राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम
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   टिड्डियों की आवाज़--नरसंहार, नकार और विजयोत्सव-2

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आर्मेनियाई नरसंहार का गहन अध्ययन करने वाले विद्वान पीटर बालकिअन का कहना है कि नरसंहार करने के लिए आपको किसी एक उप समूह को लंबे समय तक हाशिए पर रखना होता है। यह काम भारत में बखूबी हुआ है। भारत के मुसलमानों को योजनाबद्ध तरीके से हाशिए पर ढाला गया है और अब वे आदिवासी व दलितों के स्तर पर पहुंच गए हैं। जिन्हें न सिर्फ हाशिए पर रखा गया है बल्कि सवर्ण हिंदुओं और उनके शास्त्रों ने वर्षों बल्कि शताब्दियों से अमानवीय स्तर पर पहुंचाया हुआ है। एक समय था जब सवर्णों ने उन्हें इसलिए अमानवीय स्तर पर पहुंचाया हुआ था कि जो काम वे लोग स्वयं नहीं करते थे वे काम उनसे करवाए जाते थे। अब प्रौद्योगिकी के कारण वह श्रम भी बेकार हो गया है। आरएसएस का एक काम दलितों को मुसलमानों से और आदिवासियों को दलितों से भिड़वाना भी है। 

जब ये लोग अपनी एकता की परियोजना और इसके घृणा के सिद्धातं को बढ़ाने में लगे हुए थे, भारत की प्रगति की परियोजना की रफ्तार गति पकड़ रही थी। निजीकरण और उदारीकरण के नए दौर में देश के प्राकृतिक संसाधन और सार्वजनिक संरचनात्मक साधनों को निजी घरानों को बेचा जा रहा है। इसने कल्पनातीत धनी उच्चवर्ग और बढ़ते मध्य वर्ग को पैदा कर दिया है जो कि स्वाभाविक तौर पर नई व्यवस्था के कट्टर हामी हो गए हैं।

प्रगति परियोजना की दंड से मुक्ति और छल कपट की अपनी ही परंपरा है, जो किसी भी रूप में एकता की परियोजना से कम डरावनी नहीं है। उसके केंद्र में देश की सबसे ताकतवर संस्था सर्वोच्च न्यायालय है, जो कि तेज़ी से कॉर्पोरेट शक्ति के एक स्तंभ में परिवर्तित होकर बड़े बांध बनाने, नदियों को जोड़ने भू-संपदा के अंधाधुंध दोहन, जंगल औऱ जल संसाधनों को बर्बाद करने के आदेश पर आदेश देता जा रहा है। इन सारी चीज़ों को अगर एक शब्द में बताना चाहें तो इसे इकोसाइड (पर्यावरण हत्या) कह सकते हैं। शायद यह जनसंहार की प्रस्तावना है। (और न्यायलय की आलोचना करना जुर्म है, जिसकी सज़ा जेल है)

यह विडंबना है कि मुक्त बाज़ार के दौर ने भारत में अब तक के सबसे सफल  अलगाववादी आंदोलन को जन्म दिया है। उच्च और मध्यवर्ग ने स्वयं को इस देश से पूरी तरह काटकर आसमान में कहीं एक अलग देश बना लिया है, जहां वे दुनियाभर के आभिजात्य लोगों में शामिल हो जाते हैं। उनका यह साम्राज्य अपने आप में संपूर्ण है, जो बाकी भारत से सन्यासियों की भांति कटा हुआ है। उनके अपने अखबार, फिल्में, टेलीविज़न कार्यक्रम, नैतिकता से भरे नाटक, यातायात व्यवस्था, मॉल और बुद्धिजीवी हैं। और अगर आप यह मानने लगे हों कि यहां सब कुछ आनंद ही आनंद है तो आप गलती पर हैं। उनकी भी अपनी त्रासदियां हैं, उनके अपने पर्यावरण के मुद्दे हैं(पार्किंग की समस्या, प्रदूषण आदि), उनका अपना वर्ग संघर्ष है। उदाहरण के लिए एक संगठन है यूथ फॉर इक्वलिटी जिसने आरक्षण का मसला उठाया है। उसका मानना है कि भारत में उच्च जाति के लोगों के साथ दमित निम्न जाति के लोग भेदभाव कर रहे हैं। उनके अपने जनआंदोलन हैं और मशाल जलूस हैं और उसकी अपनी जन कार(नैनो) भी है। यहां तक कि इसके अपने सपने भी हैं जो टीवी के विज्ञापनों के रूप में आकार लेते हैं जिनमें भारतीय सीईओज़ काल्पनिक ईस्ट इंडिया कंपनी समेत अंतरराष्ट्रीय निगमों को खरीदते हैं। उन्हें श्वेत स्त्रियां अपने लकदक दफ्तरों में ले जा रही होती हैं और स्वागत करते श्वेत पुरुष हैं जो नए बादशाहों के लिए रास्ता छोड़ने को तैयार हैं। इस बीच स्टेडियम की भीड़ तुमुलनाद करती है (जेब में क्रेडिट कार्ड लिए) और इंडिया... इंडिया का नारा लगाती खड़ी हो जाती है।

