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   जनहित याचिकाओं का अहित न करें मीलॉर्ड!
न्यायिक सक्रियता और जनहित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट के दो हालिया फैसलों से एक नया विवाद छिड़ गया है. जनहित याचिकाओं पर अदालतों की सीमाओं व उनके अधिकार क्षेत्र और न्यायिक सक्रियता पर हर तरफ, यहां तक कि न्यायिक गलियारों में भी बहस हो रही है. इसलिए सुप्रीम कोर्ट की एक तीन सदस्यीय खंडपीठ ने इन मुद्दों की समीक्षा करने और इस संबंध में दिशानिर्देश बनाने का फैसला किया है.
जनहित याचिका शब्द 70 के दशक के आखिर में तब गढ़ा गया था जब सुप्रीम कोर्ट ने आम जनता या फिर समाज के कमजोर तबके के हित से जुड़े मुद्दों की याचिकाओं पर सुनवाई करना शुरू किया था. इसके साथ ही अदालतें मूल अधिकारों विशेषकर जीने के अधिकार की उदार व्याख्या भी करने लगीं. अदालतों का कहना था कि इस अधिकार में एक गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है जिसके लिए खाना, पानी, छत, शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ पर्यावरण आदि जैसी चीजें जरूरी हैं. इस तर्क के आधार पर अदालतों ने संबंधित विभागों और संस्थाओं को जेल और आश्रयस्थलों में रह रहे लोगों की दशा सुधारने, मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी देने, बाल श्रम और बंधुआ मजदूरी को खत्म करने, वनों को बचाने, नदियों को साफ करने, वायु प्रदूषण से निपटने, सड़क सुरक्षा, चुनावी उम्मीदवारों के बारे में जानकारी देने, पुलिस सुधार आदि से संबंधित कई दिशानिर्देश दिए. अदालतों द्वारा विकसित सिद्धांत ये था कि हर शक्ति कर्तव्य के साथ बंधी होती है और इसलिए जहां संस्थाओं और अधिरकारियों को कदम उठाने का अधिकार है तो वहीं उनका ये कर्तव्य भी है कि वे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करें.
अदालतों द्वारा विकसित सिद्धांत ये था कि हर शक्ति कर्तव्य के साथ बंधी होती है और इसलिए जहां संस्थाओं और अधिरकारियों को कदम उठाने का अधिकार है तो वहीं उनका ये कर्तव्य भी है कि वे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करें. यानी सरकारी निष्क्रियता की वजह से अगर किसी इलाके के लोगों को बिजली नहीं मिल रही है तो अदालत उन्हें इस दिशा में सोचने को कह सकती है और अगर ऐसा करने का कोई व्यावहारिक तरीका हो तो वो संबंधित विभाग या संस्था से उसे अपनाने के लिए कह सकती है. हालांकि इस पर भी सहमति थी कि नीतिगत मसले कार्यपालिका की जिम्मेदारी होंगे और अगर कहीं मसला विशेषज्ञों की राय से जुड़ा हो तो अदालत कार्यपालिका के विशेषज्ञों पर अपने विचार नहीं थोप सकती. मगर यदि सरकार के विशेषज्ञ मुद्दे की पड़ताल कर उसके समाधान की संस्तुति कर चुके हों और सरकार के पास उन्हें लागू न करने का कोई व्यावहारिक कारण न हो तो अदालतें सरकार को ऐसा करने का निर्देश दे सकती थीं.
इसलिए पुलिस सुधार मामले में अदालत ने तभी सक्रियता दिखाई जब उसने पाया कि पुलिस विभाग में भ्रष्टाचार के चलते नागरिकों के मूल अधिकारों का भारी हनन हो रहा है. पिछले 25 सालों में इस समस्या पर सरकार चार विशेषज्ञ समितियां बना चुकी थी और सभी ने कुछ समाधान सुझाए थे. फिर भी राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और सत्तासीन ताकतों द्वारा पुलिस को अपने स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करने की इच्छा के चलते ये समाधान लागू नहीं किए जा रहे थे.
