कुल रचनायें: 5 | प्रदर्शित: 1 - 5
 प्रेम है जहां, भगवान है वहां - लियो तोल्सतोय
 
रूस के मशहूर लेखक लियो तोल्सतोय की ये कहानी बताती है कि निष्काम प्रेम किस तरह इंसान को ईश्वर से जोड़ सकता है. एक नगर में मार्टिन नाम का एक मोची रहा करता था। नीचे तले में एक तंग कोठरी ...
 आज़ादी - दिनेशप्रताप सिंह चौहान
 
गोरे रहें या काले रहें हमें फर्क क्या? अपने लिए आज़ादी हुई स्वप्न एक झूठा, हां पहले रंज था कि ग़ैर लूट रहे हैं, और अब ये सब्र है चलो अपनों ने ही लूटा। ढकते हैं कब से वायदों से ...
 मैं बहुत खुश थी अम्मा ! - अंशु मालवीय
 
ये कविता, तहलका के एक पाठक कुमार मुकेश ने गुजरात पर तहलका के विशेष अंक में लिखे तरुण जी के संपादकीय पर टिप्पणी करते हुए उद्धृत की थी...एक भीषण मानवीय त्रासदी का ऐसा चित्रण कि कलेजा मुंह को आ जाए...जिसने ...
 जाहिल मेरे बाने - भवानी प्रसाद मिश्र
 
मैं असभ्य हूं क्योंकि खुले नंगे पांवों चलता हूं मैं असभ्य हूं क्योंकि धूल की गोदी में पलता हूं मैं असभ्य हूं क्योंकि चीर कर धरती धान उगाता हूं मैं असभ्य हूं क्योंकि ढोल पर बहुत ज़ोर से गाता हूं ...
 खूब गुजरे ये वर्ष – शरत जोशी
 
उस दिन जब देश आज़ाद हुआ, तब मन में कितनी शंका-कुशंकाएं थी। अब वे सब काफूर हैं। सैंतीस साल आत्मविश्वास विकसित करने के लिए काफी होते हैं। अब किसी किस्म का कोई डर नहीं है। ख़ासकर, वे डर तो बिल्कुल ...
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