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राजनीतिक पारी की फिल्मी शुरुआत

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जय चिरंजीवा, जय जय चिरंजीवा...26 अगस्त को तिरुपति के अविलला टैंक ग्राउंड में जमा छह लाख लोगों के हुजूम से इन नारों की गूंज सुनाई दे रही थी. मौका था तेलुगू फिल्मों के सुपरस्टार चिरंजीवी की राजनीतिक पार्टी के ऐलान का. जैसे ही उन्होंने प्रजाराज्यम की स्थापना की घोषणा की, समूचा वातावरण लोगों की हर्षध्वनि से गूंज उठा.

नई पार्टी की शुरुआत के लिए विशेष तौर पर 26 अगस्त को चुना गया था जो कि मदर टेरेसा का जन्मदिन भी है. बड़ी संख्या में समर्थकों को पहुंचाने के लिए 1500 बसें और 18 विशेष रेलगाड़ियां चलाई गई थीं. सभास्थल पर व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस के हजारों जवान और स्वयंसेवक भी मौजूद थे. फिर भी इंतजामात पूरे नहीं पड़ रहे थे. धक्कामुक्की कर रही भीड़ पर पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ गया जिसमें 35 लोग जख्मी हो गए. सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं और विकलांगों को झेलनी पड़ी जिन्हें खास तौर पर इस मौके के लिए लाया गया था. आयोजकों के बार-बार अनुरोध के बाद भी बेलगाम समर्थकों की पुलिस के साथ झड़पें हुईं और जमकर कुर्सियां और चप्पल चलीं.

दो घंटे लंबे भाषण में चिरंजीवी ने ज्यादातर दूसरे नेताओं वाली बातें ही दोहराईं. उन्होंने वादा किया कि वो लगातार पिछड़े समुदायों, मजदूरों, किसानों और महिलाओं के कल्याण के लिए काम करेंगे. उन्होंने खेती पर मंडरा रहे संकट की भी बात की जिसकी वजह से राज्य के किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं. उन्होंने ये भी कहा कि नक्सलवाद को एक सामाजिक मुद्दे के तौर पर देखा जाना चाहिए क्योंकि इस समस्या की जड़ बहुत गहरी है जिसकी लगातार उपेक्षा हुई है. चिरंजीवी के भाषण का सबसे अहम पक्ष तेलंगाना रहा. उन्होंने संकेत दिए कि उनकी पार्टी वहां के लोगों की भावनाओं का सम्मान करेगी. चिरंजीवी ने कहा कि अगर तेलंगानावासियों को लगता है कि भाइयों के बीच बंटवारा अपरिहार्य है तो उनके फैसले का सम्मान किया जाना चाहिए.

चिरंजीवी समाज में मौजूद सांप्रदायिक दरार के बारे में काफी चिंतित हैं इसलिए ये झंडा तीन मुख्य धर्मों को साथ लाने की उनकी कोशिश है क्योंकि सफेद रंग ईसाई, हरा, इस्लाम और लाल, हिंदू धर्म के साथ जुड़ा है. हम किसी समुदाय विशेष की पार्टी नहीं बनेंगे.

चिरंजीवी ने खुद को ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया जो लोगों की समस्याओं से अपरिचित नहीं है. उन्होंने अपने बचपन के दिनों की मुश्किलों का जिक्र करते हुए कहा कि उनके पिता पुलिस कांस्टेबल थे और कई बार उन्हें पतला दलिया खाकर गुजारा करना पड़ता था. उनका कहना था, एक्टर बनने के बाद भी मैं आपकी समस्याओं के संपर्क में रहा हूं. मैंने एक मोची से लेकर आईएएस अधिकारी तक के किरदार निभाये हैं. साफ था कि वो अभिनेता और नेता चिरंजीवी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे थे.

