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कब जागेंगे हम?

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जब पिछली बार हमने सत्ता के गलियारों को हिलाने की हिमाकत की थी तो हमें तीन साल तक दहकते अंगारों पर चलने का अभिशाप दिया गया. रक्षा सौदों में भष्टाचार की पोल खोलने वाला ऑपरेशन वेस्ट एंड मार्च 2001 में प्रसारित हुआ था. इसके फौरन बाद दो चीजें हुईं. पहला हमें लंबे समय तक लोगों की अपार सराहना और उनका प्यार मिला. दूसरा, हमारे काम और जिंदगी पर एक अनैतिक और असंवैधानिक हमला बोला गया. ये भी लंबे समय तक नहीं रूका—तब तक जब तक सरकार का सारा गोला-बारूद खत्म नहीं हो गया.

छह साल पहले उस वक्त हम पर एक के बाद एक कई आरोप लगाए गए. कुछ ने कहा कि हम कांग्रेस के लिए काम करते हैं. कइयों के लिए हम दाऊद के आदमी थे. कुछ का कहना था कि हमारे पीछे हिंदुजा का पैसा लगा है. कोई हमें आईएसआई से जोड़ रहा था जिसका मकसद हमारे जरिये शेयर बाजार को औंधे मुंह गिराना था. कहा जा रहा था कि इस काम के लिए हमें करोड़ों रुपये मिले हैं. यही नरेंद्र मोदी उस समय बीजेपी के महासचिव हुआ करते थे. मुझे वह टीवी इंटरव्यू नहीं भूलता जिसमें मोदी और मैं दोनों फोन पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे और मोदी चिल्लाचिल्लाकर हमारे खिलाफ झूठ उगल रहे थे. एक दिन बाद ही वह मेरे बारे में दस तथ्यों से भरा एक पर्चा भी छापने वाले थे. मुझे वह टीवी इंटरव्यू नहीं भूलता जिसमें मोदी और मैं दोनों फोन पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे और मोदी चिल्लाचिल्लाकर हमारे खिलाफ झूठ उगल रहे थे. एक दिन बाद ही वह मेरे बारे में दस तथ्यों से भरा एक पर्चा छापने वाले थे.

इनमें पहला और सबसे अहम तथ्य ये था कि मैं एक कांट्रेक्टर का बेटा हूं जो कि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अर्जुन सिंह के करीबी सहयोगी थे.

हमारे ख़िलाफ़ उछाला गया हर आरोप दिल्ली के संभ्रांत हलकों में न केवल चटखारे लगाकर सुना-सुनाया गया बल्कि एक कान से दूसरे कान तक जाने की प्रक्रिया में इसमें कई और स्वाद भी जोड़े गए. यहां तक कि दोस्तों और जानने वालों ने भी दबी जबान में बातें कीं. ये वे लोग थे जिन्होंने किसी को बिना फायदे के कभी कुछ करते हुए नहीं देखा था. उनके लिए ये मानना सही भी था कि हम भला उनसे क्योंकर अलग होंगे. और अब जब सरकार हमारे शिकार पर निकल ही चुकी थी तो सच का सामने आना बस कुछ वक्त का ही खेल था. इतना सब कहने के बाद मिलने पर हमारी तरफ एक जुमला उछाल दिया जाता कि आपने असाधारण काम किया...ऐसा काम जो न सिर्फ जरूरी था बल्कि बहुत साहसिक भी.

हकीकत ये है कि-

-मैं कभी भी किसी हिंदुजा से नहीं मिला था

-मैंने स्टॉक मार्केट में एक शेयर की भी खरीद-फरोख्त नहीं की थी.

-मेरा कांग्रेस से कभी भी कोई लेनादेना नहीं रहा. मैं तो राजनीति कवर करने वाला पत्रकार तक नहीं था. रिकार्ड के लिए बता दूं कि तहलका शायद भारत में अकेली ऐसी कंपनी होगी जिसके खिलाफ तीन सीबीआई केस चल रहे हैं. ये तीनों केस एनडीए सरकार के वक्त दर्ज किए गए थे और यूपीए के सत्ता में आने के बाद भी जारी हैं. हमें जमानत लेने के लिए नियमित रूप से कोर्ट के चक्कर काटने पड़ते हैं.

