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   कछुओं वाले लोग

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दो दशक पहले की बात है. केरल में कोवलिपलम गांव के एक ऑटोरिक्शाड्राइवर सुरेंद्र बाबू ने अखबार में एक चिंताजनक खबर पढ़ी. खबर में उड़ीसा के गहीरमाथा तट पर ओलिव रिडली नामक कछुओं की एक प्रजाति पर मंडरा रहे संकट का जिक्र किया गया था. सुरेंद्र को ये समझने में देर नहीं लगी कि ये वही कछुए हैं जो हर साल कोवलिपलम के तट पर भी आते हैं. उन्होंने सोचा कि क्यों न इस बारे में कुछ किया जाए. इसी के साथ शुरू हुई मछुआरों के इस गांव में ओलिव रिडली प्रजाति को बचाने की एक अनूठी पहल.

सुरेंद्र और उनके साथियों ने थीरम प्रकृति संरक्षण समिति के नाम से एक संगठन बनाया. कछुओं के प्रजनन का मौसम सर्दियों के चार महीने चलता है. इस दौरान समिति के सदस्य रात भर तट पर बने कछुओं के घोंसले ढूंढते, ताजा अंडों को सावधानीपूर्वक निकालते और फिर उन्हें प्रजनन के लिए एक माकूल और सुरक्षित जगह यानी हैचरी में रख देते. इस तरह अंडों को मनुष्यों और जानवरों से बचाया जाता था. पचास दिन बाद जब अंडों से दो इंच लंबे बच्चे निकलने लगते तो उन्हें समुद्र में छोड़ दिया जाता था.

 गांववाले कछुओं के संरक्षण को अपने संघर्ष के विस्तार की तरह देखते हैं. एक कार्यकर्ता का कहना है, “हमें हर कोई कछुए वाले लोग कहकर पुकारता है. लेकिन हम कछुओं को नहीं बचा रहे हैं बल्कि कछुओं ने हमें अपने विरोध को जाहिर करने की एक वजह दी है.

ये आसान नहीं था. मछुआरों के इस गांव में कछुओं को बचाने की इस कोशिश का मतलब था अपनी रोजी-रोटी वाले काम यानी मछली पकड़ने के वक्त में कटौती. संगठन के सदस्यों की हंसी उड़ाई जाती थी. कुछ स्वार्थी तत्वों ने इस मुहिम को यहां चल रहे अवैध रेत खनन के काम में अड़ंगा माना और कई बार समिति के सदस्यों के साथ मारपीट भी की.

लेकिन संरक्षण की इस कोशिश की कहानी तेजी से फैली. मुहिम से जुड़ने वाले लोगों की संख्या बढ़ने लगी. लोग आस-पड़ोस से भी ये खबर लाने लगे कि कछुए कहां पर अंडे दे रहे हैं. ये लोग कई बार अंडे भी अपने साथ ले आते थे. धीरे-धीरे कोशिश रंग लाने लगी और संगठन अब हर साल करीब 3000 कछुए समुद्र में छोड़ता है. गांववाले उन्हें कछुए वाले लोग कहकर बुलाते हैं.

जब से सुरेंद्र बाबू को याद है, ये कछुए कोवलिपलम के तट पर आ रहे हैं. सुरेंद्र का पहली बार कछुए से सामना तब हुआ था जब वह सालों पहले एक सुबह अपने पिता के साथ मछली पकड़कर लौट रहे थे. गांव की तरफ जाते हुए उन्होंने एक मादा कछुए को समुद्र की तरफ लौटते देखा. रेत पर कछुए के पांव के निशान उसके घोंसले का पता बता रहे थे. बाबू याद करते हैं, उस दिन हम ज्यादा मछलियां नहीं पकड़ पाए थे इसलिए हमने कछुए के अंडों की दावत उड़ाने की सोची. लेकिन संयोगवश बाद में अखबार की उस खबर ने सब बदल दिया.

समिति के एक और कार्यकर्ता संजीवन कहते हैं, माना जाता है कि ओलिव रिडली प्रजाति के कछुए उसी तट पर अंडे देने आते हैं जहां कभी वो पैदा हुए थे. हमारे द्वारा हर साल समुद्र में छोड़े जाने वाले कछुओं की संख्या बढ़ रही है. हमारा सपना है कि हमारा तट एक दिन प्रजनन के लिए आने वाले कछुओं से भरा होगा. इसमें 20 साल भी लग सकते हैं. कौन जाने तब तक ये तट...या फिर ये गांव होगा भी या नहीं.

संजीवन की चिंता बेवजह नहीं है. कोवलिपलम से समुद्र तट की दूरी कुछ साल पहले तक एक किलोमीटर हुआ करती थी. लेकिन अब ये बहुत तेजी से घट रही है. लोगों की मानें तो समुद्र तट, कछुओं और गांव को एक ही दुश्मन से खतरा है और वह है अवैध रेत खनन. हर दिन यहां से टनों रेत निर्माण कार्य औऱ भराई के लिए ले जाई जाती है. दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि ऐसा तब हो रहा है जब पर्यावरण को होने वाले नुकसान को देखते हुए रेत खनन पर राज्य सरकार द्वारा प्रतिबंध लागू है. 

काफी कोशिशों और मुश्किलों के बाद समिति ने अदालत से खनन पर रोक संबधी निर्देश हासिल करने में सफलता हासिल की. लेकिन खनन अब भी चोरीछिपे जारी है. गांववाले कछुओं के संरक्षण को अपने संघर्ष के विस्तार की तरह देखते हैं. एक कार्यकर्ता का कहना है, हमें हर कोई कछुए वाले लोग कहकर पुकारता है. लेकिन हम कछुओं को नहीं बचा रहे हैं बल्कि कछुओं ने हमें अपने विरोध को जाहिर करने की एक वजह दी है.

कार्यकर्ताओं में मछुआरे, ऑटोरिक्शा ड्राइवर, शिक्षक, मल्लाह और दुकानदार जैसे लोग शामिल हैं. जीवन के रोजमर्रा के झंझटों के बावजूद ये लोग रात में और अलसुबह अंडे ढूंढते हैं. मछुआरे विजयन कहते हैं, समुद्र, किनारा और ये प्राणी हमारी रोज की जिंदगी का हिस्सा हैं और हम इस काम को अपने कर्तव्य की तरह निभाते हैं.

इस पहल की सराहना करते हुए राज्य वन विभाग हैचरी के लिए वित्तीय सहायता देने पर सहमत हो गया है. और ये जानने के बाद कि ये प्रजाति खतरे में है, गांववालों ने भी अब कछुए के अंडे खाना छोड़ दिया है.

के ए शाजी 

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