आपको ये लेख कैसा लगा?
   रंगभूमि : पात्र बदल गए हैं
कोई 81 बरस पहले लिखा गया उपन्यास ‘रंगभूमि’ आज फिर हमारी भूमि पर अपना एक-एक पन्ना खोल रहा है. प्रेमचंद ने इसे उस समय लिखा था जब औद्योगीकरण बस अपना कदम उठा ही रहा था. आज वह सबको रौंद रहा है. उस समय भी ‘रंगभूमि’ का एक पात्र गांव वालों के सामने कारखानों का अनगिनत पहाड़ा पढ़ाता है. आज भी हम उसी पहाड़े को पढ़ा जाता देख रहे हैं. बस मंच और पात्र बदल गए हैं. रंगभूमि का पांडेपुर आज जगतसिहपुर, दादरी, सिंगूर, नंदीग्राम आदि में बार-बार दिख रहा है और नायक सूरदास की वह दृष्टि भी जस की तस मौजूद है जो औद्योगिक सुरसा के बढ़ते बदन से तब भी एक सत्याग्रही की तरह लड़ती थी और आज भी उसकी उपस्थिति दिखती है.
उपन्यास का प्रकाशन जनवरी 1925 में हुआ था. इसके पहले प्रेमचंद के नौ उपन्यास प्रकाशित हो चुके थे. तब तक लिखे गए उपन्यासों में यह उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति थी. प्रेमचंद के जीवनी लेखक अमृतराय के शब्दों में - "रंगभूमि प्रेमचंद की आज तक की जीवन-उपलब्धि का महाकाव्य है और उसमें सूरदास ही प्रेमचंद हैं. वे एक आदर्श सत्याग्रही थे, लेकिन राजनीतिक आंदोलन के सीमित अर्थ में नहीं, जीवन की एक समग्र दृष्टि के व्यापक अभिप्राय में." रंगभूमि का पांडेपुर आज जगतसिहपुर, दादरी, सिंगूर, नंदीग्राम आदि में बार-बार दिख रहा है और नायक सूरदास की वह दृष्टि भी जस की तस मौजूद है जो औद्योगिक सुरसा के बढ़ते बदन से तब भी एक सत्याग्रही की तरह लड़ती थी और आज भी उसकी उपस्थिति दिखती है.
रंगभूमि की कथा में वर्णित कुंवर भरत सिंह, राजा महेंद्र कुमार जैसे ताल्लुकेदारों का अस्तित्व अब नहीं रहा, न उदयपुर जैसी रियासतें ही रहीं और न रहे मि. क्लार्क जैसे अंग्रेज हाकिम. लेकिन ‘रंगभूमि’ को जो चीज अर्थवत्ता प्रदान करती है, वह है उसकी कथा में आरंभ से अंत तक औद्योगीकरण-अभियान का विन्यस्त होना, मुख्य कथा का इसी से संबंध है. उपन्यास के आरंभ में ही हमारा सामना होता है देसी उद्योगपति मि. जॉन सेवक की इस चिंता से कि कैसे गोदाम के पास बेकार पड़ी जमीन को सूरदास से खरीद कर उस पर सिगरेट का कारखाना खोला जाए. जॉन सेवक सूरदास को मुंहमांगा दाम देकर उसकी जमीन खरीदना चाहता है. लेकिन सूरदास अपनी जमीन बेचने को तैयार नहीं होता. वह नहीं चाहता कि उसके पांडेपुर में कारखाना खुले, जिससे वहां का परिवेश प्रदूषित होने का खतरा है. दूसरे, उसकी जमीन पर गांव के पशु चरते हैं. कारखाना खुलने से मवेशियों का यह चारागाह समाप्त हो जाएगा. सूरदास के इनकार करने पर जॉन सेवक नाना प्रकार के हथकंडे अपना कर, म्यूनिसिपिल बोर्ड के प्रमुख राजा महेंद्र कुमार और कलेक्टर को मिलाकर सूरदास की जमीन पर कब्जा कर लेता है और अंततः वह वहां पर सिगरेट का कारखाना खोलने में सफल हो जाता है. लेकिन सूरदास इस कारखाने को अपने गांव के लिए अभिशाप ही समझता रहा और अंत तक विरोध करता रहा.
बनारस के पास पांडेपुर की जिस बस्ती में सिगरेट का कारखाना लगाया जाता है, वह वस्तुगत सत्य से अधिक सांकेतिक सत्य के रूप में महत्वपूर्ण है. यूरोप में औद्योगिक क्रांति काफी आगे बढ़ चुकी थी और वहां यांत्रिक विकास ने शारीरिक श्रम को दोयम बना दिया था. इस औद्योगिक विकास से जहां बहुसंख्यक लोग मंत्रमुग्ध थे, वहीं ऐसे भी द्रष्टा, चिंतक थे जो अबाध यांत्रिक विकास को मानव हित के लिए शंका की दृष्टि से देख रहे थे. 1909 में प्रकाशित ‘हिंद स्वराज्य’ पुस्तक में महात्मा गांधी यूरोप में यांत्रिक विकास से उपजी विकृतियों, अमानवीय स्थितियों की निर्मम आलोचना कर चुके थे. प्रेमचंद भी रंगभूमि में यांत्रिक विकास, अंध औद्योगीकरण को गांधीजी की तरह ही आलोचनात्मक दृष्टि से देखते हैं और उसकी संभाव्य विकृतियों को साहित्यिक अभिव्यक्ति देते हैं. इसकी प्रामाणिकता के लिए रंगभूमि की कथा से होकर गुजरना अपेक्षित है.