-हमारे पास कभी भी काले धन की एक पाई तक नहीं रही. अगर ऐसा होता तो हर घड़ी हमारे पीछे लगी रही एजेंसियां हमें कब का जेल में ठूंस देतीं. आखिर में ऐसा वक्त आया जब इस कंपनी में काम करने वाले लोग 120 से घटकर सिर्फ चार रह गए. साउथ एक्सटेंशन के पीछे एक किराए के कमरे में हमारा ऑफिस चल रहा था. कानूनी और जिंदगी के तमाम पचड़ों से लड़ने के लिए हम पर दसियों लाख रुपये उधार चढ़ चुके थे जो हम अब तक चुका रहे हैं. गंभीर आरोप लगने पर चिल्लाचोट की रणनीति भले ही चतुर लेकिन निंदनीय राजनीतिक दांव हो लेकिन भारतीय संभ्रांत वर्ग की साजिश ढूंढने का शगल समझ से परे है. इससे केवल खुद के बारे में सोचने वाली संस्कृति की बू आती है जहां कोई जनहित कोई मकसद ही नहीं होता.

-और हां, अंडरवर्ल्ड को झटका देने वाले क्रिकेट मैच फिक्सिंग के खुलासे के बावजूद हमसे से कोई दाऊद इब्राहिम या किसी और भाई से कभी नहीं मिला था.

मेरे पिता को तो छोड़िये मैं भी उस समय तक अर्जुन सिंह से कभी नहीं मिला था. कांट्रेक्टर होने की बजाय मेरे पिता की जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा भारतीय सेना में गुजरा था. इस दौरान उन्होंने 1965 और 1971 में पाकिस्तान से हुए दोनों युद्ध भी लड़े. फिर भी मोदी ने सार्वजनिक मंच पर ये और ऐसे दूसरे कई सफेद झूठ बोलने से पहले कुछ नहीं सोचा और सेंसेक्स से भी ज्यादा चकरायमान मीडिया ने इसके पीछे के सच को बाहर लाने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं समझी.

झूठ के पीछे के सच को अगर बाहर न लाया जाए तो झूठ खतरनाक आकार ले लेता है. सच्चाई का चेहरा विकृत हो जाता है और अराजकता घर करने लगती है. पुरानी कहावत है कि झूठ को अगर लगातार और कई तरीकों से फैलाया जाता है तो वह सच बन जाता है या फ़िर कम से कम सच को डुबो तो देता ही है. इसका उदाहरण तब देखने को मिला जब 1984 में सिक्खों की गर्दनें तलवारों पर रखी गईं. और हमने ऐसा होते 2002 में भी देखा जब गुजरात को दूषित भावनाओं के साथ गलत जानकारी की आड़ में आग के हवाले कर दिया गया. कुछ मौकों पर मीडिया ने सच की पड़ताल कर उसे दिखाया भी. लेकिन तब तक सच का महत्व ही खत्म हो चुका था. सच से बेनकाब होते लोगों की रणनीति इतना शोर मचाने की थी कि उसमें सब कुछ डूब जाए—अच्छा, बुरा, सच, झूठ सब कुछ. हमारी इस तहकीकात पर उनका शोर है कि आपने गोधरा के बारे में तो कुछ कहा ही नहीं. जबकि सच ये है कि इस अंक के 30 पन्ने गोधरा की तहकीकात को ही समर्पित हैं.

गंभीर आरोप लगने पर चिल्लाचोट की रणनीति भले ही चतुर लेकिन निंदनीय राजनीतिक दांव हो लेकिन भारतीय संभ्रांत वर्ग की साजिश ढूंढने का शगल समझ से परे है. इससे केवल खुद के बारे में सोचने वाली संस्कृति की बू आती है जहां कोई जनहित कोई मकसद ही नहीं होता. पिछले कुछ सालों में मुझे कई बार ये अजीब और कड़वा अनुभव हुआ है जब लोगों को मैंने मेधा पाटकर और अरुंधती रॉय जैसे जनता के लिए लड़ने वाले लोगों पर पैसे के लिए काम करने का आरोप लगाते देखा है. किसी की राय से सहमत न होना अलग बात है. लेकिन खुद ही ये मान लेना कि आम लोगों के मुद्दों को उठाने वाले लोग भष्ट्र हैं, हमारे बारे में कई गंभीर पहलुओं की पोल खोलता है. इस विकृति का कुछ लेना-देना हमारी गुलामी के समय से भी है--वह दौर जब हम ईर्ष्या, चालाकी, साजिश, चुगली या धोखा, किसी भी तरह से गोरे मालिकों को खुश करने के लिए बैचैन रहते थे.

