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   कामायनी- उपभोक्तावाद की काव्यात्मक आलोचना

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किसी भी साहित्यिक रचना को कालजयी होने के लिए आवश्यक है कि वो हर युग की समस्याओं से किसी न किसी रूप में मुठभेड़ करने की क्षमता रखती हो। जयशंकर प्रसाद की "कामायनी" एक कालजयी कृति के रूप में समादृत है तो इसका कारण है कि वह इक्कीसवीं सदी में भी लगातार बढ़ते यांत्रिक विकास और उसके फलस्वरूप फैलती उपभोक्तावादी संस्कृति से उत्पन्न संकटों को समझने और उससे मुक्ति पाने की दृष्टि देती है।

अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैंड की धरती से शुरू हुई औद्योगिक क्रांति ने ढ़ाई-तीन सौ वर्षों के दौरान लगभग पूरी दुनिया को आज ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया है जहां एक तरफ "ग्लोबलाइजेशन" और ग्लोबल विलेज जैसे प्रगति सूचक शब्द उसे आत्म मुग्ध कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ अतिशय स्पर्धा, वर्चस्व की लालसा, उपभोक्तावादी लिप्सा जैसी प्रवृत्तियों का अनंत सिलसिला उसके स्तित्व पर संकट के संकेत दे रहा है। भाप से चलने वाली मशीन के अविष्कार से शुरू होकर आज 'पाम टॉप' या मानव प्रतिरूप के अविष्कार तक की विकास यात्रा संपन्न कर मनुष्य जाति विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उपलब्धियां हासिल कर प्रकृति पर वर्चस्व हासिल कर लेने की खुशफहमी में जरूर झूम रही है, लेकिन समय समय पर ऐसे चिंतक, मनीषी, युग दृष्टा भी होते रहे हैं जो प्रकृति के विरुद्ध निरंतर चलते रहे इस प्रौद्योगिक विकास के अंध अभियान में पल रहे मानव जाति के विनाश के कीटाणुओं की तरफ भी संकेत करते रहे हैं। आज तो पूरे विश्व में ऐसे चिंतकों की एक बड़ी जमात है जो खुलकर प्रौद्योगिकी विकास एवं उससे पल प्रतिपल पुष्ट हो रहे उपभोक्तावाद के खतरे से आगाह कर रहे हैं। बीसवीं सदी के पूर्वाध में जयशंकर प्रसाद के रूप में हमें एक ऐसे ही चिंतक का दर्शन उनकी काव्यकृति 'कामायनी' के माध्यम से होता है।

गांधी की तरह ही प्रसाद भी इस मत के कायल दिखते हैं कि मशीनी सभ्यता और उससे उत्पन्न उपभोक्तावाद को अंगीकार करने की बजाय आवश्यकताओं पर नियंत्रण कर, सादगीपूर्ण जीवन-पद्धति अपना कर विश्व मानव को यांत्रिक सभ्यता की तबाही से बचाया जा सकता है। इस दृष्टि से देखें तो 1909 में लिखा गया 'हिंद स्वराज' मशीनी सभ्यता और उपभोक्तावाद की राजनीतिशाष्त्रीय, अर्थशाष्त्रीय आलोचना है तो 1937 में प्रकाशित 'कामायनी' उसकी काव्यात्मक आलोचना। 

वस्तुत: औद्योगिक क्रांति की उपलब्धियों से आत्ममुग्ध पश्चिम के यंत्र प्रेम से असहमत होने का स्वर कम से कम भारतवर्ष में बीसवीं सदी के आरम्भ से ही सुनाई पड़ने लगा था। प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि जिस महात्मा गांधी ने 1920 से 1947 तक भारत के स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व किया, वे 1909 में ही 'हिंद स्वराज' नामक पुस्तक लिखकर यूरोप की मशीनी सभ्यता के प्रति अपना तीव्र विरोध प्रकट कर चुके थे। इस पुस्तक में गांधीजी ने भारतीय जीवन दर्शन को सामने रखते हुए पश्चिम की यांत्रिक सभ्यता और उसकी समस्त उपलब्धियों को ठुकरा दिया। उन्होंने संपत्ति संग्रह को, भौतिक आवश्यकताएं बढ़ाने को, मशीनी सभ्यता एवं बड़े पैमाने पर उत्पादन से होने वाले मुनाफे की अवधारणा को नकारते हुए ऐसे स्वराज की कल्पना प्रस्तुत की जिसमें व्यक्ति अधिकतम स्वतंत्रता का उपभोग कर सके तथा यंत्रों महायंत्रों की दासता का शिकार न हो सके।

