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दूर देस में मन को ठेस

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लगातार हमलों के शिकार होने के बावजूद आस्ट्रेलिया में पढ़ रहे भारतीय, पुलिस को इनकी सूचना क्यों नहीं देना चाहते? मेलबॉर्न से रोहित रेवो की रिपोर्ट

आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर हमले कोई नई बात नहीं है. ऐसा वहां पर पहले भी होता रहा है. दो साल पहले हमलों का शिकार हुए कुछ गुजराती छात्रों ने इसकी शिकायत गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से की थी. मोदी ने ये मामला विदेश मंत्रालय के सामने उठाया जिसकी सक्रियता के बाद आस्ट्रेलिया में पुलिस का एक विशेष कार्य बल बनाया गया. इसके अलावा न्यू साउथ वेल्स के पुलिस कमिश्नर किम मोरोनी ने सिडनी में भारतीय कौंसुल जनरल को लिखित में भी इस बात का भरोसा दिया कि वे ऐसी घटनाएं नहीं होने देंगे. इसके बाद जल्द ही भारत में अप्रवासी भारतीय मामलों के मंत्री वायलार रवि ने सिडनी का दौरा भी किया.

ये साफ है कि हालिया हमले इक्का-दुक्का घटनाएं नहीं हैं, खासकर विक्टोरिया में. इनमें से कई ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ लूटपाट कहकर खारिज नहीं किया जा सकता

इस तरह की प्रतिक्रिया पहले नहीं दिखाई देती थी इसलिए सरकार की उपेक्षा के चलते भारतीय ऐसे मामलों पर चुप्पी साध लिया करते थे. सालों की इस उदासीनता ने भारतीयों के डर और उनकी कुंठाओं को दबा कर रखा था. मगर सरकार के बदलते रुख और भारतीय छात्रों पर हो रहे हर हमले को मुस्तैदी के साथ रिपोर्ट करते मीडिया के चलते कुंठा का ये लावा फूट पड़ा है.

लंबी खामोशी और फिर अचानक इस विस्फोट के पीछे कई सालों का उबाल है. आस्ट्रेलिया में जो हो रहा है उसे समझने के लिए आपको ये समझना होगा कि भारत से यहां आने वाले लोगों के मन में क्या चल रहा होता है. आस्ट्रेलिया आए लोग बड़ी-बड़ी उम्मीदों, नौकरी की मारामारी, प्रतिस्पर्धा, अवैध गतिविधियों और असुरक्षा जैसी चीजों के बीच जिंदगी गुजारते हैं. यही वे चीजें हैं जिनके चलते नस्लीय हिंसा के शिकार छात्र पुलिस को तो दूर, देश में रह रहे अपने परिवार तक को ये बात नहीं बता पाते. इन दिनों सिंगापुर में रह रहे एक भारतीय ने मुझे बताया कि मेलबोर्न के पास मूराबिन नामक एक उपनगर में पढ़ाई के दौरान वह अपना खर्चा चलाने के लिए अखबार बांटने जैसे छोटे-मोटे काम किया करता था. एक सुबह चाकू लिए और नशे में चूर एक व्यक्ति ने उसे गालियां देकर अखबार और साइकिल उसके हवाले करने के लिए कहा. जब इस छात्र ने इनकार किया तो उसकी साइकिल उठाकर उस पर फेंक दी गई. जब पुलिस को फोन किया गया तो उसने हमलावर के खिलाफ कार्रवाई करने से इनकार कर दिया. इस घटना से बुरी तरह हिल गए छात्र ने आज तक अपने घरवालों से इसका जिक्र नहीं किया.

मार्च 2009 तक के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो आस्ट्रेलिया के शिक्षण संस्थानों में पढ़ रहे भारतीय छात्रों की कुल संख्या 68713 है. इनमें से 47 फीसद तो अकेले विक्टोरिया राज्य में ही हैं और इस तरह से देखा जाए तो राज्य में सबसे ज्यादा विदेशी छात्र भारत से आते हैं. छात्रों पर हो रहे हमलों का मामला मीडिया में उछलने के बाद विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने आस्ट्रेलिया को न सिर्फ भारतीय छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी याद दिलाई बल्कि हाल में हुए हमलों की जांच की मांग भी की है. मामले के सुर्खियों में आने के बाद आस्ट्रेलिया को अहसास हो रहा है कि इससे उसके दूसरे सबसे बड़े शिक्षा निर्यात बाजार पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है. मंदी के दौर में कोई भी देश ऐसा नहीं चाहेगा.

