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कैसे मानें वो हैं हमारे?
जब बात चले हमारी, वो सोएं पांव पसारे. पूरा पढें... |
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   ग्लोबलाइज्ड हत्यारे
ग्लोबलाइजेशन के इस ज़माने में हत्यारे का नाम कुछ भी हो सकता है- जॉर्ज मोदी भी और नरेंद्र बुश भी वह गोरा भी हो सकता हैं, सांवला भी और काला भी वह अंग्रेज़ी तो बोल ही सकता हैं मगर यह भी संभव है कि उसे अंग्रेज़ी की एकाध लाइन बोलना ही आता हो उसका पता वाशिंगटन, लंदन, दिल्ली या गांधीनगर भी हो सकता है वह तेल के लिए लोगों को मार सकता है और चुनाव जीतने के लिए भी उसके पास असीमित अधिकार हो सकते हैं, उसके लाखो झंडाबरदार भी हो सकते हैं लेकिन हत्यारा जिस छोटी-सी बात से अक्सर परेशान रहता है वह यह है कि जो उसके सामने रोज़ सिर झुकाते हैं और जिन्हें वह सबसे ज्यादा फायदे पहुंचाता है और जिनसे वह रोज़ पूछता है- केम छो वे भी जानते हैं कि यह दरअसल कौन है और वे भी उस पर भरोसा नहीं करते जबकि हत्यारा उनके साथ इतना अधिक अनौपचारिक होने की कोशिश करता है कि जैसे वह भी तो है उन जैसा एक साधारण आदमी ही, परेशान, थका, औलादों के कारनामों से त्रस्त मगर फिर भी पुरमज़ाक और चुस्त-दुरुस्त और जो उसका सार्वजनिक चेहरा है वह तो सिर्फ दूसरों को डराने के लिए है असली चेहरा तो वह है जो उन्हें दिखाई दे रहा है तो फिर डर कैसा? विष्णु नागर |