लेकिन एक परेशानी है और परेशानी लेवेन्सरॉम की है। हर राज्य को लेवेन्सरॉम की जरूरत पड़ती है। आकाश में लेवेन्सरॉम कहां मिल सकता है? आकाश में रहने वाले नागरिक प्राचीन देशों की तरफ अपनी नज़रें दौड़ाते हैं। वे पाते हैं कि उड़ीसा में बाक्साइट और झारखंड व छत्तीसगढ़ में लौह अयस्क की पहाड़ियों पर आदिवासी बैठे हैं। वो देखते हैं कि नंदीग्राम में लोग उस बहुमूल्य ज़मीन पर बैठे हैं जिसे वास्तव में केमिकल हब होना चाहिए। वे हजारों एकड़ उपजाऊ जमीन देखते हैं और सोचते हैं कि इसे तो वास्तव में हमारे उद्योगों के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र होना चाहिए। वे सोचते हैं बाक्साइट हमारा है, लौह अयस्क हमारा है, यूरेनियम भी हमारा है। फिर ये लोग हमारी ज़मीन पर क्या कर रहे हैं? हमारा पानी इनकी नदियों में कैसे बह रहा है? हमारी लकड़ी इनके पेड़ों पर क्यों है?

अगर आप भारत के जंगल, खनिज संपदा और आदिवासियों के रहने वाली जगहों के नक्शे पर नज़र डालें तो पाएंगे कि ये सब एक जगह इकट्ठा हैं। इसलिए यथार्थ में जिन्हें हम गरीब कहते हैं वास्तव में वो संपन्न लोग हैं। लेकिन जब आकाशवासी नागरिकों की नज़र इस ज़मीन पर पड़ती है तो उन्हें लगता है कि अवांछित लोग बहुमूल्य संसाधनों पर कुंडली मारे बैठे हैं। नाजियों की शब्दावली में ऐसे लोगों को 'यबरजाहलिजेन इर्सन' .यानी अनावश्यक खाने वाले कहा जाता था।

फ्रेडरिक रजाल ने उत्तर अमेरिका में मूलनिवासी रेड इंडियनों और उपनिवेशिक यूरोपियों के बीच के संघर्ष को बारीकी से देखने के बाद कहा था कि लेवेन्सरॉम का संघर्ष संहार का संघर्ष है। संहार करने का मतलब सिर्फ शारीरिक रूप से लोगों को खत्म करना, बुरी तरह से मारना पीटना, जलाना, बायोनेट भोंकना, गैस छोड़ना, बम गिरा देना या गोली मारना नहीं होता है। ऐतिहासिक रूप से सबसे दक्ष नरसंहार वह होता है जब लोगों को उनके घरों से विस्थापित किया जाता है हांककर एक जगह घेर दिया जाता है और उनके भोजन औऱ जल के रास्तों को बंद कर दिया जाता है। इन परिस्थितियों में वो बिना किसी स्पष्ट हिंसा के मरते हैं और अक्सर कई गुना बड़ी संख्या में मरते हैं। स्वेन लिंडाक्विस्ट लिखती हैं, "नाजियों ने यहूदियों के कोट पर एक स्टार लगाकर उन्हें आरक्षित जगहों पर इकट्ठा कर दिया ठीक वैसे ही जैसे इंडियनों, हेरेरोस, बुशमैन, एमनडाबेले तथा अन्य स्टार लगे लोगों को एक जगह पर घेरा गया था। जब आरक्षित जगहों पर खाद्य आपूर्ति रोक दी गई वे लोग अपने आप ही मर गए।"

