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   ...श्री कृष्णम् समर्पयामी
मैं, मेरी सोच, मेरे ख्याल, जिया हुआ हर दिन, काटे गए महीने, और बिताया हर साल। हर हद तक गया अनुराग, परिपक्वता, और फिर चुंबक के एक से छोरों सा वैराग। मेरा सारा आलस, सारे काम, मेरे से टूटा और जुड़ा हर नाम, कूट-कूट कर भरे व्यसन, वासना, दुर्विचार, मेरा अहंकार, हर दिन की जीत, हर रोज़ की हार, मेरा प्रेम, समर्पण, मेरा जुड़ाव और भटकाव, टूटन, तड़पन खुद का चिंतन, कंठ तक भरा रीतापन, मज़े में डूबी हर एक बात, मुझे उठाने और गिराने में लगे सैंकड़ो हाथ, उसकी नफ़रत, मेरा प्यार, हर अनुभव, हर चोट, हर मार, सारी प्राप्तियां, सारे आनंद, सारे सुकून, मुझसे जुड़ा हर काला, सफेद, तोतई, और मरून, मेरी सारी ताकत, सारी ख़ामी, ... श्री कृष्णम् समर्पयामि। |
देवेश वशिष्ठ
(बाइस साल के देवेश एक प्राइवेट न्यूज़ चैनल में बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर कार्यरत हैं. वे पिछले छह साल से लेखन की अनेक विधाओं से जुड़े रहे हैं.)
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कुल टिप्पणियां: 2
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प्रेषक : pratima pandeyzindagi ka har rang har ehsaas aapke shabdon se juda hai...behad khoobsurat rachnatmak soch hai aapki...
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प्रेषक : premapnki rachana sochne per majboor karti hai. achhi aur pathniya hai
























