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   सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
मोहनदास करमचंद गांधी सच पूरा पर कथा अधूरी
आत्मकथाएं कौन लोग लिखते हैं? जो लोग कुछ अच्छे कामों के कारण समाज का प्यार पाते हैं या फिर जो बुरे कामों के कारण बदनाम हो जाते हैं. एक तीसरी श्रेणी ऐसे लोगों की भी है जो दूसरों की कुछ पोलपट्टी खोल सकने वाले पदों पर रहे होंगे. तीनों तरह के लोगों में राजनेता, अभिनेता, तानाशाह, पत्रकार, साहित्यकार, मंजे हुए या पिटे हुए खिलाड़ी, उद्योगपति और उच्च अधिकारी शामिल हैं.
आत्मकथा लोग अक्सर जीवन के उतार पर पहुंचकर लिखते हैं. अच्छे बुरे कामों का तेल तब तक खत्म हो चलता है, तब ऐसे लोगों की आत्मकथा थोड़ा और तेल जुटा देती है. ज्यादातर मामलों में ऐसे दीए बुझने से पहले थोड़े समय के लिए भभक कर जल उठते है. अखबारों में इनके विवादास्पद लेख छपते हैं, टीवी पर बहस होती है. फिर सब खत्म हो जाता है.
आत्मकथाओं के इस ढेर से अलग है गांधीजी की आत्मकथा जो अधूरी होते हुए भी पूरा सच बयान करती है. इसका शीर्षक बड़ा अटपटा है - सत्य के साथ मेरे प्रयोग अथवा आत्मकथा. यहां सत्य के प्रयोग का वर्णन मुख्य था. इसलिए नाम में भी उसे आगे रखा गया आत्मकथा को पीछे. निकट के साथियों के खूब आग्रह करने पर गांधीजी ने आत्मकथा लिखना तय किया. शुरू तो किया लिखना, लेकिन उन्हीं के शब्दों में 'फुलस्केप का एक पन्ना भी पूरा नहीं हो पाया था कि इतने में बंबई में ज्वाला प्रकट हुई औऱ मेरा शुरू किया हुआ काम अधूरा रह गया.'
सच पूछा जाय तो इसमें गांधीजी की कहानी तो बस सूत्र के रूप में चलती है. मुख्य तो उस धागे में पिरोये गए उनके सत्य के प्रयोग हैं. खुद गांधीजी के शब्दों में 'मुझे आत्मकथा कहां लिखनी है? मुझे तो आत्मकथा के बहाने सत्य के साथ मैंने जो प्रयोग किए हैं उनकी कथा लिखनी है.' |
ये वो दौर था जब गांधीजी देश को एक नई भूमिका के लिए तैयार करने में दिन-रात लगे हुए थे. अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए उनके पास अख़बार भी थे जिनके लिए हर हफ्ते कुछ न कुछ लिखना होता था. हल निकाला गांधीजी ने 'तो फिर क्यों न आत्मकथा लिखूं।' इस तरह ये विचित्र कथा मूल गुजराती में 29 नवंबर 1925 से 3 फरवरी 1929 तक नवजीवन अख़बार में साप्ताहिक रूप से छपी. फिर अंग्रेज़ी अनुवाद 3 दिसंबर 1925 से 7 फरवरी 1929 तक 'यंग इंडिया' के अंको में छपा.
हिंदी पुस्तक के रूप में सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली ने इसे सबसे पहले सन् 1928 में प्रकाशित किया. लेकिन गांधीजी की तमाम रचनाओं का कॉपीराइट रखने वाला नवजीवन ट्रस्ट हिंदी संस्करण पहली बार 1957 में छाप सका. इन तीन भाषाओं में इस पुस्तक की करीब 14,56,000 प्रतियां पाठकों तक पहुंची है. इसके अलावा तमिल, कन्नड़, मराठी, तेलगू, उड़िया, असमी, बंगला और उर्दू में इसकी करीब पांच लाख प्रतियां छप चुकी हैं. सत्य के इस विचित्र प्रयोग को दुनिया की तमाम दूसरी भाषाओं में भी अनूदित किया जा चुका है. अंग्रेज़ी में यहां भी छपी और विदेशों में भी. फिर स्पेनी, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, इतावली, जर्मन, पोलिस स्विस, तुर्की के अलावा अरबी भाषा में भी इसका अच्छा स्वागत हुआ है. चीनी, जापानी और तिब्बती भाषाओं में भी इसके संस्करण हैं.
