कश्मीर संकट, नौ नज़रिये
कुछ समय पहले तक लग रहा था कि जैसे कश्मीर फिर से स्वर्ग बनने जा रहा है मगर अब घाटी के साथ-साथ जम्मू में भी आग लगी हुई है. कश्मीर संकट से अलग-अलग तरीकों से जुड़े नौ नज़रियों को सामने ला रही हैं हरिंदर बवेजा.
पत्रकार
इस साल अब तक मेरा दो बार कश्मीर जाना हुआ है. पहली बार 28 मई को और दूसरी दफा 14 अगस्त को. मई में ये धरती का स्वर्ग जैसा ही लग रहा था. सूरज की रोशनी में नहाई सड़कों पर खुशगवार चेहरे नजर आ रहे थे और डल झील के शांत और गहरे पानी में तैरते हाउसबोट्स और शिकारों में सैलानियों का सैलाब उमड़ रहा था. डल से सटी सड़क पर छुट्टियों का मजा लेने आए लोगों की भीड़ थी जिनमें से ज्यादातर गुजरात और महाराष्ट्र से थे. साड़ी पहने और बिंदी लगाए महिलाओं को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे मैं आतंकवाद शुरू होने से पहले वाले दौर के कश्मीर में पहुंच गई हूं.
और सिर्फ तीन महीने से भी कम समय में आलम ये था कि मैं जब श्रीनगर पहुंची तो हवाई अड्डे पर एक भी टैक्सी तक नहीं थी. बैगेज एरिया से सटा टूरिस्ट काउंटर वीरान पड़ा था. ये हाल तब था जब राज्य सरकार के आंकड़े बता रहे थे कि साल के शुरुआती छह महीनों के दौरान वादी में चार लाख से भी ज्यादा पर्यटक आ चुके हैं. एयरपोर्ट से शहर की तरफ जाते हुए हमें हर चौराहे पर जलते टायर नजर आए और हर मोड़ पर आजादी के नारे सुनाई दिए. 1989 में कश्मीर में आतंकवाद की शुरुआत से ही मैंने इस राज्य को कवर किया है. इसलिए जब अचानक एक भीड़ हमारी कार के शीशे पीटते हुए ये चिल्लाने लगी कि भारत से हिंदू आ गए तो मुझे ज्यादा हैरत नहीं हुई.
मई और अगस्त के इस जबर्दस्त विरोधाभास से केंद्र भौचक्का है. नॉर्थ और साउथ ब्लॉक के अफसरों को समझ में नहीं आ रहा कि जम्मू में प्रदर्शनकारियों का हुजूम कम होने की बजाय बढ़ता ही क्यों जा रहा है, क्यों यहां महिलाएं गिरफ्तारी देने के लिए सड़कों पर उतर आई हैं और क्यों कश्मीरी एक बार फिर से आजादी का नारा बुलंद कर रहे हैं. आखिर महज 40 हेक्टेयर जमीन अमरनाथ श्राइन बोर्ड को देने और फिर उसे वापस लेने से ऐसा क्या हो गया कि पीर पंजाल के दोनों तरफ के हिस्से धधकने लगे हैं? क्यों ये राज्य अराजकता के तूफान में घिर गया है? क्यों जम्मू और कश्मीर वाले एक दूसरे से नफरत करने लगे हैं? ![]() |
हरिंदर बवेजा |
अमरनाथ यात्रा के मार्ग में पड़ने वाली जिस 40 हेक्टेयर या 800 कनाल जमीन के मुद्दे पर ये हंगामा खड़ा हुआ है अगर उसे जाकर देखा जाए तो कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि यहां कोई अमरनाथ नगर बन सकता है और इससे घाटी में मुसलमान अल्पसंख्यक हो सकते हैं जैसा अलगाववादी प्रचार कर रहे हैं. साल में ज्यादातर वक्त यहां 10 फीट मोटी बर्फ की चादर होती है. वीराना ओढ़े इस इलाके में गर्मियों के दो महीने रौनक तब लौटती है जब यहां तीर्थयात्रियों के लिए अस्थाई झोपड़ियां और शौचालय बनाए जाते हैं. नफरत के जिस तूफान में ये राज्य घिरा हुआ है उसमें न तो राज्य की मुख्यधारा की पार्टियों और न ही केंद्र ने ये स्पष्ट करने की जहमत उठाई कि पिछले छह साल से