पता नहीं गांधीजी की इस सोच से कविवर जयशंकर प्रसाद का कितना परिचय था, किंतु इतना अवश्य है कि साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान राजनीति में महात्मा गांधी, तो साहित्य में जयशंकर प्रसाद दो ऐसे व्यक्तित्व दिखाई देते हैं जो औपनिवेशिक दासता के साथ-साथ पश्चिम की मशीनी सभ्यता के भी आलोचक के रूप में सामने आते हैं। गांधी की तरह ही प्रसाद भी इस मत के कायल दिखते हैं कि मशीनी सभ्यता और उससे उत्पन्न उपभोक्तावाद को अंगीकार करने की बजाय आवश्यकताओं पर नियंत्रण कर, सादगीपूर्ण जीवन-पद्धति अपना कर विश्व मानव को यांत्रिक सभ्यता की तबाही से बचाया जा सकता है। इस दृष्टि से देखें तो 1909 में लिखा गया 'हिंद स्वराज' मशीनी सभ्यता और उपभोक्तावाद की राजनीतिशाष्त्रीय, अर्थशाष्त्रीय आलोचना है तो 1937 में प्रकाशित 'कामायनी' उसकी काव्यात्मक आलोचना।

कामायनी के आरंभ में ही चिंता सर्ग के अंतर्गत प्रसाद इसके नायक मनु के एकालाप द्वारा ये दिखाते हैं कि किस प्रकार देव सभ्यता अतिशय भोगवाद के कारण प्रलय विनाश का शिकार हुई। दृष्टव्य है मनु का ये उद्गार-

"सुख, केवल सुख का वह संग्रह, केंद्रीयभूत हुआ इतना,

छाया-पथ में नव तुषार का सघन मिलन होता जितना।

सब कुछ थे स्वायत्त, विश्व के बल, वैभव आनंद अपार,

उद्वेलित लहरों सा होता, उस समृद्धि का सुख-संचार।"

स्पष्ट है कि केवल सुख का संग्रह, बल, वैभव, आनंद अपार जैसी मनोवृत्तियों के वशीभूत हो देव सभ्यता विनाश को प्राप्त हुई। किंतु विडंबना यह है कि अपने पूर्वजों की अतिशय विलासप्रियता अहंकार आदि को कोसनेवाला मनु इन सबसे कोई सबक नहीं लेता। यही कारण है जब प्रलयकालीन जल उतर जाता है, जीवन सामान्य हो जाता है और श्रद्धा जैसी रमणी का उसे साहचर्य मिलता है, तो उसकी भोग लिप्सा फिर से अनियंत्रित होने लगती है। आखेट-विहार, सोमपान, यज्ञ, पशु-बलि आदि सारे कृत्यों को वह संपन्न करने लगता है और श्रद्धा द्वारा ग्रहित सरल, सादगीपूर्ण जीवन के प्रति उसमें क्षोभ, असंतोष उत्पन्न होने लगते हैं जिसकी परिणति होती है गर्भवती श्रद्धा के परित्याग एवं सुदूर सारस्वत प्रदेश की ओर प्रयाण के रूप में, जहां उसे मिलता है एक दूसरी रमणी इड़ा का सानिध्य।

मनु का यह अहंकार निश्चय ही उस पूंजीपति वर्ग का अहंकार है जिसने मजदूरों के श्रम से औद्योगिक विस्तार किया और उलटे उनका वह स्वामी बन बैठा तथा अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में श्रमिक वर्ग का साधन के रूप में इस्तेमाल करने लगा।

यह इड़ा ऐसी थी जिसके "वक्षस्थल पर एकत्र धरे संसृति के सब विज्ञान ज्ञान" और वह मनु की आकांक्षा के अनुकूल सिद्ध हुई और फिर तब दोनों के साहकार से सारस्वत प्रदेश में ज्ञान विज्ञान, उद्योग-धंधों की नई सभ्यता विकसित हुई। परंतु इस सभ्यता ने भी मनु को शांत संतुष्ट करने की बजाय और अशांत, अतृप्त, अहंकारी बना दिया। नतीजतन इड़ा को ही वह अपनी काम लिप्सा की आग में आहुति देने को व्याकुल हो उठा। परिणाम हुआ प्रजा द्वारा इड़ा का समर्थन और मनु का प्रतिरोध। रक्तपात हुआ, हिंसा की ज्वाला से सारस्वत प्रदेश दग्ध हुआ और मनु आहत हुआ। इसके उपरांत होता है मनु का व्यक्तित्वांतरण। उसे बोध होता है कि आकांक्षाओं के पीछे इंद्रियों को दौड़ाते रहने से जीवन पर्यंत शांति नहीं मिल सकती और तब वह श्रद्धा का फिर से साहचर्य स्वीकार कर भौतिकता के दलदल से बाहर की ओर गमन करता है।

