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पुराना घर, नया मुखिया

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शिवराज पाटिल को बाहर का रास्ता दिखाकर गृहमंत्रालय की कमान पी चिदंबरम को सौंप दी गई है. क्या चिदंबरम सरकार में जनता का भरोसा बहाल कर पाएंगे?

कुछ दिन पहले तक आर्थिक मंदी की मार से अर्थव्यवस्था को बचाने की जुगत में जुटे पलानिअप्पन चिदंबरम देश के 16वें गृहमंत्री बन गए हैं. 26 नवंबर को मुंबई में हुए आतंकी हमलों के बाद सरकार पर से उठ चुके जनता के विश्वास को बहाल करने के मकसद से ये क़दम उठाया गया है. कुर्सी संभालते ही चिदंबरम ने कहा कि इस तरह का आतंक उस विचार पर हमला है जिस पर भारत की बुनियाद रखी गई थी और वे इससे निपटने के लिए दृढ़संकल्प हैं. 

लगता है कि चिदंबरम का वित्तमंत्रालय से गृहमंत्रालय में तबादला 22 साल पहले राजीव गांधी सरकार में गृहराज्यमंत्री के रूप में उनके प्रदर्शन को ध्यान में रखते हुए किया गया है. हालांकि 1986 से अब तक स्थितियां काफी हद तक बदल चुकी हैं. उस वक्त चिदंबरम के सामने सबसे बड़ी चुनौती 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई हिंसा की आग थी जबकि आज उनके सामने आतंकवाद का दावानल है. 

चिदंबरम के तबादले की बड़ी वजह ये है कि वित्त मंत्रालय संभालने के लिए उनसे भी बेहतर एक शख्स मौजूद है और वो हैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह. इसके अलावा चिदंबरम के हावभाव और लोगों से संवाद स्थापित करने की क्षमता उनके पूर्ववर्ती शिवराज पाटिल से कहीं बेहतर है. अगर किसी तरह की असामान्य स्थिति पैदा नहीं होती है तो आम चुनावों से पहले चिदंबरम को नए मंत्रालय में चार महीने या इससे कुछ ज्यादा काम करने का अवसर मिलेगा. हालांकि किसी तरह का बदलाव लाने के लिए चार महीने का वक्त बहुत कम होता है लेकिन दिग्भ्रमित पाटिल से हुए नुकसान को कम करने के लिए ये वक्त पर्याप्त है. 

पूर्णकालिक गृहमंत्री के रूप में चिदंबरम की पहली चुनौती होगी देश की सुरक्षा एजेंसियों को कुंभकर्णी नींद से जगाना जो मुंबई में हमले के दौरान अपनी डच्यूटी पर सोते हुए रंगे हाथ पकड़ी गईं. खुफिया एजेंसियों के सूत्र बताते हैं कि उन्होंने 12 और 19 नवंबर को सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों को ये जानकारी दी थी कि मुंबई में एक बड़ा हमला हो सकता है. बावजूद इसके नौ सेना, तटरक्षक बल, मुंबई पुलिस और तमाम केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने कुछ भी नहीं किया. आतंकवादी बोट पर सवार होकर आए और मुंबई में ऐसे घूमते रहे जसे उन्हें सालों से इसकी आदत हो.

विरोधियों के बीच पाटिल हमेशा हमेशा मजाक का विषय बने रहे और मातहत उन्हें कुछ समझते नहीं थे. वामपंथी पार्टियों ने पहली दफा चार साल पहले उनके इस्तीफे की मांग की थी. वामपंथियों का मानना था कि शिवराज पाटिल गृहमंत्रालय में मौजूद आरएसएस से सहानुभूति रखने वाले अधिकारियों का सफाया करने में नाकाम रहे हैं. गृहमंत्रालय में इन अधिकारियों की नियुक्ति कथिततौर पर उनके पूर्ववर्ती और वर्तमान में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी ने की थी. वाम पार्टियों का गुस्सा तब और बढ़ गया जब उन्होंने देखा कि पाटिल उन्हीं अधिकारियों की मंडली के साथ काम कर रहे थे. जब पहली बार वाम पार्टियों ने शिवराज पाटिल के इस्तीफे की मांग की उस वक्त मनमोहन सिंह की सरकार वाम पार्टियों की बैसाखी पर टिकी थी. फिर भी पाटिल पर कोई आंच नहीं आई. तब से अब तक सुरक्षा और खुफिया मामले में अनगिनत चूकें हुईं. नतीजतन भारत पर आतंकी हमलों में लगातार इजाफा होता गया. 