यात्रियों के लिए सुविधाओं का प्रबंध इसी 40 हेक्टेयर जमीन पर किया जा रहा है. जमीन को अस्थाई तौर पर हस्तांतरित करने संबंधी कैबिनेट के आदेश से तो पहले से ही मौजूद इस व्यवस्था पर औपचारिकता की मुहर भर लगती. राज्य के नेताओं और मीडिया को मुद्दे से आंखें मूंदे रखने की बजाय उस दुष्प्रचार का मुकाबला नहीं करना चाहिए था जिसकी वजह से इतना गंभीर संकट खड़ा हो गया है? सवाल ये भी है कि गृहमंत्री जमीनी हकीकतों से कितनी अच्छी तरह वाकिफ थे? ऐसा इसलिए क्योंकि राज्य से प्राप्त सूचनाएं जहां ये बता रही थीं कि मुजफ्फराबाद कूच करने वालों की संख्या 70,000 से कम नहीं थी, वहीं जम्मू में एक सर्वदलीय बैठक में आश्वस्त शिवराज पाटिल एक दूसरे वरिष्ठ नेता को बता रहे थे कि ये आंकड़ा महज 8000 था.
यहीं पर समस्या की जड़ छिपी है. इस संकट की बुनियादी वजह है केंद्र का टालमटोल भरा रवैया और जमीनी हालात को जानने की इसकी अनिच्छा या असमर्थता. केंद्र की ये आदत रही है कि वो कश्मीर समस्या को कानून और व्यवस्था की समस्या की तरह देखता रहा है.
इसलिए जब श्रीनगर में सैलानियों की भीड़ उमड़ी और गृह मंत्रालय ने आंकड़ों पर नजर डाली तो उसने पाया कि हिंसा और घुसपैठ में कमी आ गई है, हिजबुल मुजाहिदीन का लगभग सफाया हो चुका है, राजनीतिक गतिविधियां बढ़ गई हैं और कश्मीरी आजादी को छोड़ पानी और बिजली जैसी चीजों के मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे हैं. सतही तौर पर दिख रही इस शांति को वो सामान्य हालात की बहाली समझकर एक अहम भूल कर बैठा. उसने जम्मू और कश्मीर को मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र या किसी दूसरे राज्य की श्रेणी में रख दिया. जब राज्य कैबिनेट ने भूमि हस्तांतरण का आदेश पारित किया तो उसने घाटी को हलके में लिया और जब आदेश वापस लिया गया तो उसने जम्मू के बारे में नहीं सोचा. , दोनों एक दूसरे के खिलाफ खड़े दिख रहे हैं तो इसकी वजह ये भी है कि उन्हें अब तक राज्य सरकारों से लेकर केंद्र तक सिर्फ खोखले वादे ही मिलते रहे हैं. एक के बाद एक राज्य सरकारें पंडितों को वादी में वापस लाने का वादा करती रहीं. पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने स्वायत्तता का वादा किया. देवेगौड़ा ने कहा कि आजादी के अलावा कुछ भी. साल भर पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी सीमाओं को अप्रासंगिक बनाने की बात कहकर यहां के लोगों की उम्मीदें बढ़ा दीं.आज जब राज्य में धधकती आग शांत होने का नाम नहीं ले रही तो केंद्र को समझ में ही नहीं आ रहा कि इसकी वजह क्या है. और इस बार तो उसके पास ये बहाना भी नहीं है कि ये आईएसआई की साजिश है. श्रीनगर की सड़कों पर जाइये और आप देखेंगे कि पाकिस्तानी झंडे लेकर प्रदर्शन कर रही भीड़ का एक बड़ा हिस्सा नई पीढ़ी से बना है. उसे देखकर ऐसा लगता है जैसे हिंसा, मौत और विनाश के बीच पली-बढ़ी इस पीढ़ी को किसी बात का डर नहीं. 1990 में आतंकवादी खुल्लमखुल्ला हथियार लहराया करते थे. आज छात्र हाथों में पत्थर लिए सीधे सेना के बंकरों तक पहुंच जाते हैं और कहते हैं, हमें मारो, हम शहीद बनना चाहते हैं.