संतुलन साधने की ये कोशिश और भी कई रूपों में दिखी. इनमें से एक प्रजाराज्यम का झंडा भी था जिसमें हरी और सफेद पट्टी पर चमकता सूरज दर्शाया गया है. चिरंजीवी का कहना था कि ये सूरज सरीखी ऊर्जा के जरिये सामाजिक क्रांति लाने की भावना को इंगित करता है. सफेद रंग शासन में पारदर्शिता का प्रतीक है और हरा किसानों की खुशहाली का. इस प्रतीकवाद को आगे बढ़ाते हुए उनके एक करीबी सहयोगी का कहना था, चिरंजीवी समाज में मौजूद सांप्रदायिक दरार के बारे में काफी चिंतित हैं इसलिए ये झंडा तीन मुख्य धर्मों को साथ लाने की उनकी कोशिश है क्योंकि सफेद रंग ईसाई, हरा, इस्लाम और लाल, हिंदू धर्म के साथ जुड़ा है. हम किसी समुदाय विशेष की पार्टी नहीं बनेंगे.

मगर संतुलन साधने की तमाम कोशिशों के बावजूद ये सच्चाई अपनी जगह है कि जाति समीकरणों से आगे की राजनीति करना चिरंजीवी के लिए खासी चुनौती साबित होगा. चिरंजीवी कापू समुदाय से आते हैं जो राज्य की कुल आबादी का 25 फीसदी है. आंध्र प्रदेश के दूसरे प्रमुख समुदाय हैं कम्मा और नायडू.  ये समुदाय परंपरागत रूप से कांग्रेस का वोटबैंक रहा है इसलिए चिरंजीवी के राजनीति में उतरने से पार्टी का चिंतित होना स्वाभाविक है. वो इस चुनौती से निपटने के लिए कापू समुदाय को अपने पक्ष में करने के लिए आरक्षण का कार्ड खेलते हुए उसे पिछड़े समुदायों को सूची में शामिल कर सकती है. गौरतलब है कि ये समुदाय काफी समय से इसके लिए लामबंदी कर रहा है. हैदराबाद स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इकॉनॉमिक्स द्वारा समुदाय का एक सामाजिक-आर्थिक सर्वे किया जा रहा है और इस संबंध में आखिरी ऐलान दिसंबर में होने के आसार हैं.

उधर, राज्य के एक और प्रमुख दल तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) ने इस संभावना को खारिज कर दिया है कि चिरंजीवी 2009 के विधानसभा चुनावों में उसके प्रदर्शन पर बुरा असर डाल सकते हैं.

पार्टी मुखिया एन चंद्रबाबू नायडू का कहना है कि राजनीति में चिरंजीवी नए खिलाड़ी हैं और उनकी कोई विश्वसनीयता नहीं है इसलिए टीडीपी को उनसे डरने की जरूरत नहीं है. जब उनसे कुछ नेताओं के चिरंजीवी के पाले में जाने के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि टीडीपी लगातार मजबूत हो रही है और एक दो नेता चले भी गए तो इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा. गौरतलब है कि प्रजाराज्यम का औपचारिक ऐलान होने से पहले ही वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और सांसद हरिरामा जोगैया, पूर्व टीडीपी सांसद सी रामचंद्रैया, वी गीता और बी नागी समेत कई नेताओं ने अपनी पार्टी छोड़ दी थी. राज्य के बड़े दलित नेता कट्टि पद्म राव भी चिरंजीवी का समर्थन कर रहे हैं.

इन सब घटनाक्रमों से तो यही प्रतीत होता है कि अगर चिरंजीवी कैंप में दरार नहीं पड़ी तो कांग्रेस और टीडीपी को निश्चित रूप से उनसे चिंतित होने की जरूरत है. जहां तक चिरंजीवी का सवाल है तो उन्हें अब फिल्मी परदे पर मिली सफलता को राजनीति के मैदान में भी दोहराना है. इसमें कोई संदेह नहीं कि वो जिस भी सीट से लड़ेंगे, जीत जाएंगे मगर असली चुनौती प्रजाराज्यम के दूसरे नेताओं के लिए भी ऐसी ही जीत सुनिश्चित करने की होगी. तभी वो आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में कोई जलवा दिखा पाएंगे.

संजना

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