कोई 80 वर्षों से लगातार पाठकों को लुभा रही इस आत्मकथा में ऐसा क्या है? सच पूछा जाय तो इसमें गांधीजी की कहानी तो बस सूत्र के रूप में चलती है. मुख्य तो उस धागे में पिरोये गए उनके सत्य के प्रयोग हैं. खुद गांधीजी के शब्दों में 'मुझे आत्मकथा कहां लिखनी है? मुझे तो आत्मकथा के बहाने सत्य के साथ मैंने जो प्रयोग किए हैं उनकी कथा लिखनी है.' इस आत्मकथा में ब्रितानी राज, कांग्रेस, हिंदू-मुसलमान या दक्षिण अफ्रीका के दौरे में वहां के शासकों के खिलाफ रत्ती भर ज़हर नहीं मिलेगा, जो है वह है सत्य, अमृत जिसके कारण उन्हें इस गंदी से गंदी राजनीति में भी बहुत कुछ कर जाने की शक्ति मिली. इसमें तो उन्होंने अपने दोषों का भी वर्णन किया है.
आत्मकथा में गांधीजी के विभिन्न सत्याग्रहों और संघर्षों का वर्णन भी है. वो लिखते हैं "सत्याग्रह में संघर्ष व्यक्तियों अथवा पक्षों के बीच नहीं माना जाता, सत्य और असत्य, सही और गलत के बीच माना जाता है." ऐसे मौकों पर अपने हिस्से की सच्चाई को नहीं, पूरी सच्चाई को ठीक से पकड़ लो और उसके सहारे झूठ को, असत्य को पराजित करने के काम में लग जाओ. उन्ही के शब्दों में 'इस तरह न कोई जीतता है, न कोई विजेता होता है. किसी को भी ऐसा नहीं लगता कि हम हार गए, हमने कुछ खो दिया है या हमारा अपमान हो गया है.'
गांधीजी ने इस आत्मकथा में 1921 तक का ही वर्णन किया है. पर यह उनकी कहानी का अंत नहीं है. यह आत्मकथा हमें बताती है कि चम्पारण सत्याग्रह में गांधीजी ने नील की खेती को लेकर अंग्रेजों के अत्याचारों में कैसे सत्य को पकड़ा और फिर अंत तक उसे पकड़े रहे. 'नील का धब्बा' नामक शीर्षक से लिखा यह अंश इस बात को बताता है कि गांधीजी ने ये मामला यूं ही नहीं उठा लिया था. एक पक्ष था अत्याचार करने वाले अंग्रेजों का तोगांधीजी ने इस आत्मकथा में 1921 तक का ही वर्णन किया है...पूरे सच की ये अधूरी कथा ज़हर से घुली इस दुनिया में दूध से धुली है इसीलिए आज 80 सालों बाद भी खामोशी से तहलका मचा रही है. |
सारी बात जान लेने के बाद गांधीजी की पहली राय थी "अब ये मुकदमें लड़ना तो हमें बंद ही कर देना चाहिए. जो रैयत इतनी कुचली हुई हो जहां सब इतने भयभीत रहते हों, वहां कचहरियों के जरिए थोड़े ही इलाज हो सकता है. लोगों का डर निकालना उनके रोग की असली दवा है. यह तिनकठिया प्रथा (जबरन नील की खेती) न जाय, तब तक हम चैन से नहीं बैठ सकते."
गांधीजी चम्पारण की इस भयानक समस्या को देखने-समझने बस दो दिनों के लिए आए थे पर सत्य के प्रयोग ऐसे ही नहीं होते. उन्होंने यहां आकर जो देखा उससे उन्हें लगा "ये काम तो दो साल भी ले सकता है. इतना समय लगे तो भी मैं देने को तैयार हूं." सत्य के प्रयोग भत्ते लेने से नहीं चलते. गांधीजी ने सभी प्रसिद्ध वकीलों का मेहनताना खत्म करवाया. खुद पेशे से वकील होते हुए भी उनसे कहा कि "इस बड़े काम में आपकी वकालत की योग्यता का थोड़ा ही उपयोग होगा. आप जैसों से तो मैं मुहर्रिर और दुभाषिए का काम चाहूंगा." ये भी कहा कि वकील का धंधा अनिश्चित काल के लिए छोड़ देना पड़ेगा. जेल जाने की भी तैयारी रखें.
