ममता: नैनो की किरकिरी, वाम का सिरदर्द
सिंगूर आंदोलन के जरिये ममता बनर्जी ने तीन दशक से प. बंगाल की सत्ता पर काबिज वाममोर्चा सरकार के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती पेश की है. क्या वे औद्योगीकरण की दुश्मन न दिखते हुए जमीनी सरोकारों के संघर्ष और अपनी राजनीति को सफलतापूर्वक आगे बढ़ा सकेंगी? शांतनु गुहा रे की रिपोर्ट.
झुलसाने वाली धूप के बावजूद तड़ित सिकदर 24 अगस्त को तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी का भाषण सुनने के लिए घंटों तक खड़े रहे. तीन घंटे का सफर तय कर सिंगूर आए स्टेट बैंक अधिकारी सिकदर उन आठ लाख लोगों में से एक थे जो जमीन अधिग्रहण के खिलाफ होने वाली रैली में हिस्सा लेने यहां पहुंचे थे. ममता के लिए बने अस्थाई मंच से टाटा मोटर्स का वो कारखाना नजर आ रहा था जिसमें भारत की सबसे सस्ती कार नैनो का उत्पादन होना है. दूसरे वक्ताओं के भाषण के बीच में थोड़ी-थोड़ी देर पर ममता अपने समर्थकों को चेताती रहतीं कि वो संयम का परिचय दें और कारखाने में जबरन घुसने की कोशिश न करें.
प. बंगाल के बहुतेरे लोगों की तरह राजनीति का अनुसरण करने वाले सिकदर समझ रहे थे कि ममता इतनी सावधानी क्यों बरत रही हैं. ये एक ऐसा लम्हा था जो उन्हें सही मायनों में एक ऐसे शक्तिशाली विपक्ष में बदल सकता था जो पिछले तीन दशक से वामशासित इस राज्य में नदारद रहा है.
इससे लगभग सौ मील दूर कोलकाता की राइटर्स बिल्डिंग में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य अपनी आधी कैबिनेट के साथ बैठे अपने विरोधी के एक-एक कदम की खबर ले रहे थे. सूत्र बताते हैं कि सिंगूर रैली से घंटों पहले तक 13 राजनीतिक पार्टियों से मिलकर बने वाममोर्चा गठबंधन के पास इस तेजतर्रार नेता से निपटने के लिए कोई रणनीति नहीं थी.
राज्य के राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि प. बंगाल में ऐसे हालात बहुत समय के बाद बने हैं. विपक्ष को हाशिये पर धकेलने के लिए समूचे वाम मोर्चे को पिछली बार सबसे तगड़ा जोर तब लगाना पड़ा था जब करीब एक दशक पहले तृणमूल कांग्रेस और वाम समर्थकों के बीच कोलकाता में तीखा टकराव हुआ था जिसमें ममता बनर्जी समेत सैकड़ों लोग घायल हो गए थे. कांग्रेस नेता निर्बेद राय कहते हैं, “उनकी नजर राइटर्स बिल्डिंग पर है और वापसी करने के लिए उनके पास ये सबसे बड़ा मौका है. वाम मोर्चा वास्तव में चिंतित है क्योंकि उसके अलावा कोई और भी है जो भीड़ खींच रहा है और वोट भी.”
ममता के शब्दों पर गौर किया जाए तो संकेत मिलते हैं कि औद्योगीकरण के खिलाफ मुहिम से कहीं ज्यादा ये सत्ता की ताकत की लड़ाई है. रैली में जब ममता ने कहा कि “हम किसानों के आंसुओं की कीमत पर कार नहीं चाहते” तो उनके समर्थकों का नारा गूंजा, ‘लाल भगाओ, बांग्ला बचाओ.’ साफ है कि परोक्ष उद्देश्य वाम के हाथ से सत्ता की लगाम खींचना है.
