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जल्दबाजी के निष्कर्ष

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लालकृष्ण आडवाणी को चुका हुआ मान लेना ऐसा ही होगा जैसे कोई तर्क और विश्लेषण के बजाय ज्योतिष का सहारा लेने लग जाए

अनुमानों पर आधारित पूंजीवाद और चुनाव प्रचार, दोनों में ही एक ऐसा उत्साह देखने को मिलता है जिसकी कोई तर्कसंगत वजह नहीं होती. पिछले कुछ महीनों से, खासकर विश्वास मत पर यूपीए सरकार की जीत के बाद कांग्रेस ऐसी हवा बनाने में लगी है मानो उसके नेतृत्व में एक और इसी तरह की सरकार का आना पत्थर की लकीर हो. इसमें उसे मीडिया के एक धड़े जिसे पद्म मीडिया कहा जाना चाहिए, का भी पूरा सहयोग मिल रहा है. कांग्रेस के लिए संभावनाओं पर चर्चा हो रही है और एनडीए के बारे में कहा जा रहा है कि भीतर से बिखरते इस गठबंधन पर तीसरा मोर्चा भी भारी पड़ने वाला है. विजयवाद को नई ऊंचाइयों तक ले जाते हुए कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी तो यहां तक कह गए कि भारत में राजनीतिक परिदृश्य अब एकध्रुवीय हो गया है.

भाजपा ने अपरंपरागत इलाकों और उन जगहों, जहां पर ये अपने सहयोगी दलों के साथ छोटे सहयोगी की भूमिका में है, पर आधार गंवाया है तो दूसरी तरफ उसने परंपरागत इलाकों में अपनी पकड़ लगातार और भी मजबूत की है

प्रचार के इस खेल में फिलहाल एनडीए दूसरे नंबर पर है. दिसंबर 2008 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में मिली अप्रत्याशित हार के बाद ये सकते में आ गया था. फिर उड़ीसा में 11 साल पुराने सहयोगी नवीन पटनायक ने जब इससे रिश्ता तोड़ दिया तो इसे और झटका लगा. प्रचार के लिए दोस्ताना मीडिया का इस्तेमाल कर रही कांग्रेस ने कोशिश की कि पटनायक के जाने को इस तरह दिखाया जाए कि लगे जैसे ढह रहे एनडीए के ताबूत में ये आखिरी कील हो. वह इसमें सफल भी रही.

प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी यात्रा की शुरुआत से ही लालकृष्ण आडवाणी को बेवजह कम करके आंकने की कोशिशें हो रही है. नया-नया बना एक राजनीतिक गुट भी ये हवा बनाने की कोशिशों में जुटा है कि आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना बेहद कम है. ये बात सभी जानते हैं कि 2004 के बाद से ही भाजपा अंतर्कलह से घिरी रही है और अपरंपरागत इलाकों में इसका आधार घटा है. ऊपर से एनडीए के इस मुख्य घटक ने एआईएडीएमके, तेलुगू देशम पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और बीजू जनता दल जसे सहयोगियों को खोकर अपना और ज्यादा नुकसान किया है. इसके अलावा इसकी सबसे पुरानी सहयोगी शिवसेना भी इन दिनों शरद पवार से नजदीकियां बढ़ा रही है. उधर, ये भी संकेत मिल रहे हैं कि अगर भाजपा ने अपने घटे आधार की भरपाई नहीं की तो बिहार में अगले विधानसभा चुनावों से पहले नीतिश कुमार भी नवीन पटनायक की राह पकड़ सकते हैं.

विडंबना ये है कि एक तरफ भाजपा ने अपरंपरागत इलाकों और उन जगहों, जहां पर ये अपने सहयोगी दलों के साथ छोटे सहयोगी की भूमिका में है, पर आधार गंवाया है तो दूसरी तरफ उसने परंपरागत इलाकों में अपनी पकड़ लगातार और भी मजबूत की है. गुजरात और मध्य प्रदेश इसका उदाहरण हैं. साथ ही कर्नाटक में भी पहली बार पार्टी अपने बूते सरकार बनाने वाली शक्ति बनी है. उत्तर प्रदेश इस रुझान का अपवाद रहा है जहां 1999 में कल्याण सिंह के पहली बार भाजपा छोड़ के जाने के बाद पार्टी फिर उबर नहीं पाई.