हालांकि ये भी सच है कि कुछ मामलों में न्यायिक सक्रियता की अति भी देखने में आई है. अदालत द्वारा नदियों को जोड़ने की योजना को लागू करने का निर्देश इसका एक उदाहरण है. यद्यपि सरकार द्वारा बनाई गई विशेषज्ञ समितियों ने इस योजना को अव्यावहारिक करार देते हुए ठुकरा दिया था फिर भी अदालत ने जनहित याचिका पर राज्य सरकारों को प्रतिक्रिया देने की अनुमति तक नहीं दी और केंद्र सरकार को निर्देश दे दिया कि वो छह लाख करोड़ के बजट वाली इस योजना को 10 साल के भीतर पूरा करे. ऐसे ही कुछ दूसरे उदाहरण भी हैं.
पर इससे उन टिप्पणियों को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता जो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने अपने दो हालिया फैसलों में की हैं. गोल्फ क्लब के कर्मचारियों के एक मामले में गैरजरूरी तरीके से वो कह गए कि नर्सरी दाखिले, अनाधिकृत स्कूल, स्कूलों को पेयजल की आपूर्ति, सरकारी जमीन पर बने अस्पतालों में गरीबों के लिए मुफ्त बेड आदि जैसे मामलों में दिए गए हालिया निर्देश न्यायपालिका की शक्ति की हदों से आगे के थे और ये पूरी तरह से कार्यपालिका या विधायिका के कार्यक्षेत्र में पड़ते थे. उनका आगे कहना था, “अगर विधायिका या कार्यपालिका सही तरीके से काम नहीं कर रहे तो ये जनता पर है कि वो अगले चुनाव में सही तरीके से वोट दे कर और उस उम्मीदवार को मत देकर जो उनकी उम्मीदों को पूरा करे, इस कमी को दुरुस्त करे.”
तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि अगर अदालत के सामने कभी ऐसी स्थिति आ जाए कि दिनदहाड़े किसी का बलात्कार और हत्या हो रही हो और पुलिस कोई कार्रवाई करना छोड़ तमाशा देख रही हो तो अदालत को अपनी असहायता व्यक्त करनी चाहिए और याचिकाकर्ता को कहना चाहिए कि वो अगले चुनाव में सरकार को बदलने के लिए वोट करे!
जस्टिस काटजू का यही रुख उनके उस फैसले में भी नजर आया जो उन्होंने कॉमन कॉज नामक एक एनजीओ की याचिका को खारिज करते हुए दिया था. अपनी याचिका में इस संगठन ने अदालत से सड़क सुरक्षा(नॉन मोटोराइज्ड ट्रैफिक के लिए अलग लेन बनाने और व्यावसायिक वाहनों पर स्पीड गवर्नर लगाने) पर निर्देश देने की अपील की थी. ये निर्देश देने की प्रार्थना सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट और आईआईटी दिल्ली द्वारा तैयार एक रिपोर्ट के आधार पर की गई थी. रिपोर्ट में कहा गया था कि हर साल 80,000 जानें और 32,000 करोड़ रुपये ऐसी दुर्घटनाओं की
भेंट चढ़ जाते हैं जिन्हें टाला जा सकता है. जस्टिस काटजू ने जब इस याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाए तो उन्हें सूचित किया गया कि एमसी मेहता के एक ठीक ऐसे ही मामले में अदालत की एक बड़ी खंडपीठ इस मसले को ये कह कर हल कर चुकी है कि ये स्पष्ट है कि इस समस्या से निपटने के उपाय करना प्राथमिक रूप से कार्यपालिका की जिम्मेदारी है मगर चूंकि 1985 से याचिका लंबित पड़ी है और ये समस्या लगातार बढ़ रही है इसलिए इस संबंध में अदालत का कुछ निर्देश जारी करना जरूरी हो गया है. जस्टिस काटजू को ये पता ही होगा कि हाई कोर्ट की 20 से भी ज्यादा खंडपीठों में से सिर्फ एक या दो ही जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करती हैं और वो भी हफ्ते में सिर्फ एक दिन. इसके बावजूद वो कहते हैं कि अदालतों में जनहित याचिकाओं की बाढ़ आ गई है.
