राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम
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चक्र सुदर्शन

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कुल रचनायें: 5 | प्रदर्शित: 1 - 5

 बटोर लो अपना हिस्सा

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मांगो जितना चाहिए, अब ताक़त दिखलाय, जनता को तकलीफ़ हो, पर सत्ता झुक जाय। हां सत्ता झुक जाय, लगे हिंसा का घिस्सा, फिर बटोर लो, जितना चाहो अपना हिस्सा। चक्र सुदर्शन,  संविधान  खूंटी  पर  टांगो, भारतवासी!  सब के सब  आरक्षण  ...
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 महंगाई की आंच

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उबली जन-मन भावना, महंगाई की आंच, कीमत इतनी नुकीली, रस्ते पर ज्यों कांच। रस्ते पर ज्यों कांच, बालकों को बहलाओ, बटुआ लहूलुहान, न शॉपिंग करने जाओ। चक्र सुदर्शन कहे— 'चाय है कैसी बबली?' 'गैस बचाने के चक्कर में आधी उबली।' ...
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 बदले पुलिस बयान

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हो कैसे विश्वास अब, सच क्या था श्रीमान, दुहरे हत्याकांड में बदले पुलिस बयान। बदले पुलिस बयान, मची है आपा धापी, साक्ष्य मिटाती बेदर्दी वर्दी है पापी। चक्र सुदर्शन कहे तरीका यही बैस्ट हो, पुलिस कर्मियों का पहले नारको टैस्ट ...
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 जायज़ नाराज़ी

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बाजी पल्टी कोर्ट में, लौटे वेणु गुपाल, एम हुआ पूरा, उधर, एम्स बजे घड़ियाल। एम्स बजे घड़ियाल, मरीज़ों की क्या चिन्ता, अहंकार का युद्ध, कराहें कोइ न गिन्ता। चक्र सुदर्शन, जायज़ है उनकी नाराज़ी, क्यों होने दी, अस्पताल में आतिशबाज़ी? ...
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 मौन कान्हा की बंसी

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यमुना लाखों वर्ष से, थी जीवन की डोर, लहराती हरियालियां, खुशहाली चहुं ओर। खुशहाली चहुं ओर, हो गई अब विध्वंसी, मछली तक मर जांय, मौन कान्हा की बंसी। चक्र सुदर्शन, कंसों ने वो कचरा डाला, यमुना मैया, तुझको बना दिया ...
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