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   टिड्डियों की आवाज़--नरसंहार, नकार और विजयोत्सव
यह लेख तुर्की-आर्मेनियाई अख़बार एगोस के संपादक ह्रांन्ट डिंक की हत्या की पहली पुण्य तिथि पर इस्तांबुल में 18 जनवरी, 2008 को दिए गए अरुंधती रॉय के भाषण का संपादित रूप है.
मैं यहां आपके सामने विश्वविख्यात विद्वान के रूप में भाषण देने नहीं आई हूं या इस देश में घर कर गए उस मौन को भरने नहीं आई हूं जिसने यहां 1915 में अनातोलिया में घटी उन घटनाओं की स्मृति को ढंक लिया है। यही काम ह्रांट डिंक ने करने की कोशिश की थी जिसकी कीमत उन्होंने अपनी जान देकर चुकाई।
मैं जिस दिन इस्तांबुल पहुंची यहां की सड़कों पर घंटों घूमती रही और जब मैं अपने इर्द गिर्द इस्तांबुल के लोगों से ईर्ष्या करते हुए, शहर की खूबसूरती, रहस्यमयता, जीवंतता को देख रही थी कि एक दोस्त ने सफेद टोपियां पहने ऐसे लड़कों की ओर इशारा किया जो शहर में किसी चकत्ते की तरह अचानक उभऱ आए थे। उसने समझाया कि वे उस बाल हत्यारे के प्रति अपनी एकजुटता दर्शा रहे हैं जो कि ह्रांन्ट की हत्या करते समय सफेद टोपी पहने था।
तुर्की के इस्तांबुल में टोपी पहनने वालों से लड़ाई मुझे नहीं लड़नी हैं, यह आपकी लड़ाई है। मेरी लड़ाई अपने देश में अलग तरह की टोपी पहनने वालों और मशाल लेकर चलने वालों से है। एक तरह से ये लड़ाइयां बहुत भिन्न भी नहीं है, फिर भी एक महत्वपूर्ण अंतर है। यहां तुर्की में पूरी तरह चुप्पी है, जबकि भारत में उत्सव का माहौल है, मैं कह नहीं सकती कि इनमें ज्यादा खराब कौन है?
गुजरात राज्य में 2002 में मुसलमानों का नरसंहार हुआ था। मैं नरसंहार शब्द का प्रयोग सोच-समझकर और संयुक्त राष्ट्र संघ के नरसंहार अपराध निवारण और दंड सम्मेलन की धारा 2 को ध्यान में रखकर कर रही हूं। यह नरसंहार उस अनसुलझे अपराध की सामूहिक रूप से सजा देने के लिए शुरू हुआ जिसमें रेलवे के एक डिब्बे में आग लग जाने से 52 हिंदू तीर्थ यात्री झुलसकर मर गए थे। सोच समझकर पूर्व निर्धारित योजना के तहत बनाई गई इस तथाकथित बदले की कार्यवाही में दिन दहाड़े फासिस्ट अर्धसैन्य संगठन के द्वारा संगठित हथियार बंद हत्यारों के गिरोहों ने तत्कालीन गुजरात सरकार व प्रशासन की शह पर दो हज़ार मुसलमानों का कत्लेआम कर दिया। मुस्लिम महिलाओं को सामूहिक बलात्कार के बाद जिंदा जला दिया गया। मुसलमानों की दुकानों, मुसलमानों के व्यवसायों और मुसलमानों की दरगाहों और मस्जिदों को सुनियोजित ढंग से बर्बाद किया गया। तकरीबन एक लाख पचास हजार लोगों को बेघर कर दिया गया।
आज भी इनमें से कई गंदी बस्तियों में जी रहे हैं जिनमें से कुछ तो कूड़े के ढ़ेर पर बसी हैं- जहां न पानी की आपूर्ति है, न नाला है और न रोशनी, स्वास्थ्य की कोई व्यवस्था नहीं है। सामाजिक तथा आर्थिक रूप से बहिष्कृत वे दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में जी रहे हैं। इस बीच हत्यारों, पुलिस व नागरिक, दोनों की जयजयकार हो रही है, उन्हें पुरस्कृत किया जा रहा है। आज स्थिति को सामान्य बताया जा रहा है। इस 'सामान्यता' पर अपनी मुहर लगाते हुए देश के दो प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा और मुकेश अंबानी ने 2004 में सार्वजनिक रूप से गुजरात को वित्तीय पूंजी निवेश की सबसे मनोवांछित जगह घोषित किया।
राष्ट्रीय प्रेस का शुरुआती हो-हल्ला थम चुका है। गुजरात में जनसंहार को बेशर्मी से गुजराती गौरव, हिंदुत्व और यहां तक कि भारतीयता के रूप में गौरवांवित किया जा रहा है। इस विषैली शराब को लगातार दो चुनाव जीतने के लिए इस्तेमाल किया जा चुका है। जिसके चुनाव अभियानों में आधुनिकता और लोकतंत्र की भाषा और उसके संसाधनों को बहुत ही चतुराई से इस्तेमाल किया गया। इसके कर्णधार नरेंद्र मोदी लोकनायक बन गए हैं और भाजपा उन्हें देश के अन्य राज्यों में भी चुनाव प्रचार के लिए बुला रही है।