आईटी क्षेत्र में भारतीय बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं

इस मामले में भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया पिछले एक पखवाड़े में लगातार सख्त हुई है. हाल ही में खचाखच भरे एक संवाददाता सम्मेलन में आस्ट्रेलिया में भारत की राजदूत सुजाता सिंह ने कहा कि कुछ हमलों में नस्लीय भावना देखी जा सकता है. एक टीवी चैनल से बात करते हुए उनका कहना था, ‘मैं शरमन (हमले के बाद अस्पताल में भर्ती छात्र) से मिली थी. उसके पिता आंध्र प्रदेश के गरीब किसान हैं. आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उनकी क्या स्थिति होगी. इन हमलों के खिलाफ बहुत गुस्से और चिंता का माहौल है.’

उधर, आस्ट्रेलिया ने इस मामले में उम्मीद से तेज प्रतिक्रिया दिखाई. वहां के उप प्रधानमंत्री ने संसद में कहा कि उनकी सरकार विदेशी छात्रों और उनकी सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श करेगी. आस्ट्रेलियाई विदेश मंत्री स्टीफन स्मिथ ने भारतीय छात्रों के सामने आ रही समस्या की बात मानी और संबंधित अधिकारियों के साथ इस मामले पर काम करने का वादा किया. प्रधानमंत्री केविन रूड ने डा मनमोहन सिंह से बात कर उन्हें आश्वासन दिया कि आस्ट्रेलिया नस्लवादी देश नहीं है. आस्ट्रेलियाई सरकार में एशियाई मूल के पहले मंत्री पेन्नी वोंग ने दावा किया कि उनके देश में नस्लवाद कट्टर सोच वाले चंद लोगों तक ही सीमित है. मगर हमले अब भी जारी हैं और भारतीय छात्रों का असंतोष अब तरह-तरह की शक्लें अख्तियार कर रहा है - वे विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और अपनी सुरक्षा स्वयं करने के लिए तरह-तरह के उपाय भी कर रहे हैं.

पूर्व राजनयिक और सिडनी स्थित लोयी इंस्टीट्यूट में कार्यक्रम निदेशक रोरी मेडकॉफ कहते हैं, ‘विदेशी छात्रों से होने वाले वित्तीय फायदे को देखते हुए राज्य सरकारें कम से कम ये तो कर ही सकती हैं कि कुछ पुलिस दस्तों की व्यवस्था करें जिन्हें सिर्फ छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की ही जिम्मेदारी दी जाए. आस्ट्रेलियाई अधिकारियों के लिए भारतीय छात्रों की चिंताओं को खारिज कर देना बेवकूफी होगी. हर घटना की पूरी जांच होनी चाहिए, न सिर्फ दोषियों तक पहुंचने के लिए बल्कि इन घटनाओं का मकसद जानने के लिए भी.’ सिडनी इंस्टीट्यूट के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर गेराल्ड हेंडरसन ने वहां के जाने-माने अखबार सिडनी मॉर्निग हेराल्ड में लिखा कि पिछले छह महीनों के दौरान मेलबोर्न में हिंसा का शिकार हुए छात्रों की संख्या क्रोन्यूला नस्लवादी दंगों में गंभीर रूप से घायल हुए लोगों की संख्या से भी ज्यादा है.

इन छात्रों में से ज्यादातर कई घंटे ज्यादा काम करते हैं खासतौर पर देर रात तक. उनमें से कई सार्वजनिक परिवहन सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं. इससे शरारती तत्वों को उन्हें शिकार बनाने में आसानी होती हैइसके बावजूद पिछले पखवाड़े तक सार्वजनिक समाचार माध्यमों में इस मुद्दे की चर्चा न के बराबर रही. समाचार चैनल एबीसी के अहम कार्यक्रमों में भी इस मामले को दरकिनार कर दिया गया.

