अमन की अज़ान
लगातार बढ़ती जा रहीं तरह-तरह की खाइयों के इस दौर में अमन और मजहबी भाईचारे का पैगाम लेकर जाती एक रेलगाड़ी. शोमा चौधरी की रिपोर्ट.
मुसलमानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता..मुसलमानों के लिए मजहब देश से बड़ा है..मुसलमान पाकिस्तान की जीत पर खुशी मनाते हैं..मुसलमान कट्टरपंथी होते हैं..मुसलमानों की कई बीवियां और बच्चे होते हैं..वो गंदे होते हैं..और सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं पर सारे आतंकवादी मुसलमान हैं.
ये वो जुमले हैं जो मुसलमानों के बारे में अक्सर सुनने को मिल जाते हैं. कभी किसी आम आदमी तो कभी किसी नेता की जुबान से. जो लोग इन जुमलों का इस्तेमाल करते हैं उनके दिल और दिमाग में ये इतने सख्त हो चुके हैं कि अक्सर इन पर सवाल नहीं उठते. किसी आम गैरमुस्लिम के लिए मुसलमान एक से लगने वाले खतरनाक लोग हैं. सफेद टोपी और लुंगी पहने ऐसे लोग जो शहरों में बसी सबसे तंग बस्तियों में रहते हैं. ऐसे लोग जिनके बारे में हमारी सोच निश्चित है और उससे ज्यादा हम कुछ भी जानना नहीं चाहते.
शायद इसीलिए जब मेरे परिवार को पता चलता है कि मैं 2000 उलेमाओं से भरी एक ट्रेन में यात्रा करने वाली हूं तो चिंता भरा एक सवाल पूछा जाता है, क्या? तुम 2000 उलेमाओं से भरी एक ट्रेन में अकेले हैदराबाद तक जा रही हो? 2000 मुसलमानों के बीच में अकेली औरत?
छह नवंबर 2008 को यात्रा शुरू होती है. देवबंद से हैदराबाद तक हजारों उलेमाओं का ये सफर उस छवि के खिलाफ एक अभियान है जो उनके समुदाय के ऊपर चस्पा की जा रही है. राष्ट्रीय एकता का पैगाम लेकर जा रही इस ट्रेन का नाम है शेख-उल-हिंद एक्सप्रेस अमन एकता कारवां स्पेशल ट्रेन. इसकी मंजिल हैदराबाद है जहां जमीयत-उलेमा-ए-हिंद की 29वीं बैठक में देश के कोने-कोने से 4000 दूसरे उलेमा आने वाले हैं.
आज के इस दौर में जब हर तरफ नफरत और बंटवारे की क्षुद्र राजनीति हो रही है तो वे फिर से अमन के बीज बोने की कोशिश कर रहे हैं.ये ट्रेन उस प्रक्रिया का हिस्सा है जो इस साल फरवरी में दारुल उलूम देवबंद के आतंकवाद के खिलाफ फतवा जारी करने के साथ शुरू हुई थी. अपनी तरह के पहले इस ऐतिहासिक फतवे को मिले अपार जनसमर्थन का सबूत था मई में दिल्ली के रामलीला मैदान में आतंकवाद के खिलाफ हुई रैली जिसमें लगभग तीन लाख मुसलमान जुटे थे. उस रैली में हर राज्य से आए उलेमा, शिया और सुन्नी प्रतिनिधि और जमीयत सहित तमाम दूसरे मुस्लिम संगठन भी मौजूद थे.
ट्रेन में सवार ये उलेमा भारत में इस्लाम का सबसे परंपरागत चेहरा हैं. आपसी भाईचारे और सहिष्णुता की जो फसल पिछले कुछ समय से मुरझाती दिख रही है उसमें ये फिर से जान फूंकना चाहते हैं. आज के इस दौर में जब हर तरफ नफरत और बंटवारे की क्षुद्र राजनीति हो रही है तो वे फिर से अमन के बीज बोने की कोशिश कर रहे हैं.
दोपहर के तीन बजे हैं. शेख-उल-हिंद एक्सप्रेस अभी-अभी निजामुद्दीन स्टेशन पर पहुंची है जहां सफेद कुरता और टोपी पहने सैकड़ों उलेमा इसका इंतजार कर रहे हैं. माहौल में खुशी भरा रोमांच है, शायद एक ऊंचे मकसद से साझ होने का. हो सकता है कि कल अपनी-अपनी जिंदगी के झमेलों के चलते ये रोमांच जाता रहे मगर आज तो इसकी मौजूदगी साफ महसूस की जा सकती है. ये देखकर हैरानी होती है कि ट्रेन में चढ़ने वालों की खासी भीड़ होने के बावजूद सब कुछ व्यवस्थित तरीके से होता है. दो हजार लोगों की मौजूदगी के बावजूद माहौल में कहीं से भी पुरुष आक्रामकता नहीं झलकती. न ही किसी बोगी में जरा भी ऊधमबाजी होती है.