क्या इसे जवानी के जोश में की गई बहादुरी कहा जाए? हो सकता है, मगर इस पर भी गौर कीजिए---90 के दशक में जब ये ज्वार शुरू हुआ था तब इसके प्रति लोगों में एक तरह की रूमानियत थी. वैसी रूमानियत जो किसी क्रांति की शुरुआत करने वाले लोगों में होती है. तब उन्हें ये अंदाजा नहीं था कि बगावत को कुचलने वाले उपाय कितने सख्त हो सकते हैं. आज के प्रदर्शनकारियों को सरकार की ताकत का पता है. आज की पीढ़ी हिंसा, विनाश और मौत के साये में बड़ी हुई है और उसे इनकी आदत हो गई है.
वादी में अब भी रह रहे पंडितों के साथ वक्त बिताइये तो आपको पता चलेगा कि वो इतने डरे हुए हैं कि जो काम उन्होंने 20 साल पहले नहीं किया उसे अब करने की सोच रहे हैं. जम्मू में रह रहे शरणार्थियों से पूछिए और वो कहते हैं कि बहुत हो चुका, अब जवाब देने का वक्त है. करीब दो दशक पहले कश्मीर में शौहरों के घर से निकलते वक्त बीवियां उनकी जेब में उनका नाम-पता लिखा एक कागज रख देती थीं. आज वही महिलाएं श्रीनगर की सड़कों पर निकल रहे जुलूस का हिस्सा हैं. 1990 की तरह ही अब मस्जिदों से जुलूस, ब्लैक आउट जैसे ऐलान होने लगे हैं.
लोगों के शब्दों पर गौर कीजिए और आपको महसूस होगा कि कई मायनों में हालात 90 के दशक के शुरुआती सालों से भी ज्यादा खराब हैं. जम्मू में हमें सुनने को मिला, सारे कश्मीरी आतंकवादी हैं. उधर कश्मीर में छोटा सा बच्चा कहता है, “जम्मू में भीड़ के लिए पानी की बौछार और हम कश्मीरियों के लिए गोलियां.” जिस राज्य को मैंने 1990 में कवर किया था उसमें सांप्रदायिकता की आग इतनी भयानक नहीं थी. जम्मू शहर या पूरी सबडिविजन में किसी भी मुसलमान पर हमला नहीं किया गया था. आज ये इलाका बारूद के ढेर पर बैठा है. संवेदनशील डोडा जिले के किश्तवाड़ में, जहां आबादी का अनुपात 52: 48 का है, आग लग चुकी है और जम्मू से सुरक्षा बलों को वहां भेजा जा रहा है.
मगर सवाल ये है कि सेना कब तक सरकार की टालमटोल वाली नीति से हो रहे नुकसान से निपटेगी? दोनों तरफ के व्यापारी अपनी रोजी-रोटी का बलिदान करने को तैयार हैं. जम्मू में वे ऐसा आस्था के नाम पर कर रहे हैं और कश्मीर में आजादी के नाम पर. अगर उमर अब्दुल्ला अपनी सांसदी छोड़ने की धमकी दे रहे हैं और महबूबा मुफ्ती प्रदर्शनकारियों पर सख्ती के विरोध में राज भवन तक मार्च कर रही हैं तो वे ऐसा कश्मीरी भावनाओं को ध्यान में रखकर कर रहे हैं. मगर इससे भी अहम बात ये है कि पहली बार राज्य में मुख्यधारा की पार्टियों का स्वर भी उसी हुर्रियत कांफ्रेस जैसा लग रहा है जिसे अलगाववादी कहलाए जाने में कोई दिक्कत नहीं है. मुख्यधारा की पार्टियों को हमेशा से श्रीनगर और दिल्ली के बीच का पुल समझ जाता रहा है. आज यही पार्टियां मुजफ्फराबाद चलो अभियान का हिस्सा हैं.