लेकिन मुंबई में हुए नरसंहार ने सारी हदें पार कर दीं. इस दुखद हमले के बाद पाटिल को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का समर्थन भी जाता रहा. संकट के खत्म होने के तुरंत बाद 29 तारीख की शाम सोनिया गांधी ने नई दिल्ली में कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्लयूसी) की बैठक बुलाई. कागजों पर देखा जाए तो सीडब्ल्यूसी कांग्रेस में फैसले लेने वाली सर्वोच्च इकाई है पर असल में इसका काम होता है कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा पहले से ही ले लिए गए फैसलों पर औपचारिक मुहर लगाना. 

बैठक में सोनिया गांधी ने आम जनता में नेताओं के प्रति जबर्दस्त गुस्से का जिक्र किया. सोनिया ने कहा कि इस बार कुछ ठोस करना ही होगा. बैठक में कांग्रेस महासचिव पद राहुल गांधी भी मौजूद थे. उन्होंने कहा, ‘ये बड़े शर्म की बात है कि कोई हमारे घर में आया और हमारे मुंह पर तमाचा मार गया.’ 

ये मानो एक इशारा था. चिदंबरम, कमलनाथ, एचआर भारद्वाज और कपिल सिब्बल, सबने एक सुर से ये आवाज बुलंद की कि पाटिल को नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए. सूत्रों की मानें तो बैठक में किसी ने भी पाटिल का साथ नहीं दिया. अपनी बारी आने पर पाटिल ने कहा कि सीडब्लयूसी जो चहेगी वो करने को तैयार हैं. पाटिल ने आतंकी हमलों में मारे गए लोगों के आंकड़े भी पेश किए जिसके मुताबिक उनके कार्यकाल में मारे गए लोगों की संख्या आडवाणी के कार्यकाल में मारे गए लोगों से कम है. ये तर्क पाटिल अक्सर देते आ रहे थे. पर इस बार उनकी एक नहीं सुनी गई. 30 नवंबर को पाटिल ने ये कहते हुए अपना त्यागपत्र प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भेज दिया कि वो मुंबई में हुए नरसंहार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हैं.

कांग्रेसी शब्दावली में नैतिक जिम्मेदारीऐसा मुहावरा है जिसका उपयोग लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए किया जाता है. प्रधानमंत्री कार्यालय ने तुरंत ही उनका त्याग पत्र राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को फैक्स कर दिया जो उस वक्त जकार्ता में थी. और उन्होंने इसे तुरंत स्वीकार कर लिया. इसके बाद तुरंत ही कार्यभार चिदंबरम को सौंप दिया गया. हालांकि वर्तमान लोकसभा के बचे-खुचे दिनों को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि ये एक अल्पकालिक उपाय है. 

चिदंबरम ने अपने करियर की शुरुआत 60 के दशक के अखिरी दिनों में मद्रास हाईकोर्ट में वकील के तौर पर की थी. लगभग इसी दौर में वो यूथ कांग्रेस से भी जुड़ गए थे. सीपीएम महासचिव प्रकाश करात उनके स्कूली दिनों के साथी हैं. वो इंदिरा गांधी के भाषणों का तमिल में अनुवाद करते थे. 1975 में इंदिरा द्वारा थोपे गए आपातकाल का चिदंबरम ने पूरा समर्थन किया था. कुलीन तबकों में उनके दोस्त हैं मसलन अंबानी बंधु जो अक्सर अपने विवाद लेकर उनके पास पहुंचते रहते हैं. चिंदबरम दिग्गज खनन कंपनी वेदांता रिसोर्सेज़ के बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स में भी शामिल रहे हैं जो इन दिनों उड़ीसा में खनन को लेकर स्थानीय लोगों के जबर्दस्त प्रतिरोध का सामना कर रही है. चिदंबरम के सहयोग के लिए एक संघीय जांच एजेंसी होगी. बहुत संभव है कि उनके पास नए लोगों की टीम भी हो, हालांकि प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन के इस्तीफे की पेशकश को ठुकरा दिया है. 

