राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम
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   अमेरिकन खा रहे हैं

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      बुश ने कहा है कि भारतीय पेटू हैं, गेहूं चावल बहुत खाते हैं, सो इनके भाव बढ़े जा रहे हैं। 

      बास ने कहा कि पता लगाकर आओ कि कौन से भारतीय बहुत खाते हैं। 

      सबसे पहले मैं नेताजी के पास पहुंचा। नेताजी दारु में डुबो कर चिकन खा रहे थे। 

      मैंने कहा-महाराज आप पर आरोप है कि आप गेहूं चावल ज्यादा खाते हैं। 

      नेताजी हंसने लगे, बोले देखो-यह चिकन भी इंपोर्टेड है, अमेरिका से आया है। और दारु भी इंपोर्टेंड है, अमेरिका से आयी है। हम तो अमेरिकन आइटम खाते हैं। कई अमेरिका वाले इराक में जाकर खाते हैं, ये इंटरनेशनल लेवल पर इस तरह का खाना पीना चलता रहता है। 

      नेताजी ने इस बीच आठ चिकन और आर्डर कर दिये। 

      मैंने पूछा-नहीं सर सवाल यह है कि गेहूं चावल महंगे हो रहे हैं। 

      नेताजी ने बताया-कसम है चिकन की, मुझे तो गेहूं चावल के भाव पता ही नहीं हैं। यू सी मैं तो महंगाई के भाव दारु चिकन के भाव से कैलकुलेट करता हूं। थैंक्स टू बर्ड फ्लू, चिकन में तो सस्ताई मची हुई है। 

      मैंने पूछा-सरजी यह बताइए कि आलू चावल को सस्ता कैसे किया जाये। 

      नेताजी ने बताया- गेहूं चावल को भी फ्लू हो जाये, तो इनके भाव भी सस्ते हो सकते हैं। ये गेहूं चावल को फ्लू कैसे हो, इस सवाल पर एक्सपर्ट कमेटी बिठानी पड़ सकती है। मैं तो सिर्फ रास्ता सुझा सकता हूं, इंपलीमेंटेशन तो उस पर आखिर एक्सपर्टों को करना है। 

      फिर मैंने फोन किया एक टाप अफसर को, उससे पूछने के लिए गेहूं चावल आखिर कौन खा रहा है। 

      अफसर ने मोबाइल पर बताया कि वह आजकल अमेरिका में है। हर कायदे का अफसर गरमी के सीजन में या तो अमेरिका जा रहा होता है या वहां से वापस आ रहा होता है। अफसर ने बताया कि वह इन दिनों में लास एंजेल्स में अमेरिकन बर्गर ही खा रहा है। सो वह तो बिलकुल दोषी नहीं है गेहूं चावल खाने का। आगे उसने बताया कि वह जब इंडिया में भी होता है, तो मैकडोनाल्ड बर्गर ही प्रेफर करता है। वह भी अमेरिकन है। इंडिया के गेहूं चावल से  उसका कोई लिंक ना जोड़ा जाये। 

      अफसर की बात में दम था। 

      फिर मैं गया साऊथ दिल्ली में एक बड़े से बिजनेसमैन के पास। 

      उस बिजनेसमैन की टेबल पर कई तोप, कई टैंक, कई पनड़ुब्बियां पड़ी हुई थीं। 

      एक टैंक का आधा हिस्सा वह खा चुका था। 

      स्विस बैंक में किसी से बात करते हुए वह तोप को कुतर रहा था। 

      मैंने पूछा-सरजी ये गेहूं चावल कौन खा रहा है। पकड़ में नहीं आ रहा है। 

      बिजनेसमैन ने बताया-भईया सरकार का इत्ता बजट बढ़ गया है। इतने प्लेन, उतनी पनडुब्बी खरीदी जा रही हैं। हमें उन्हे खाने से फुरसत नहीं है। आप गेहूं चावल की बात कर रहे हो। मैं तो हथियार डीलर हूं। देख लो मैं क्या खा रहा हूं। 

      फिर भाई ने एक राइफल चबाना शुरु कर दिया। 

      मैं फिर निकल पड़ा गेहूं चावल खाऊ की तलाश में। 

      एक विकट से बाजार के बाहर मैंने देखा-सेनसेक्स उछल रहा था। उससे भी ऊपर चावल नाच रहे थे और उससे भी गेहूं छलांग रहा था। 

      एक बंदा गेहूं चावल को कूद कर पकड़ने की कोशिश कर रहा था और गिरा पड़ा था। 

      मैंने पकड़ लिया उसे कहा-अब पकड़ में आ गया कि कौन खा रहा है गेहूं चावल। 

      वह गिरी हालत में बोला-आप देख लो, इत्ती छलांग लगा ली, ना गेहूं पकड़ में आ रहा है, ना चावल। 

      उछलते गेहूं -चावल को पकड़ने की कोशिश में वह गिरकर बेहोश हो गया। 

      अब आप ही बताइये कि बास को क्या जवाब दूं कि गेहूं चावल इंडिया में खा कौन रहा है। 

आलोक पुराणिक

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