महिला आरक्षण का मूल
कौन समर्थक, कौन विरोधी, बात जाओ ये भूल.
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संकलन

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साहित्य की कोपलें

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कुल रचनायें: 5 | प्रदर्शित: 1 - 5

 चांदी के चंद सिक्के

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दोस्तो क्यों परेशान होते हो, क्यों हैरान होते हो, चांदी के चंद सिक्कों के लिए, ज़रा सोचो, चांदी के सिक्कों का करोगे क्या, क्या इन सिक्कों से नींद आ जाएगी, या फिर इनसे, रात की करवटें रुक जायेंगी, और तो ...
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 बोलती चिचरी

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उसे छोटू बोलते हैं,बिल्कुल छोटा सा है ऐसे नाम परेमू है। नहीं, नहीं! कोई प्रेम का बिगड़ा रूप नहींअरे प्रेम तो छोड़िए प्रेमू भी नहीं।पढ़ना लिखना नहीं जानतापन्ने पर कभी चिचरी भी नहीं पारी है उसने,ये दीगर बात है कि ...
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 ...श्री कृष्णम् समर्पयामी

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मैं, मेरी सोच, मेरे ख्याल, जिया हुआ हर दिन, काटे गए महीने, और बिताया हर साल। हर हद तक गया अनुराग, परिपक्वता, और फिर चुंबक के एक से छोरों सा वैराग। मेरा सारा आलस, सारे काम, मेरे से टूटा और ...
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 कविता की मदद से

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कविता की मदद से यूं तो इससे पहले भी स्वयं निर्मित औजारों सेसमय की जंग को परिमार्जित करने का असफल उपक्रम किया है मैंने। कभी प्रार्थनाओं की गर्म भाप से कभी कल्पनाओं के अनगिनत बिम्बों से। पर कविता मेरी आखिरी कोशिश है ...
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 हम जीते हैं क्यूं रोज़ ज़िंदगी

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हम जीते हैं क्यूं रोज़ ज़िंदगी क्यूं न ऐसा हो कि जब हम भर जाएं तो कुछ दिनों के लिए हम मर जाएं चंद रोज़ मर कर जब चाहें वापस ज़िंदा होकर आएं कभी--कभी  तो कहीं  यार  कुछ  ऐसा  हो जीवन पोथी के ...
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