इतिहासकार माइक डेविस का कहना है कि 1876 से 1892 के बीच हिंदुस्तान में एक करोड़ 20 लाख से 2 करोड़ 90 लाख लोग महा-अकाल के कारण मर गए, जबकि उसी दौरान अंग्रेज़ भारत से खाद्य पदार्थ और कच्चे माल का निर्यात करते रहे थे। अमर्त्य सेन का कहना है कि लोकतंत्र में भूखमरी की संभावना नहीं होती। इसलिए चीन के महा-अकाल की जगह पर हमारे पास भारत का महा-कुपोषण है। (भारत में पांच करोड़ 70 लाख लोग कुपोषण के शिकार हैं, जो कि विश्व के कुल कुपोषित बच्चों की संख्या का एक तिहाई से कुछ ज्यादा ही बैठता है)

चीन के संभावित अपवाद को छोड़ दें तो दुनिया में आज सबसे ज्यादा आंतरिक रूप से विस्थापित लोग भारत में हैं। अकेले बांधों ने ही तीन करोड़ लोगों को विस्थापित किया है। इस विस्थापन को या तो न्यायालय के आदेश पर या पुलिस की बंदूकों की नोक पर या सरकार नियंत्रित अर्धसैनिक बलों द्वारा या फिर उद्योगपतियों के गुंडो की मार्फत अंजाम दिया गया है। विस्थापितों को टीन के छप्परों के नीचे शिविरों, और पुनर्वास कॉलोनियों में हांका गया है जहां जीवनयापन के साधनों से वंचित वे गरीबी के चक्र में गहरे डूबते जाते हैं।

लौह अयस्क की परिसंपदा से संपन्न राज्य छत्तीसगढ़ जो कार्पोरेट घरानों के निशाने पर है वहां एक अलग ही तरीका अपनाया जा रहा है। माओवादी विद्रोहियों से लड़ने के नाम पर सैकड़ों गांवो को जबरदस्ती खाली करवा लिया गया है। और लगभग 40 हजार लोगों को पुलिस शिविरों में पटक दिया गया है। सरकार ने इनमें से कुछ को शस्त्र देकर सलवा जूडम यानी जन सेवा बना दिया है। जहां अति गरीब दूसरे अति गरीबों से लड़ रहे हैं। गृहयुद्ध की इस स्थिति में टाटा और एस्सार औद्योगिक घराने चुपचाप छत्तीसगढ़ में लौह खदानों के लिए सौदेबाजी कर रहे हैं। क्या इन दोनो बातों में कोई संबंध स्थापित किया जा सकता है? ऐसा हम सपने में भी नहीं सोच सकते। हालांकि सलवा जूडम की स्थापना टाटा समूह और सरकार के बीच समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के एक दिन बाद की गई थी।

इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि इन घटनाओं के बारे में उस नए भारत के संस्करण में कुछ दिखाई नहीं पड़ता जो आज बाज़ार में चल रहा है। यह रॉबर्ट जे लिफ्टन के शब्दों में धोखे से भरे संसार के अस्तित्व को नकारने का ही एक दूसरा रूप है। इस संसार में सुव्यवस्थित त्रासदियों को व्यक्तियों की क्षणिक भूलों में बदल दिया जाता है। और वास्तविक दुनिया के बदले एक ज्यादा संतुलित खुशियों से भरी दुनिया प्रस्तुत की जाती है। यह संतुलन नकली है। अक्सर एकता और उन्नति को एक दूसरे के लिए इस्तेमाल किया जाता है। एकता की परियोजनाओं की उदार धर्म निरपेक्ष आलोचना का इस्तेमाल प्रगति की परियोजनाओं के विध्वंस को न्यायसंगत बनाने के लिए किया जाता है। वे लोग जो सबसे ज्यादा खाए पीए हैं वे जिन्हें समाज की स्थिति बदलने की ज़रा भी जरूरत नहीं है, वे ही इस धोखे भरे संसार के निर्माता हैं। उनका काम सीमाओं पर गश्त लगाना आक्रोश को ठंडा करना क्रोध को असंवैधानिक बनाना तथा युद्ध विराम हासिल करना है।

नरेंद्र मोदी के संदर्भ में शाहरुख खान के जवाब पर गौर फरमाएं, "मैं उन्हें व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता हूं... मेरी कोई राय नहीं है।" वो कहते हैं। “जहां तक मेरा सवाल है उन्होंने मेरे साथ कभी कुछ बुरा नहीं किया।” उदारवादी इतिहासकार रामचंद्र गुहा जो कार्पोरेट घरानों के पैसे से बने न्यू इंडिया फाउंडेशन के संस्थापक सदस्य हैं, अपनी किताब और बहुप्रचारित साक्षात्कारों की श्रृंखला में हमें सलाह देते हैं कि गुजरात सरकार वास्तव में फासिस्ट नहीं है जो नरसंहार हुए वह तो सिर्फ विकार था जिसने अपने को चुनावों के बाद सुधार लिया है।