आडवाणी प्रधानमंत्री बन पाएंगे या नहीं ये दो बातों पर निर्भर करता है. पहला ये कि भाजपा अपनी सत्ता वाले राज्यों और दिल्ली व राजस्थान, जहां ये मुख्य विपक्षी दल है, में कितनी सीटें जीतने में कामयाब होती है. अगर पार्टी यहां 90 सीटें भी जीत रही है तो यह सत्ता की दौड़ में है. दूसरा, पार्टी को उन राज्यों में कम से कम 60 सीटें जीतनी होंगी जहां ये एनडीए सहयोगियों के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ रही है. इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, असम और महाराष्ट्र हैं.

व्यावहारिक बुद्धि से देखा जाए तो इस बात की संभावना बहुत कम लगती है कि एनडीए या फिर यूपीए अपने बूते बहुमत के आंकड़े तक पहुंच पाएंगे. जो भी पार्टी सबसे ज्यादा सीटें जीतेगी वह मानसिक रूप से लाभ की स्थिति में होगी. इस मोर्चे पर फिलहाल कांग्रेस और भाजपा बराबर की टक्कर में हैं. सत्ता तक पहुंचने के लिए इनमें से एक को अपने प्रतिद्वंदी पर पर्याप्त बढ़त चाहिए होगी. अतिरिक्त लाभ की स्थिति में वह चुनावपूर्व गठबंधन भी होगा जिसने ज्यादा सीटें जीती होंगी.

आडवाणी की सबसे बड़ी ताकत ये है कि उनकी स्वीकार्यता उनकी पार्टी भाजपा से कहीं ज्यादा है. अटल बिहारी वाजपेयी में भी यही गुण था. हां ये बात अलग है कि उनके वक्त यानी 1998-99 के दौरान भाजपा की अपनी ताकत आज के मुकाबले कहीं ज्यादा थी. आडवाणी को चुनाव के बाद होने वाले गठबंधन पर भी निर्भर रहना होगा. एनडीए का एजेंडा जो कि भाजपा के चुनावी घोषणापत्र से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा, ऐसा बनाया जा रहा है कि इसकी स्वीकार्यता का दायरा ज्यादा से ज्यादा हो.

जिन गुटों पर एनडीए की नजर है उनमें एआएडीएमके, तेलुगू देशम पार्टी, बीजू जनता दल और बहुजन समाज पार्टी शामिल हैं. इनमें से तेलुगू देशम और बीजू जनता दल के किसी ऐसे गठबंधन में जाने की संभावना बहुत कम है जिसका नेतृत्व कांग्रेस कर रही हो.

आडवाणी के लिए हालात और भी अनुकूल हो सकते हैं अगर वाममोर्चा 2004 में जीती गई अपनी रिकॉर्डतोड़ सीटों के से घटकर 30 तक आ जाए. वाममोर्चे ने भाजपा विरोध को अपना एजेंडा बना लिया है मगर ये दूसरों से आडवाणी के पाले में न जाने के लिए वजनदार तरीके से तभी कह सकता है जब इसके पास खुद भी ताकत हो. अपने फायदे के अलावा छोटे दलों के पास अक्सर कोई खास विचारधारा नहीं होती और अगर वाममोर्चे की ताकत घटी तो वह फिर आडवाणी को नहीं रोक सकता.

फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता कि ऊंट किस करवट बैठेगा. इस मोड़ पर आडवाणी के राजनीतिक सफर को खत्म करार दे देने को विश्लेषण से ज्यादा ज्योतिष कहना उचित होगा. 

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