• print प्रिंट करें

   आलू आन मिलो

फॉन्ट आकार Decrease font Enlarge font
image

साहबजी कल एक साहब ने बुला लिया मुझे एक क्लासिकल संगीत नृत्य के प्रोग्राम में। बड़ी विकट गुजरी, मुझ पर नहीं, उन पर।

एक क्लासिकल गायिका ने गाना शुरु किया-प्रीतम आन मिलो।

मेजबान ने पूछा-इस गीत का मतलब समझे कितने सुंदर भाव हैं।

मैंने कहा-कहां सरजी, लगता है कि यह गायिका यह गीत आलू के लिए गा रही है। आलू आन मिलो। इत्ता विरह भाव तो आजकल आलू के लिए देखने को मिलता है, आपको पता है क्या आलू आजकल किस भाव पर मिलता है। और आलू के भाव सुंदर नहीं हैं, बहुत हैं।

मेजबान उखड़ गया बोला तुम सिर्फ आलू के लिए चिंतित रहते हो। शैम।

नहीं मैं सिर्फ आलू के लिए नहीं, चावल के लिए भी परेशान रहता हूं। चावल आन मिलो भी हो सकता है यह कह रही हो। मतलब आजकल की नायिकाएं पति और प्रेमी पर विरह ज्यादा खर्च नहीं करती हैं। अच्छे पति और प्रेमी इफरात में हैं। पर यह बात आलुओं के बारे में नहीं कही जा सकती। मतलब अच्छे और अफोर्डेबल आलू मिलना इन दिनों बहुत मुश्किल हो लिया है-मैंने फुल  स्पष्टीकरण दिया।

तुम्हारे अंदर सौंदर्यबोध नहीं लगता है-मुझे मेजबान ने डांटा।

नहीं मुझे आलू बहुत ही सुंदर लगते है-मैंने अपने आलू बोध के बारे में उन्हे बताया।

जगाये रतिया, बनाये बतिया ना आये रे-तब तक गायिका  दूसरा क्लासिकल गीत शुरु कर चुकी थीं।

सरजी, विकट समस्या से गुजर रही है, ये गायिका। लगता है कि ये पानी की समस्या से गुजर रही है। गर्मी शुरु हो गयी हैं। पानी दिन में आता नहीं है। रात में तीन चार बजे के आसपास पानी आता है। सो ये गायिका जागकर पानी भरती है, जगाये रतिया-क्या बोल हैं-मैंने फिर गीत की अपनी व्याख्या पेश की।

उफ्फ, तुम आलू और पानी के अलावा कुछ और नहीं सोच सकते क्या-मेजबान ने फिर डांटा।

जी एकदम सोच सकता हूं। जगाये रतिया का मतलब यह भी हो सकता है कि इस गायिका का प्रेमी अथवा पति काल सेंटर में काम करता है। रात में तीन बजे वापस आता है नौकरी से। जगाये रतिया का मतलब यह हुआ कि इसके लिए जागकर सुबह दरवाजे खोलने पड़ते हैं। सच्ची में काल सेंटर की नौकरी बहुत मारु होती है, जगाये रतिया-मैंने आगे अपनी अक्ल भर व्याख्या पेश की।

ओ नो आलू पानी नौकरी, इसके अलावा तुम कुछ और भी सोच सकते हो नहीं, लाइफ में कित्ता कुछ है देखने सोचने को-मेजबान ने फिर डांटा।

तब तक गायिका एक नया गीत शुरु कर चुकी थी-नदी नारे ना जाओ, शाम पईंयां पड़ूं।

देखो, कितने महीन  बोल हैं, इस गीत के-मेजबान ने बताया।

जी बिलकुल सही कही रही हैं ये नदी नारे किनारे का माहौल डेंजर टाइप। कल मेरे पड़ोसी जमुना किनारे से गुजर रहे थे, राहजनों ने घेर लिया और उनके थैले से आलू और गेहूं लूट लिये। उनकी पत्नी ने रहम की अपील की  भईया ये ज्वैलरी ले जाओ पर आलू प्लीज छोड़ दो। तो राहजनों ने बताया कि ज्वैलरी लूटने का काम अब बंद हो लिया है। अब तो आलू लुटते हैं। सही कह रही है गायिका आलू के साथ नदी नारे के पास नहीं जाना चाहिए-मैंने अपनी व्याख्या पेश की।

अबकी बार मेजबान ने जोर से डांटा-तुम्हारी पहुंच सिर्फ आलू गेहूं तक ही है।

नहीं आलू गेहूं भी अब मेरी पहुंच से बाहर हो रहे हैं। अब तो इनके गीत ठुमरी सुनकर ही दिल बहलाना पड़ेगा। आप गायिका से कहें ना आलू गेहूं पर कुछ नये विरहगीत लिखें-मैंने अपना आलू विरह साफ किया।

मेजबान ने मुझे प्रोग्राम से बाहर कर दिया है।

मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि लोग आलू  विरह की बात क्यों नहीं समझ रहे हैं। 

आलोक पुराणिक 

इस वर्ग की सभी रचनाएं

अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 0