जब नरसंहारों की बात करें तो गुजरात के नरसंहार की तुलना कांगो, रवांडा औऱ बोस्निया के जनसंहारों से नहीं की जा सकती, जहां मारे गए लोगों की संख्या लाखो में है, या फिर यह भारत का ही पहला नरसंहार नहीं था (उदाहरण के लिए 1984 में दिल्ली की सड़कों पर तीन हज़ार सिखों का इतनी ही निर्ममता के साथ कांग्रेस पार्टी की देख-रेख में कत्लेआम हुआ था)। लेकिन गुजरात का जनसंहार एक ज्यादा व्यापक, नियोजित और व्यवस्थित दृष्टि का हिस्सा है। यह हमें बतलाता है कि गेंहूं पक रहा है और टिड्डे भारत के हृदय स्थल पर पहुंच गए हैं।
नरसंहार लोगों का एक पुराना शगल रहा है। इसने सभ्यता की राह में प्रामाणिक भूमिका निभाई है। 149 ई. पूर्व में हुआ तीसरा प्युनिक युद्ध उन सबसे पहले के नरसंहारों में है जिसके प्रमाण मिलते हैं। माना जाता है कि इसमें कांथेज को नष्ट कर दिया गया था। जिनोसाइड (नरसंहार) शब्द का प्रयोग सबसे पहले रेफेल लेमकिन ने 1943 में किया था और संयुक्त राष्ट्र ने इसे 1948 में नाजियों द्वारा किए गए कत्लेआम (होलोकास्ट) के बाद अपनाया था। संयुक्त राष्ट्र संघ के नरसंहार अपराध का निवारण और दंड सम्मेलन की धारा 2 नरसंहार को इस तरह से परिभाषित करती है—
"इनमें से कोई भी कृत्य जो किसी राष्ट्रीय, जातीय, नस्लीय या धार्मिक समूह को पूरी तरह या आंशिक तौर पर नष्ट करने की मंशा से किया गया हो...जैसे कि समूह के लोगों की हत्या, समूह के लोगों को गंभीर शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुंचाना, जानबूझकर समूह के लोगों पर जीने के तरीके लादना जिससे कि इसका पूरा या आंशिक विनाश हो जाय, ऐसे नियम लागू करना कि समूह में बच्चे ही पैदा न हो पाएं, जन्म पर रोक लगाना, या एक समूह के बच्चों को दूसरे समूह के हवाले कर देना।"
चूंकि इस परिभाषा में वास्तविक या काल्पनिक राजनीतिक विरोधियों को शामिल नहीं किया गया है, इसलिए इतिहास के कई बड़े नरसंहार इसकी परिधि में नहीं आते हैं। मेरे विचार से फ्रैंक चाक और कर्ट जोनासॉन की किताब "द हिस्ट्री एंड सोसियोलॉजी ऑफ जीनोसाइड" की परिभाषा ज्यादा सही है। उनके अनुसार-- "नरसंहार एकतरफा हत्या का एक रूप है जिसमें राज्य या अन्य सत्ताओं की मंशा एक समूह को नष्ट कर देने की होती है, जैसा कि उस समूह और उसके सदस्यों को इस दुष्कर्म को अंजाम देनेवाले परिभाषित करते हैं।" अगर इस परिभाषा के अनुसार देखें तो नरसंहार की परिधि में, उदाहरण के लिए इंडोनेशिया में सुहार्तो (दस लाख), कंबोडिया में पोल पोट (15 लाख), सोवियत रूस में स्टालिन (छह करोड़) और चीन में माओं (सात करोड़) के बड़े-बड़े अपराध भी शामिल होंगे।
सारी चीजों को ध्यान में रखते हुए "उन्मूलन" शब्द ज्यादा उपयुक्त है जो कीड़े-मकोड़ों के समूल विनाश के लिए मोटे तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। जब आतताइयों का कोई गिरोह अपने उत्पीड़ितों के सामने आता है, हत्या के अपने विवेकहीन कृत्य को अंजाम देने से पहले, उनसे अपने मानवीय संबंधों को काट लेना जरूरी होता है। वे जिन्हें उत्पीड़ित करते हैं उन्हें इंसान नहीं बल्कि एक परजीवी प्राणी मानते हैं जिनका खात्मा समाज हित के लिए जरूरी है। उदाहरण के लिए 1636 में कनैक्टिकट में जॉन मैसन के नेतृत्व में प्यूरिटन अंग्रेजों द्वारा पीक्वोट इंडियनों के किए गए नरसंहार के इस वृतांत को देखिए--
जो लोग गोली से बच गए उनकी तलवार से हत्या कर दी गई। कुछ को टुकड़े टुकड़े कर दिया गया तो कुछ को उन्हीं की छुरियां फेंक कर मारा गया जिससे कि उन्हें स्वर्ग जाने में देर नहीं लगी और बहुत ही कम लोग बचकर निकल पाए। अनुमान है कि इस बार इस तरह उन्होंने लगभग 400 लोगों का विनाश किया। उन्हें धधकती हुई आग में जलते हुए देखना डरावना था और खून की धारा उसी आग को बुझा रही थी। उसकी दुर्गंध और बू भयानक थी। लेकिन विजय के लिए ये मधुर सी कुर्बानी थी...