इस बार जब हमने 2002 के गुजरात नरसंहार के पीछे छिपे सच का खुलासा किया तो साजिश ढूंढने वालों ने नई ऊंचाइयां नाप लीं. बीजेपी ने हम पर कांग्रेस के लिए काम करने का आरोप लगाते हुए हमला किया. उधर, कांग्रेस का कहना था कि हम बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं. इससे साफ था कि हम किसी सही काम को ही अंजाम दे रहे थे. इस सबके बीच भारत के विचार के लिए लड़ने का काम लालू यादव, मायावती और वामदलों पर छोड़ दिया गया. हालांकि आदर्श भारत का ये विचार कभी कांग्रेस के पुरोधाओं द्वारा रचा गया था लेकिन आज की कांग्रेस से जुड़े दिग्गज शायद इसका मतलब भी भूल चुके हैं. अगर सीआईआई को थोड़ी भी बदहजमी हो जाए तो प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर देता है. और अगर इस बदहजमी पर वह एक सेमिनार भी करना चाहे तो प्रधानमंत्री उसमें मुख्य वक्ता के रूप में फौरन पहुंच जाते हैं.

ये भी अपने आप में असाधारण बात है कि गुजरात नरसंहार के खुलासे को कई दिन होने को आए लेकिन अब तक इस पर न तो प्रधानमंत्री ने ही कोई बयान दिया और न ही गृहमंत्री ने. पत्रकारिता के इतिहास में पहली बार सामूहिक हत्याकांड करने वाले कैमरे पर खुद बता रहे थे कि उन्होंने कैसे मारा, क्यों मारा और किसकी इजाजत से मारा. ये कोई छोटे-मोटे अपराधी नहीं थे. ये विचारधारा में अंधे वे उन्मादी लोग थे जो उस खतरनाक दरार की सच्चाई का खुलासा कर रहे थे जिसमें इस देश के टुकड़े करने की क्षमता है. लेकिन रेसकोर्स रोड में बैठे भद्रजनों के लिए ये काफी नहीं था. अगर सीआईआई को थोड़ी भी बदहजमी हो जाए तो प्रधानमंत्री कार्यालय इस पर तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर देता है. और अगर इस बदहजमी पर वह एक सेमिनार भी करना चाहे तो प्रधानमंत्री उसमें मुख्य वक्ता के रूप में फौरन पहुंच जाते हैं.

प्रधानमंत्री को भी कोसने का क्या फायदा. उनके पास जिम्मेदारी तो है पर शक्तियां नहीं. बेईमानी के पहाड़ की चोटी पर बैठा ईमानदार व्यक्ति. कांग्रेस के उन बड़े रणनीतिकारों पर नजर डालते हैं जो खुद तो कोई चुनाव नहीं जीत सकते मगर कईयों को चुनाव जितवाने के रहस्य जानते हैं. उनके हिसाब से देखा जाए तो हत्याओं और बलात्कारों में मोदी की भूमिका का पर्दाफाश इस तरह से डिजाइन किया गया था कि गुजराती हिंदू को ये यकीन हो जाए कि मोदी ही उनके लिए आदर्श नेतृत्व हैं. उन्हें यह नहीं सूझा कि हिंसा के इन सबूतों को वे मोदी के खिलाफ एक हिला देने वाली सार्थक बहस शुरू करने के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

वास्तविकता ये है कि कांग्रेस को आज कुछ ऐसे छुटभैये रणनीतिकार चला रहे हैं जो ये भूल चुके हैं कि सही कदम उठाना क्या होता है. उनके पास न तो इतिहास के अनुभवों का प्रकाश है और न ही भविष्य के लिए दृष्टि. वे यह देख पाने में असमर्थ हैं कि एक जमाने में महान विभूतियों ने धर्म, जाति, भाषा, नस्ल आदि जैसी खाइयों को पाटते हुए इस देश के विचार को शक्ल दी थी. मूर्खतापूर्ण तरीके से वे अब इन्हीं दरारों को फिर से उभार रहे हैं. वे उन संकटों को देख पाने में असमर्थ हैं जो इसके परिणामस्वरूप सामने आएंगे. उन्हें ये नहीं पता कि राजनीति में नैतिकता को हथियार कैसे बनाया जा सकता है और उनमें नैतिकता के रास्ते पर चलने की हिम्मत भी नहीं है. ये लोग और कुछ नहीं ज्यादा से ज्यादा बस चुनावों में वोटों की तिकड़म भिड़ाने वाले एकाउंटेंट हैं जो चुनावी लाभ और हानि के बीच झूला झूलते रहते हैं.

