तहलका हिन्दी: अब पुल की क्या जरूरत? अब पुल की क्या जरूरत? ================================================================================ Sanjay Dubey on 30/07/2008 22:13:00 ये तहलका-फुलका कोना रोज़मर्रा की पत्रकारिता से इतर तहलकाइयों की कोमल-कठोर, छुपी-उघड़ी हर तरह की भावनाओं को ज़ुबान देने का प्रयास है... अपना काम निकलते ही भगवान राम ने रामसेतु तोड़ दिया था। बनाने का मकसद था माता सीता को पापी, खलकामी रावण के चंगुल से मुक्त कराना। वो महान कार्य संपन्न हुआ तो फिर पुल की क्या जरूरत। रावण को परास्त करने के बाद ज्ञानी, गुणीजनों की सभा में भगवान राम को एक सुर से शायद यही राय दी गई थी। माता सीता को वापस पाने के बाद ऋक्षराज, वानरराज और तमाम विद्वानों की सभा में अयोध्या वापसी का महत्वपूर्ण मुद्दा किनारे करके पहले पुल पर बहसी बहसा शुरू हो गई थी और अंतत: निष्कर्ष ये निकला कि पुल को तोड़ दिया जाय और ये शुभ कार्य भगवान श्रीराम स्वयं अपने हाथों अंजाम दें। वैसे भी राक्षसों की धरती का पवित्र आर्यावर्त की माटी से जुड़ना भविष्य के लिहाज से कोई अच्छी बात नहीं हैं। सतयुग का काल था। सब के सब दूरदर्शी हो लिए थे। सभा के गुणीजनों का एक मत से फैसला था राक्षसों की धरती लंका अगर सूर्यवंश की धरती से जुड़ी रही तो भविष्य में आर्य कन्याओं पर हमेशा खतरा बना रहेगा। इन राक्षसों का क्या भरोसा। उनका कोई ईमान धर्म तो है नहीं, बार बार हमारी पावनी कन्याओं को ही उड़ा ले जाएंगे। कौन बार बार इनसे लड़ाई लड़ेगा। इतनी दूर कौन आएगा? इसलिए पुल तोड़ना ज्यादा बेहतर रहेगा। रही बात पुष्पक विमान की तो इसे भगवान श्री राम चंद्र अपने साथ अयोध्या लेकर चले जाएंगे। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। कोई राक्षस लाख चाहकर भी इधर से उधर नहीं आ पाएगा। मुसीबत आने की तीसरी राह जलमार्ग हो सकती है पर भारतीय उपमहाद्वीप में इसकी संभावना नगण्य है क्योंकि हिंदू शास्त्रों के मुताबिक सागर की यात्रा महापाप है। जिसको धर्म, करम, ईमान से जाना हो वो समुद्र में उतरे—ऐसी मान्यता है। सागर यात्रा के नाम पर बस थोड़ी सी छूट है गंगा सागर यात्रा की वो भी बस एक बार—सारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार। तो इस तरह से तमाम मुसीबतें हल हो जाएंगी किसी तरह की विदेश नीति का संकट भी नहीं खड़ा होगा। तो कुल मिला कर निष्कर्ष यही निकला कि पुल का मकसद पूर्ण हुआ, अब अगर ये रहेगा तो भविष्य में, कलियुग में दोनों देशों के बीच मुसीबत ही पैदा करेगा। तब इतने शुद्ध समझदार लोग तो होंगे नहीं। लिहाजा सभा ने ध्वनिमत से फैसला दिया कि पुल को भगवान श्रीराम के कर कमलों से तोड़ दिया जाए। पर जाने कहां भगवान से भी चूक हो गई। पुल तोड़ने की बात कम्बन रामायण, स्कंद पुराण में दी गई पर पुल का अस्तित्व फिर भी कायम है। ये सारी बातें कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र देकर भगवान राम के आस्तित्व को नकार चुकी यूपीए सरकार ने एक नए शपथपत्र में कही है। इसलिए अगर उपरोक्त किसी बात से आपको आपत्ति हो तो बरास्ता सर्वोच्च न्यायलय आप सरकार से पूछताछ कर सकते हैं। अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं है। आपकी सुविधा के लिए सूचना के अधिकार का क़ानून भी है। अतुल चौरसिया इस वर्ग की सभी रचनाएं