और यहां लगभग चार शताब्दी बाद, गुजरात नरसंहार के सबसे बड़े संहारकों में से एक बाबू बजरंगी ने कुछ महीने पहले तहलका के एक स्टिंग ऑपरेशन में छिपे कैमरे के सामने कहा—
हमने एक भी मुसलमान की दुकान को नहीं छोड़ा, हमने सब कुछ आग के हवाले कर दिया, मारा जलाया आग में झोंक दिया। हम उन्हें जलाना चाहते थे क्योंकि ये हरामजादे दाह संस्कार नहीं चाहते। वे इससे डरते हैं। मेरी एकमात्र ख्वाहिश थी चाहे मुझे मौत की सज़ा हो जाए... मुझे फांसी की परवाह नहीं है...मुझे फांसी पर चढ़ाने से पहले सिर्फ दो दिन का समय दे दिया जाय, मैं जुहापुरा जाउंगा जहां वे सात-आठ लाख लोग रहते हैं वहां गदर मचा दूंगा। मैं उसे तबाह कर दूंगा कुछ औऱ को मरना चाहिए... कम से कम 25 से 50 हज़ार लोग मरने चाहिए।
यह कहने की जरूरत नहीं है कि बाबू बजरंगी को नरेंद्र मोदी का वरदहस्त था, पुलिस का संरक्षण था और अपने लोगों का प्यार भी था। वह अभी भी गुजरात में किसी भी स्वतंत्र आदमी की तरह घूम रहा है। जिस एक मात्र अपराध के जिसके लिए उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता है वह है नरसंहार से मुकरने का।
नरसंहार को नकारना, पुराने खूनी विजयवाद का बिल्कुल नया तरीका है यह शायद 19वीं शताब्दी में जन्मी, ठोक पीट कर बनी दोहरी नैतिकता से पैदा हुआ है। जब यूरोप अपने घर में सीमित पर लोकतंत्र के नए रूप और नागरिक अधिकारों को विकसित कर रहा था और दूसरी ओर अपने उपनिवेशों में लाखों लोगों के उन्मूलन में लगा हुआ था। अचानक देशों और सरकारों ने अपने द्वारा किए हुए संहारों को नकारना या छिपाना शुरू कर दिया।
हिरोशिमा एंड अमेरिका- फिफ्टी ईयर्स ऑफ डिनायल के लेखक प्रो. रॉबर्ट जे लिफ्टन का कहना है, "नकारने का मतलब वास्तव में कहना है कि हत्यारों ने हत्या नहीं की। किसी की हत्या नहीं हुई। नकारने का सीधा प्रभाव ये होता है कि यह अगले नरसंहार का रास्ता साफ कर देते हैं।"
सच पूछिए तो आज जब कि नरसंहार की राजनीति और मुक्त बाज़ार मिल रहे हैं, नरसंहारों को आधिकारिक तौर पर स्वीकारना या नकारना एक बहुराष्ट्रीय धंधा हो गया है। इसका ऐतिहासिक तथ्यों या फॉरेंसिक प्रमाणों से शायद ही कोई लेना-देना हो, नैतिकता तो बहुत दूर की बात है। यह एक ऐसी सौदेबाजी हो गया है जिसका संयुक्त राष्ट्र से कम बल्कि विश्व व्यापार संगठन से ज्यादा लेना देना है।
तेल के एक बैरल (या एक टन यूरेनियम) के दाम में गिरावट या बढो़त्तरी, सैनिक ठिकाने बनाने की इजाजत या देश की अर्थव्यवस्था का उदारीकरण यह तय करते हैं कि किसी सरकार की नज़र में जनसंहार हुआ या नहीं। या कहीं नरसंहार होने जैसी परिस्थितियां हैं या नहीं। और जब ये होगा तो इसकी ख़बरें आएंगी या नहीं आएंगी। और अगर ये आईं भी तो उन्हें किस तरह से लिया जाएगा। उदाहरण के लिए कांगो में 20 लाख लोगों की मौत का कहीं कोई जिक्र नहीं हुआ। क्यों? और एक लाख ईराकियों की अमेरिकी आक्रमण से पहले प्रतिबंधों के दौर में हुई मौत (इराक में संयुक्त राष्ट्र के मानवीय को ऑर्डिनेटर डेनिस हेली डे ने कहा था) नरसंहार था या संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत मेडलिन अल्ब्राइट के दावे के मुताबिक ये बिल्कुल ठीक था? यह इस पर निर्भर करता है कि नियम कौन बनाता है। बिल क्लिंटन? या एक ईराकी मां जो अपनी संतान गंवा चुकी है?