यह कहने में तनिक भी अतिश्योक्ति नहीं कि गांधी की तरह प्रसाद भी आधुनिक सभ्यता का विश्लेषण कर इस निष्कर्ष पर पहुंचे दिखाई देते हैं कि मशीनी सभ्यता अपने आप में मनुष्य जाति के लिए शुभ नहीं है। अपनी समझ में मनु ने यंत्रों का निर्माण-विकास कर जनता के लिए अच्छा ही किया, पर साथ ही उसके अंदर कर्ता का ऐसा दर्पभाव भी प्रबल हो उठा कि वह इड़ा को भी अपने भोग की वस्तु समझ बैठा। तभी तो वह कहता है-

"मैं शासक, मैं चिर स्वतंत्र, तुम पर भी मेरा हो अधिकार असीम, सफल हो जीवन मेरा।"

मनु का यह अहंकार निश्चय ही उस पूंजीपति वर्ग का अहंकार है जिसने मजदूरों के श्रम से औद्योगिक विस्तार किया और उलटे उनका वह स्वामी बन बैठा तथा अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में श्रमिक वर्ग का साधन के रूप में इस्तेमाल करने लगा। कहा जाता है कि पूंजीवादी स्पर्धा, आपाधापी एवं विस्तारवादी दुष्प्रवृत्तियों का समाधान समाजवाद है, क्योंकि इसमें उत्पादन के साधनों पर व्यक्तिगत स्वामित्व नहीं रह जाता। इस प्रकार मशीनीकरण तो सही है, ग़लत है उप आधिपत्य रखने वाला पूंजीवाद। अतएव इसके वैज्ञानिक समाधान के रूप में समाजवादी समाज रचना को अपनाया जाय, न कि यंत्रों का विरोध किया जाय। क्योंकि ऐसा करना घड़ी की सुई को पीछे की ओर घुमाना होगा।

ऐसे सोचने वालों की दृष्टि में इसीलिए गांधीजी या प्रसाद की यंत्र विरोधी दृष्टि अवैज्ञानिक, भाववादी एवं अव्यावहारिक है। परंतु देखा जाय तो यांत्रिक सभ्यता के प्रति गांधी या प्रसाद का जो दृष्टिकोण है, उसके पीछे शक्तिशाली तर्क है। दुनिया भर में तमाम विचारधाराएं सामने आई लेकिन कोई भी पूरी तरह से लागू नहीं हो सकीं। "कामायनीकार" की दूर दृष्टि ने इन तमाम शक्तियों और इनके अंदर निहित खतरे को पहचान लिया था-

"प्रकृति शक्ति तुमने यंत्रों से सबकी छीनी। शोषण कर जीवनी बना दी जर्जर झीनी।"

यह उपालंभ है उस जनता का जिसके लिए यंत्रों का निर्माण कर मनु ने समझा कि उसने सबका जीवन सुख से भरपूर कर दिया।

इस दृष्टि से देखा जाय तो कामायनी में प्रसाद जहां फैंटेसी, जैसा कि मुक्तिबोध का कहना है, के माध्यम से आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता की समस्याओं की आलोचना करते हैं, वहीं वे मेरी समझ में फैंटेसी के जरिए उसका समाधान भी प्रस्तुत करते हैं। कामायनी के उत्तरार्ध में प्रसाद ने जिस समरसता एवं वन्य जीवन को आदर्श के रूप में रखा है, वह प्रतीकात्मक है। सारस्वत प्रदेश से घायल मनु को लेकर जब श्रद्धा चलती है तो उसे यही समझाती है कि अतिशय उद्योगवाद, महायंत्रों की भरमार और अति भोगवादी लालसाओं की गिरफ्त में रहकर मानवमन को कभी शांति नहीं मिल सकती। ग़ौरतलब है रहस्य सर्ग में श्रद्धा का यह कथन-

श्रद्धा और मनु का वन्य जीवन की ओर प्रयाण वास्तव में एक रूपक सदृश्य है जिसके जरिए कवि हमारा ध्यान यंत्रों पर कम से कम निर्भर होने एवं प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता की ओर आकृष्ट करना चाहता है। प्रसाद के इस दृष्टिकोण को पुरातन या प्रतिक्रियावादी कह कर अब खारिज करना बुद्धिमानी नहीं- इसे खारिज करने का मतलब है उपभोक्तावाद के सर्वग्रासी, सर्वभक्षी जबड़े में पूरी सृष्टि की बलि दे देना।