भले ही कुछ समय बाद हालात थोड़ा संभल जाएं मगर वे सुधर तब तक नहीं सकते जब तक केंद्र नींद से नहीं जागता और ये महसूस नहीं करता कि जवाब बंदूक की गोली से नहीं निकल सकता. ये बात आप सेना के उन कमांडरों से भी पूछ सकते हैं जो जवानों द्वारा अपने अधिकारियों की हत्या कर खुद को भी गोली से उडा़ देने की घटनाओं से चिंतित हैं. वे आपको बताएंगे कि वहां उन्हें दुश्मन की सेना के तौर पर देखा जाता है. 2000 के बाद से कभी ऐसा नहीं हुआ था कि छोटी सी भीड़ भी श्रीनगर में संयुक्त राष्ट्र के ऑफिस तक गई हो. जम्मू में भी कोई हड़ताल या बंद एक दिन से ज्यादा नहीं खिंचा. कश्मीर में हिंसा ने 1990 में जड़ें जमाई थीं. 2008 में इसने जम्मू को भी अपनी चपेट में ले लिया है. कल तक भारत पाकिस्तान के साथ शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा था. आज इसे जम्मू और कश्मीर के बीच शांति स्थापित करने की जरूरत है. जिन सीमाओं को अप्रासंगिक बनाए जाने की आवश्यकता है वे घर के भीतर ही खिंच गई हैं.
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सैयद अली शाह गिलानी, अध्यक्ष, हुर्रियत कॉंफ्रेंस |
पृथकतावादी
ये यात्रा का विरोध नहीं है। पांच लाख से ज्यादा यात्री इस साल यात्रा पर आए और एक भी आदमी को कोई नुकसान नहीं हुआ। कश्मीरियों ने उनके लिए लंगर आयोजित किए और आगे भी ऐसा करते रहेंगे। राज्यपाल एस के सिन्हा ने अपनी शक्तियों का ग़लत इस्तेमाल किया और ज़मीन को हस्तांतरित कर दिया। उन्होंने यात्रा की अवधि दो महीने तक बढ़ाकर एक और गलती की। पर्यावरण का क्या होगा? उत्तराखंड में भाजपा सरकार ने गंगोत्री जाने वाले पर्यटकों की संख्या एक दिन में 300 निर्धारित कर दी है। तो फिर यहां क्यों नहीं?
आज कश्मीरी युवा ये मानता है कि भारत उन्हें अपना गुलाम बनाकर रखना चाहता है। उन्हें लगता है कि सेना जबर्दस्ती उनकी ज़मीनें छीन लेगी। स्कूलों में वंदे मातरम की इजाजत है तो नमाज की छूट क्यों नहीं है? जम्मू-कश्मीर भारत का अविभाज्य हिस्सा नहीं है। लोग यहां स्वशासन की मांग कर रहे हैं, नेहरू ने इसका वादा किया था। आप चिल्लाते रहिए कश्मीर हमारा अविभाज्य हिस्सा है लेकिन एक बार सेना को यहां से हटा कर देखिए कितने लोग "हिंदुस्तान ज़िंदाबाद" का नारा लगाते हैं। हम भाजपा की तरह सांप्रदायिक नहीं हैं। हम अपनी जान पर खेल कर यात्रियों की रक्षा करेंगे। हम जम्मू-कश्मीर को बांटना नहीं चाहते। हम अपनी एकता को बनाए रखेंगे क्योंकि हिंदू हमारे भाई हैं। इसका सिर्फ एक ही हल है--हम एक खूबसूरत जेल में बंद हैं। कृपया हमें हमारी आज़ादी और स्वशासन का अधिकार दो। अगर लोग भारत के साथ रहने का फैसला करते हैं तो हम उसे स्वीकार करेंगे लेकिन पहले भारत को हमारे अधिकारों का सम्मान करना होगा।
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महबूबा मुफ्ती, अध्यक्ष पीडीपी |
अवसरवादी