धर्म निरपेक्ष राष्ट्रीय अख़बारों में संपादक और लेखक गुजरात के नरसंहार के प्रति अपने गुस्से से बाहर आकर मोदी की प्रशासनिक क्षमता का आंकलन कर रहे हैं। और इनमें से ज्यादातर लोग उससे प्रभावित हैं। हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक ने लिखा, "मोदी नरसंहारक हो सकता है, लेकिन वह हमारा नरसंहारक है", और वे ऐसे नरसंहारक से कैसे निबटें जो एक अच्छा मुख्यमंत्री भी है, इस पर अपने द्वंदो का जिक्र करते रहे।

भारत के इस धोखे भरे संस्करण में संस्कृति के क्षेत्र में, बंबइया सिनेमा में, अंग्रेज़ी के भारतीय साहित्य के उभार में.. गरीब सिरे से गायब हैं। उन्हें तो पहले ही मिटा दिया गया है। वे सिर्फ विकास परियोजनाओं तथा स्वयं सेवी संस्थाओं द्वारा बांटी जाने वाली दयानतदारी की तस्वीरों में मुस्कराते हुए नज़र आते हैं।

पिछली गर्मियों में मैं भटकते हुए एक ऐसे वातानुकूलित कमरे में पहुंच गई जहां चार सुंदर, और सीधे किए हुए बालों और दमकती त्वचा वाली लड़कियां बैठी अपने पिल्लों का एक दूसरे से परिचय करवा रहीं थीं। उनमें से एक ने मेरी तरफ मुड़कर कहा, "मैं अपने परिवार के साथ छुट्टियां मना रही थी वहीं पर मुझे आपका बांध आदि पर लिखा पुराना लेख मिला। मैंने अपने भाई से पूछा क्या तुम्हे पता है कि इन दलित और आदिवासियों को विस्थापन आदि के कारण क्या बुरे दिन देखने पड़ रहे हैं... मेरा मतलब उन्हें अपने घरों से खदेड़ दिया गया है वगैरह वगैरह? और आपको पता है मेरा भाई इतना बुद्धू है कि उसने कहा कि यही लोग हैं जो भारत को आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं। उन्हें नेस्तनाबूद कर दिया जाना चाहिए। देखिए न कैसी अजीब बात है? आप आप ऐसा सोच सकती हैं?"

परेशानी यह है कि मैं कर सकती हूं करती हूं।

पिल्ले बहुत प्यारे थे। मैं सोच रही थी कि क्या कुत्ते कभी एक दूसरे का सर्वनाश करने की कल्पना कर सकते हैं? शायद वे इतने प्रगतिशील नहीं हो पाए हैं।

उसी शाम मैंने अमिताभ बच्चन को टाइम्स ऑफ इंडिया के इंडिया पॉइज़्ड अभियान में टेलीविज़न पर देखा। टीवी का एंकर अभियान के बारे में बता रहा था कि यह लोगों को अतीत के रोड़ा अटकाऊ भूत से मुक्त होने को प्रेरित करने के लिए है। निराशा को छोड़कर आशावान बनाने के लिए है। अमिताभ ने अपनी मशहूर गूंजती आवाज़ में कहा, "इस देश में दो भारत हैं।"

एक भारत जंजीर तोड़कर मुक्त हो आगे छलांग लगाने और उन विशेषणों के अनुकूल बनने के लिए तड़प रहा है, जिन्हें हाल में दुनिया हम पर बरसा रही है। दूसरा भारत जंजीरों से बंधा है।

एक भारत कहता है "मुझे मौका दो मैं अपनी योग्यता सिद्ध कर दूंगा।"

दूसरा भारत कहता है, "पहले अपनी योग्यता सिद्ध करो तब तुम्हें मौका दिया जा सकता है।"

एक भारत हमारे हृदयों के आशावाद में रहता है, दूसरा भारत हमारे दिमागों की शंकाओं में झूलता रहता है।

एक भारत चाहता है, दूसरा उम्मीद करता है। एक भारत नेतृत्व करता है दूसरा पीछे चलता है।

ये बदलाव बढ़ रहे हैं।

हर दिन दूसरे भारत से अधिकाधिक लोग इस ओर आ रहे हैं।

और चुपचाप जबकि दुनिया की इस पर नज़र नहीं है एक धड़कता हुआ गतिशील नया भारत उभर रहा है।

और अंत में...

