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त्रिशंकुओं की त्रासदी

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यूरोप में नौकरी और उसके बूते अपने परिवार की आर्थिक मुश्किलों को हल करने का ख्वाब लेकर घर से निकले दर्जनों भारतीय स्पेन के शहर स्यूटा के पास अधर में दिन बिता रहे हैं. मंजुला नारायण का लेख

स्पेन के शहर स्यूटा के पास की पहाड़ियों में बनी एक झोंपड़ी से 23 साल के गुरिंदर सिंह बाहर आते हैं. उनके हाथ में एक मुड़ी-तुड़ी रोटी है. इसके बाद वे सीधा कैमरे में देखते हुए कहते हैं, ‘मां, ये तुम्हारे हाथों से बने फुलकों जितने बढ़िया तो नहीं है मगर फिलहाल हमें इनसे ही काम चलाना पड़ रहा है.’ हजारों मील दूर, पंजाब के एक गांव में इस वीडियो को देखते हुए गुरिंदर की मां की आंखें छलक आती हैं. उन्होंने बेटे को आखिरी बार ढाई साल पहले तब देखा था जब वो हवाई जहाज से मोरक्को के लिए रवाना हुआ था. एजेंट्स ने गुरिंदर से वादा किया था कि उन्हें ब्रिटेन में नौकरी दिलवाई जाएगी. उन्हें मोरक्को होते हुए अपनी मंजिल पर पहुंचना था.

 ‘जरा सोचिए, इन भारतीयो को कैसा लगा होगा जब वो हवाई जहाज से उतरे होंगे और उन्हें हर तरफ अश्वेत लोग दिखाई दिए होंगे. पहले तो उनमें से कुछ ने सोचा कि यूरोप वैसा तो नहीं है जैसा हम सोच रहे थे.’मगर गुरिंदर का सफर बीच में ही अटक गया. अब वो मोरक्को और स्पेन की सीमा पर बसे शहर स्यूटा के पास स्थित जंगल में झोंपड़ी बनाकर रह रहे हैं. उनके साथ उन जैसे 57 भारतीय भी हैं. हालांकि गुरिंदर को इस लिहाज से थोड़ा खुशकिस्मत कहा जा सकता है कि वो सीधे मोरक्को से स्यूटा पहुंचे. उनके साथ रह रहे अधिकतर लोग ऐसे हैं जिन्हें यहां पहुंचने से पहले कई बार मौत को चकमा देना पड़ा, जिनका पासपोर्ट मानव तस्करों ने छीन लिया और जिन्हें स्यूटा पहुंचने से पहले एक छोटी सी वन में जानवरों की तरह लदकर कई अफ्रीकी देशों और सहारा रेगिस्तान के जोखिम भरे सफर से गुजरना पड़ा. जैसा कि अल्बटरे गार्सिया ओरित्ज कहते हैं, ‘जरा सोचिए, इन भारतीयो को कैसा लगा होगा जब वो हवाई जहाज से उतरे होंगे और उन्हें हर तरफ अश्वेत लोग दिखाई दिए होंगे. पहले तो उनमें से कुछ ने सोचा कि यूरोप वैसा तो नहीं है जैसा हम सोच रहे थे.’ 36 साल के अल्बटरे 28 वर्षीय अगाथा मासियाजेक के साथ त्रिशंकु की तरह लटके पंजाब के इन लोगों पर एक डॉक्यूमेंट्री बना रहे हैं. अल्बटरे बताते हैं कि सहारा रेगिस्तान को पार करते हुए कुछ नौजवान तो प्यास से मर गए. लगभग सभी समाजों में अंतिम संस्कार से जुड़ी प्रथाओं को बड़ा पवित्र माना जाता है और ऐसे में ये कल्पना की जा सकती है कि ऐसे लोगों पर क्या गुजरी होगी जिन्हें अपने साथियों के शवों को यूं ही रेत में फेंककर आगे बढ़ना पड़ा हो.