हमें देश विरोधी दल के तौर पर पेश किया जा रहा है जबकि अकेले हम ही हैं जिन्होंने इस विवाद से हुए नुकसान की भरपाई करने की शुरुआत की है। मुफ्ती साहब के पास वो राजनीतिक समझ थी जिसके जरिए तीन साल पहले उन्होंने ज़मीन का हस्तांतरण रोक दिया था क्योंकि हमें पता था कि ये परमाणु बम की शक्ल ले लेगा। गुलाम नबी आज़ाद राज्यपाल सिन्हा की चाल में फंस गए और ज़मीन के हस्तांतरण के लिए दबाव में आ गए। ये बात सही है कि ज़मीन के हस्तांतरण के लिए हुई कैबिनेट की मीटिंग में पीडीपी के मंत्री भी शामिल थे, लेकिन तभी श्राइन बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अरुण कुमार ने एक ख़तरनाक खेल खेला। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने ये घोषणा कर दी कि श्राइन बोर्ड को दी गई 800 कनाल ज़मीन पर मुहैया होने वाली सुविधाएं स्थाई होंगी। उन्होंने हिंदू प्रदूषण और हज के दौरान होने वाले मुस्लिम प्रदूषण की चर्चा भी की। क्या कोई सरकारी अधिकारी बिना किसी ताकतवर राजनीतिक वरदहस्त के ऐसे बोल सकता है? दिल्ली समझ ही नहीं रही है कि ज़मीन का मुद्दा पहचान से जुड़ा है। हर कोई नंदीग्राम पर बोल रहा है, कश्मीर पर क्यों नहीं? पूरा देश 10 सदस्यों वाली श्राइन बोर्ड समिति का पक्ष ले रहा है। श्राइन बोर्ड जम्मू-कश्मीर या भारत से ऊपर नहीं है। आप जो देख रहे हैं वो आम लोगों का आंदोलन है आतंकवादियों का नहीं। तात्कालिक उपाय है मुजफ्फराबाद मार्ग को खोलना। अगर बाघा बॉर्डर के जरिए सामान आ-जा सकता है तो मुजफ्फराबाद से क्यों नहीं? और कृपया दिल्ली से कहिए कि वो मुशर्रफ के साझा नियंत्रण के प्रस्ताव पर विचार करे। आप इससे मुंह नहीं मोड़ सकते हैं।
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रतन चाकू, कश्मीरी पंडित, श्रीनगर |
पीड़ित
हम 90 के दशक में भी यहीं रहे लेकिन आज हमें रोना आता है। हमारे हिंदू भाई जो उस वक्त पलायन कर गए थे, अब हमारे ऊपर फब्तियां कसते हैं। वो हमसे कहते हैं कि हमने धर्म परिवर्तन कर लिया, हमने गाय का मांस खाना शुरू कर दिया है। पलायन के बाद एक साल तक हमने अपने कश्मीरी मुस्लिम पड़ोसियों के साथ कोई संबंध नहीं रखा लेकिन धीरे-धीरे रिश्ते फिर से कायम हो गए। जब हमने आज़ादी के नारे सुने तो डर के मारे दुबक गए। ये मेरी जन्मभूमि है। मैं यहां से जाना नहीं चाहता लेकिन मुझे ऐसा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। मुझे अपने राष्ट्रीय झंडे को जलते हुए देखकर बहुत दुख होता है। महबूबा मुफ्ती की पार्टी इसके लिए जिम्मेदार है। हम वन्य भूमि के हकदार क्यों नहीं है? यात्रियों को बेहतर सुविधाएं क्यों नहीं मिलनी चाहिए? क्या ये हमारा देश नहीं है? ये विवाद तो पांच महीने के अंदर हल हो सकता है सिर्फ नेता अपनी निगाहें वोट बैंक से हटा लें। आपको क्या लगता है कश्मीरी पाकिस्तान के साथ जाना चाहते हैं। कभी नहीं। कोई भी ऐसा नहीं करेगा। उन्हें जाने दीजिए उन्हें पता लग जाएगा कि कश्मीर की क्या अहमियत है। इससे पहले कि जम्मू और कश्मीर पूरी तरह से बंट जाए घाटी के पंडितों को अमरनाथ श्राइन बोर्ड का सदस्य बना दीजिए। इससे हमारे कश्मीरी भाई न तो असुरक्षा महसूस करेंगे और न ही ये सोचेंगे कि उनकी ज़मीन उनसे छीनी जा रही है।
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यूसुफ तारिगामी, सीपीएम विधायक |