आज की कांग्रेस उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्र में निष्ठा रखने वाले उस भारतीय को निराश करती है जिसे भारत की आत्मा की रक्षा करने को एक राजनीतिक छाते की आवश्यकता है. सही बातें न कहकर, सही कदम न उठाकर ये उस उदार भारतीय को कमजोर करती है जिसकी विवादों में कोई रुचि नहीं और जो अपनी अच्छाई की स्वीकृति चाहता है. इससे पैदा हुए खाली स्थान पर जहरीली और विकृत विचारधाराएं काबिज हो जाती हैं.

और ये सब तब हो रहा है जब भारतीय कुलीन वर्ग ऐसा व्यवहार कर रहा है जैसा कि 1920 में चमक-दमक और शैंपेन की खुमारी में डूबा अमेरिकी कुलीन वर्ग किया करता था जबकि पैरों के नीचे की जमीन बड़ी तेज़ी से दरकती जा रही है. ताजा आंकड़े बताते हैं कि पांच मुख्य राज्यों में गरीबी से बदहाल लोगों की संख्या बढ़ रही है. भारत के 30 फीसदी जिलों में घनघोर दरिद्रता से उठता नक्सलवाद बढ़ता रहा है. आखिर कब तक आकंठ पैसे में डूबे हुए और भूख से मर रहे लोग बगैर टकराव के साथ-साथ रह सकते हैं. सच्चाई ये है कि भारत को सिर्फ आर्थिक सुधारों की नहीं बल्कि राजनीतिक दूरदृष्टि की भी जरूरत है जिसका कहीं अता-पता नहीं. गुजरात के प्रति हमारी बेपरवाही बताती है कि दुनिया के इस सबसे जटिल लोकतंत्र के सामने अब तक की सबसे पेचीदा चुनौती मुंह बाए खड़ी है.

तरुण तेजपाल

(कुछ ही दिनों में तहलका की हिंदी पत्रिका पाठकों के सामने होगी जिसमें तरुण तेजपाल सीधे आपसे संवाद करेंगे. यदि आपके मन में तरुण के लिए कोई सवाल हो तो आप इसे hindi@tehelka.com पर ई मेल कर सकते हैं या नीचे लिखे पते पर भेज सकते हैं. )

तहलका, एम-76, एम ब्लॉक मार्केट, ग्रेटर कैलाश-2, नई दिल्ली-110048

Comments (118 posted)

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Abhishek Shah 30/04/2012 13:34:06
Mr. Tejpal, First of all i would like to thank you for putting your all efforts together.. There are very few reporters left in India who are independent and can deliver the truth without fear...

I can only imagine what you have gone through these years and it horrify's my soul but also give the strength that if your motive if clear and you have enough guts then you can bring the truth from the invisible to visible.

I would like to congratulate you and express my gratitude towards your magnificent work. There is one saying, "Ek aadmi bahaut hota hein sach ko sach sabit karne ke liye". You proved the lines correct...

I only wish that we have many more courageous reporters like you.... There is one more saying which is very significant in your case.... You can deliver in the context of what your caliber is, for what you have made off… and you are made of solid rock soul with the vision to change the perception of a common man… who does not know that facts which trades behind the walls of dark politics….

And to say that you are a very high Caliber man... So always think that you are a exception in a billion people who can bring the light on the path as always.....

I would be glad if I can contribute in any way by doing anything to bring the truth into public podium...

"Kaash woh (politicians, Policy makers) jan pate ke yeh jahan unka bhi hein, jinhe woh bech rahe hein woh sar zameen unki bhi hein, agar jag gaye hote pehle to andhera aur na gaherata, aur unko sar na chupana hota...
Ab bhi apne man ko tatolta hu mein aur hamesha kehta hu mein.... sone ki chidiya fir aayeg.... Is andhere ke baad ek sunhari subha fir aayegi... fir aayegi... fir aayegi....

