तहलका हिन्दी: 'जब तक किस्सागोई है, किताबें लिखीं और पढ़ी जाएंगी' 'जब तक किस्सागोई है, किताबें लिखीं और पढ़ी जाएंगी' ================================================================================ Sanjay Dubey on 03/02/2010 10:11:00 आपकी मनपसंद लेखन शैली क्या है? ऐसी कोई भी शैली जिसमें भाषा के प्रयोग का आनंद हो, किस्सागोई हो, कुछ टेढ़ी, महीन बुनावट की कसरत हो, सघन भाव संसार हो. फिर वह चाहे रेणु की शैली हो या पामुक की. इन दिनों क्या लिख-पढ़ रही हैं? उम्बेर्तो इको की बौदोलिनो, रेणु की परती परिकथा फिर से, बोर्खेज की बुक ऑफ सैंड, बीच-बीच में साईनाथ की एवरी वन लव्स अ गुड ड्रॉट और नैयर मसूद की कहानियां. अंग्रेजी में एक उपन्यास पर काम करने का इरादा है. कोई महत्वपूर्ण रचना जो अलक्षित रह गई. बहुत हैं. साहित्य समाज के जोड़-तोड़ ऐसे गूढ़ रहस्य हों, ऐसा तो नहीं है, फिर किन रचनाओं को रेखांकित किया जाए और किन्हें गुमनामी अंधेरों मे ठेल दिया जाये उनका उस रचना की विशिष्टता से बहुधा कोई सीधा तार नहीं भी होता है. रचना जिसे बेमतलब की शोहरत मिली. पीली छतरी वाली लड़की. रचना या लेखक जो आपके बेहद करीब हों? परती परिकथा, आधा गांव, गर्दिशे रंगे चमन, सांन्ग लाईंस, इस्ट ऑफ ईडेन, इस्तांबुल, अ टेल ऑफ लव ऐंड डार्कनेस, जुलूस, मित्नो मरजानी, लाल टीन की छत, कहा पाऊ उसे, काला जल. किताबें पढ़ने की परंपरा बनी रहे, इसके लिए क्या किया जा सकता है? जब तक किस्सागोई है, किताबें लिखीं जाएंगी और फिर पढ़ी भी जाएंगी. शायद ये समझना ज्यादा जरूरी है कि किताबें अन्य दृश्य या श्रव्य माध्यमों को रिप्लेस नहीं करेंगी या इसका उल्टा, बल्कि सब विधाएं अपनी अपनी जगह बनाए रखेंगी, उनकी अपनी अहमियत होगी. आजकल कितनी किताबें छपती हैं, ये आंकड़े मेरी बात को ज्यादा सही तरीके से साबित करेंगे. आज के बाजारवादी समय में प्रकाशक घाटे का सौदा तो नहीं करते होंगे. गौरव सोलंकी