सिर्फ तीन महीने पहले राजनीतिक सक्रियता पूरे चरम पर थी। अक्टूबर में होने वाले चुनावों में हिस्सा लेने के लिए तकरीबन हर सीट पर चार-चार उम्मीदवार नज़र आते थे। अब चुनाव पर ही सवालिया निशान लग गया है। हस्तांतरण के मुद्दे से ठीक से निपटा नहीं गया। कश्मीरी, सेना के जरिए भारतीय वर्चस्व से नाराज़ हैं तो जम्मूवासी महसूस करते हैं कि सिर्फ घाटी के नेताओं की ही सुनी जा रही है। मैं इसके लिए पूर्व राज्यपाल ले. जनरल सिन्हा को जिम्मेदार मानता हूं। 2003 में पद संभालते ही उन्होंने ज़िला मुख्यालयों का दौरा करना शुरू कर दिया। किसी राज्यपाल की ये जिम्मेदारी नहीं है। मैंने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिलकर इसकी शिकायत की और उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को भी पत्र लिखा। ऐसा क्यों है कि मुस्लिम वक्फ बोर्ड का अध्यक्ष एक मुस्लिम मुख्यमंत्री ही होगा या फिर अमरनाथ श्राइन बोर्ड का मुखिया एक हिंदू राज्यपाल ही होगा। इसकी क्या जरूरत है? सिन्हा ने ज़मीन हस्तांतरण करके बड़ी भूल की है। राज्य इस वक्त सिर्फ भौगोलिक आधार पर ही नहीं बल्कि धार्मिक आधार पर भी बंट गया है। 1990 में भी मुझे इतना डर नहीं लगा था लेकिन अब हालात बदतर हो गए हैं। इसका एक ही स्थाई समाधान है-- राज्य को अधिकतम स्वायत्तता दी जाए। ऐसी क्षेत्रीय परिषदें बनाई जाए जिनके पास संवैधानिक अधिकार हों।
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शिदान और सुनीता कौल, विस्थापित कश्मीरी पंडित |
शरणार्थी
घाटी में हमारा एक सुंदर सा घर हुआ करता था और मेरी पत्नी के मायके में सेब का एक बड़ा सा बगीचा था. लेकिन अब ये सब सिर्फ यादें हैं. आज हमें अपने बेटों के लिए 50 रुपये किलो के फल खरीदने पड़ते हैं. हम कैसे अपने कश्मीर को भूल जाएं? वो हमारा वतन, हमारी जन्मभूमि है. मेरी पोस्टिंग तब श्रीनगर के डाकघर में थी. लेकिन घाटी में आंदोलन के चलते मुझे अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ जम्मू आना पड़ा. वहां हम सीआरपीएफ की सुरक्षा में थे, लेकिन मुझे डाकघर से बाहर कदम रखते भी डर लगता था. 1990 में हमारे मोहल्ले में जगह-जगह पोस्टर लगा दिए गये जिनमें पंडितों को फौरन भाग जाने को कहा गया था. उस वक्त मुझे नहीं लगता था कि हम वहां से जिंदा भी बच पाएंगे क्योंकि माहौल में साम्प्रदायिकता घुल गई थी. मेरी बीबी तो अब भी घर के बारे में सोचती रहती है और अक्सर कहती है कि ‘कश्मीर तो जन्नत का नज़ारा था’. आप खुद सोचिए मेरे बच्चे वहां सिर्फ एक बार गए हैं और वो भी सैलानी बनकर. अब, आंदोलन पूरे जम्मू में फैल गया है और सब पूछ रहे हैं कि सरकार हमें भोलेनाथ की जमीन क्यों नहीं दे सकती? पर सच कहूं तो मैं अब इस सब से आजिज़ आ गया हूं, मैं अब शांति और सुरक्षा चाहता हूं. हम सब भाई हैं. सिर्फ बातचीत से ही इस मसले का हल निकाला जा सकता है. मेरा ये विश्वास है कि अगर दोनों पक्ष मिल बैठकर बात करेंगे तो हमें अमरनाथ की जमीन मिल जाएगी. उन (कश्मीरी) लोगों की भी समझ में आ जाएगा कि वहां कोई अमरनाथ नगर नहीं बसने जा रहा है. हम सिर्फ यात्रियों के लिए जगह चाहते हैं. हमें जमीन दे दो ताकि हम वहां से शांति के लिए प्रार्थना कर सकें, जम्मू और कश्मीर दोनों के लिए.
