat ban,
danda dal degi tere,
tumare jaise unpadh log hi usse jitate hai aur desh barbad kerne pe lage hai..
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