कई लोग इस बात से सहमत हैं कि टाटा के खिलाफ मौजूदा विरोध अभियान तृणमूल का वोटबैंक मजबूत करेगा. पार्टी ने पिछले साल इंडोनेशिया के सलीम ग्रुप को नंदीग्राम छोड़ने पर मजबूर कर दिया था जिससे उसका प्रभाव बढ़ा. पिछली मई में हुए जिला परिषद चुनाव में तृणमूल ने 17 में से दो सीटें जीतीं और चार अन्य पर उसने वाममोर्चे को कड़ी टक्कर दी. दो बांग्ला समाचार चैनलों ने हाल ही में भविष्यवाणी की है कि अगर आज चुनाव हो तो प. बंगाल की 42 में से 20 लोकसभा सीटें तृणमूल के खाते में जा सकती हैं. ममता के शब्दों पर गौर किया जाए तो संकेत मिलते हैं कि औद्योगीकरण के खिलाफ मुहिम से कहीं ज्यादा ये सत्ता की ताकत की लड़ाई है.
मगर कई लोग ये भी मानते हैं कि ममता को एक हद से आगे नहीं जाना चाहिए. राज्य के शहरी विकास मंत्री क्षिति गोस्वामी कहते हैं, “वे पूर्व की मायावती हैं. दरअसल उन्हें टाटा और राज्य सरकार के साथ बात कर किसानों के लिए मुआवजे की दिशा में सोचना चाहिए था. साफ है कि उनकी नजर ग्रामीण वोटों पर है.”
टाटा मोटर्स ने नैनो पर एक बड़ा दांव खेला है. भारत में साढ़े चार करोड़ लोग दोपहिया वाहनों का इस्तेमाल करते हैं और कंपनी को उम्मीद है कि इनकी एक बड़ी संख्या भारत की सबसे सस्ती कार नैनो को हाथोंहाथ लेगी. टाटा सुप्रीमो रतन टाटा ने इस साल फरवरी में नैनो से पर्दा उठाते हुए कहा था कि ये इस साल अक्टूबर तक बाजार में उपलब्ध होगी.
विशेषज्ञों के मुताबिक 623सीसी की नैनो टाटा के लिए बहुत अहम है क्योंकि लगातार बढ़ती ब्याज दरों और मुद्रास्फीति ने कारबिक्री पर बुरा असर डालना शुरू कर दिया है. टाटा के साथ तो स्थिति और भी बुरी है क्योंकि जुलाई में जहां कार बिक्री में औसत 1.7 फीसदी की गिरावट आई वहीं टाटा के लिए ये आंकड़ा 8.9 फीसदी रहा. टाटा समूह को फ्रांस के दूसरे सबसे बड़े कार निर्माता रेनॉल्ट एसए से भी चुनौती मिल रही है जिसने बजाज के साथ मिलकर भारतीय बाजार के लिए टाटा जैसी ही सस्ती कार बनाने का ऐलान किया है. इसके 2011 तक बाजार में आने की संभावना है.
टाटा और ग्रामीणों के बीच टकराव पिछले साल तब हुआ जब राज्य सरकार ने भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की. अब तक परियोजना के लिए प्रस्तावित 997 एकड़ जमीन का 70 फीसदी अधिग्रहीत किया जा चुका है. करीब 11,000 जमीन मालिकों को इस योजना पर कोई ऐतराज नहीं था. बाकी बचे लोगों के पास 400 एकड़ जमीन है और ममता उन्हीं के हक में आवाज उठा रही हैं. उनकी मांग है कि जमीन के बदले पैसा नहीं, बल्कि जमीन ही दी जाए.