अब एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में साठवें वर्ष में यह यात्रा हमें समय के महान कगार पर ले आई है।

और एक भारत दिमाग के किसी छोटे से कोने में घाटी की ओर देखकर झिझक रहा है। दूसरा भारत आकाश की ओर देख रहा है और कह रहा है यह उड़ान भरने का समय है।

यहां वह धोखे भरी दुनिया अपने बिल्कुल नग्न स्वरूप में सामने आती है।

वह कहती है कि अमीर के पास चुनाव की कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन गरीबों के पास है। वे अमीर बनने का चुनाव कर सकते हैं। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो इसका कारण यह है कि वे आशावाद की जगह निराशावाद, विश्वास की जगह झिझक, चाह की जगह उम्मीद को चुन रहे हैं। दूसरे शब्दों में वे गरीब रहने का चुनाव कर रहे हैं। यह उनकी गलती है। वे कमजोर हैं( और हमें पता है कि लेबेंसरॉम की खोज करने वाले कमज़ोर लोगों के बारे में क्या धारणा रखते हैं.) ये लोग विगत में रोड़ा अटकाने वाले भूत हैं। ये पहले ही भूत हो चुके हैं।

रॉबर्ट जे लिफ्टन का कहना है एक धोखे भरे संसार में नरसंहार आसान हो जाता है, लगभग स्वाभाविक। गरीब तथाकथित गरीबों के पास एकमात्र विकल्प है, या तो विरोध करें या फिर घुटने टेक दें। बच्चन सही फरमा रहे हैं- वे दूसरी ओऱ आ रहे हैं, खामोशी से, और दुनिया नहीं देख रही है। वहां नहीं जहां वह सोचते हैं बल्कि दूसरी और खाई में, हथियारबंद युद्ध की तरफ। वहां से वे पीछे मुड़कर विकास के जारों(Tsars) की ओर देख रहे हैं और उनके नारे कि "और कोई विकल्प है ही नहीं" की खिल्ली उड़ा रहे हैं।

वे महान गांधीवादी जनआंदोलनों को कोर्ट कचहरी के दलदल में भटकते, भूख हड़तालों और जवाबी भूख हड़तालों के चक्कर में धूल धूसरित और अपमानित होते हए देख चुके हैं। ये अतीत के लाखो करोड़ो रोड़ा अटकाने वाले भूत आश्चर्य से सोचते होंगे कि गांधी, अमेरिकी इंडियनों, अफ्रीका के गुलामों, तस्मानिया वासियों, हेरेरो, होटेंटो, आर्मेनियाइयों, जर्मनी के यहूदियों और गुजरात के मुसलमानों को क्या सलाह देते। संभवत: उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि जब वे पहले ही भूख से मर रहे हों तो वे भूख हड़ताल कैसे कर सकते हैं। वे विदेशी सामान का कैसे बहिष्कार कर सकते हैं जबकि उनके पास इन्हें खरीदने के लिए पैसे ही नहीं है। वे कैसे आयकर देने से मना कर सकते हैं जब उनकी कोई आय ही नहीं है।

जिन लोगों ने हथियार उठा लिये हैं उन्हें पता है कि इसका परिणाम क्या होगा। वे जो कर रहे हैं, यह सोचकर कर रहे हैं कि उन्हें उनके ही सहारे छोड़ दिया गया है। वे जानते हैं कि नए भूमि क़ानून गरीबों को अपराधी बना रहे हैं और प्रतिवाद को आतंकवाद से जोड़ा जा रहा है। वे जानते हैं कि आत्मा को अपील, उदार नैतिकता और सहानुभूति भरी प्रेस की रिपोर्टें उनकी कोई मदद नहीं कर सकती हैं। वे जानते हैं कि जब गोलियां चल रही होंगी तब न कोई अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन, न ही भू-मंडलीय प्रतिरोध, और न ही कोई मशहूर लेखक उनके साथ होगा।

भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं से करोड़ों का विश्वास उठ गया है। देश के कई बड़े हिस्से सरकार के नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं। अंतिम आंकड़ों के हिसाब से ये दायरा कम से कम 25 फीसदी होगा। इस लड़ाई में मौत की गंध आती है।

प्रधानमंत्री ने घोषणा की है कि माओवादी संघर्ष "आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है।" यहां तक की सेना को बुलाने की अपीलें भी की गई हैं। मीडिया का इसकी भर्त्सना से गला बंद हो गया है।