जॉन सेवक द्वारा सिगरेट का कारखाना खोलने की प्रस्तावित योजना के संबंध में सूरदास अपने अन्य साथियों भैरो, बजरंगी, नायक राम आदि से कहता है, "अब तक तो तुम्हारे ऊपर भगवान की दया है, अपना-अपना काम करते हो, मगर ऐसे बुरे दिन आ रहे हैं, जब तुम्हें सेवा-टहल करके पेट पालना पड़ेगा, जब तुम अपने नौकर नहीं, पराए के नौकर हो जाओगे, तब तुममें नीति-धरम का निसान भी न रहेगा." ठाकुरदीन के यह पूछने पर कि क्या कोई विपत आने वाली है? सूरदास कहता है - "हां, लच्छन तो दिखाई देते हैं. चमड़े के गोदाम वाला साहब यहा एक तंबाकू का कारखाना खोलने जा रहा है. मेरी जमीन मांग रहा है. कारखाना खुलना ही हमारे ऊपर विपत का आना है."
लेकिन मि. जॉन सेवक के मददगार बने राजा महेंद्र कुमार सूरदास को कारखाने से होने वाले लाभ का पहाड़ा सुनाते हैं - जरा यह भी तो सोचो कि इस कारखाने से लोगों को क्या फायदा होगा. हजारों मजदूर, मिस्त्री, बाबू, मुंशी, लुहार, बढ़ई यहां आकर आबाद हो जाएंगे. एक अच्छी बस्ती हो जाएगी, बनियों की नई-नई दुकानें खुल जाएंगी, आसपास के किसानों को साग-सब्जी लेकर शहर नहीं जाना पड़ेगा, यहीं खरे दाम मिल जाएंगे. कुजड़े, खटिक, ग्वाले, धोबी, दर्जी सभी को लाभ मिलेगा. क्या तुम इस पुण्य के भागी न बनोगे ?
| भारत या विश्व स्तर पर औद्योगिक पूंजीवाद से हो रहे इस अनिष्ट को प्रेमचंद ने इस सदी के आरंभ में ही देख लिया था. उन्होंने इसे ‘रंगभूमि’ की मूल कथा का विषय बनाया. |
गांव वाले इन दलीलों के कायल हो जाते हैं और वे भी जमीन दे देने के लिए सूरदास की मान-मनुहार करने लगते हैं. लेकिन बगैर आंखों वाला यह सूरदास कारखाने के खुलने में अंतर्निहित अनिष्ट को दूरदर्शिता से देखते हुए कभी इसके पक्ष में नहीं होता. महेंद्र कुमार की सभी दलीलों से अप्रभावित रहते हुए वह कहता है – "सरकार बहुत ठीक कहते हैं, मुहल्ले की रौनक जरूर बढ़ जाएगी, रोजगारी लोगों का फायदा भी खूब होगा, लेकिन जहां यह रौनक बढ़ेगी, वहां ताड़ी-शराब का परचार भी तो बढ़ जाएगा, कसबियां भी तो आकर बस जाएंगी, परदेसी आदमी हमारी बहू-बेटियों को घूरेंगे, कितना अधरम होगा. दिहात के किसान अपना काम छोड़ कर मजूरी के लालच में दौड़ेंगे, यहां बुरी-बुरी बातें सीखेंगे और अपने बुरे आचरन अपने गांव में फैला देंगे. दिहातों की लड़कियां, बहुएं मजूरी करने आएंगी और यहां पैसे के लोभ में अपना धरम बिगाड़ेंगी. यही रौनक शहरों में है. वही रौनक यहां हो जाएगी. भगवान न करें यहां वह रौनक हो. सरकार मुझे इस कुकरम और अधरम से बचाएं. यह सारा पाप मेरे सिर पड़ेगा." सूरदास की यह आशंका कारखाना खुलने के बाद सच साबित होती है.