उनके आलोचकों का कहना है कि ममता सिर्फ ग्रामीण वोट चाहती हैं. इस पर भारत के जाने-पहचाने ‘क्विजमास्टर’ और आजकल तृणमूल के मुख्य सलाहकार डेरेक ओ ब्रायन कहते हैं, “ये बेतुकी सी बात है. क्या वाममोर्चे ने दशकों तक सत्ता पर काबिज होने के लिए ग्रामीण वोट नहीं मांगा, भारत को औद्योगीकरण की जरूरत है मगर इसके मानवीय पहलुओं को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए.” वे तर्क देते हैं कि उनकी पार्टी ने वाममोर्चे की तरह बेईमानी की राजनीति नहीं की है और वो अपनी मांग पर डटे रहे हैं. डेरेक कहते हैं, “वे पिछले तीस साल की गलतियों के लिए माफी मांग रहे हैं और प्रचार कर रहे हैं कि नैनो ही इस राज्य को उबार सकती है. ये बड़ी हास्यास्पद सी बात है.”
अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि डेरेक ममता के खासे काम आ रहे हैं. ये उनकी सलाह ही थी कि ममता ने ये मुद्दा उठाया कि वाममोर्चे ने टाटा के साथ हुए सहमति पत्र को तो सार्वजनिक नहीं किया मगर वो उस सहमति पत्र को देखने के लिए लालायित है जो केंद्र की यूपीए सरकार ने 123 समझोते पर अमेरिका से किया है. मीडिया ने इस मुद्दे को हाथोंहाथ लिया और ये भट्टाचार्य और उनके सिपहसालारों के लिए अच्छी-खासी झेंप का सबब बन गया.
ममता ने सत्ताधारी लाल ब्रिगेड के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक पैदा कर दी है. हालांकि देखा जाए तो वाममोर्चे को सत्ताच्युत करने के लिए उन्हें अब भी लंबा सफर तय करना है. पिछले विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को 294 में से सिर्फ 29 सीटें मिलीं थीं जबकि पांच साल पहले ये आंकड़ा 80 था. मगर फिर भी वाममोर्चा चिंतित है हालांकि वो साफ तौर पर इसे स्वीकार करना नहीं चाहता. मई के पंचायत चुनावों में ममता की अप्रत्याशित जीत के बारे में पूछने पर वाममोर्चे के चेयरमैन बिमान बोस कहते हैं कि एक दो बूंदों का मतलब बाढ़ नहीं होता जमीन के बदले जमीन की मांग को खारिज करते हुए बोस कहते हैं, “जमीन देने के अनिच्छुक किसानों की सही संख्या पता लगाने के लिए तृणमूल को बातचीत की मेज पर आने दीजिए. हमारे आंकड़े बताते हैं कि ऐसे किसानों के पास सिर्फ 167 जमीन है मगर तृणमूल 400 एकड़ जमीन की मांग कर रही है. आंकड़ा जो भी हो, बातचीत करने का तब तक कोई मतलब नहीं जब तक वे परियोजना के लिए आवंटित जमीन का कोई भी हिस्सा वापस लेने की मांग पर अड़े रहते हैं. उन्हें चाहिए कि वे अराजकता फैलाना बंद कर बातचीत करें.” राज्य के उद्योग मंत्री निरूपम सेन कहते हैं, “काम में बाधा डालने का ये काम ज्यादा दिन तक नहीं चल सकता. तृणमूल कांग्रेस को ये दिखाना होगा कि उनका एजेंडा हमसे बढ़िया है. मगर उनके पास कोई एजेंडा हो तब तो.”
मगर खुद को बेअसर दिखाने की तमाम कवायदों के बावजूद सच्चाई यही है कि वाममोर्चे पर दबाव बढ़ रहा है. राज्य के परिवहन मंत्री सुभाष चक्रवर्ती भी ये मानते हैं. अब वे यह कहकर ममता का मुकाबला करना चाहते हैं कि जब वो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री थीं तो उस दौरान राज्य सरकार ने 40,000 एकड़ जमीन के अधिग्रहण में रेलवे की सहायता की थी. चक्रवर्ती तहलका से कहते हैं, “ये अधिग्रहण सिंगूर जैसा ही था. अब मुझे बताइए कि अगर जमीन देने वाले बाद में दावा करें कि हम तो देना ही नहीं चाहते थे तो क्या जमीन को लौटाना संभव है? एक बार इस तरह की कोई प्रक्रिया शुरू हो जाती है तो उसे उलटना बहुत मुश्किल हो जाता है.” एक तरफ ये चिंता है कि टाटा सिंगूर से उठकर कहीं और न चल दें तो दूसरी ओर सिंगूर में तृणमूल का धरना आर्थिक नुकसान का सबब साबित हो रहा है.