भारतीय छात्रों पर हो रहे इन हमलों के पीछे कुछ आम पूर्वाग्रह और वहां के मीडिया की बेरुखी भी है. एक तरफ गरीब भारतीय छात्रों को नीची नजर से देखा जाता है. दूसरी तरफ आईटी क्षेत्र में भारतीय बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं. उदाहरण के लिए सिडनी स्थित हैरिस पार्क को अब ऑस्ट्रेलिया में लिटिल इंडिया कहा जाता है. स्थानीय लोगों के मन में सुलग रही असंतोष की चिंगारी को मंदी की हवा ने और भी भड़का दिया है और शायद इसीलिए भारतीयों के खिलाफ हमले बढ़ने लगे हैं.

आंध्र प्रदेश के खम्मम से ताल्लुक रखने वाले श्रवण कुमार थीरथला पर कुछ लोगों ने नस्लवादी गालियां बकते हुए पेंचकस से हमला कर दिया. 25 साल के बलजिंदर सिंह को मेलबोर्न में चाकू घोंप दिया गया और इसी शहर में 21 साल के सौरभ शर्मा को एक चलती ट्रेन में पिटाई कर लूट लिया गया. सिडनी में हुई एक दूसरी घटना में राजेश कुमार के घर में एक पेट्रोल बम फेंक दिया गया. राजेश का 30 फीसदी शरीर झुलस गया और वे तीन दिन तक कोमा में रहे. उन्होंने अपनी पढ़ाई खत्म ही की थी और स्थायी नागरिकता का इंतजार कर रहे थे. हर बार हमले का तरीका एक जैसा ही रहा है. अराजक तत्वों के गैंग छात्रों से मोबाइल फोन और कैश छीन लेते हैं. इनमें से कुछ मामलों में मार-पीट और नस्लवादी गालियां भी देखने में आती हैं. कुछ छात्रों से बलपूर्वक उनके एटीएम का नंबर मांगा जाता है और फिर उनके खाते से समूची रकम निकाल ली जाती है.

फेडरेशन ऑफ इंडियन स्टूडेंट्स ऑफ ऑस्ट्रेलिया ने इन हमलों के विरोध में एक रैली आयोजित की थी. मेलबोर्न में आयोजित इस रैली को पुलिस के बल प्रयोग का शिकार होना पड़ा. मगर पुलिस के रुख के बारे में भी यहां रह रहे भारतीयों की राय अलग-अलग है. सिडनी में मशहूर कार्डियोलॉजिस्ट और भारतीय छात्रों से जुड़े मुद्दों पर बनी कम्युनिटी कमेटी के संयोजक यदु सिंह इस बात से इनकार करते हैं कि आस्ट्रेलियाई पुलिस नस्लवादी है. वे कहते हैं, ‘पुलिस के लिए हर छात्र को सुरक्षा देना मुमकिन नहीं है.’ दरअसल सिंह छात्रों की कई समस्याओं का ठीकरा यहां कुकुरमुत्तों की तरह उग आए निजी शिक्षण संस्थानों पर फोड़ते हैं. वे कहते हैं, ‘इन संस्थानों में पंजीकृत ज्यादातर छात्र कुकरी, हेयर ड्रेसिंग, सोशल वर्क आदि से जुड़े कोर्स कर रहे हैं. इनका आस्ट्रेलिया आने का एकमात्र मकसद ये है कि किसी भी तरह यहां की नागरिकता हासिल हो जाए. ये संस्थान शहर से दूर स्थित होते हैं और इनके नजदीक छात्रों का जमावड़ा अक्सर उन्हें एक आसान शिकार बना देता है. अक्सर ये छात्र आस्ट्रेलिया आने के लिए 20 से 30 लाख रुपए का कर्ज ले लेते हैं. जब वे स्थाई नागरिकता के लिए आवेदन करते हैं तो उन्हें एक पुलिस क्लियरेंस सर्टिफिकेट चाहिए होता है. अगर कोई उन पर हमला करता है तो वे उसका मुकाबला करने या इस घटना की रिपोर्ट करने में इसलिए हिचकिचाते हैं कि कहीं उनके सर्टिफिकेट पर कोई नकारात्मक टिप्पणी दर्ज न हो जाए.’