चूंकि अमेरिका दुनिया का सबसे अमीर और ताकतवर देश है, इसलिए उसने नरसंहार से इनकार करने वाले दुनिया के नंबर एक देश का दर्जा पा लिया है। वह आज भी कोलंबस दिवस मनाता है, वह दिन जब क्रिस्टोफर कलंबस अमेरिका पहुंचा था, औऱ उसके बाद नरसंहार की प्रक्रिया शुरू हुई थी, जिसमें लाखों स्थानीय लोगों का पूरी तरह विनाश कर दिया गया था, स्थानीय मूल निवासियों के लगभग 90 फीसदी का। लॉर्ड एमहर्स्ट जिसने स्थानीय लोगों को मारने के लिए चेचक के जीवाणुओं से प्रदूषित कंबल बांटने का तरीका सुझाया था, उसके नाम पर मैसैच्युसेट्स में एक विश्वविद्यालय का कस्बा और एक प्रतिष्ठित कला विद्यालय है।
अमेरिका के दूसरे नरसंहार में तकरीबन तीन करोड़ अफ्रीकियों का अपहरण करके उन्हें गुलामी के लिए बेंच दिया गया था। हां तथ्य यह भी है कि इनमें से आधे रास्ते में ले जाते हुए ही मर गए थे। लेकिन 2002 में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने डरबन में हो रहे नस्लभेद विरोधी सम्मेलन में गुलामी और गुलामों के व्यापार को अपराध मानने से ही मना करते हुए वाक आउट कर दिया था। वह इस बात पर अड़े रहे कि उस समय गुलामी कानून सम्मत थी। अमेरिका ने हिरोशिमा, नागासाकी, टोक्यो, ड्रेसडेन और हैमबर्ग पर की गई बमबारी को जिसमें लाखो लोग मारे गए थे नरसंहार तो छोड़िए अपराध मानने से ही इनकार कर दिया। यहां उनका तर्क है कि सरकार की मंशा नागरिकों को मारने की नहीं थी। यह ‘आनुषंगिक नुकसान’(Collateral damage) विचार के विकास का पहला चरण था। दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से अमेरिकी सरकार ने सौ देशों में खुले आम 400 बार और गुपचुप तरीके से 6000 बार सैन्य दखलंदाजियां की हैं। इसमें वियतनाम पर आक्रमण भी शामिल है। जिसमें तीस लाख वियतनामियों का (कुल जनसंख्या का लगभग 10 फीसदी) सदिच्छाओं के चलते सफाया कर दिया गया।
इनमें से किसी को भी युद्ध अपराध या नरसंहार नहीं माना गया।
“प्रश्न यह है,” रॉबर्ट मैकनामारा- जो 1945 में टोक्यो पर बम गिराने (जिसमें रातो रात एक लाख लोग मर गए) के बाद पहले वियतनाम युद्ध के योजनाकार बने और अब विश्व बैंक के अध्यक्ष बन, अपने आरामदायक देश में, आरामदायक घर में, आरामदायक कुर्सी पर बैठकर फरमाते हैं, "प्रश्न यह है कि एक अच्छाई के लिए आपको कितनी हैवानियत को अंजाम देना पड़ता है?"
रॉबर्ट लिफ्टन की वो बात कि नरसंहार से इनकार अगले नरसंहार का रास्ता तैयार करती है, का इससे बेहतर कोई और साक्षात उदाहरण हो सकता है?