वाममोर्चा किस कदर चिंतित है इसका अंदाजा पार्टी के अलग-अलग नेताओं द्वारा दिए गए बयानों से हो जाता है. ममता के इस बात का खंडन करने के बाद कि वे औद्योगीकरण की विरोधी नहीं हैं, मुख्यमंत्री भट्टाचार्य ने 26 अगस्त को एक बैठक बुलाई और कहा कि वो बंद से नफरत करते हैं. हाल तक किसी भी वामनेता का इस तरह का बयान अकल्पनीय था. बुद्धदेव के शब्द थे, “ये विकासविरोधी है. निजी तौर पर मैं इसका समर्थन नहीं करता. बंद से किसी को फायदा नहीं होता. व्यक्तिगत तौर पर मैं हड़ताल के खिलाफ हूं. मगर दुर्भाग्य ये है कि मैं एक पार्टी का सदस्य हूं और जब वो हड़ताल का आह्वान करती है तो अच्छा यही है कि मैं चुप हो जाऊं. मगर अब मैंने ये फैसला किया है कि अगली बार मैं अपना मुंह बंद नहीं रखूंगा.”
हालांकि पार्टी में तीखी प्रतिक्रिया होने पर बुद्धदेव ने बाद में इस बयान पर खेद व्यक्त तो कर दिया मगर साफ है कि वाममोर्चे पर दबाव बढ़ रहा है. एक तरफ ये चिंता है कि टाटा सिंगूर से उठकर कहीं और न चल दें तो दूसरी ओर सिंगूर में तृणमूल का धरना आर्थिक नुकसान का सबब साबित हो रहा है. राज्य का सबसे व्यस्त माल ढुलाई कॉरीडोर चार लेन वाला दुर्गापुर-कोलकाता एक्सप्रेसवे बंद पड़ा है.परिवहन मंत्री चक्रवर्ती कहते हैं कि जल्द ही खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं क्योंकि धरने की वजह से 25,000 के करीब ट्रक रास्ते में ही फंसे पड़े हैं. इससे हर दिन दो करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है.
मगर ममता टस से मस होने को तैयार नहीं हैं. उनका कहना है कि इसके लिए उनकी पार्टी नहीं बल्कि राज्य सरकार जिम्मेदार है. तृणमूल सदस्यों का मानना है कि सत्ताधारी गठबंधन हताशा का शिकार होता जा रहा है. राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता पार्थ चटर्जी कहते हैं, “वाम अपनी ही रणनीति का शिकार हो गया है. ये बड़ी संख्या में ग्रामीण वोट लेकर सत्ता में सबसे ये कहते हुए आया था कि पूंजीवादी किसी के मित्र नहीं होते. इसके बाद तीन दशक तक इसने राज्य की तरक्की के लिए कुछ नहीं किया. अब जब हालात हद के बाहर चले गए हैं तो वो तरक्की की बात करते हुए सिर्फ एक परियोजना से चिपक गया है.”