My e-mail address is Abhishek_29@hotmail.com and contact # is 09227462206.
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yugal 20/03/2012 13:57:27
india needs political reform a powerful election commission first.as politicians our MP n MLA are also public servant salary n pension have been paid to them.than why two sets of rule.same rules should be implemented if a politician found involve in corruption.without political reform economic reform are meaning less.who will monitor when the the apex lavel is corrupt.
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नरेंद्र तोमर 04/02/2012 13:39:30
आज के इस बेहद निराश और हताश तक करने वाले राजनीतिक और सामाजिक माहोल में आप का यह कथन बिलकुल सही है,''आज की कांग्रेस उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतंत्र में निष्ठा रखने वाले उस भारतीय को निराश करती है ...'' धर्मांध और कटटरतावादी ताकतों और पूंजी के नए गंठजोड तथा दूसरी ओर बामपंथी ताकतों के लगातार कमजोर होते जाने के चलते स्थिति और भी गंभीर हो चली है। इसके अलावा जनतंत्र (पढ‍िये भरतीय पूंजीवाद का )चौथा स्‍तंभ ज्‍यादा से ज्‍यादा पैसा कमाने के चक्‍कर में बेलगाम होकर हर तरह की घोर प्रतिगामी ताकतों और विचारों का पोषण कर रहा है। ऐसे में हम साधारण लोग आपके प्रयासों से काफी उम्‍मीद रखते है।
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dr ajay 22/12/2011 03:59:27
hame ye pata kaise chale ki kaun such bol raha hai aap ya wo jinke bare me aap likh rahe hai
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dr ajay 22/12/2011 03:58:04
hame ye kaise pata chale ki jo aap likh rahe hai wo sahi hai ya jinke bare me likh rahe hai wo log sahi . ek aam aadmi ko kya pata ki kaun sahi bol raha hai. ans. pls.
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R.P.Pandey 27/11/2011 06:41:36
ham sab jaage hue log hai,koi saaf niyat se jagaane wala nahi mil rahaa hai
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Chen 25/11/2011 02:37:40
Pretty section! I'm so happy to find this post, it's very useful. I've got information about the same that you can search at www.pdfpal.org. Enjoy reading :)

Chen
www.pdfpal.org
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suneel joshi 21/10/2011 07:44:03
Tarun g,
dausa rajasthan me aapki patrika nahi aati,pl. do the needful
suneel joshi,
09414242133
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Sandesh Jain 20/10/2011 05:04:04
Tarun sir,

BEST SELF DEFENCE IS FIRST ATTACK. Modi follow the same.

Sach ko Man ke ander rakhege to kisi ko pata nahi chalega... lakin zuth chiilla chilla ker logo ko bayan karenge to log zuth ko bhi sach hi man lete hain.

some times we should foolow the same .
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To expose corruption in defense deals with Operation West End was aired in March 2001. Soon after, there were two things.
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how to get your ex back fast 12/08/2011 01:57:35
When we wake up ? It is a big questions for the all people for the india.Here I found your blog to be quite interesting. I am almost excited with all the content of your site.I really do enjoy this great website and your article was just wonderful.
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manoj saxena 31/07/2011 08:08:07
the world is like this that it creates problem for good persons 'ancho ko bura sabit karna duniya ki purani adaat hai' but remember god is with good people
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Mohd. Rafiq chauhan 27/07/2011 12:28:37
जकात, फितरा व सदका

हमारे देश में लगभग 18 से 20 करोड़ मुस्लमानों की आबादी है और हर साल गरीब हो या अमीर, वो ईद की नमाज अदा करने से पहले अढ़ाई किलो गेंहू के बराबर का पैसा बतौर फितरे के रुप में और ऐसे लोगों को अदा करता है जो कभी उसका हिसाब उन लोगों को नहीं देते जिनसे उन्होंने फितरा व जकात के रुप में पैसा उगाया है। किसी को कोई पता नहीं कि यह रकम कहां खर्च होती है। इसका इस्तमाल जायज कामों पर खर्च किया जाता है या नाजायज काम पर। जिसका आकलन अरबों रुपयों में है। इसलिए हरियाणा मुस्लिम खिदमत सभा का विचार है कि इस रकम के लिए एक ऐसा कोष बनाया जाए। जो इस्लामिक शरीयत के अनुसार उन लोगों पर खर्च किया जाए। जो इसके असली हकदार हैं। इसलिए हरियाणा मुस्लिम खिदमत सभा का विचार है कि जकात, फितरा व सदका का एक ऐसा कोष स्थापित किया जाए। जिसमें जकात, फितरा व सदका इक्ठा किया जाए और असली जरुरतमंद और इस्लामिक शरीयत के अनुसार इसका प्रयोग किया जाए। बरा-ए-मेहरबानी अपने विचार निम्नलिखित ईमेल पर लिखें। या अधिक जानकारी के लिए निम्न नम्बरों पर सम्पर्क करें।