और जब पीड़ित आततायी हो जायें तब? (रवांडा में, कांगो में?) इज़राइल के बारे में क्या कहा जाय, स्वयं जिसका निर्माण मानवीय इतिहास के सबसे निर्मम नरसंहार के मलबे से किया गया है? कब्जा किए गए भू-भाग पर इसके कृत्यों पर क्या कहा जाय? इसकी फैलती हुई बस्तियां, पानी पर कब्जा, इसकी वह नई सुरक्षा दीवार जो फिलिस्तीनी जनता को अपने खेत-खलिहान, अपने रोजगार, अपने रिश्तेदारों, उनके बच्चों को स्कूलों, अस्पतालों और डॉक्टरों से अलग करती है? यह एक तरह से मछलियों के कटोरे में किया जा रहा नरसंहार है, धीमी गति से किया जा रहा नरसंहार जो खासतौर पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के नरसंहार के निवारण और दंड की धारा 2 को मूर्तरूप में सामने लाने लाता है जिसके मुताबिक नरसंहार होता है "जानबूझकर किसी समूह पर जीने के तरीके लादना जिससे कि इसका पूरा या आंशिक विनाश हो जाय "
नरसंहार का इतिहास बतलाता है कि यह कोई अपवाद या विसंगति नहीं है बल्कि मानवीय तंत्र में एक खोट है। यह एक बहुत ही पुरानी आदत है, जो मनुष्य में उसी तरह विद्यमान है जैसे कि प्रेम कला और दूसरी भावनाएं।
15वीं शताब्दी से शुरू हुए ज़्यादातर जनसंहार यूरोप में रहने की जगह की तलाश के चलते हुए जिसे जर्मन लोग लेबेंसरॉम कहा करते थे। लेबेंसरॉम शब्द को जर्मन भूगोलवेत्ता और प्राणि विज्ञानी फ्रेडरिक रेटजेल ने ईजाद किया था, जिनका कहना था कि ताकतवर मानव नस्लों की स्वाभाविक प्रवृत्ति मात्र रहने के लिए इलाकों की तलाश भर नहीं है बल्कि इसमें विस्तार भी शामिल है। विस्तार की यह तीव्र इच्छा स्वाभाविक है कि कम ताकतवर नस्लों, कमजोर नस्लों की कीमत पर ही होगी जिनके बारे में नाजी विचारकों का मानना था कि उन्हें ताकतवरों के रास्ते से हट जाना चाहिए।
लेबेंसरॉम का विचार सही अर्थों में पहली बार 1901 में सामने आया था लेकिन यूरोप लेबेंसरॉम के रास्ते पर 400 साल पहले ही अपने कदम रख चुका था जब कोलंबस अमेरिका में पहुंचा था। लेबेंसरॉम की तलाश में यूरोपवासी एक के बाद नरसंहार करते हुए अफ्रीका भी पहुंचे थे। जर्मन्स ने तो दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका की होरोरॉस आबादी का लगभग सूपड़ा-साफ ही कर दिया था, जबकि कांगो में बेल्जियनों के व्यावसायिक विस्तार के प्रयोग में एक करोड़ लोगों ने अपनी जान गवाई। 19 वीं शताब्दी के अंतिम ढ़ाई दशको में अंग्रेज़ों ने तस्मानिया की मूल और ऑस्ट्रेलिया की ज़्यादातर आबादी का ही सफाया कर दिया था।
‘एक्सटर्मिनेट द ब्रूटस’ के लेखक स्वेन लिंडक्विस्ट का कहना है कि हिटसर की लेबेंसरॉम की खोज ने ही, ऐसी दुनिया में जिसे कि अन्य यूरोपीय देशों ने अपने हिसाब से बना लिया था, नाजियों को पूर्वी यूरोप और रूस की ओर बढ़ने के लिए बाध्य किया। पूर्वी यूरोप और पश्चिमी रूस के यहूदी, हिटलर की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा के बीच आ रहे थे। इसलिए जैसा कि अफ्रीका, अमेरिका और एशियाई मूल के लोगों के साथ हुआ था, उन्हें भी या तो गुलाम बनाया जाना या फिर उनका सफाया किया जाना ज़रूरी था। इसलिए लिंडक्विस्ट कहते हैं कि नाजियों की यहूदियों के प्रति नस्लीय अमानवीयता को पागलपन का आक्रोश कह कर दरकिनार नहीं किया जा सकता है। यह एक बार फिर जानी-पहचानी चीज़ों का सम्मिश्रण है-- पुराने नस्लवाद में भढ़िया तरीके से लिपटा आर्थिक निर्णायकवाद जो कि हमेशा से ही तत्कालीन यूरोपीय परंपरा का हिस्सा रहा है।