हालांकि ममता मानती हैं कि लाल ब्रिगेड को सत्ताच्युत करने के लिए उन्हें अब भी लंबा सफर तय करना है. 1980 के दशक में वाममोर्चे ने कृषि सुधारों की बदौलत अपना ग्रामीण वोट मजबूत किया था. जब भी ग्रामीण इलाकों में इसकी पकड़ ढ़ीली हुई तो इसके करीब 16 लाख वफादार कैडर ने उस नुकसान की क्षतिपूर्ति कर दी. मगर नंदीग्राम और सिंगूर में जीत से ममता ने साबित कर दिया है कि कैडर की अभेद्य दीवार को भी तोड़ा जा सकता है. ये एक असाधारण मानसिक जीत है. तहलका से बात करते हुए ममता कहती हैं, “मैं ये नहीं कह रही कि मेरा एजेंडा सिर्फ किसानों के अधिकारों की सुरक्षा करना है. हमें बंगाल को फिर से तरक्की के रास्ते पर लाने की जरूरत है.”
बनर्जी ये भी जानती हैं कि मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिए उन्हें राज्य से बड़े पैमाने पर हो रहे विस्थापन की रफ्तार को भी धीमा करना होगा. हर साल औसतन 25000 से भी ज़्यादा युवा बढिया अवसरों की तलाश में पश्चिम बंगाल से दूसरे राज्यों की ओर रुख कर लेते हैं. कुछ विदेश चले जाते हैं. राज्य सरकार के मुताबिक ये आंकड़ा पूरे देश में सबसे बड़ा है.
बंगाल के जाने-माने लेखक मणिशंकर मुखर्जी कहते हैं, “कई पीढ़ियों से हमने हर चीज़ को शक की नज़रों से देखा और हमारे हाथ कुछ नहीं आया. क्या कोई इसे बदल सकता है? बहुत मुश्किल है ऐसा होना” कोलकाता विद्युत वितरण निगम के अपने भव्य दफ्तर में बैठे मुखर्जी कहते हैं. कभी ये दफ्तर सरकारी हुआ करता था मगर अब इस पर 11000 करोड़ रुपये के व्यावसायिक समूह आरपीजी का स्वामित्व है. ये भी रोचक है कि करीब दो दशक पहले आरपीजी समूह को भी तब टाटा जैसी ही परेशानियों का सामना करना पड़ा था जब वो हल्दिया पेट्रोकैमिकल्स परियोजना को पाने की दौड़ में सबसे आगे वालों में से था. इस परियोजना को पश्चिम बंगाल की वाम सरकार निवेश आकर्षित करने की शुरुआत के तौर पर पेश कर रही थी. लेकिन 5000 करोड़ रुपये का ये प्रोजेक्ट आरपीजी के बजाय टाटा को मिल गया. कई लोगों को ये बेहद अजीब लगा था क्योंकि टाटा के उलट आरपीजी समूह द्वारा राज्य में निवेश किए जाने की संभावनाएं ज़्यादा थीं. आज सरकार टाटा और तृणमूल कांग्रेस को मनाने में लगी है और एक बार फिर से वातावरण में अनिश्चितता छाई हुई है. मुखर्जी के मुताबिक ममता एक बेहद फिसलन भरे रास्ते पर चल रही हैं क्योंकि बंगाल में किसी भी नये नेता द्वारा सत्तासीन होने के लिए उद्योग जगत के साथ जुड़ना ज़रूरी है. वे कहते हैं, “किसी भी नये नेता को ये नजरिया बदलने में मदद करके राज्य को वापस रास्ते पर लाना होगा. केवल तिकड़मों से काम नहीं चलने वाला”
बंगाल अंबुजा सीमेंट के सीएमडी हर्षवर्धन नियोटिया इससे सहमति जताते हैं, “परियोजनाओं को शुरु करना हर जगह एक जैसा ही होता है मगर कुछ राज्यों में जहां परिस्थितियां सकारात्मक हों, आपका काम आसान हो जाता है. पश्चिम बंगाल में भी कहीं-कहीं ऐसा है. मगर यदि आप मोटे निवेश की चाह रखते हैं तो इसमें बदलाव करना ज़रूरी है.” करीब दो दशक पहले आरपीजी समूह को भी तब टाटा जैसी ही परेशानियों का सामना करना पड़ा था जब वो हल्दिया पेट्रोकैमिकल्स परियोजना को पाने की दौड़ में सबसे आगे वालों में से था.