शेख-उल-हिंद एक्सप्रेस का ये सफर मुङो खुद के भीतर के उन कई पूर्वाग्रहों से भी दो-चार कराता चलता है जिन्हें मैं अब तक पूर्वाग्रह मानती ही नहीं थी. ये बताता है कि हमारी जानकारी कितनी सीमित है और हम दूसरी संस्कृतियों के बारे में जानने की कितनी कम कोशिश करते हैं. ये सफर मुझे अहसास दिलाता है कि कितनी आसानी से हमारे दिमाग की खाली स्लेट को इस्तेमाल करके उस पर कुछ भी लिखा जा सकता है.
ट्रेन के स्टेशन से आगे बढ़ते ही फैजाबाद के मौलाना कलीमुल्ला खान मेरी मदद के लिए आगे आ जाते हैं. फैजाबाद में हीरा पब्लिक स्कूल के इस संस्थापक को आयोजकों ने मेरी टूटी-फूटी हिंदी और उलेमाओं की धाराप्रवाह उर्दू के बीच पुल का काम करने की जिम्मेदारी सौंपी है. ये पुल मुस्कराते हुए बिना थके अपनी जिम्मेदारी निभाता है.
बातों का सिलसिला शुरू होता है. आतंकी धमाकों, मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारी, तुष्टिकरण, आरक्षण, बराबरी के हक, सार कमेटी रिपोर्ट, भेदभाव, मुसलमानों की गलतियों, हिंदू अधिकारों, बाबरी मस्जिद विध्वंस, सिमी, हिंदू और मुस्लिम समाजों की अच्छाइयां, ओसामा बिन लादेन, सद्दाम हुसैन, पाकिस्तान, कश्मीर, कुरान में महिलाओं की स्थिति..हर मुद्दे पर चर्चा होती है.
मौलाना कलीमुल्ला खान बताते हैं कि अपने स्कूल को सीबीएसई से मान्यता दिलवाने में उन्हें कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. राज्यसभा सदस्य, जमीयत के सेक्रेटरी और आतंकवाद के खिलाफ इस अभियान में अहम भूमिका निभाने वाले मौलाना महमूद मदनी भी अपने अपमानजक अनुभव के बारे में बताते हैं. मदनी देहरादून में मुसलमान बच्चों के लिए सीबीएसई से मान्यता प्राप्त बोर्डिंग स्कूल खोलना चाहते थे. तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने उन्हें जमीन भी दे दी थी मगर बाद में सरकार ने उन्हें स्कूल बनाने से रोक दिया. उसे शक था कि मदनी वहां पर मदरसा खोलने जा रहे हैं और इससे भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए)की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है. एक उदास सी हंसी के साथ मदनी कहते हैं, ‘और वो कहते हैं कि राजनीतिक पार्टियां हमें खुश करने में लगी हैं. ये मेरे साथ हुआ, एक राज्य सभा सदस्य के साथ. आप अंदाजा लगा सकती हैं कि आम मुसलमान के साथ क्या होता होगा. आईएमए और मेरी जमीन के बीच की 12 किलोमीटर दूरी में दर्जनों इंस्टीट्यूट्स हैं, मगर शक सिर्फ हमीं पर था.
अगर जनसंख्या के इतने बड़े हिस्से को अलग-थलग रखा जाता रहेगा, अगर वो पिछड़ा रहेगा तो ये सिर्फ मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए नुकसानदेह होगा.’
मैंने शिक्षा मंत्री से कहा कि मदरसे खोलने के लिए मुङो उनकी इजाजत की जरूरत नहीं है. मैं यहीं बैठे-बैठे उन्हें अरुणाचल प्रदेश में शुरु कर सकता था. वे मदरसों पर इतना शोर मचाते हैं मगर दूसरी तरह के स्कूल खोलने भी नहीं देते. मुसलमानों को सुनियोजित व्यवस्था के तहत मुख्यधारा से दूर रखा जा रहा है. लोग ये नहीं समझते कि अगर जनसंख्या के इतने बड़े हिस्से को अलग-थलग रखा जाता रहेगा, अगर वो पिछड़ा रहेगा तो ये सिर्फ मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए नुकसानदेह होगा.’