यह सिर्फ संयोग नहीं कि जिस राजनीतिक पार्टी ने ऑटोमन साम्राज्य के दौर में आर्मेनिया में नरसंहार किया उसका नाम कमेटी फॉर यूनियन एंड प्रोग्रेस था। गठबंधन (नस्लीय, जातीय, धार्मिक, राष्ट्रीय) और उन्नति नरसंहार के सहयोगी रहे हैं।
इतिहास को इस नज़रिए से देखते हुए यह चिंता बहुत ही स्वाभाविक है कि जो राष्ट्र उन्नति के मुहाने पर दिख रहा है क्या वह नरसंहार की दिशा में भी बढ़ रहा है? क्या वह भारत, जिसकी पूरी दुनिया में, उन्नति और लोकतंत्र के लिए जय जयकार हो रही है, वह नरसंहार के मुहाने पर खड़ा है? इस तरह की बात इस समय करना बेमतलब का लग सकता है और नरसंहार का प्रयोग तो निश्चय ही गैर जरूरी कहा जाएगा। फिर भी अगर हम भविष्य की ओऱ देखते हैं, औऱ विकास के बादशाह स्वयं अपनी प्रचार सामग्री में मानते हैं कि उनके द्वारा चुने गए प्रगति के मॉडल के अलावा और कोई विकल्प नहीं है तो यह तय है कि उन्हें हत्याएं करनी ही होंगी, और बड़ी संख्या में करनी होंगी, अपना रास्ता बनाने के लिए।
टुकड़ों-टुकड़ों में रिस रिस कर जिस तरह से समाचार आ रहे हैं, बहुत साफ दिखाई देने लगा है कि हत्याएं और मौतें तो शुरू हो चुकी हैं।
सन 1989 में सोवियत रूस के विघटन के तत्काल बाद भारत सरकार ने गुटनिरपेक्षता से नाता तोड़ गुट सापेक्षता को ये कहते हुए अपना लिया कि हम इज़राइल अमेरिका के स्वाभाविक सहयोगी हैं। इन तीनों के बीच कम से कम एक चीज़ तो समान है-- ये तीनों खुलेआम सीधे-सीधे नव औपनिवेशिक सैनिक कब्जा जमाए हुए हैं। भारत कश्मीर में, इज़राइल फिलिस्तीन में, अमेरिकी इराक में।
दो प्रमुख राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियां भाजपा, और कांग्रेस एकता और उन्नति के भारतीय संस्करणों के लिए दिन-रात काम कर रही हैं। इसको आधुनिक भाषा में राष्ट्रवाद और विकास कहा जाता है। रह रह कर खास कर चुनाव के समय जानी पहचानी पारिवारिक तूतू-मैंमैं का नाटक होता है और चुनावों के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी जैसे धुर विरोधियों को भी साथ ले लिया जाता है।
जहां एकता परियोजना हिंदू राष्ट्रवाद परोसती है (जो कि हिदू वोट को एकताबद्ध करते हैं, आप को मानना पड़ेगा कि भारत जैसे महान लोकतंत्र के लिए यह जरूरी है) वहीं विकास परियोजना का लक्ष्य 10 फीसदी वार्षिक विकास दर है। इन दोनों ही परियोजनाओं में नरसंहार अंतर्निहित है।
एकता परियोजना की जिम्मेदारी मुख्य रूप से आरएसएस को दी गई है। जो कि भाजपा और इसके अर्ध सैनिक संगठनों विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दलों की होल्डिंग कंपनी है। आरएसएस की स्थापना 1925 में हुई थी। 1930 में इसके संस्थापक डॉ. हेडगेवार, जो बेनिटो मुसोलिनी के प्रशंसक थे, ने इसे इतावली फासीवादी मॉडल पर गढ़ना शुरू कर दिया था। हिटलर भी प्रेरणा का स्रोत था और आज भी है। यहां प्रस्तुत है एमएस गोलवलकर, जिन्होंने डॉ. हेडगेवार के बाद 1940 में आरएसएस की कमान संभाली थी, द्वारा रचित आरएसएस की बाइबिल मानी जाने वाली, ‘वी आर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ के कुछ अंश—
"उस कुदिन, जब पहली बार मुसलमानों का हिंदुस्तान की सरजमी पर कदम पड़ा था से लेकर आज तक हिंदू राष्ट्र इन लुटेरों से वीरता पूर्वक लड़ रहा है। हिंदुओं की जातीय चेतना जाग रही है।"
"हिंदुओं की भूमि हिंदुस्तान में हिंदू राष्ट्र बसता है और बसना चाहिए। अन्य सभी राष्ट्र द्रोही और राष्ट्रहित के दुश्मन हैं। या थोड़ी उदारता बरतें तो बेवकूफ हैं..."
