तहलका हिन्दी: रोष नहीं हताशा की परिणति रोष नहीं हताशा की परिणति ================================================================================ Sanjay Dubey on 16/04/09 11:06:00 ऐसा दुर्लभता से ही होता है कि भारत में सबसे अधिक पाठक संख्या वाला अखबार दैनिक जागरण कोई खबर छापने से चूक जाए. 8 अप्रैल 2009 का दिन ऐसा ही था. इस दिन उसमें वह खबर नहीं थी जिसे देश भर के अखबारों ने अपने मुख्यपृष्ठ पर बड़ी जगह दी थी. दरअसल मामला था इसी अखबार के पत्रकार जरनैल सिंह द्वारा गृहमंत्री पी चिदंबरम के ऊपर जूता फेंकने का. दैनिक जागरण ने अपने इस पत्रकार की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए लंबाचौड़ा खेदपत्र छापा था जिसमें सिंह के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की बात भी कही गई थी. सिंह क्रिकेट भी बढ़िया खेल लेते हैं और अगर वे वास्तव में चाहते तो जूता चिदंबरम के मुंह पर ही लगता अकाली दल ने फौरन ये मुद्दा लपकते हुए सिंह को दो लाख रूपए का नगद पुरस्कार देने की घोषणा कर दी. उधर खबरिया चैनलों पर हर तरफ सिंह की चर्चा हो रही थी. घटना ने राजनीतिक रंग ले लिया और सिंह की जिंदगी बदल गई. सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह रही जिसने सिंह जैसे शांतचित्त व्यक्ति को इतना उग्र कदम उठाने पर मजबूर कर दिया? जवाब में वे कहते हैं, ‘2 अप्रैल को चिदंबरम ने कहा था कि जगदीश टाइटलर को 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में सीबीआई द्वारा क्लीनचिट दिए जाने से उन्हें खुशी हुई है. मैं जानना चाहता था कि उन्हें खुशी क्यों है जब कि पूरे सिख समुदाय में गुस्से का माहौल है.’ घटना से पूर्व सिंह ने उनसे जवाब मांगने की कोशिश की पर चिदंबरम ने ये कह कर उन्हें चुप करा दिया कि इस पर बहस करने का ये सही अवसर नहीं है. इसके बाद सिंह ने अपना जूता उतारा और उसे चिदंबरम की तरफ उछाल दिया. लगभग उसी समय शायद उन्हें अपने किए का अहसास हो गया था. तहलका से बातचीत में वे कहते हैं, ‘ये गलत था और मुझे अपने किए पर खेद है.’ सिंह की इस बात पर यकीन न करने की कोई वजह नहीं है कि उन्होंने ये कदम क्षणिक आवेश में आकर उठाया था. उनके साथी भी उन्हें शांत, गंभीर, तार्किक और मृदुभाषी व्यक्ति बताते हैं. द टेलीग्राफ में सामरिक मामलों के संपादक और सिंह के नजदीकी मित्र सुजान दत्ता कहते हैं, ‘कभी-कभी चोट इतनी गहरी हो जाती है कि भावनाएं व्यावहारिकता पर हावी हो जाती हैं. ऐसा हममें से किसी के भी साथ हो सकता है.’ दत्ता बताते हैं कि सिंह क्रिकेट भी बढ़िया खेल लेते हैं और अगर वे वास्तव में चाहते तो जूता चिदंबरम के मुंह पर ही लगता. 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के दंगों के दौरान सिंह 11 वर्ष के थे. अकेले दिल्ली में 2000 से ज्यादा सिखों को भीड़ ने मौत के घाट उतार दिया जिसकी अगुवाई कथित तौर पर जगदीश टाइटलर समेत तमाम कांग्रेसी नेता कर रहे थे. इनमें से किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई. सिंह कहते हैं, ‘हर तरफ से अन्याय हुआ. पुलिस, न्यायपालिका और इस दौरान आई सभी सरकारें न्याय दिलाने में असफल रहीं.’ चुनावी हिसाब-किताब को देखते हुए चिदंबरम और कांग्रेस ने उन्हें माफ करने में कोई देर नहीं मगर उनके नियोक्ता दैनिक जागरण ने उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का वादा किया है. दैनिक जागरण के संपादक संजय गुप्ता इस बारे में कुछ कहने से इनकार कर देते हैं. 35 वर्षीय सिंह बीते 10 सालों से जागरण में काम कर रहे हैं. उनकी पृष्ठभूमि के बारे में पूछने पर वे कहते हैं, ‘मुझमें कोई असाधारण प्रतिभा नहीं है.’ बाद में उन्होंने ये भी कहा कि न वे अकाली दल से जुड़े हैं और न उनकी राजनीति में जाने की इच्छा है. लगता है जसे वे अपने असाधारण कदम से पैदा हुए हो-हल्ले को शांत करना चाहते हैं. अब मामला सियासी रंग ले चुका है लिहाजा सिंह को किसी सामान्य पत्रकार की तरह खबर देने के लिए लंबा इंतजार करना होगा. फिलहाल तो वे खुद ही खबर हैं. नाम न छापने की शर्त पर उनके एक नजदीकी दोस्त कहते हैं, ‘पता नहीं उनका क्या होगा. हमने तमाम पत्रकारों को सूली चढ़ते हुए देखा है.’