उधर गांधीजी ने हजारो किसानों से जो बात की उसमें भी सच्चाई का पूरा ध्यान रखा. हर किसान का बयान लेते समय, अंग्रेजों के खिलाफ शिकायत लिखवाते समय एक अच्छे वकील की तरह जिरह की जाती थी. जिस किसी भी शिकायत में झूठ या अतिश्योक्ति की गंध आती उस मामले को वहीं छोड़ दिया जाता था. झूठ के पुलिंदों के सहारे सच की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती. गांधीजी का सच, गांधीजी के राम, दो पक्षों के बीच कैसा मजबूत सेतु बन जाता था- ऐसे अनेक प्रयोगों से भरी पड़ी है ये आत्मकथा. इसमें 1921 तक का ही वर्णन है इसके बाद गांधीजी का जीवन और भी सार्वजनिक होता गया. उन्हीं के शब्दों में "शायद ही कोई ऐसी चीज हो जिसे लोग न जानते हों." इसलिए यहां आकर वे पाठकों से विदा लेते हैं. जिस सत्य के आग्रह पर उन्होंने आत्मकथा लिखना शुरू किया था, उसे इन सब विवरणों के बाद वे और भी गहरे उतर कर लिखते है "सत्य को जैसा मैंने देखा है, जिस मार्ग को देखा है उसे बताने का मैंने सतत प्रयत्न किया है. क्योंकि मैंने यह माना है कि उससे सत्य और अहिंसा के विषय में अधिक आस्था उत्पन्न होगी."
पूरे सच की ये अधूरी कथा ज़हर से घुली इस दुनिया में दूध से धुली है इसीलिए आज 80 सालों बाद भी खामोशी से तहलका मचा रही है.
अनुपम मिश्र
(गांधी शान्ति प्रतिष्ठान से सम्बद्ध अनुपम मिश्र स्वयं एक कालजयी पुस्तक आज भी खरे हैं तालाब के लेखक हैं.)
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कुल टिप्पणियां: 6
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प्रेषक : tarun goyalanupamji i have read your books khare hain talab and saff mathe ka samaj. both books have inspirations for the society. a well written peice on the utobiography of mahatma gandhi. we are obliged for your views and thinking
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प्रेषक : bhure raviMahatma Gandhi ki yah kaljai racna hai jisme satya ke prayog fut fut kar bhare hai . esiliy wah bahuthi kaljai racna kahi jati hai.
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प्रेषक : NEERAJ RAJPUTBUT PEOPLE OF THIS LAND HAS NOT EVEN SPARED THE MAHATMA'S AUTOBIOGRAPHY FOR THEIR PERSONAL GAINS. IT HAS COME TO LIGHT THAT MAHTMA'S AUTOBIOGRAPHY HAS BEEN DOCTORED IN PORBANDER TO TAKE POSSESSION OF A SHIPWRECK LYING AT THE PORBANDER PORT. THIS IS THE VERY SHIP IN WHICH MAHATMA HAD ONCE RETURNED FROM SOUTH AFRICA. MOREOVER THIS SHIP BELONGED TO THE DADA ABDULLAHA COMPANY, IN WHICH MAHATMA GANDHI HAD GOT HIS FIRST JOB AS BARRISTER IN SOUTH AFRICA AND WHICH HAS GOT MENTION IN GANDHI'S 'AN AUTOBIOGRAPHY OR MY EXPERIMENTS WITH TRUTH'. HOW SUCH A BIG FRAUD HAS BEEN COMMITTED? FOR MORE DEATILS JUST CLICK ON THIS SITE : http://gunaahgar.blogspot.com/
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प्रेषक : Hare Singh SodhaHal hi mai Jab big bachan ki bahurani USA se vapis loti to media ne ha...ha kar macha diya !! par rural india mai rahane dhukhiyaro ki khabaro ke liye koi jagh hi nahi Najar aati. Print & elec. Media ko samajik sarokaro ke liye mudo ko uthane ki jarurat hai.
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प्रेषक : saroj kumarJab Dr. Rajendra Prasad aur Braj kishore Babu jaise log us jamane men kisano se 10 hajar fee lete the to aaj ke neta agar bhrast hain to aashcharya ki koi bat nahin.