"विदेशी नस्लें हिंदुस्तान में रह सकती हैं मगर उन्हें हिंदू राष्ट्र की सर्वोच्चता स्वीकारनी होगी। वे कोई हक नहीं जता सकते उन्हें कोई विशेषाधिकार नहीं होगा, किसी तरजीह की बात करना ही बेकार है। यहां तक की नागरिकता का भी अधिकार नहीं होगा। "
आगे कहा गया है-
"अपनी नस्ल और संस्कृति को अक्षुण्ण और शुद्ध बनाए रखने के लिए यहूदियों का सफाया करके जर्मनी ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया था। नस्लीय गौरव यहां अपने चरम पर दृष्टिगोचर होता है... हिंदुस्तान में हमारे लिए ये एक अच्छा सबक है जिससे हम लाभ उठा सकते हैं।"
(इस तरह की व्यवस्थित घृणा का आप कैसे मुकाबला करेंगे? धर्म निरपेक्षता के मीठे बोल बोलकर तो कतई नहीं।)
सन 2000 तक आरएसएस की 45 हज़ार शाखाएं और 70 लाख स्वयंसेवकों की फौज इस दर्शन का पाठ पूरे देश में पढ़ा रही थी। इसमें भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पूर्व गृहमंत्री और वर्तमान में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी और निश्चय ही तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने नरेंद्र मोदी शामिल हैं। इसके अलावा मीडिया, पुलिस, सेना, गुप्तचर एजेंसी, न्यायपालिका तथा प्राशासनिक सेवा के वरिष्ठ लोग भी शामिल हैं, जो अनौपचारिक रूप से हिंदुत्व-आरएसएस की विचारधारा के अनुयायी हैं। ये लोग नेताओं की तरह नहीं हैं जो आते जाते रहते हैं बल्कि सरकारी मशीनरी के स्थाई सदस्य हैं।
लेकिन आरएसएस की सबसे बड़ी ताकत है कि उसने दशकों के कठिन परिश्रम से समाज के सभी तबकों में अपनी संस्थाओं का जाल फैला दिया है, एक ऐसा करिश्मा जिसका दावा कोई अन्य संगठन नहीं कर सकता है।
भाजपा उसका राजनैतिक मंच है। उसका अपना मजदूर संगठन(भारतीय मज़दूर संघ), महिला शाखा(राष्ट्रीय सेविका समिति), छात्र शाखा(अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) और एक आर्थिक शाखा(स्वदेशी जागरण मंच) है।
विद्या भारती इसका ग़ैर सरकारी सेक्टर का सबसे बड़ा शैक्षणिक संगठन है। इसकी 13 हज़ार शैक्षणिक शाखाएं हैं, जिसमें सरस्वती विद्या मंदिर स्कूल हैं जहां 70 हजार शिक्षक पढ़ाते हैं और 17 लाख से ज्यादा छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं। इसके संगठन आदिवासियों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों, इतिहासकारों के साथ, भाषा के क्षेत्र में, झुग्गी झोपड़ी में, स्वास्थ्य के क्षेत्र में, कुष्ठ रोगियों के लिए, सहकारी संगठनों के लिए, अखबार और अन्य प्रचार प्रसार सामग्री के लिए, धर्म और धर्म प्रचार के लिए कार्य करते हैं। इस सूची का कोई अंत नहीं है।
11 जून 1989 को कांग्रेस पार्टी के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आरएसएस को एक तोहफा दे दिया। उन्होंने पूरी उदारता से अयोध्या में विवादास्पद बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा दिया, जिस पर आरएसएस का दावा था, कि यहां भगवान राम का जन्म हुआ था। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पार्टी ने प्रस्ताव पास कर कहा कि अयोध्या में मस्जिद तोड़कर मंदिर बनाया जाएगा। लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि "मुझे पक्का यकीन है कि प्रस्ताव वोट में परिवर्तित होगा।" 1990 में उन्होंने पूरे देश में रथयात्रा निकाली और मांग की कि बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया जाय। इसके फलस्वरूप दंगे और खून खराबे हुए। 1991 में बीजेपी को संसदीय चुनाव में 120 सीटें मिली (1984 में उसकी दो सीटें थी)। आडवाणी द्वारा शुरू हुआ तांडव 1992 में शिखर पर पहुंचा जब 1992 में उपद्रवी भीड़ द्वारा बाबरी मस्जिद तोड़ दी गई। 1998 में भाजपा केंद्र में सत्तासीन हो गई। सत्ता में आते ही उसने पहला परमाणु परीक्षण किया। पूरे देश में फासीवादी और कारपोरेटों, राजा और रंक सब ने मिलकर भारत के हिंदू बम का उत्सव मनाया।