Mohd. Rafiq Chauhan

State Chief co-ordinator

Haryana Muslim Khidmat Sabha

Mob: +91-9416097234, +91-9729258554

Email: 786hmks@gmail.com

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Mohd. Rafiq Chauhan 18/06/2011 20:35:07
Respected Sir ,
Namskar
"Can you do something for Muslims backwardness"
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Mohd. Rafiq Chauhan 18/06/2011 20:28:34
क्या बदलेगा मुस्लिम समाज

क्या बदलेगा मुस्लिम समाज, वो समाज कभी नहीं बदल सकता। जिसमें बदलें की चाह और अहसास ही ना हो। बड़ी मशहुर कहावत है। कि " सो ते को तो जगाया जा सकता है, लेकिन जो जागता हो उससे कैसे जगाया जा सकता है" मुस्लिम समाज के दीनी रहनुमाओं ने मुस्लमानों को कुछ ऐसा ही बना दिया है। उन्हें मौत के बाद की जिन्दगी के सब्ज बाग दिखाकर, उनकी मौजुदा जिन्दगी का ही नक्शा बदल दिया है। उन्हें मौत के बाद मिलने वाली पाक साफ बीबियों की तो फिकर है, मगर वो मौजुदा बीबियों के हलात से बे-खबर हैं। वो मौत के बाद मिलने वाली असल जिन्दगी के चक्कर में, अपनी मौजुदा जिन्दगी को जहनुम बनाने में लगे हुए है। वो सबाब कमाने के चक्कर में, विकास को भूल रहे हैं। यदि कोई उनसे पुछे कि नबी-ए-करीम हजरत मोहम्मद (सलव) ने एक उम्मी (अनपढ़) होते हुए इल्म यानि शिक्षा के महत्व को कितना समझते थे। आपने फरमाया था- कि आपको शिक्षा यानि तालीम पाने के लिए चाहे चीन क्यों न जाने पढ़े। कुरआन-पाक और हजुर-ए-पाक ने यह कभी नहीं फरमाया कि मुस्लमान डाक्टर, इंजीनियर, वकील, प्रोफसर, वैज्ञानिक इत्यादि न बन सकता। लेकिन वो बनेगे कब जब उनको ऐसा करने के लिए प्रेरित किया जाऐगा और वातावरण बनाया जाए। वो कौन कर सकते हैं वो डाक्टर, इंजीनियर, वकील, प्रोफसर, वैज्ञानिक और उसकी अमियत समझने वाले या फिर सही मायनो में मुस्लिम कौम के दर्द को समझने वाला। कोई और दुसरा नहीं।

मो. रफीक चौहान (एडवोकेट)
मुख्य प्रदेश संयोजक
हरियाणा मुस्लिम खिदमत सभा
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akash 29/05/2011 07:06:56
kab jaagene hum ?..
tarun ji... is neend se, aankh to sab khol chuke hai.
parantu, "pahle me hi kyu ya muje kya lena hai is se.." bus.. shayed yahi sochker bister nahi chhodna chahte...
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Bablu 28/02/2011 19:18:32
Sir Aapko salaam karte hain. Aap Ham jaise Patrakaronke Aadarsh ho. Gaddar netaonko Sabak sikhane k liye, aur Bhrashtachar ke khilaf aapke sath ham naujawan patrakar nayi kranti ko taiyar hain. Jay Bharat.
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ajay 24/02/2011 19:32:48
tarun ji
mai ap ki bhvana ki kadr karta hu ku ki ap jashe log kam hi hai bharat me lakin choti si bat ko apetne labe shyam tak logo ke bich rak kar shan bhuit na batore balki kuch naya de aj brastachra charm per hai kaya ap ke pash esh vishya ke liya kuch tarakik shamachar de. kripya kar ke kuch new thalka machay
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shailendra hazari 22/02/2011 21:30:46
why don't you explode M.P,where Govt. Dept. & politicians eat the state like anything, this is a under developed state & badly need a real reformar....if u step in u got tremandous response.....for sure...
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kulbir singh 16/02/2011 20:23:40
tarun ji this is our india we are with u and make india power full and anticurruption country
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