"श्रममय कोलाहल, पीड़ामय विकल प्रवर्तन महायंत्र का,

क्षण भर भी विश्राम नहीं है प्राणदास है क्रिया तंत्र का,

यहां सतत संघर्ष विकलता कोलाहल का यहां राज है,

अंधकार में दौड़ लग रही मतवाला यह सब समाज है।"

प्रसाद ने अच्छी तरह भांप लिया था कि अहंकार, विस्तारवाद, भोगवाद, यश लालसा आदि को बढ़ावा देने वाली यांत्रिक सभ्यता पर अंकुश लगा कर ही मनुष्य को शांति सुरक्षा की गारंटी दी जा सकती है। उनका मनु वास्तव में उस मानव मन का प्रतीक है जो औद्योगिक उन्नति द्वारा हासिल होने वाली भौतिक समृद्धि की चकाचौंध से अभिभूत होकर ऐसे कार्यों को निष्पादित करते चलता है जो अंतत: उसकी भोगइच्छाओं को और उद्दीप्त करते हैं और वह सच्चे सुख एवं शांति से कोसों दूर हो जाता है। मानव मन का प्रतीक यह मनु शांति तब पाता है जब श्रद्धा के सानिध्य में उसे भौतिक आपाधापी अपनी तबाही का मूल कारण प्रतीत होती है और श्रद्दा के निर्देशों का अनुगमन करता हुआ वह हिमालयीन अंचल में चला जाता है।

वस्तुत: मनु के चरित्र के माध्यम से प्रसाद यह बताना चाहते हैं कि जब तक मनुष्य यंत्र, महायंत्र के चक्कर में पड़ा रहेगा तब तक वास्तविक शांति उससे दूर रहेगी। जब तक वह अति भोगवादी कामनाओं को उद्दीप्त करने वाली वस्तुओं का निर्माण करता रहेगा तब तक उसकी भोगवादी आकांक्षाएं उसे अतृप्त एवं तनावयुक्त रखेंगी। इसलिए भोगवादी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना मनुष्य को सीखना होगा- मनु का हृदय परिवर्तन यही सबक देता है। 'कामायनी' का अंत यही दर्शाता है कि मानव जीवन में उपभोक्तावाद का वर्धन करने वाली मशीनी सभ्यता का हस्तक्षेप कम से कम होना चाहिए। अबाध यांत्रिक विकास कोलाहल, संघर्ष, प्रतिस्पर्धा, विनाशक हथियार आदि को ही जन्म देगा चाहे व्यवस्था पूंजीवादी हो या समाजवादी।

यह बात विशेष रूप से ध्यान रखने की है कि मनु और श्रद्धा जिस हिमालयीन प्रदेश में समरसता की अनुभूति करते है, वह भी नितांत वायवीय और अवास्तविक नहीं है। यहां पर भले ही 'स्काई स्क्रैपर्स' नहीं हो न फैक्ट्रियों का धुआं और महायंत्रों का कोलाहल हो, लेकिन वह है इसी धरती पर जो अपनी समस्त संपदा से मानव जीवन का श्रृंगार करती है। यहां प्रसाद का पूरा वर्णन प्रतीकात्मक है इस अर्थ में कि मनुष्य जीवन का सच्चा सुख प्रकृति को उजाड़ने में नहीं, अपितु उसके साथ सुसंगति, मैत्री स्थापित करने में है।

यह कहने में तनिक भी अतिरंजना नहीं कि 'कामायनी' आदि से अंत तक न केवल मनुष्य जाति बल्कि पूरी संस्कृति को तबाह करने वाली अतिशय उपभोक्तावादी प्रवृत्ति एवं उसके परिणामस्वरुप अबाध रूप से प्राकृतिक संसाधनों के होने वाले दोहन की निर्मम आलोचना है। इसकी पूरी कथा फैंटेसी में विन्यस्त है। मुक्तिबोध ने समस्याओं को तो फैंटेसी के अंतर्गत देखा, किंतु समाधान को यथातथ्य मान लिया जबकि समाधान भी एक फैंटेसी है- प्रतीकवत है। श्रद्धा और मनु का वन्य जीवन की ओर प्रयाण वास्तव में एक रूपक सदृश्य है जिसके जरिए कवि हमारा ध्यान यंत्रों पर कम से कम निर्भर होने एवं प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता की ओर आकृष्ट करना चाहता है। प्रसाद के इस दृष्टिकोण को पुरातन या प्रतिक्रियावादी कह कर अब खारिज करना बुद्धिमानी नहीं- इसे खारिज करने का मतलब है उपभोक्तावाद के सर्वग्रासी, सर्वभक्षी जबड़े में पूरी सृष्टि की बलि दे देना। 

श्रीभगवान सिंह

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