राजनीति का हम्माम और नंगे हुक्काम
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   मनमोहन के दोस्त बुश

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image घाटे पानी सब भरे औघट भरे न कोय।

औघट घाट कबीर का भरे सो निर्मल होय।। 

तुम तो कह रहे थे साधो कि भांग, गांजा, सुलफा सब इतने महंगे हो गए हैं कि सुट्टा लगाते हुए भी तुम सोचते हो कि पता नहीं कल मिलेगा या नहीं। और तुम यह भी कह रहे थे कि यह सब अनाज, दालों, सब्जियों और दूध दही के भाव आसमान चढ़ जाने के कारण हो रहा है। तुमने समझाया था कि पंद्रह साल से इस सरकार ने खेती की अनदेखी की है और इसलिए खेती की पैदावार लगातार गिरी है। और सरकार ने अनाज के धंधे में बड़े-बड़े व्यापारियों को आने दिया है। और वायदा बाज़ार भी अनाज के व्यापार में घुस गया है। और ये व्यापारी लोग अनाज की जमाखोरी कर के कमी पैदा करते हैं और जब लोग घबरा कर खरीदने आते हैं तो भाव बढ़ा देते हैं। आदमी अन्न खाए बिना नहीं रह सकता और व्यापारी जमाखोरी और मुनाफाखोरी से बाज नहीं आ सकता। एक तो पैदावार कम ऊपर से लोगों की भूख से खेलने की छूट। सरकार की इस नीति के कारण ही महंगाई और हाय-हाय मची हुई है।

हमें मालुम नहीं था साधो कि अपने देश में ऐसे-ऐसे और इतने खाने-पीने वाले लोग हो गए हैं कि जिनके खाने-पीने से अपने देश में ही नहीं पूरी दुनिया में टोटा पड़ जाय।

हमने तुम पर विश्वास किया साधो। लेकिन अब अमेरिका के राष्ट्रपति बुश कह रहे हैं कि यह महंगाई तो अपने देश के खाते-पीते लोगों ने बढ़ाई है। और इन खाते-पीतों के कारण अपने देश में ही नहीं सारी दुनिया में अनाज की कमी हो गई है। वह इतना महंगा हो गया है कि सबसे रईस और सबसे बलवान देश के राष्ट्रपति और विदेशमंत्री भी घबरा गए हैं। हमें मालुम नहीं था साधो कि अपने देश में ऐसे-ऐसे और इतने खाने-पीने वाले लोग हो गए हैं कि जिनके खाने-पीने से अपने देश में ही नहीं पूरी दुनिया में टोटा पड़ जाय। जरूर अमेरिका ने अपने मुल्क में से ऐसी सच्ची जानकारी इकट्ठी करवायी होगी जो अपनी सरकार और अपने जानकारों के पास भी नहीं है। तुम तो कह रहे थे साधो कि अपने देश के आम लोगों को खाने को अब उतना अनाज भी नहीं मिलता जितना पचास साल पहले मिला करता था। इसका मतलब तो यही हुआ कि अपने खाने पीने वाले अपने ही भूखों मरते लोगों का अनाज-पानी हजम नहीं करते। दुनिया भर का खाना पीना चट कर जाते हैं।

हम तो इस अचंभे से घबरा गए साधो कि अपने गरीब भूखमरे देश में ऐसे और इतने पेटू हो गए हैं। लेकिन ये बुश बड़ा उस्ताद आदमी है साधो। ये अपने देश के खाते-पीते लोग ही तो हैं जो महंगाई पर इतना हल्ला कर रहे थे। और जिनके हल्ले को तुम्हारे अखबार और सारे के सारे न्यूज़ चैनल नगाड़े की तरह बजा रहे थे। इन्ही के पास पैसा है और यही अपने भरे हुए बटुए लेकर बड़ी-बड़ी मंडियों और मॉलों में जाते हैं और कारों में भर-भर कर सामान लाते हैं। अपने देश के आम लोग बेचारे इस बाज़ार में हैं ही कहां। वे तो खड़ा भी नहीं हो सकते। बाज़ार तो सब ओर पैसे वालों का ही होता है। यही खाते पीते लोग सरकार को कोस रहे थे कि इससे महंगाई नहीं थमती। अब इस बुश ने इन्हीं लोगों को कोसा है कि दुनिया भर में इन्हीं के कारण हाय-तौबा मची हुई है। यह बुश हमारे मनमोहन सिंह का दोस्त है साधो। उसने खाते-पीते लोगों की मार से मनमोहन सिंह को बचा लिया। लेकिन गरीब की आह से कौन बचाएगा साधो! उससे तो लोहा भी भस्म हो जाता है।

प्रभाष जोशी

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अपनी राय दें comment कुल टिप्पणियां: 1

  • प्रेषक : pravin
    sadho dekho bush bourana