अल्बटरे को तब पहली बार इस तरह के लोगों के बारे में मालूम हुआ जब स्यूटा में 27 बांग्लादेशी अवैध अप्रवासियों के समर्थन में एक रैली निकाली गई. जैसा कि वो बताते हैं, ‘सबसे पहले यहां
 

अल्बटरे और अगाथा 

बांग्लादेशी आए. उनका पहुंचना भारतीयों से डेढ़ साल पहले हुआ था. एक दिन उन्हें पता चला कि बांग्लादेशी दूतावास से एक अधिकारी निगरानी कैंप का दौरा करने आ रहा है. पिछली बार जब ऐसा हुआ था तो 20 लोगों को वापस बांग्लादेश भेज दिया गया था. इन लोगों ने कैंप से भागने का फैसला किया और पहाड़ियों में रहने लगे.’ अल्बटरे बताते हैं कि बांग्लादेशी अप्रवासियों के समर्थन में राजनीतिक गतिविधियां तेज होने के बाद स्पेन की सरकार ने उन्हें अपने देश आने और वहां एक साल तक रहने की इजाजत दे दी. बांग्लादेशियों की इस सफलता ने भारतीयों को भी ऐसा ही करने की प्रेरणा दे दी और ये लोग भी कैंप से भागकर पहाड़ियों में रहने लगे. मगर बांग्लादेशियों को जहां ऐसा करने के साढ़े तीन महीने बाद ही स्पेन में प्रवेश की इजाजत मिल गई थी वहीं भारतीयों के लिए ये वक्त लगभग डेढ़ साल लंबा खिंच गया है. अगाथा कहती हैं, ‘स्पेन में अप्रवासियों से जुड़ी बहुत ही कहानियां हैं मगर ये बहुत खास है क्योंकि 57 लोगों के इतने लंबे वक्त तक पहाड़ियों पर फैले जंगल में रहने की घटना दुर्लभ ही होती है.’

अगाथा ये देखकर हैरान होती हैं कि बेहद मुश्किल हालात में जिंदगी बिताने के बावजूद ये लोग प्यार से मिल-जुलकर रहते हैं. वो कहती हैं, ‘ये समुदाय सात कैंपों में बंटा हुआ है. इनमें से हर एक लकड़ी और प्लास्टिक की शीट्स से बना हुआ है और इसकी बनावट और साज-सज्जा से उस देश की पहचान झलकती है जिसके बाशिंदे इसमें रहते हैं. ये सभी लोग मिल-जुलकर रहते और काम करते हैं. उन्हें नियमित नौकरी पर नहीं रखा जा सकता इसलिए वो शॉपिंग सेंटर्स पर लोगों की कार पार्क करने जैसे छोटे-मोटे काम करते हैं. टिप जमा कर ली जाती है जिससे सबका खर्चा चलता है. यहां तक कि खाना बनाने और जरूरी सामान खरीदने जसे घरेलू काम भी आपस में बंटे हुए हैं.’

अल्बटरे को ये भी आशा है कि भारत सरकार जबर्दस्ती उन्हें वापस लाने का बंदोबस्त नहीं करेगी. उम्मीद भरे लहजे में अगाथा कहती हैं, ‘हमारी फिल्म का आखिरी शॉट एक नाव का होगा जो उन्हें स्पेन की मुख्यभूमि की तरफ ले जा रही होगी.’

काम के अलावा ये लोग मन बहलाने के लिए कभी-कभार क्रिकेट जैसे खेलों का सहारा लेते हैं. और डॉक्यूमेंट्री की वीडियो क्लिप्स पर नजर डाली जाए तो उन्हें भांगड़े की धुन पर थिरकते भी देखा जा सकता है. समय बिताने के लिए ये कुछ गीत भी गाते नजर आते हैं जिनके बोल उन्होंने खुद लिखे हैं और जिनसे उनके सपनों के बिखरने की कहानी पता चलती है.