न्यू साउथ वेल्स में शिक्षा विभाग और कम्युनिटी रिलेशंस कमिश्नर द्वारा बनाए गए वर्किग ग्रुप का हिस्सा राज दत्ता कहते हैं, ‘इन छात्रों में से ज्यादातर कई घंटे ज्यादा काम करते हैं खासतौर पर देर रात तक. उनमें से कई सार्वजनिक परिवहन सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं. इससे शरारती तत्वों को उन्हें शिकार बनाने में आसानी होती है. इनमें से कई घटनाओं के बारे में पुलिस को नहीं बताया जाता है क्योंकि कुछ छात्र तय प्रावधानों से ज्यादा समय तक काम करते हैं. ये एक आम धारणा है कि घटना की रिपोर्ट करने से छात्र को किसी भी तरह का फायदा नहीं होगा. बल्कि ये भविष्य में और भी हमलों को न्यौता दे सकता है.’

छह महीने पहले सिडनी में सामुदायिक कल्याण का छात्र राहुल अरोड़ा अपने मोबाइल फोन पर बात करते टहल रहा था. दो लोगों ने उसका रास्ता रोक लिया और उस पर गालियों की बौछार करने लगे. राहुल भागने लगा तो दोनों ने उसका पीछा कर उसे पकड़ लिया. इसके बाद उन्होंने उसकी बुरी तरह पिटाई की और उसका फोन छीन लिया. अगले दिन वह पुलिस स्टेशन गया और इस घटना की रिपोर्ट दर्ज करवाई. मगर दो महीने बाद बिना किसी कार्रवाई के ये मामला बंद कर दिया गया.

भारत से ऑस्ट्रेलिया गए छात्र खर्च कम से कम रखने के लिए साथ-साथ बड़े-बड़े समूहों में रहते हैं. वे ज्यादातर स्थानीय कारोबारियों के लिए काम करते हैं और हर हफ्ते 20 घंटे की कानूनी सीमा से ऊपर काम करने के लिए उन्हें मेहनताना नकदी में मिलता है. बैंक उन पर भरोसा नहीं करते और क्रेडिट कार्ड के अभाव में उन्हें हर समय अपने साथ नकदी लेकर चलना पड़ता है. ज्यादातर छात्र देर रात घर लौटते हैं. उनके पास लैपटॉप जसे अत्याधुनिक उपकरण और नकदी उन्हें आसान शिकार बना देते हैं.

आस्ट्रेलिया इंडिया बिजनेस काउंसिल (एआईबीसी) आस्ट्रेलियाई और भारतीय कंपनियों के बीच गठजोड़ बनाने की कोशिश कर रही है. इसने एक शिक्षा शाखा भी बनाई है जो भारतीय छात्रों को आस्ट्रेलियाई समाज में और भी आसानी से घुलने-मिलने में मदद करती है. सांस्कृतिक फासले को दूर करने के लिए ये भारतीय छात्रों और विभिन्न आस्ट्रेलियाई संगठनों के साथ काम भी करती है. एआईबीसी के अध्यक्ष दिपेन रुघानी का कहते हैं, ‘ये साफ है कि हालिया हमले इक्का-दुक्का घटनाएं नहीं हैं, खासकर विक्टोरिया में. इनमें से कई ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ लूटपाट कहकर खारिज नहीं किया जा सकता. आस्ट्रेलिया की सरकार ने हालिया मामलों को बहुत गंभीरता से लिया है और वह ये सुनिश्चित करने की हरमुमकिन कोशिश कर रही है कि इससे दोनों देशों के संबंधों को कोई दीर्घकालिक नुकसान न हो. इस तरह की दुखद घटनाएं फिर से न हों इसके लिए एआईबीसी आस्ट्रेलिया की केंद्रीय और राज्य सरकारों के अलावा भारतीय दूतावास के साथ भी मिलकर काम कर रही है.’

हालांकि ऐसा सही मायने में तभी हो सकता है जब ऐसी घटनाओं में शामिल दोषियों का पता लगाकर उन्हें सख्त सजा दी जाए और इसके साथ ही बहुलतावादी कार्यसंस्कृति को बढ़ावा दिया जाए.

लेखक आस्ट्रेलिया स्थित पत्रकार हैं 

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