निशाने पर और भी लोगों का आना तय था. बढ़ते दबाव के बाद राज्य के गृहमंत्री आर आर पाटिल ने भी इस्तीफा दे दिया और मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख ने भी इसकी पेशकश कर डाली. देशमुख तो इसलिए भी आलोचना के घेरे में आ गए क्योंकि एनएसजी की कार्रवाई खत्म होने के बाद जब वो ताज में हुए नुकसान का जायजा लेने पहुंचे तो उनके साथ उनके बेटे और हिंदी फिल्म अभिनेता रितेश देशमुख औप निर्माता निर्देशक राम गोपाल वर्मा भी नजर आए. ऐसा लगा कि देशमुख किसी गंभीर दौरे पर नहीं बल्कि किसी हिंदी फिल्म की तैयारी करने आए हों. देशमुख के नायब भी उतने ही लापरवाह दिखे. उधर आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई खत्म हुई इधर आरआर पाटिल मीडिया का जमावड़ा लेकर बैठ गए और कह गए कि बड़े शहरों में इस तरह की छोटी घटनाएं हो जाती हैं और इसका ये मतलब नहीं है कि सारा खुफिया ढांचा ही नाकाम रहा है. ऐसे में तो इस जोड़ी का जाना तय ही लग रहा था. हालांकि आखिर तक दोनों यही कहते रहे कि उनके पद छोड़ने का सवाल ही नहीं पैदा होता. 

शिवराज पाटिल के पद छोड़ने पर दोस्त और दुश्मन, दोनों ही तंजबाण चलाने से नहीं चूके. का वर्षा जब कृषि सुखानी’, ये कहना था रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव का. अरुण जेटली ने कहा, ‘ये काफी पहले हो जाना चाहिए थाजबकि सीपीएम पोलित ब्यूरो सदस्य बृंदा करात ने इसे सिर्फ दिखावा बताया.

8 दिसंबर को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आ जाएंगे (जम्मू कश्मीर के नतीजे 28 दिसंबर को आएंगे) अगर कोई चमत्कार नहीं होता है तो बुरी ख़बर कांग्रेस के इंतजार में है. चिदंबरम के सामने असल चुनौती है कुछ ठोस काम करके लोगों के गुस्से को शांत करना. उन्हें अपनी तमाम योग्यताओं के सहारे गृहमंत्रालय को पटरी पर लाना है, ये काम इतना महत्वपूर्ण है कि वो यहां कोई जुआ खेलने का जोखिम नहीं ले सकते. लेकिन कांग्रेस ने ये खतरा मोल ले लिया है. इसमें कितना फायदा होता है और कितना नुकसान ये जल्द ही सामने आ जाएगा. 

विजय सिम्हा

Comments (1 posted):

Ashraf Ali on 03/12/08 05:14:07
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Mr.Home Minister Patil ke jane ke bad ummeed jagi thi ki zaroor koi zamini tajarba kar siysatdan unki jagah lega ,Lekin qayas ke khelaf P Cidambaram ko yeh zimmedari mere khyal me zyadao munasib nahi hai kyon ki unki asal tajarba gah to Finance Ministry hi hai , jiska woh nirwah bhi bkhoobi kar rahe the mere khyal me unki saf suthri siysi chabi ko ab bade challenge ka samna hai ,woh PM ki ummeed par kitna khra utren ge yeh to aanewala waqt hi batayega , Ham asha karte hain ki is nazuk ghadi me desh ki suraksh ke lye kargar qadam uthaen ge.
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