हालात कितने भी मुश्किल हों एक बात तो उन्होंने तय कर रखी है कि वो कभी भीख नहीं मांगेंगे. अल्बटरे कहते हैं, ‘उन्हें खुद पर काफी गर्व है. जब आपसे सब कुछ छीन लिया गया हो तो आपके पास सिर्फ एक ही चीज बचती है और वो है आपका आत्मसम्मान. उसे कोई नहीं छीन सकता.’ स्यूटा में इन भारतीयों की जिंदगी फिल्माने के बाद अल्बटरे और अगाथा के लिए स्वाभाविक रूप से अगला कदम था पंजाब में रह रहे उनके घरवालों तक पहुंचना. जैसा कि अल्बटरे बताते हैं, ‘हमने 13 लोगों के संदेश रिकॉर्ड किए और फिर उनके परिवारों से मुलाकात की.’ इन फिल्मकारों के लिए ये भावनात्मक रूप से झकझोर देने वाला अनुभव रहा. अल्बटरे बताते हैं, ‘अमरदीप नाम का एक युवा इस हद तक अवसाद से ग्रस्त था कि वो हफ्तों तक सो नहीं सका और आखिरकार उसे स्यूटा के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया. हमने वहां के मानसिक रोगी वार्ड में उसकी तस्वीरें फिल्माईं. पंजाब में रह रहे और आर्थिक संकट से गुजर रहे उसके मां-बाप को पता था कि वो परिवार के बारे में काफी चिंता करने वाला शख्स है. मगर उन्हें अंदाजा नहीं कि उनके बेटे की क्या हालत है.’

इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म का भारत वाला हिस्सा फिल्माने वाली कंपनी टीमवर्क के सूरज ढींगड़ा कहते हैं, ‘गांवों में जाने के बाद हमें पता चला कि कुछेक को छोड़ दें तो अधिकतर लड़के सिर्फ दसवीं पास हैं और उनसे कहा गया है कि उन्हें खेती से जुड़े कामों में नौकरी मिलेगी. ज्यादातर मामले ऐसे हैं जिनमें उनके परिवारों ने अपनी जमीन बेच दी है और मकान गिरवी रख रखा है. इनको झांसा देने वाले एजेंट्स ने इनसे वादा किया था कि यूरोप में नौकरी मिलने के बाद उनके परिवार की सारी तकलीफें खत्म हो जाएंगी.’

70 हजार की आबादी वाले स्यूटा का इतिहास बताता है कि पहले-पहल यहां स्थानीय लोग रहते थे जिन्हें बेर्बर कहा जाता था. उसके बाद ये अरबों के अधीन हुआ. फिर पुर्तगालियों ने इसे कब्जे में लिया और आखिर में 300 साल पहले ये स्पेन के हाथों में चला गया. एशिया जाने वाले व्यापारिक मार्ग के लिहाज से ये जगह हमेशा से बहुत अहम रही है. 1986 में जब स्पेन यूरोपीय समुदाय में शामिल हुआ तो उसने इस शहर की सीमा पर कंटीली बाड़ लगा दी. इसके पीछे उसका मकसद था खुद और यूरोप को तीसरी दुनिया के भूखे लोगों से बचाना. अल्बटरे कहते हैं, ‘स्यूटा से आप यूरोप की मुख्यभूमि देख सकते हैं. ये सिर्फ 14 किलोमीटर दूर है. इसलिए इन लोगों के लिए यूरोप बहुत पास होकर भी बहुत दूर है.’

अल्बटरे और अगाथा को विश्वास है कि इन लोगों की कहानी का अंत सुखद होगा और स्पेन की सरकार उन्हें अपने देश में आने की इजाजत दे देगी. अल्बटरे कहते हैं, ‘मुझे उम्मीद है कि ऐसा होगा क्योंकि जब उन्होंने आपकी जमीन पर ढ़ाई साल बिता लिए हैं तो आप उन्हें वापस नहीं भेज सकते.’ अल्बटरे को ये भी आशा है कि भारत सरकार जबर्दस्ती उन्हें वापस लाने का बंदोबस्त नहीं करेगी. उम्मीद भरे लहजे में अगाथा कहती हैं, ‘हमारी फिल्म का आखिरी शॉट एक नाव का होगा जो उन्हें स्पेन की मुख्यभूमि की तरफ ले जा रही होगी.’

लगता है उनकी उम्मीद जल्द पूरी हो जाएगी. कुछ ही दिन पहले भारत के अनुरोध पर स्पेन इन अप्रवासियों को अपने यहां प्रवेश की इजाजत और वर्क परमिट देने पर राजी हो गया है. उसकी शर्त ये है कि इन लोगों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होना चाहिए. यानी स्यूटा की पहाड़ियों में रह रहे भारतीयों और उनके सपनों के बीच का 14 किलोमीटर फासला अब खत्म होने ही वाला है.    

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