नियोटिया जानते होंगे कि शायद सिंगूर विवाद की वजह से ही अगले कुछ महीनों में भारत का दौरा करने वाले जर्मनी के कम से कम नौ व्यावसायिक प्रतिनिधिमंडल कोलकाता की यात्रा पर नहीं जा रहे हैं. इनमें से कुछ जर्मनी के सबसे प्रमुख राज्यों से हैं, जिनके साथ राज्य सरकार लंबे समय से रिश्ते बनाने की कोशिशों में जुटी हुई है और जिनमें से एक में दुनिया की सबसे बड़ी वाहन निर्माता कंपनियों में से एक बीएमडब्ल्यू का घर भी है. इंडो जर्मन चैंबर ऑफ कॉमर्स के क्षेत्रीय निदेशक बीजी रॉय कहते हैं, “पिछले साल हमारे यहां जर्मनी से सात प्रतिनिधिमंडल आए थे मगर दुर्भाग्यवश इस बार ऐसा नहीं हो पा रहा है”
लेकिन तृणमूल कांग्रेस के राज्य सभा सदस्य मुकुल रॉय कहते हैं, “ये, देश को ये समझने में मदद करेगा कि मुख्यमंत्री की बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद पश्चिम बंगाल में ज़मीन पर ज़्यादा कुछ नहीं हो रहा. हमें माहौल बदलने की ज़रूरत है”
इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष हर्ष के झा राज्य के आमूल-चूल बदलाव के हिमायती हैं. "ये किसी नए घर को खड़ा करने जैसा है क्योंकि वर्तमान ढांचा सिर्फ ढहाने लायक है." संकट को उजागर करने के लिए वो एक दिलचस्प उदाहरण देते हैं. बंगाल की बहुप्रचारित एकल खिड़की अनुमति प्रक्रिया (सिंगल विंडो क्लियरेंस प्रॉसेस) की सच्चाई ये है कि इसे पूरा होने में 105 कार्यदिवस लग जाते हैं. वे कहते हैं, "गुजरात में इसमें एक दिन लगता है और कर्नाटक व महाराष्ट्र में दो, जबकि हमारे यहां जमीन खरीदना और उसे अपने नाम करवाने में ही सारा समय बर्बाद हो जाता है." पश्चिम बंगाल में निवेश आकर्षित करने के लिए झा और उनकी टीम ने इस व्यवस्था पर अपनी रिपोर्ट में कई सुझावों की सिफारिश की है.
ममता ने एक बार मजाक में कहा था कि अगर बंगाल के गरीबों को एक लाख नैनो कार मुफ्त में दे दी जाएं तो वो अपना रुख नर्म कर सकती हैं. वो मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की बातचीत की अपील को ठुकरा चुकी हैं क्योंकि उसमें ये शर्त जुड़ी हुई थी कि ममता परियोजना को आगे बढ़ने देंगी. उनके इस कदम के व्यापक प्रभाव हो सकते हैं. हाल में कांग्रेस छोड़कर अपनी पार्टी बनाने वाले सोमेन मित्रा कहते हैं, "अगर वाममोर्चा अपने राजनीतिक हित के लिए परमाणु करार के साथ जनता के बीच जा सकता है, तो फिर इस आंदोलन में क्या बुराई है? आखिरकार वो कुछ वाजिब सवाल ही तो उठा रही हैं. राज्य के आंकड़े बताते हैं कि यहां 70 लाख से ज्यादा बेरोजगार हैं. मुझे उम्मीद है कि वो सारे लोग टाटा में नौकरी की उम्मीद नहीं कर रहे हैं. यहां तक कि बहुप्रचारित हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स में भी सिर्फ 500 लोगों को ही रोजगार मिल सका. वाममोर्चे ने राज्य का औद्योगिक माहौल किस तरह खराब कर दिया इसका एक नमूना देखिए. बिरला समूह को उनकी कार अंबेसडर के कारखाने के लिए 550 एकड़ ज़मीन लिए दी गई थी. हाल ही में उन्होंने कहा कि उन्होंने 314 एकड़ ज़मीन का इस्तेमाल ही नहीं किया और अब वो इसे रियल इस्टेट कारोबार के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं. और सरकार भी इसके लिए मान गई. और यहां वे 400 एकड़ उपजाऊ ज़मीन के लिए हाय-तौबा मचा रहे हैं,"
मित्रा के इस तर्क से कई लोग सहमत दिखते हैं. कइयों का मानना है कि ममता को उनका समर्थन बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि वे राज्य में वोटों का रुझान बदल सकते हैं. मित्रा के स्वर की प्रतिध्वनि सिंगूर में भी सुनने को मिलती है जहां बराबारी ग्राम पंचायत के उपप्रधान दीपांकर घोष कहते हैं, “आज ये समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि कृषि और उद्योग साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं. किसी एक के लिए दूसरे की हत्या क्यों?"