ये देखिए एक अखबारी समाचार का उदाहरण। यह कहता है नक्सलियों को खत्म करो।

यह सरकार अंतत: नक्सलवाद का सामना करने की समझ दिखला रही है। माह भर पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्य सरकारों से कहा कि एक विशेष बल बना कर नक्सली ढांचे का गला घोंट दो और उनकी गतिविधियों को पंगु कर दो जिससे कि इस विषाणु को समाप्त किया जा सके। यह इस समझ का संकेत है कि नक्सलवाद को क़ानून व्यवस्था के माध्यम से उखाड़ फेंका जाय न कि विकास पर बेकार खर्च करके।

घोंटना। पंगु करना। विषाणु। संहार। उखाड़ फेंकना।

जी! संहार का विचार हवा में है। और लोगों का मानना है कि संहार के खतरे के सामने लड़ना उनका अधिकार है। जिस तरीके से भी संभव हो। संभवत: वे टिड्डियों की आवाज़ सुनते रहे हैं।

अरुंधती राय

(तुर्की-आर्मेनियाई अख़बार एगोस के संपादक ह्रांन्ट डिंक की हत्या की पहली पुण्य तिथि पर इस्तांबुल में 18 जनवरी, 2008 को दिए गए अरुंधती के भाषण का संपादित रूप है)

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अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 3

  • प्रेषक : मीडिया स्कैन
    भाई बाबू बजरंगी ने चॅनल पर अपने वीरता के किस्से सुने, हद कर दी उन्होने बेशर्मी की। ऐसे ना जाने कितने लोग है। बताया जा रहा है तरुण जी के कैमरे के जाल में फंसे ज्यादा नेता वे थे जो गुजरात में भाजपा की सरकार आने के बाद मलाई खाना चाहते थे, मगर मोदी के नेतृत्व में यह मौका उन्हें नसीब नहीं हुआ, मेरी बात सुन कर मेरे कई मित्र परेशान होंगे, यह एक नरभक्षी की वकालत क्यों कर रहा है? मगर मोदी की यह तस्वीर मीडिया ने गढी है। मैं गुजरात होकर आया हूँ, मुसलमानों से बात की है मैंने। वह खुश है मोदी के राज में। क्या कोई छापेगा इसे। हाँ जहाँ तक नैतिकता की बात है मोदी को मुख्यमंत्री के नाते सांप्रदायिक दंगों की जिम्मेवारी लेनी चाहिय, लेकिन भाई तरुण जी को यह सब चुनाव के समय क्यों याद आ रहा है। वह नहीं जानते जाने-अनजाने में वे मोदी की मदद ही कर रहे हैं।
  • प्रेषक : aslam
    dimag ki saari naso ko hilane dene wali jankariya deti hain arundhati roy,main inki 3 kitabe padh chuka hu,aur kahin bhi bolte hue mujhe inki baate madad karti hain,magar main baat khatam karte hue hardam sochta hu ki woh baat khatam nahi karti hain..balki jo jaisa chahe unke likhe main se chun le, aisi kosish karti hain, unhe maine kareeb se dheka hain..aandolno ke saath,woh apne liye kaunsa sa rasta chun rahi hain? yeh sahi hain ki woh hamare liye nahi tay karengi.hamare liye to hum hi tay karenge..ki hume hatiyar ke saath vichar chahiye,yah sirf hatiyar chahiye..yah sirf vichar chahiye,jahan har tarah ki koshish ko dabaya ja raha hain..chahe woh janwadi loktantarik aandolan ho,yah hatiyar band..sarkar har us kadam ko kuchal dene ki firaq main jo bhi zal,zameen aur jungle ki baat karte hain..baki kaun kya karta hain unhe koi pareshani nahi hain,kyonki woh baki log unki vikas ki paribasha ki han main han milate hain..yeh vidroh ka waqt to hain magar woh virodh kis tarah ka hoga, hum main se har ek ko tay karna hoga..jo ki yeh mante hain ki yeh intezami zammuriyat bardashat ke bahar hain...long Live Revolution
  • प्रेषक : सुशील
    मुझे हमेशा इनकी कलम से निकले शब्दों का इंतजार रहता है क्योंकि ये हमारी आत्मा को झकझोर देती है सोचने को मजबूर कर ती है. ओर ये सच्चाई को कही से भी निकाल लेती है यह भाषण भी उसकी ही निशानी है.