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   हम जीते हैं क्यूं रोज़ ज़िंदगी

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हम जीते हैं क्यूं रोज़ ज़िंदगी

क्यूं न ऐसा हो कि जब हम भर जाएं

तो कुछ दिनों के लिए हम मर जाएं

चंद रोज़ मर कर जब चाहें 

वापस ज़िंदा होकर आएं 

कभी--कभी  तो कहीं  यार  कुछ  ऐसा  हो

जीवन पोथी के हों काफी पन्ने काले अगला पन्ना स्वर्ण लेख के जैसा हो

गम पीते हैं क्यूं रोज़ ज़िंदगी

क्यूं न ऐसा हो कि जब हम अफर जाएं

तो कुछ दिनों के लिए हम मर जाएं

चंद रोज़ मर कर जब चाहें 

वापस ज़िंदा होकर आएं 

कल का सूरज सुख लाएगा, कल की रात सुहानी होगी

बात बनेगी रुत बदलेगी, हाथ बढाते ही बाहों में कल सपनों की रानी होगी

भ्रम सींते हैं क्यूं रोज़ ज़िंदगी

क्यूं न ऐसा हो कि जब ये उधड़ जाएं

तो कुछ दिनों के लिए हम मर जाएं

चंद रोज़ मरकर भी देखें

वापस ज़िंदा होकर आएं

                                                       संजय दुबे

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अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 4

  • प्रेषक : Vineet Khare
    बहुत अच्छे संजय बाबू. काश मैं कुछ ऐसा लिख पाता!
  • प्रेषक : राकेश
    शायद श्वेता जी उस भाषा शैली की बात कर रही हैं जिसमें भारी -भरकम, डराने वाले शब्द होते हैं और जिसमें लिखी ज्यादातर बातें केवल लेखकों को ही समझ आती हैं. शायद श्वेता जी को ढर्रे से अलग चलती चीज़ें पसंद नहीं आतीं.
  • प्रेषक : sweta
    Kavita ka sirf concept hi achchha hai........bhasha shaili mein kami hai........aur kahin kahin par bhav bhi dhang se vyakt nahi ho paaye hai.......layaatmak sahajta mein abhi pakad honi baaki hain......kopalen ke tahat ise sirf thik thak kosis bhar kaha ja sakta.........par padne me mehsoos hoti kamio ko nazar-andaaz nahi kiya ja sakta.......
  • प्रेषक : Jai Shankar
    Shaandaar. . . . Bhaav aur bhaashaa dono laajwaab lagi. . . . Lage raho Sanjay bhai.