2002 में नरेंद्र मोदी की सरकार ने गुजरात नरसंहार की योजना बनाई और उसे कार्यान्वित किया। नरसंहार से कुछ ही दिनों बाद हुए चुनाव में वह जबर्दस्त बहुमत से सत्ता में फिर से वापस आ गए। उन्होंने पूरा ध्यान रखा कि जिन लोगों ने नरसंहार को अंजाम दिया था उन्हें किसी तरह का कोई दंड न मिलने पाए। उन विरले मामलो में जिनमें अगर किसी को सज़ा हुई भी तो वे लोग तो बस छोटे-मोटे प्यादे ही थे।
सज़ा न होने का आश्वासन नरसंहार की पहली ज़रूरत है। भारत में सामूहिक नरसंहार के मामलों में दंडमुक्ति की महान परंपरा पहले से ही विद्यमान है। मैं इस तरह के विवरणों से कई किताबे लिख सकती हूं।
एक लोकतंत्र में आपको दंड मुक्ति के लिए "उपयुक्त माध्यम-- प्रॉपर चैनल का इस्तेमाल करना होता है।" प्रक्रिया पर ही सारा दारोमदार रहता है। सरकार ने नरसंहार के कई मामलों में जिन्हें सरकारी वकील नियुक्त किया वे वकील पहले ही कई अभियुक्तों का मुकदमा लड़ रहे थे। इसमें अनेक आरएसएस और विश्व हिंदु परिषद के सदस्य थे और जिनके पक्ष में वे तथाकथित मुकदमा लड़ रहे थे उनके प्रति खुलेआम शत्रुतापूर्ण रुख रखते थे। नरसंहार से बचे प्रत्यदर्शियों ने पाया कि जब वे अपना बयान लिखवाने पुलिस के पास जाते हैं तो पुलिस उनके बयान को गलत तरह से दर्ज करती है और अपराधियों के नामों को लिखने से ही मना करती है। उन कई मामलों में जहां बच गए पीड़ितों ने अपने परिवार के लोगों की हत्या होते हुए देखी थी (उन्हें जिंदा जला दिया गया ताकि उनकी लाश न मिले) ऐसे मामलो में पुलिस ने केस दर्ज करने से ही इंकार कर दिया।
कांग्रेस के नेता व कवि एहसान जाफरी, जिन्होंने राजकोट चुनाव में मोदी के खिलाफ प्रचार करने की गलती की थी, की सार्वजनिक रूप से हत्या कर दी गई। एक ऐसी भीड़ द्वारा जिसका नेतृत्व उन्हीं का कांग्रेसी साथी कर रहा था। एक व्यक्ति जिसने इस कृत्य में हिस्सा लिया था उसकी जुबानी सुनिए—
पांच लोगों ने उसे पकड़ा, फिर किसी ने उस पर तलवार से हमला किया.. उसका हाथ काट दिया.. फिर पांव काटे... फिर सब काट दिया टुकड़े-टुकड़े करने के बाद उसे लकड़ी के बनाए ढेर पर डाल दिया और आग लगा दी। उसे जिंदा जला दिया।
जब अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर पीसी पांडे बिल्कुल पड़ोस के ही एक इलाके में घूमने की उदारता दिखा रहे थे, तब उपद्रवी भीड़ ने ज़ाफरी के साथ 70 और लोगों की हत्या कर दी और 12 महिलाओं को बलात्कार के बाद जिंदा जला दिया गया। । जब मोदी पुन: चुनाव जीते, पांडे को प्रोन्नति दी गई और गुजरात पुलिस महानिदेशक बना दिया गया। नरसंहार का पूरा तंत्र यथावत रहा।
दिल्ली में सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ धमकानेवाली बाते कीं, फिर उसने भी मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। कांग्रेस औऱ कम्युनिस्टों ने काफी हो-हल्ला तो किया पर किया कुछ नहीं।
तहलका के स्टिंग ऑपरेशन में जो थोड़े दिन पहले प्राइम टाइम में टेलीकास्ट हुआ था, बाबू बजरंगी के अलावा एक के बाद दूसरा हत्यारा बताता चला गया कि किस तरह से नरसंहार की योजना बनी और कैसे उसे क्रियांवित किया गया। कैसे मोदी और वरिष्ठ नेतागण और पुलिस अधिकारी व्यक्तिगत रूप से इसमें शामिल थे। इसमें कोई भी सूचना नई नहीं थी, लेकिन इस बार स्वयं कसाई सबके सामने थे, जो समाचार चैनलों पर न सिर्फ स्वीकार कर रहे थे बल्कि अपने किए अपराध के लिए शेखी भी बघार रहे थे। इस स्टिंग पर ज्यादातर जनता की प्रतिक्रिया गुस्से की नहीं थी बल्कि इसको दिखाए जाने के समय को लेकर शंका थी। अधिकांश लोगों का मानना था कि इससे मोदी को लाभ होगा और वह चुनाव जीत जाएगा। कुछ का तो अविश्वसनीय ढंग से यहां तक कहना था कि उसने यह स्टिंग ऑपरेशन खुद ही करवाया है। अंतत: वह चुनाव जीत गए। और इस बार एकता और प्रगति के नाम पर। भाजपा की रैली में हजारो जान छिड़कने वाले समर्थक मोदी का प्लास्टिक का मुखौटा पहनते हैं। हत्या के नारे लगाते हैं। लोकतांत्रिक फासिस्ट, लाखो छोटे-छोटे फासिस्टों में तब्दील हो गया है। ये सब लोकतंत्र के फायदे हैं। क्या नाजी जर्मनी में हिटलर का मुखौटा पहनने की किसी की हिम्मत हो सकती थी?
गुजरात के ब्लूप्रिंट क्रियांवित करने की तैयारी भाजपा द्वारा शासित दूसरे राज्यों-- उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में चल रही है।























