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कैसे मानें वो हैं हमारे?
जब बात चले हमारी, वो सोएं पांव पसारे. पूरा पढें... |
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   चांदी के चंद सिक्के
दोस्तो क्यों परेशान होते हो, क्यों हैरान होते हो, चांदी के चंद सिक्कों के लिए, ज़रा सोचो, चांदी के सिक्कों का करोगे क्या, क्या इन सिक्कों से नींद आ जाएगी, या फिर इनसे, रात की करवटें रुक जायेंगी, और तो और, क्या कोई बतायेगा, कि इन सिक्कों को देख कर, क्या ‘यमदूत’ डर कर लौट जायेंगे, या फिर, इन सिक्कों पर बैठ कर, तुम स्वर्ग चले जाओगे, या इन्हें जेब में रख कर, अजर-अमर हो जाओगे, अगर तुम सोचते हो, ऐसा कुछ हो सकता है, तो चांदी के सिक्के अच्छे हैं, और तुम्हारी इनके लिए मारामारी अच्छी है, अगर ऐसा कुछ न हो सके, तो तुम से तो, तुम्हारे चांदी के सिक्के अच्छे हैं, तुम रहो, या न रहो, ये सिक्के तो रहेंगे, न तो तुम्हारे अपने और न ही ये सिक्के, तुम्हें याद करेंगे, अगर ऐसा हुआ या होगा! फिर ज़रा सोचो, क्यों परेशान होते हो, चांदी के चंद सिक्कों के लिए, अगर होना ही है परेशान, रहना ही है जीवन भर हलकान, तो उन कदमों के लिए हो, जो कदम उठें तो, पर उठ कर बस कदम ही न रहें, बन जायें रास्ते, सदा के लिए, न सिर्फ तुम्हारे लिए, न सिर्फ हमारे लिए, सभी के लिए...। श्याम कोरी ‘उदय’ |
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कुल टिप्पणियां: 2
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प्रेषक : pravinbhukh daridrata jab jab sataege chandi ke sikke hi kam aege
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प्रेषक : यज्ञमित्रचाँदी के सिक्के उपदेशात्मक और आत्मसात करने की प्रेरणा देने वाली कविता है। तहलका और कवि अच्छी कविता के लिये धन्यवाद। यज्ञमित्र