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प्रिंस खजूरिया, अमरनाथ यात्री |
तीर्थयात्री
मैं पिछले तीन सालों से अमरनाथ की यात्रा पर जा रहा हूं. मैं और मेरे दोस्त पहले भोलेनाथ के दर्शन और प्रार्थना करते हैं और फिर छुट्टियां मनाने गुलमर्ग चले जाते हैं. लेकिन पिछली बार की तरह इस बार मैं खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा था. हालांकि इसका अहसास हमें श्रीनगर पहुंचने के बाद ही हुआ जहां बहुत बड़ी भीड़ आंदोलन कर रही थी. यात्रा मार्ग में हमें कोई परेशानी नहीं हुई. कश्मीरी मुसलमान हमारी मदद कर रहे थे यहां तक कि वो बीमार यात्रियों को अपनी पीठ पर बैठाकर रास्तों में लगे मेडीकल कैंप तक भी ले जा रहे थे. वहां के सारे बचाव कार्य स्थानीय लोग ही कर रहे थे. श्रीनगर में एक टैक्सी ड्राइवर ने हमें कश्मीरी भाषा की एक-दो लाइनें भी सिखा दीं. जिससे हमें प्रदर्शनकारी हिंदू न समझें. ‘वारे छुक’, यानी ‘आप कैसे हैं?’ जब हम डल झील की हाऊसबोट में बैठे तो हमसे 2,000 रूपये मांगे गये, जबकि बाकी लोगों से वो 5000 रुपये मांग रहा था. जब हमने हाऊसबोट के मालिक से इसकी वजह पूछी तो उसने कहा कि वो लोग हिंदू हैं इसलिए हम उनसे ज्यादा पैसे मांगते हैं. जम्मू में हमारे मुसलमान दोस्त भी हैं लेकिन घाटी के मुसलमानों की तरह वो हमें सिर्फ हिंदू के रूप में नहीं देखते. अगर बात सिर्फ जमीन की ही होती तो हम कहते कि 800 कनाल में से 400 तुम ले लो और 400 हमें दे दो. लेकिन ये जम्मू के साथ होने वाले भेदभाव का मामला है. यहां तक कि जम्मू के नेता भी कश्मीर को ही वरीयता देते हैं. जम्मू में कहीं ज्यादा वोटर हैं लेकिन वहां सिर्फ 37 सीटें हैं और कश्मीर में 46 सीटें हैं. कश्मीर से तीन सांसद संसद पहुंचते हैं, जबकि हमारे यहां से सिर्फ दो. पिछले कैबिनेट में कश्मीर से 14 लोगों को मंत्री बनाया गया था जबकि जम्मू से सिर्फ पांच को. अगर इस आंदोलन को रोकना है तो इन सभी ग़लतियों को सुधारना होगा.
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फ़ारूख़ अब्दुल्लाह, नेता, नेशनल कॉन्फ्रेंस |
मध्यमार्गी
आज नई पीढ़ी सड़कों पर उतर आई है जिसे मौत का कोई डर नहीं है. जम्मू कश्मीर के बीच बढ़ती ये खाई बेहद खतरनाक है और इस उपमहाद्वीप को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. मैं पूछता हूं कि श्राइन बोर्ड के साथ खेलने की क्या जरूरत थी? अब अमरनाथ मुद्दा पीछे छूट गया है और जम्मू की उपेक्षा की बात हो रही है. आर्थिक नाकेबंदी की ख़बर ने कश्मीरियों के मन में ये भय पैदा कर दिया कि उनकी जीवनरेखा को ही बंद कर दिया गया है, और इसका नतीजा ‘मुजफ्फराबाद चलो’ जैसे आंदोलनों में दिखा. हालांकि हालात ऐसे थे कि अगर कोई आसान रास्ता अगर तिब्बत की तरफ भी जा रहा होता तो वो वहां भी चले जाते. मैंने राजनाथ सिंह और अरुण जेतली से विनती की है कि वो देशव्यापी आंदोलन न चलाएं वरना कश्मीर मुद्दे का फिर से अंतर्राष्ट्रीयकरण हो जाएगा. मैंने उनसे ये भी कहा कि इससे गुजरात जैसे हालात पैदा हो सकते हैं. मुझे इस बात का डर है कि इससे पूरे भारत के मुसलमान प्रभावित होंगे. पिछले 10 दिनों की यात्रा में केवल वही लोग श्रीनगर पहुंच सके हैं जो हवाई यात्रा का खर्च उठा सकते हैं. यहां तक कि 1990 में भी राजमार्ग की नाकेबंदी कभी नहीं हुई थी. श्राइन बोर्ड को एक्शन कमेटी से बात करने दीजिए. इस परेशानी का एकमात्र स्थाई समाधान है अधिकतम स्वायत्तता और केन्द्र को इसके लिए मजबूर किया जाएगा.
