मुखपृष्ठ | इन दिनों | राष्ट्रीय | नए जोश से लबरेज

नए जोश से लबरेज

image

कुछ ही महीने पहले तक बेजान नजर आ रही भाजपा अचानक ही केंद्र की सत्ता की मजबूत दावेदार दिख रही है. पार्टी की चुनावी रणनीति का आकलन कर रहे हैं स्वप्न दास गुप्ता

नवंबर 2003 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनावों में मिली जीत के कुछ ही समय बाद तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने मुझे बताया था कि वे उस वक्त पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के साथ ही लोकसभा चुनाव भी कराये जाने के पक्ष में थे। आडवाणी के मुताबिक उस वक्त मध्यप्रदेश में तो भाजपा के जीतने की पूरी संभावना थी मगर राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में पार्टी की जीत को लेकर वे कतई आश्वस्त नहीं थे। इसलिए, उनका तर्क था कि तीन राज्यों में जीत के उत्साह से भरी कांग्रेस का आम चुनावों में मुकाबला करने की बजाय दोनों चुनाव साथ ही कराना ज्यादा सही होता.

हालांकि उन्हें ये अंदाजा बिलकुल नहीं था कि भाजपा विधानसभा चुनावों में जोरदार जीत दर्ज करेगी और लोकसभा चुनावों में उसे मुंह की खानी पड़ जाएगी।

दिलचस्प है कि कुछ इसी तरह के तर्क कांग्रेस के रणनीतिकारों ने भी इस साल की शुरुआत में दिए थे। उनका सोचना था कि बेशक दिल्ली में भाजपा बढ़िया स्थिति में है मगर छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान - जहां भाजपा सत्ता में है - में सत्ता विरोधी लहर कांग्रेस के पक्ष में काम करेगी और चूंकि भाजपा ने 2004 के लोकसभा चुनावों में अपने चरम पर थी इसलिए आम चुनाव भी यदि लोकसभा चुनावों के साथ ही हों तो पार्टी को दोहरा फायदा हो सकता है। मगर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आम चुनावों से पहले भारत-अमेरिका परमाणु करार को अंजाम तक पहचाने की उधेड़बुन में थे. अब ऐसा लगता है कि चुनाव समय से पहले न करवा कर कांग्रेस ने होशियारी से काम लिया क्योंकि बाद में समय बीतने के साथ-साथ यूपीए सरकार की मुश्किलें भी बढ़ गईं.

परमाणु करार की सफलता और विश्वासमत हासिल करने के बाद कई सुजान लोगों ने मनमोहन सिंह को सिंह इज किंग की तरह पेश किया लेकिन देश को आर्थिक उदारवाद के दौर में प्रवेश कराने वाले हमारे आर्थिक विशेषज्ञ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह वैश्विक आर्थिक संकट के लिए कतई तैयार नहीं थे। जब यूपीए दहाई अंकों वाली विकास दर के फायदे देश को गिना रहा था तब असलियत ये थी कि मुद्रास्फीति दहाई अंकों में प्रवेश कर चुकी थी. इसके अलावा देश के विभिन्न शहरों में लगातार आतंकी हमलों ने भी सरकार के पक्ष में माहौल को बिगाड़ने का काम किया। इन स्थितियों में जिस परमाणु करार को कांग्रेस हमारी ऊर्जा जरूरतों की चाबी के रूप में पेश करना चाहती थी वो अचानक ही अपना महत्व खो बैठा. इसके अलावा सोनिया गांधी की बहुप्रचारित रोजगार ग्रामीण गारंटी योजना के भी उतने अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिले। अब तक उद्योगपतियों और मीडिया के चहेते रहे वित्तमंत्री पी चिदंबरम का भी अर्थव्यवस्था के पूरी तरह सुदृढ़ होने की उनकी रटंत के चलते मजाक उड़ाया जा रहा है.

हालांकि ये सब कुछ सेमीफाइनल की तैयारी में लगी भाजपा के लिए शहनाई की मधुर आवाज जसा था. मगर पिछले दो सालों में बिहार, पंजाब, गुजरात और कर्नाटक के विधानसभा चुनाव जीतने के बावजूद भाजपा खुद को ये भरोसा नहीं दिला पा रही थी कि वो एक बार फिर से केंद्र में सरकार बनाने जा रही है. राजनीतिक हल्कों में ये माना जा रहा था कि पार्टी साल 2004 के दौरान इन तीन राज्यों में सबसे ऊंचे शिखर पर पहुंच गई थी और ताजा हालातों में उसे नवंबर-दिसंबर में होने वाले विधानसभा चुनावों में वहां सत्ताविरोधी लहर का सामना करना पड़ेगा। मतलब ये कि जैसे मुश्किल हालात में यूपीए नजर आ रहा था कुछ वैसी ही समस्याओं से भाजपा भी दो-चार हो रही थी। ऊपर से कोढ़ में खाज ये कि पिछले कुछ समय से इस बात की चर्चा लगातार चलती रही कि एनडीए से इसके दो घटक जनता दल (यू) और बीजू जनता दल अलग हो सकते हैं।

