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   मूर्ति ही भली

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ये निबंध उस छात्र की कापी से लिया गया है,जिसने निबंध प्रतियोगिता में टाप किया है। निबंध का विषय था-नेताओं अथवा नेत्रियों की मूर्तियां। 

मूर्तियां का हमारे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन में बहुत रोल है। 

भगवान की मूर्तियों से कई पुजारियों की दुकान चलती है।  मंदिर में भगवान जिंदा रुप में रहें, तो पुजारी के मरने का डौल बन जाये। महंगाई के इस आलम में, पूरे दिन के चढ़ावे से भगवान कृष्ण दस बीस ग्राम मक्खन ही खरीद पायेंगे। फिर पुजारीजी क्या खायेंगे। 

इसलिए जीते जागते भगवान पुजारियों को सूट नहीं करके। पुजारियों को क्या, किसी को सूट नहीं करते। शनि महाराज जीते जागते होते, तो नेताओं को हड़काते- दुष्टों, सरसों के तेल के भाव कहां पहुंचा दिये हैं, इधर भक्त चढ़ाते ही नहीं है। शनि महाराज इसलिए मूर्ति वाले ही अच्छे, कोई सवाल जवाब नहीं करते। हनुमानजी के एक मंदिर के बाहर लिखा हुआ है-साड़ी वाले हनुमानजी।  ब्रह्चर्य का व्रत धारण करने वाले ये हनुमानजी साड़ी वाले इसलिए हो गये है कि साड़ी बाजार कारोबारी एसोसियेशन ने इस हनुमान मंदिर का जीर्णोद्धार कराया है। मंदिर चल निकला है, पुजारीजी साईकिल से टोयोटा पर आ लिये हैं।

अब हनुमानजी जीवित होते, तो चाहे कितने ही जीर्ण हो जाते, पर साड़ी वाला उद्धार ना कराते। संक्षेप में कहें, तो जीते जागते भगवान किसी को सूट नहीं करते। साइकिल से टोयोटा पर आने वाले पुजारी को तो बिलकुल ही नहीं।

मूर्तियां नेताओँ की भी लगती हैं।

जिन कार्यकर्ताओं की अपने नेताओं से खुंदक होती हैं, वो उनकी मूर्तियां लगवा देते हैं।

नेताओँ की मूर्तियों पर कबूतर, कऊए जब बीट करते हैं, तो चौराहे पर अपने नेता को जलील करने की कई कार्यकर्ताओं की इच्छा पूरी होती है। बल्कि कतिपय मामलो में यह भी देखा गया है कि नेता लोग अपने प्रतिद्वंदी नेताओं की मूर्तियां चौराहे पर लगवाते हैं, ताकि उन्हे मरने के बाद भी बीट कर सकें।

वैसे कतिपय राजनीतिशास्त्रियों का मानना है कि जीते जागते नेता से मूर्ति का नेता ज्यादा अच्छा होता है।

नेता की मूर्ति पांच दस फुट जगह घेरती है।

जीता जागता नेता तो पार्क, सड़क, शहर क्या, दांव लग जाये तो पूरा देश घेरने के लपेटे में ही रहता है।

नेता की मूर्ति तले जुआरी जुआ खेल सकते हैं और दारु वारु पी सकते हैं, बस।

पर जीता जागता नेता तो जुआघरों और दारु की दुकानों की सीरिज चला सकता है।

नेता की मूर्ति वोट मांगकर हर साल दो साल में परेशान नहीं करती।

यह बात जीते जागते नेता के बारे में नहीं कही जा सकती।

फिर नेता की मूर्ति पर तो जब चाहे, जूते चप्पलों की माला डालकर नाराजगी जाहिर की जा सकती है।

यह लिबर्टी आम तौर पर जीते जागते नेता पब्लिक को नहीं देते।

यूं कुछ लोग यह मुद्दा उठाते हैं कि नेता की मूर्ति कुछ करती नहीं है। सवाल उठता है कि जीता जागता नेता भी क्या करता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि इस तरह से देखें, तो नेता की मूर्ति जीते जागते नेता से कम नुकसान पहुंचाती है।

आलोक पुराणिक

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अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 2

  • प्रेषक : रतन सुराणा
    बहुत अच्छा लगा यह व्यंगात्मक लेख.आज की क्रिकेट के हालात पर लिखा 'क्रीज पर मार्था और सोनाटा' भी बहुत पसन्द आया.कृपया सामयिक घटनाओं पर इसी तरह लिखते रहें.बहुत-बहुत सधुवाद.
  • प्रेषक : rajshekhar
    गुरुदेव बड़े दिनों बाद आपका पुराना मिजाज़ देखने को मिला। वैसे तो आपके हम भक्त रहे हैं पर इन दिनों कुछ ख़ास मज़ा नहीं आ रहा था। इस पोस्ट में फिर से अगड़म-बगड़म बाबा की याद आ गई।