फिर भी जस्टिस काटजू ने बड़ी खंडपीठ के अपने ऊपर बाध्य निर्णय की ये कहकर उपेक्षा की कि उस खंडपीठ का फैसला उससे भी बड़ी एक सात सदस्यीय खंडपीठ के फैसले द्वारा खारिज हो गया था. हैरानी की बात ये है कि सात सदस्यीय खंडपीठ द्वारा दिया गया वो निर्णय सड़क सुरक्षा पर एम सी मेहता केस के फैसले या ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई करने के दिशानिर्देशों के बारे में कुछ भी नहीं कहता. मगर जस्टिस काटजू ने फिर भी इस फैसले का हवाला दिया.
इसके बावजूद कि याचिका में नॉन मोटोराइज्ड वाहनों के लिए अलग से लेन जैसे निश्चित दिशानिर्देशों की अपील की गई थी, जस्टिस काटजू का कहना था, “याचिकाकर्ता की चिंता ये है कि कई लोग दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं. मगर कई लोग इसलिए भी मर जाते हैं क्योंकि उनकी हत्या हो जाती है. अब क्या अदालत ये आम दिशानिर्देश भी जारी कर दे कि इस देश में हत्याएं नहीं की जानी चाहिए?” फैसले के अंत में उनका कहना था, “दुर्भाग्य से सच ये है कि कई अदालतों में एक रूटीन के तहत कई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई होने लगी है और इसका नतीजा ये है कि ज्यादातर बड़ी अदालतों में जनहित याचिकाओं की बाढ़ सी आ गई है जिनमें से ज्यादातर महत्वहीन होती हैं या फिर उन समस्याओं की बात करती हैं जिनके लिए न्यायपालिका के पास कोई समाधान नहीं है.” जस्टिज काटजू ने आगे ये भी कहा कि ज्यादातर जनहित याचिकाएं दरअसल ब्लैकमेल करने का जरिया हैं.
आखिर किस आधार पर कोई जज इस तरह की गलत टिप्पणियां कर सकता है? दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके जस्टिस काटजू को ये पता ही होगा कि हाई कोर्ट की 20 से भी ज्यादा खंडपीठों में से सिर्फ एक या दो ही जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करती हैं और वो भी हफ्ते में सिर्फ एक दिन. इसके बावजूद वो कहते हैं कि अदालतों में जनहित याचिकाओं की बाढ़ आ गई है. और कितनी जनहित याचिकाएं ऐसी पाईं गईं जिन्हें निजी या राजनीतिक लाभ और ब्लैकमेल के उद्देश्य से दाखिल किया गया था? सच ये है कि ऐसी याचिकाओं का प्रतिशत नगण्य ही है.
और अगर ऐसी याचिकाएं आती भी हैं तो अदालत पहली ही सुनवाई में उन्हें खारिज कर सकती है और करती भी है. मगर एक जज का उसी हथियार को बदनाम करना जिसे अदालतों ने ही जनहित के लिए और स्थापित कानून के मद्देनज़र बनाया हो, न्यायिक अनुशासन का उल्लंघन नहीं तो और क्या है.
21 अप्रैल को जस्टिस काटजू ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी जिसमें एक सार्वजिनक पार्क में चल रहे निर्माण पर पाबंदी लगाई गई थी. उनका कहना था कि ऐसा करना विधायिका द्वारा किसी कानून को पास किए जाने पर पाबंदी लगाने जैसा होगा. ये याद दिलाने पर कि उन्होंने खुद भी हाईकोर्ट में ऐसे आदेश पारित किए हैं, जस्टिस काटजू का कहना था कि अब वो ज्यादा बुद्धिमान हो गए हैं! दुर्भाग्य से देर में आई इस अजीब सी बुद्धिमानी ने हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए आईं जनहित याचिकाओं के बारे में काफी दुविधा की स्थिति पैदा कर दी है. उम्मीद है कि एक बड़ी खंडपीठ जनहित याचिकाओं और न्यायिक सक्रियता को लेकर जब दिशानिर्देश तय करेगी तो ये दुविधा कुछ हद तक छंट जाएगी.
प्रशांत भूषण
लेखक सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं.
