लेकिन उसके बाद परिस्थितियां एनडीए के पक्ष में बदली हैं। गठबंधन बिखरने की खबरों के बीच पिछले महीने भाजपा ने ओमप्रकाश चौटाला के राष्ट्रीय लोकदल और असमगण परिषद को अपने पाले में कर इन अटकलों पर विराम लगा दिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोकदल से पार्टी के समझोता पर बस औपचारिक मुहर भर लगना बाकी है।  इसके अलावा चिरंजीवी की प्रजाराज्यम और तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के भी एनडीए में शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। तमिलनाडु में जहां भाजपा का कोई खास प्रभाव नहीं है वहां भले ही जयललिता से भाजपा का चुनाव पूर्व कोई समझोता न हो. लेकिन उनका झुकाव भाजपा की तरफ है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।

चारों राज्यों के विधानसभा परिणाम यदि भाजपा के पक्ष में रहते है तो इसका असर भाजपा कार्यकर्ताओं पर संजीवनी बूटी जसा होगा। सरकार और पार्टी के नेतृत्व की गुत्थी पिछले साल ही सुलझ लेने के बाद भाजपा का मानना है कि राज्यों के अच्छे परिणामों के साथ जम्मू क्षेत्र में पार्टी का बढ़िया प्रदर्शन आने वाले लोकसभा चुनावों में आडवाणी की प्रधानमंत्री बनने की राह को और आसान बना सकता है। ऊपर से यह भी हो सकता है कि आडवाणी की मध्यमार्गी नीति यूपीए के भी कुछ घटक दलों को एनडीए की ओर आकर्षित कर सकती है।

इन विधानसभा चुनावों में भाजपा इस मामले में आगे रही कि उसने चुनावों के पहले ही बिना किसी विवाद के तय कर लिया था कि चुनाव में जीत के बाद राज्य में कमान किसके हाथों में रहेंगी। गुजरात, बिहार और कर्नाटक में पार्टी इस फार्मूले को सफलता पूर्वक आजमा चुकी है। दिल्ली में भाजपा अरुण जेटली को भावी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करना चाहती थी ताकि शीला दीक्षित की व्यक्तिगत छवि का आसानी से मुकाबला किया जा सके लेकिन जेटली के नाम पर सहमति न बनने पर उनकी जगह अनमने ढंग से विजय कुमार मल्होत्रा को लाया गया। उधर दिल्ली में कांग्रेस को लेकर दिलचस्प बात यह है कि यहां चार महीने पहले तक यहां मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को हटाने के लिए घमासान मचा हुआ था।

इस बात में कोई शक नहीं कि इन विधानसभा चुनावों में चुनावपूर्व मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की घोषणा भाजपा के लिए जीत की कुंजी साबित हो सकती है। निजी चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों की मानें तो मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह की छवि से पार्टी को अतिरिक्त फायदा मिलना तय है। मध्यप्रदेश में उमा भारती और बाबूलाल गौर के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद शिवराज सिंह को उनकी जगह लाया गया था। पिछले कुछ समय प्रदेश में लगातार दौरों और विकास कार्यों पर फोकस करने की वजह से चौहान ऐसे मुख्यमंत्री के तौर पर उभर कर आए हैं, जिन तक पहुंचना आसान है। इसके अलावा संगठन पर पकड़ तथा टीम को साथ लेकर चलने वाले व्यक्ति की छवि की बदौलत चौहान आरएसएस की भी पहली पसंद हैं।

छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के लिए दोबारा सरकार में आना थोड़ा मशक्कत भरा काम हो सकता है। पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा का जीतना पार्टी के लिए एक सुखद संयोग से ज्यादा कुछ नहीं था क्योंकि उस वक्त कांग्रेस के मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर अन्य कारकों के अलावा करिश्माई नेता दिलीप सिंह जूदेव पर सीधा निशाना साधना महंगा पड़ा। चूंकि जूदेव छत्तीसगढ़ में उस समय सबसे लोकप्रिय नेता थे और उन्हें भाजपा नेता से इतर भी राज्य के लोगों का भारी समर्थन प्राप्त था। इन सब वजहों से जोगी चुनाव हार गए लेकिन भाजपा की जीत के तुरंत बाद जूदेव कैमरे के सामने रिश्वत लेते हुए पकड़े गए और इन हालातों में पार्टी ने सौम्य चेहरे और छत्तीसगढ़ के बाहर कम पहचाने जाने वाले डॉ. रमन सिंह को मुख्यमंत्री बनाया। शिवराज सिंह के विपरीत रमन सिंह कम आक्रामक छवि वाले नेता है। उन्हें प्रदेश में भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने वाले नेता के तौर पर देखा जाता है। इसके साथ ही वो समाज के मध्यवर्ग के मूल्यों का प्रतिनिधत्व करने वाली छवि भी रखते हैं और यह इनकी सबसे बड़ी विशेषता है क्योंकि भाजपा काफी लंबे वक्त तक समाज के इस तबके की पार्टी मानी जाती रही है। छत्तीसगढ़ में इस बार चुनावी मुकाबला कड़ा रहने की उम्मीद है। यह सिर्फ इसलिए नहीं कि यहां कांग्रेस की पकड़ मजबूत मानी जाती है बल्कि इसलिए कि बस्तर का इलाका जो कि माओवादियों के प्रभावक्षेत्र में माना जाता है इस जगह की विधानसभा सीटों के परिणाम राज्य विधानसभा की उभरने वाली तस्वीर को बहुत हद तक प्रभावित करेंगे। यहां पर बीजेपी समर्थित सलवा जुड़ूम आंदोलन को लेकर माओवादी भाजपा के भारी विरोध में हैं जबकि कांग्रेस के अजित जोगी भी इस आंदोलन का विरोध कर चुके हैं तब देखने वाली बात यह है कि चुनावों में माओवादी कांग्रेस को वोट देने की बात करते हैं या चुनाव बहिष्कार की।

राजस्थान विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए एक मात्र आस वसुंधरा राजे ही हैं। यहां भाजपा का मानना है कि यदि वसुंधरा राजस्थान के वोटरों को रिझने में सफल होती हैं तब तो राज्य में भाजपा सरकार बन पाएगी अन्यथा पार्टी दोबारा सत्ता में आए ये आसान नहीं होगा। गुर्जर आंदोलन के दौरान राजस्थान भाजपा का एक बड़ा वर्ग वसुंधरा को हटा कर संघ के पूर्व प्रचारक तथा उस समय के प्रदेश पार्टी अध्यक्ष ओमप्रकाश माथुर को मुख्यमंत्री बनाने का समर्थन कर रहा था। लेकिन मीणा व अन्य समुदायों को नाराजगी मोल लिए बिना गुर्जर आंदोलन खत्म करवाकर वसुंधरा पार्टी के साथ साथ प्रदेश स्तर पर भी एक मजबूत नेता के तौर पर उभरी हैं। उनकी इस छवि से भाजपा विधानसभा चुनावों में करिश्मे की उम्मीद कर रही  है। वसुंधरा ने राजस्थान में पार्टी में रहते हुए उससे इतर एक ऐसे मजबूत और विकासोन्मुखी नेता के तौर खुद को उसी तरह स्थापित करने की कोशिश की है जसे कि नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में हैं। ऐसा नहीं है कि वसुंधरा राजे के  राजस्थान भाजपा में विरोधियों की कोई कमी है लेकिन वसुंधरा ने पार्टी के भीतर तथा बाहर वफादारों की फौज बना रखी है जिनके दम पर वो मुसीबतों से बची रहती हैं। वसुंधरा राजस्थान की महिलाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं जो उनकी असल ताकत है। संघ परिवार और पार्टी दोनों के लिए वसुंधरा मुख्यमंत्री पद के दावेदार की  पहली पसंद नहीं हैं फिर भी इस बात पर भाजपा और परिवार सहमत दिखते हैं कि राजस्थान में पार्टी की नैया सिर्फ वसुंधरा ही पार लगा सकतीं हैं।

भाजपा को विचार आधारित पार्टी माना जाता है। जहां उसूल है कि कोई व्यक्ति संगठन से बड़ा नहीं है। लेकिन चुनावी गणित ने पार्टी को व्यावहारिक बनने पर मजबूर कर दिया है। अब उसूल पीछे छूट रहे हैं। चार राज्यों में होने वाले इन विधानसभा चुनावों में भाजपा ने मुद्दों से परे मुख्यमंत्री पद के दावेदारों को आगे किया है और चुनावी जीत के लिए इन दावेदारों के व्यक्तिगत करिश्मे पर निर्भर कर रही है। 

Comments (0 posted):

Post your comment comment
Please enter the code you see in the image:
  • email Email to a friend
  • print Print version
  • Plain text Plain text
Rate this article
5.00