लेकिन कारखाने की भूमिका इतने तक ही सीमित नहीं रहती. इस औद्योगिक सुरसा का बदन फैलते जाता है, जिसकी परिणति होती है पांडेपुर वालों का अपने गांव से विस्थापन. कारखाने में काम करने वाले मजदूरों के रहने की खातिर जॉन सेवक राजा महेंद्र कुमार और प्रशासन के सहयोग से सभी ग्रामवासियों को नाम मात्र का मुआवजा राशि देकर उनकी पुश्तैनी घर-जमीन से बेदखल कर देता है. इस विस्थापन से उपजी पीड़ा का प्रेमचंद ने बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है. एक मात्र सूरदास है जो अपनी झोपड़ी छोड़ने को तैयार नहीं होता और एक सत्याग्रही की तरह वह इस विस्थापन के झंझावात के विरुद्ध डटा रहता है. लेकिन औद्योगिक विकास के उन्मादी ध्वजारोहियों को इसकी चिंता कहां ? सूरदास के समर्थन में जनसमर्थन का सैलाब उमड़ पड़ता है. गोलियां चलती हैं. इंद्रदत्त जैसा समाजसेवी मारा जाता है. कलेक्टर मि. क्लार्क सूरदास को गोली मार कर सारे हंगामे की जड़ मिटा देना चाहता है. इस औद्योगिक पूंजीवाद की समर्थक शक्तियों की निर्दयता देखते ही बनती है.
भारत या विश्व स्तर पर औद्योगिक पूंजीवाद से हो रहे इस अनिष्ट को प्रेमचंद ने इस सदी के आरंभ में ही देख लिया था. उन्होंने इसे ‘रंगभूमि’ की मूल कथा का विषय बनाया. जॉन सेवक औद्योगिक विकास से होने वाले मुनाफे को लेकर इस कदर चिंतित है कि उसे दूसरों या समाज के अन्य पक्षों के हित-अहित का भी ध्यान नहीं रह जाता. परिणामतः न केवल पांडेपुर जैसी बस्ती उजाड़ दी जाती है, बल्कि मानवीय रिश्तों की भी होली जला दी जाती है.
जॉन सेवक अपने उद्योग-उत्कर्ष के लिए अपने बेटे-बेटी की भी परवाह नहीं करता. उसका बेटा प्रभु सेवक अपनी समाजसेवा की प्रवृत्ति की वजह से अंततः पिता से अलग हो इंग्लैंड चला जाता है. उसकी बेटी सोफिया को भी पिता के व्यावसायिक स्वार्थों में कोई दिलचस्पी नहीं. मजहबी सरहदों को लांघते हुए वह विनय से प्यार करती है और समाज-सेवा को ही अपने जीवन का आदर्श बना कर अंततः विनय की स्मृति में खुद को भी मृत्यु के हवाले कर देती है. लेकिन जॉन सेवक को इसका तनिक भी मलाल नहीं. बेटे के अलगाव, बेटी की मृत्यु से अप्रभावित यह व्यक्ति कथा के अंत में पटना में दूसरी मिल खोलने की इच्छा और योजना के साथ हमारे सामने आता है.
यह है औद्योगिक पूंजीवाद का असली चरित्र जो केवल मुनाफे और अर्थ लिप्सा को जीवन में सर्वोंपरि बनाते हुए, समस्त मानवीय संवेदनाओं और इंसानी रिश्तों का खून करते हुए संवेदनशून्यता, अमानवीयता का रूखा रेगिस्तान रचता है - मनुष्य को हर दृष्टि से जर्जर, अशक्त बना देता है.
यांत्रिक सभ्यता की दिशा में मनुष्य के कदम लगातार बढ़ रहे हैं. यूरोप हो या अमेरिका, वहां भी पर्यावरण-सुरक्षा के नाम पर आए दिन नए आंदोलन और चिंतन पैदा हो रहे हैं. इस दृष्टि से भारत में भी चिपको आंदोलन, एपिको आंदोलन, गंगा मुक्ति आंदोलन आदि का महत्व है. औद्योगिक या यांत्रिक विकास के जिन सवालों से ‘रंगभूमि’ के लेखक ने मुठभेड़ की है, इस दृष्टि से ‘रंगभूमि’ आज पहले की तुलना में कहीं ज्यादा अर्थपूर्ण हो उठा है.
श्रीभगवान सिंह
(लेखक भागलपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रवक्ता और साहित्यकार हैं.)
अपनी राय दें
कुल टिप्पणियां: 3
-
प्रेषक : BRIJESH YADAVapke alochnatmak vishleshan ki tarif karni hogi. par jo kurityan aaj bhi gaon aur chhote kasbon me pasri padi hui mujhe nahi lagta ki app usese nagawar honge.aur to aur aap unhi vishesh chhetron ko vibhushit kar rahe hai.kya apne jin samasayao ka vistar kiya vo in videshi companiyon ke pahle nahi tha.aap to 1925 ki tulna kar rahe ho ye aap ye kyu nahi sochte 2005 se kya kuch nahi badal gaya. kul milakar aap apne putra kaha rakhana pasand karenge.bite hue kal me , aaj me, ya ane wale kal me.
-
प्रेषक : nitin kumaryour idea and apporach is quite right in one aspect. But at the same time, we should realise and accept with open mind that industrilisation is a unavoidable stage of social development.
-
प्रेषक : prasun latantshree bhagwan singh ne bilkul thik likha hai.sahi me rangbhumi pahle ke tulna me kahin jyada mahatwpurn ho utha hai.
























