सम्पादकीय
सही है जो, क्यों न हो
जीवित रहने के लिए हर समाज को खुश रहने और भूलते रहने की आवश्यकता होती है. हल्की-फुल्की बेवकूफियां और स्मृतिलोप न हों तो जीवन एक
कितनी लंबी यात्रा
हर तरह के संघर्षों के बावजूद सरोकारी पत्रकारिता का एक विचार आज भी सांसें ले रहा है...कृतज्ञता और आक्रोश
नेताओं और सैन्य अधिकारियों के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वाले ऑपरेशन वेस्ट एंड की सबसे भारी कीमत जिन्हें चुकानी पड़ी उनका इस ऑपरेशन से कोई लेना-देना ही नहीं था...छाया वीर
इतिहास आखिरकार मनमोहन सिंह का फैसला इस आधार पर नहीं करेगा कि वे क्या थे और उन्होंने क्या किया बल्कि ये फैसला इस आधार पर होगा कि उनके जाने के बाद क्या हालात उभरे...जाग स्वयं में लीन कुलीन
ये समझने का वक्त आ गया है कि हर समाज के केंद्र में इसकी राजनीति होती है. अगर राजनीति घटिया दर्जे की होगी तो सामाजिक हालात के बढ़िया होने की उम्मीद करना बेमानी है....कब जागेंगे हम?
जब पिछली बार हमने सत्ता के गलियारों को हिलाने की हिमाकत की थी तो हमें तीन साल तक दहकते अंगारों पर चलने का अभिशाप दिया गया....- 'आप’ का क्या होगा?
- चिह्न पर प्रश्नचिह्न
- हरेक बात पे कहते हो तुम कि...
- ह्त्याग्रही गांधी!
- तो हमें तुम्हारी जरूरत ही क्या है मौलाना?
The article shows deliberate intent of the writer to attain 'fake greatness' by irrelevent analysis of occurances.
इस आलेख को पढ़ने के बाद मैंने तुरंत ही इसे अपने बुकमार्क सूचि में शामिल कर लिया।
संजय कुमार
सुरुचिपूर्ण, व्यवस्थित और ज्ञानवर्धक आलेख है।
सर, मैं आपके इस लेख की प्रशंसा किन शब्दों में करूँ, समझ में नहीं आ रहा है।
नए लेखकों के ...
संघ परिवार की गर्भनाल से बंधी भाजपा और अपने स्वार्थ की नाल लेकर भाजपा से बंधे वरुण गांधी से आप उम्मीद भी क्या कर सकते ...
एफएसएल के अतिरिक्त एनडीटीवी ने भी वरुण के भड़काऊ भाषणों वाली सीडी की जांच अमेरिका की एक स्वतंत्र फोरेंसिक लैब 'डिजिटल एविडेंस लीगल वीडियो सर्विसेज' ...