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ब्रिगेडियर सुचेत सिंह, अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति |
आंदोलनकारी
ये तो आस्था की बात है. हम सभी ने मिलकर एक प्रस्ताव पारित किया था कि यदि जम्मू के नेता विश्वास मत में गुलाम नबी आज़ाद का समर्थन करते हैं तो उनका बहिष्कार कर दिया जाएगा. अब जम्मू से नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस के नेता भी हमारे साथ है. यह जम्मू बनाम कश्मीर का आंदोलन नहीं है. हम आम कश्मीरियों के खिलाफ नहीं हैं. हम कश्मीरी नेताओं से बात नहीं कर सकते क्योंकि हमारी नज़र में वो अपराधी हैं. पूर्व राज्यपाल सिन्हा बार-बार श्राइन बोर्ड को जमीन दिये जाने की बात करते रहे, लेकिन सभी को सिर्फ कश्मीरियों की चिंता थी. कश्मीरी कह रहे हैं कि वो यात्रियों को सुविधाएं मुहैया कराते हैं. कृपा करके इसे दान जैसी चीज़ का चोला मत पहनाइए. यात्री टेंट और टट्टुओं के लिए रकम चुकाते हैं. ये एक जनआंदोलन है जो हर घर-मोहल्ले तक पहुंच चुका है. यहां तक कि अब अगर हम भी इसे रोकना चाहें तो रोक नहीं पाएंगे. इसका केवल एक ही समाधान है- श्राइन बोर्ड को जमीन वापस की जाए और राज्यपाल एनएन बोहरा को वापस बुलाया जाए. राज्यपाल ने चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष से हड़ताल की वजह से हुए आर्थिक नुकसान के बारे में पूछा तो उन्हें जवाब मिला- 183 करोड़ रुपये. उनका सुझाव था कि आंदोलन रुकना चाहिए लेकिन हमारा जवाब है—हमें अपना सम्मान वापस चाहिए उसके लिए चाहे 183 हजार करोड़ का नुकसान क्यों न हो जाए.














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Comments (6 posted):
Mudde to sare aa gaye lekin hal kese niklega???
Kya Jammu yo hi jalta rahega???
एक कहावत है..."लातो के भूत बातों से नहीं मानते" .जिस सख्ती से punjab मैं बगावत को कुचला गया है उसी तरह से कश्मीर में सख्ती बरतनी होगी.सच्चाई से नज़रें चुराते रहने ke कारण ही आज हमें यह मंज़र देखने पड़ रहे है की हमारे ताज कहे जाने वाले कश्मीर मैं पाकिस्तानी झंडे लहरा रहे है,,और भारतीय सैनिक हाथ बांधे खड़े तमाशा देख रहे है..क्या हम नपुंसक हो गए है???आधा कश्मीर तो पाकिस्तानियो को दे चुके है,अब भी होश नहीं आया हमारे नेताओं को???अपनी कड़वाहट में लिखी इस ग़ज़ल से बयान हो जायेगा....
धमाकों के तमाचों से आंखें तो खुली होंगी
गर अब भी न उठा हाथ तो यह बुजदिली होगी
है गफ़्लत कि उंघती सरकारें जागेंगी धमाकों के शोर से
सियासतदानों कि कुछ देर को महज कुर्सी हिली होगी
ज़ंग जरूरत है अमन कि हिफ़ज़त के लिये वरना
खिजा के साये तले सहमी चमन कि हर कली होगी
"सो सुनार कि तो एक लोहार कि" याद रहे "कुरील"
जब हम लेंगे हिसाब तो हर चोट कि वसूली होगी.
-मनोज कुरील
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