जमात-ए-इस्लामी हिंद के सेक्रेटरी मोहम्मद रफीक खान कहते हैं, ‘सांप्रदायिक शक्तियां हम पर आतंकवाद और राष्ट्रविरोधी होने का आरोप लगाती हैं. मगर महात्मा गांधी को संघ के नाथूराम गोडसे ने मारा, इंदिरा गांधी अपने ही अंगरक्षकों के हाथों मारी गईं, राजीव गांधी की हत्या लिट्टे ने की. सुप्रीम कोर्ट से जिला अदालतों तक क्या कभी ऐसा हुआ है कि बार काउंसिल ने कहा हो कि कोई भी इन आरोपियों का वकील न बने? बल्कि इंदिरा गांधी के हत्यारों का केस तो राम जेठमलानी जसे जानेमाने वकील ने लड़ा. लेकिन आज गोरखपुर, बनारस, फैजाबाद और लखनऊ की बार काउंसिल कह रही है कि साबरमती अग्निकांड और संकटमोचन मंदिर धमाकों के आरोपी मुसलमानों की पैरवी कोई वकील नहीं करेगा. जबकि अभी तो उन पर आरोप लगे हैं. दूसरी तरफ विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और संघ ऐलान कर रहे हैं कि साध्वी प्रज्ञा को बचाने के लिए वे हरमुमिकन कोशिश करेंगे. ये भेदभाव क्यों? ठीक तरीके सिर्फ दो हैं-या तो आतंकवाद में शामिल किसी भी आरोपी को कोई कानूनी या वित्तीय मदद न दी जाए या फिर हरेक को दी जाए. राहुल राज की मौत के लिए रामविलास पासवान, नीतिश कुमार और लालू यादव जसे कट्टर प्रतिद्वंदी एक होकर प्रधानमंत्री से इस मामले की जांच की मांग करते हैं. मगर जब मुसलमान फर्जी मुठभेड़ों की जांच की मांग करते हैं तो वे गद्दार हो जाते हैं. इस तरह के नजरिए से तरक्की कैसे होगी? इससे तो देश बर्बादी की राह पर ही जाएगा. हम देश की कितनी ही तरक्की चाहते रहें पर ये तब तक नहीं हो सकती जब तक दिल मिलाकर ये नहीं समझते कि हिंदू हो या मुसलमान, दर्द दोनों को एक जैसा ही होता है.’
दो हफ्ते पहले तहलका के साथ साक्षात्कार में बजरंग दल के राष्ट्रीय संयोजक प्रकाश शर्मा ने दावा किया था कि जिन इलाकों में मुसलमानों का घनत्व बढ़ रहा है वहां से एक और बंटवारे की आवाज उठेगी. इस बारे में बात करने पर मौलाना रफीक पूछते हैं, ‘उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झरखंड, ग्रेटर नागालैंड, गोरखालैंड, तेलंगाना, लिट्टे की मांगें, उल्फा की मांगें, मराठी माणुष अभियान..इनमें से किस पृथकवादी अभियान की कमान किसी मुसलमान के हाथ में रही है?’
चर्चा के दौरान हालांकि मुस्लिम पर्सनल ला¬ और परदा प्रथा पर मुद्दों पर परंपरा से न हटने की जिद साफ झलकती है. मगर ये संस्कृति से जुड़े मामले हैं जिन पर समुदाय के भीतर से ही कोई फैसला हो सकता है. शायद इसमें कहीं न कहीं व्यवस्था, न्याय और नैतिकता के मामले में इस्लाम को सबसे बेहतर मानने की सोच भी छिपी हो सकती है. बहरहाल, इस तरह के मुद्दे ये जानने का जरिया भी हो सकते हैं कि कोई संस्कृति खुद को किस तरह से देखती है और इसके लिए किस चीज की अहमियत कितनी है. मगर चर्चा के दौरान ये भी साफ झलकता है कि ट्रेन में सवार ये लोग देश के प्रति वफादारी और सहिष्णुता के मामले में किसी से कमतर नहीं हैं.
हैदराबाद से दिल्ली लौटते हुए हवाई जहाज में बैठे बार-बार आग्रह करते हैं, ‘कृपा करके इंसाफ या मुस्लिम आरक्षण या फिर भेदभाव के इन मुद्दों को आतंक और सामाजिक बंटवारे के खिलाफ हमारे संदेश के साथ मत मिलाइए. ये अलग-अलग बातें हैं.’ जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना कारी उस्मान कहते हैं, ‘अगर हमारी मांगों पर ध्यान नहीं दिया जाता तो भी इस देश के नागरिक होने के नाते हम अपनी लड़ाई जारी रखेंगे मगर ये कानून और भारतीय संविधान के दायरे में ही होगी.’
ये उस भारतीय मुसलमान की आवाज है जिसे आम भारतीय गैरमुस्लिम पूरी तरह से भुला बैठा है. ये वो आवाज है जिसे मीडिया की सुर्खियां नहीं मिलतीं, जो क्रिया-प्रतिक्रिया के शोर और मुस्लिम और हिंदू कट्टपंथियों के टकराव में कहीं खो सी गई लगती है.