मुश्किल से एक मील की दूरी पर अनंत और तरुण साहू अपने बगीचे में बैठे इस बात की चर्चा कर रहे हैं कि काम फिर से कब शुरू होगा. दोनों को सिंगूर प्लांट में नियुक्त करने से पहले कोलकाता में छह महीने का प्रशिक्षण दिया गया था. उनका कुल वेतन 4500 रूपए है. दोनों एक स्थानीय कॉलेज से स्नातक करने के बाद दो साल से बेरोजगार थे. तरुण कहते हैं, "कुछ ग्रामीण प्लांट के पक्ष में हैं और कुछ इसके खिलाफ. ये अच्छी बात नहीं है. कारखाने में काम करने की वजह से जल्द ही हम गांव में अलग-थलग पड़ जाएंगे. इस समस्या का समाधान होना चाहिए."
ममता को इस विवाद के परिणामों का अच्छी तरह से अंदाज़ा है. मुद्दा सहयोगी कंपनियों को दी जाने वाली अतिरिक्त ज़मीन नहीं है जिसे टाटा समूह अपने प्लांट के आस-पास चाहता है, न ही ये मुद्दा किसानों के पर्याप्त मुआवजे से जुड़ा है, बात ये भी नहीं है कि भारतीय सड़कों को नैनो की कितनी जरूरत है. दरअसल ये ऐसा सर्वोत्तम अवसर है जिसके जरिये ममता, तीस साल पुराने वाम शासन की तमाम गलतियों का फायदा उठाकर खुद को राज्य की राजनीति में शीर्ष पर पहुंचा सकती हैं.
अग्रणी स्थानीय बिल्डर अरुण पोद्दार कहते हैं, "ममता बनर्जी के लिए ये महत्वपूर्ण है कि वो नैनो परियोजना को राज्य से बाहर न जाने दें, क्योंकि कॉर्पोरेट जगत को उनका यही संदेश होगा."
ममता को पता है कि अगर परियोजना कहीं और जाती है तो टाटा को आर्थिक नुकसान उठाना होगा और अगर 2500 डॉलर की कार के बाज़ार में उतरने में देरी होती है तो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारत की छवि भी कुछ धूमिल होगी. मगर यदि वे इस परियोजना को राज्य में कायम रखने में सफल रहती हैं और इसके साथ ही किसानों का विश्वास भी जीत लेती हैं तो इससे बंगाल, जहां बड़े से बडा़ पूंजीपति भी कदम रखने में डरता है, की छवि ही बदल जाएगी.
ये एक बड़ी चुनौती है. ममता को इसे समझ कर आगे बढ़ने की जरूरत है. शायद इसके बाद ही वे मुख्यमंत्री की कुर्सी की तरफ विश्वास के साथ कदम बढ़ा सकती हैं.




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