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बॉलीवुड के दस सांचे

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‘दस कहानियां’ बनाने वाले और ‘दस बहाने’ गाने वाले बॉलीवुड के ‘दस’ से लगाव को समर्पित, इसके दस मसालेदार सांचों के दोहराव, बदलाव और फिर दोहराव का विश्लेषण कर रहे हैं गौरव सोलंकी, चित्र सज्जा सुदीप चौधरी

इस कहानी के सभी पात्न एवं घटनाएं काल्पनिक हैं. यदि इनका किसी जीवित या मृत व्यक्ति या वस्तु से कोई सम्बन्ध पाया जाता है तो इसे मात्न संयोग ही कहा जाएगा. फिल्म के आरंभ में दिखाई जाने वाली इन पंक्तियों का बॉलीवुड ने शपथ की तरह हमेशा पालन किया. बॉलीवुड ने हमें ऐसी सुखांत झूठी कहानियां दिखाईं जो सपनीली दुनिया की बातों जैसी थी. हमने ऐसे नायक देखे, जो असाधारण रूप से चमत्कारी, सौम्य और संस्कारित थे. हमें सुन्दर, बेवकूफ और चरित्रवान नायिकाओं की आदत हो गई. बॉलीवुड ने हमें रोमांटिक गाने और क्रूर खलनायक दिए. बॉलीवुड ने हमें प्रेम-कहानियों को ही कहानी समझना सिखाया. बॉलीवुड ने हमें त्यौहार मनाने सिखाए और करवाचौथ तथा वेलेंटाइन डे को लोकप्रिय बनाया. बॉलीवुड की मांओं ने हमारी मांओं को ज्यादा भावुक बना दिया और हमारे पिताओं को ज्यादा कठोर.

'एक फिल्मकार ऐसे सपने बुनता है, जिनसे रात काटना आसान हो जाता है. वह घोर अंधेरे की कोख में रोशनी की कल्पना करता है'                               

महेश भट्ट

बॉलीवुड ने हर किरदार से लेकर हर रिश्ते तक के अपने ही सांचे गढ़े और उन्हें बार-बार दोहराता रहा. ‘नया दौर’ से लेकर ‘लगान’ तक हमारी सांसें उन्हीं कहानियों पर थमती-दौड़ती रहीं, जिनके सुखद अंत हमें मालूम थे. हम घोड़ों पर आने वाले डाकुओं की कहानियां देखकर सिहरे और बीसियों गोली खाकर बच गए हीरो को देख खुशी से चिल्लाए भी. ‘रामायण’ के हनुमान ने अपने सीने में श्रीराम को दिखाया और ‘नमक हलाल’ के अमिताभ ने स्मिता को, और हमने दोनों बार विश्वास किया और खुश हुए. महेश भट्ट कहते हैं, ‘एक फिल्मकार ऐसे सपने बुनता है, जिनसे रात काटना आसान हो जाता है. वह घोर अंधेरे की कोख में रोशनी की कल्पना करता है. वह किसी नशे की गोली बेचने वाले या धर्मगुरु से अलग नहीं है, जो काल्पिनक स्वर्ग की बातें करते हैं.’

हम सपनों की लकड़ी से बने उन्हीं साँचों की बात कर रहे हैं, जो हर दौर में बॉलीवुड के नायकों से लेकर नौकरों तक को एक खास छवि में बांधते रहे. समय के साथ उनका आकार बदला जरूर, लेकिन फिर अगले कुछ समयांतराल के लिए नए आकार का सांचा बार-बार इस्तेमाल किया जाता रहा.

यह एकरूपता भी उस दौर के बीतने और बदलने के बाद नजर आती है. हो सकता है कि ढर्रे तोड़ती और अधिक वास्तविक होती जा रही जिन फिल्मों को देखकर हम आज प्रसन्न हो रहे हैं, बीस साल बाद देखने पर इस दशक की फिल्मों में भी कुछ नए स्टीरियोटाइप्स जन्म लेते दिखें. दोहराव, बदलाव और फिर दोहराव का यह सिलसिला इतना रोचक है कि इसमें एक मसालेदार फिल्म के तमाम गुण हैं. अगले कुछ पन्नों पर बिखरा है, ‘दस कहानियां’ बनाने वाले और ‘दस बहाने’ गाने वाले बॉलीवुड के ‘दस’ से लगाव को समर्पित, इसके दस मसालेदार सांचों का यह विश्लेषण.

नायक,  नायिका, जाति व धर्म

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