ये उस भारतीय मुसलमान की आवाज है जिसे आम भारतीय गैरमुस्लिम पूरी तरह से भुला बैठा है. ये वो आवाज है जिसे मीडिया की सुर्खियां नहीं मिलतीं
आतंकवाद के खिलाफ फतवा, रैलियां और अब ये अमन की रेल..इन सब अभियानों के पीछे जमीयत-उलेमा-ए-हिंद की अहम भूमिका रही है. देवबंद से तालीम हासिल किए हुए लोगों से बने इस संगठन के करीब एक करोड़ सदस्य हैं जो देश के कोने-कोने में स्कूल और मदरसे चलाते हैं. कम ही गैरमुस्लिम जानते होंगे कि 1919 में बने इस शक्तिशाली संगठन ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए सभी भारतीय मुसलमानों का आह्वान किया था. जब बंटवारे की बात होने लगी तो इसने तीखे तेवर दिखाते हुए पाकिस्तान के विचार का विरोध किया. यही नहीं इसने एक प्रस्ताव भी पास किया जिसमें ऐलान किया गया था कि मजहब के आधार पर अलग देश की मांग करना इस्लाम के आदर्शों के खिलाफ है और कुरान साफ तौर पर इसकी इजाजत नहीं देता. इसने धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में भारत की बुनियाद डालने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी.
इसके मूल्यों की झलक नौ नवंबर 2008 को आयोजित हुई इसकी आम सभा में दिख जाती है. हैदराबाद के निजाम ग्राउंड पर एक लाख मुसलमान पंक्तिबद्ध होकर बैठे हैं. एक के बाद एक उलेमा आकर माइक थामते हैं और श्रोताओं को एकता और सच्चाई की जिंदगी जीने का सबक याद दिलाते हैं. द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने इस आयोजन के लिए अपना संदेश भेजा है. दूसरी बातों के अलावा इसमें वो कहते हैं, हिंदू और मुसलमानों के बीच कोई टकराव नहीं हो सकता क्योंकि हिंदू धर्मग्रंथों में 5000 साल पहले हजरत मोहम्मद के आने की भविष्यवाणी कर दी गई थी. इसलिए मुसलमानों से ज्यादा पैगंबर शायद हिंदुओं को प्रिय होंगे. भीड़ में खुशी से अल्लाह हो अकबर का नारा गूंजने लगता है. श्री श्री रविशंकर सभी समुदायों के बीच अमन की बात करते हैं. थोड़ी-थोड़ी देर पर माहौल में एक गाना भी गूंजता रहता है जिसके बोल हैं—हम मुसलमान भारत के वफादार हैं. सभा के आखिर में सभी खड़े होते हैं और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में निष्ठावान बने रहने की कसम खाते हैं.
तय है कि आलोचक कहेंगे कि ये सब बचाव की मुद्रा में आ गए एक समुदाय का दिखावा है. अगर एक पल के लिए इसे सच भी मान लिया जाए तो भी हमें याद रखना चाहिए कि पूरी तरह से घिर जाने की हालत में दो तरह की प्रतिक्रियाएं होती हैं. या तो घिरने वाला किसी ऊंचे मकसद की तरफ कदम बढ़ा सकता है या फिर उसका जवाब गुस्से और अराजकता के रूप में सामने आ सकता है.
यहां साफ है कि शेख-उल-हिंद एक्सप्रेस पहले वाली दिशा में जा रही है.





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मैं भी एक टीवी पत्रकार हूँ, 13 साल से। जो बात आप इतनी आसानी से कह गईं उसे मुस्लिम पत्रकार भी कहने से घबराता है, मगर मैं नहीं। शक और नफ़रत के घिनौवने माहौल में इस हसीन पहल को NDTV के अलावा किसी टीवी चैनल ने कवर नहीं किया, लेकिन मैंने 1 प्रोग्राम बनाया। उर्दू चैनलों ने इसलिए चलाया क्योंकि ये तो माना ही जाता है कि उर्दू मुसलमानों की ज़बान है। ख़ैर...
बात आम लोगों और सियासत तक ही हो तो कोई बात नहीं। मीडिया हाउस तक में लोग नस्ली फ़ब्तियों के शिकार होते हैं और ये जानते हैं इसका जवाब नहीं होता, ये समझ का फेर है, जिसे लौटाना होगा।
अच्छा लगा पढ़कर। खोल से बाहर आने को कोई तैयार नहीं। बहुत मुश्किल है। भरोसा बढ़ाना होगा। ख़ुदा हमारी उम्मीदों को बर लाए।
अल्लाह हाफ़िज़।
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