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   "पहले 'नो टेररिस्ट' सर्टीफिकेट लाओ"
विवादों से घिरे कश्मीर में पैदाइश के दौरान, मैंने कभी भी किसी को मस्जिद में नमाज़ पढ़ने से रोके जाते हुए नहीं देखा था, ना ही कभी मुझे खुद को मुस्लिम कहते हुए अटपटा लगा था। लेकिन मैं आज भी अपनी मां के चेहरे पर उभरी उस भय की छाया को याद कर सकता हूं जो किशोरावस्था में पहली बार मेरी ठुड्डी पर उग आए चंद बालों की वजह से थी। उन्हें ये चिंता सता रही थी कि मैं सेना के किसी अभियान में न पकड़ लिया जाऊं जो हर दाढ़ी वाले को आतंकवादी मानती है।
बचपन में जब सेना के जवान सड़कों पर मार्च करते थे या फिर आतंकवादी ग्रेनेड से हमले करते थे तब हम भय के मारे कांप जाते थे। अपने कमरे की चार दीवारों के बीच मुट्ठी बांधे हम ज़मीन पर लेट जाते थे। उस समय भयभीत होकर मैं कुरान की आयतें नहीं दोहराता था। बजाय इसके मैं अपने स्कूल की असेंबली में होने वाली प्रार्थना फुसफुसाता रहता था-- "लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी। ज़िंदगी शम्मा की सूरत हो खुदाया मेरी।" उस वक्त खुदा ही हमारे एकमात्र रक्षक होते थे।
उस समय धर्म को लेकर हम कुछ खास गंभीर नहीं थे। इसमें खेल और मस्ती का भी अहम स्थान था। मुझे याद है हमारे बड़े बुजुर्ग हमेशा मुझे और मेरे दोस्तों को शांति से सामूहिक नमाज़ में हिस्सा लेने के लिए कहा करते थे। मगर हम नमाज़ पढ़ते तो थे लेकिन वैसे नहीं जैसा हमें कहा जाता था। जब इमाम ज़ोर-ज़ोर से कुरान की आयतें पढ़ रहे और लोग शांति से उन्हें सुन रहे होते थे तब हम बच्चे या तो हंस रहे होते या फिर कुछ करने के लिए कुलबुलाते रहते थे। फिर पास की पहाड़ी पर भाग जाते थे-- जिसे कुछ लोग तख्त-ए-सुलेमान तो कुछ शंकराचार्य की पहाड़ी कहते थे।
इस समय तक बढ़ती असुरक्षा के चलते घाटी के पंडित यानी कश्मीरी हिंदू यहां से जम्मू पलायन कर चुके थे। श्रीनगर के ज्यादातर मंदिर निर्जन, वीरान हो चुके थे। मैंने कभी वो भजन नहीं सुने जो हमारे बाप-दादाओं की पीढ़ियों ने सुने थे। लेकिन मेरे पिता हमेशा ये कह कर मेरा उत्साह बढ़ाते थे कि, पंडितों के बच्चों जैसे मेहनती और पढ़ाकू बनो। उनका मानना था कि पंडित समुदाय के जाने के साथ ही घाटी में ऐसा कोई नहीं बचा था जिसका पढ़ाई-लिखाई के मामले में अनुसरण किया जा सके। मेरे किशोरावस्था तक पहुंचने से पहले ही कश्मीर इस धर्मपरायण और विद्वान समुदाय से महरूम हो चुका था।
मैं इस अहसास के साथ बड़ा हुआ कि मैं महज़ एक मुसलमान नहीं हूं बल्कि एक कश्मीरी मुसलमान हूं। हालांकि मैं अल्लाह में आस्था रखने वाला मुसलमान हूं मगर मुझे किसी भी पूजास्थल में जाने में कोई झिझक नहीं होती थी चाहे वो मंदिर हो या मस्जिद या फिर चर्च। उन शुरुआती दिनों में मुझे यही सिखाया जाता था कि मुस्लिम होने का मतलब है दूसरों की सहायता करना, दूसरे धर्मों का सम्मान करना। तब मुझे इस बात का तनिक भी अहसास नहीं था कि भविष्य में मेरे साथ क्या होने वाला है।
कई सालों बाद जब मैंने मास्टर डिग्री में दाखिला लेने की कोशिश की तब मुझे एक ज़बर्दस्त झटका लगा। एक प्रतिष्ठित भारतीय विश्वविद्यालय ने ये जानकर कि मैं एक कश्मीरी मुसलमान हूं, मुझसे आतंकवादी न होने का प्रमाणपत्र मांगा। इस्लाम के प्रति मेरी पैदाइशी धारणा पर पहले से ही हमले हो रहे थे और तख्त-ए-सुलेमान--शंकराचार्य पहाड़ी पर खेलने कूदने और कॉलेज जाने लायक होने के दौरान चीज़े काफी बदल चुकी थीं।
9/11 और 13 दिंसबर को भारतीय संसद पर हुए हमले के बाद जल्द ही दुनिया की सोच बदल गई। मेरी क्षेत्रीय और धार्मिक पहचान से ही मुझे परिभाषित किया जाने लगा। भारतीय जनता की नज़र में कश्मीरी और पूरी दुनिया के लिए मुसलमान होना आतंकवादी होने का सर्टीफिकेट बन गया। "कश्मीरी-मुस्लिम" एक ऐसा मिश्रण जिस पर मुझे फख्र होना चाहिए था एक बोझ में तब्दील हो चुका था।
जब तक में जवान हुआ मुसलमानों के प्रति दुनिया का नज़रिया बदल चुका था और इसके चलते मेरा भी खुद को देखने का नज़रिया बदल गया। मुझसे सवाल किए जाते-- तुम एक कट्टरपंथी मुसलमान हो या फिर उदारवादी? तुम एक सूफी हो या फिर बिन लादेन के संस्करण वाले इस्लाम के समर्थक? वो शायद घुमा फिरा के ये पूछ रहे थे-- तुम हमारे दोस्त हो या फिर हमारे दुश्मन? संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं। ये सीधे इस तरफ या उस तरफ की स्थिति थी। फलां के खिलाफ या फलां के समर्थन में?
एक सेना के जवान ने एक बार मुझसे मेरी ही जन्मभूमि में पहचान की किसी निशानी की मांग कर डाली। मैं इस दुविधा में पड़ गया कि उसे बहुत सारी पहचानों में से कौन सी बताऊं। अगर धर्म का अर्थ ईश्वर को अपने जीवन के केंद्र में रखना है तो मैं गहराई से एक धार्मिक व्यक्ति हूं। लेकिन चूंकि मेरे सारे चिप्पे, मेरी हर पहचान दुनिया की निगाहों के मुताबिक नहीं हैं इसलिए मुझे गहराई में जाकर सोचना होगा कि मैं क्या बताऊं कि दरअसल मैं हूं कौन? मगर मैं जितना ही सोचता हूं ये और भी जटिल होता जाता है।
सुहेल अकरम
(श्रीनगर के रहने वाले सुहेल अकरम पत्रकारिता के छात्र रहे हैं।)
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प्रेषक : ABDUL WAHISDEAR BHAI SUHAIL. MAY AGE IS 53.I BORN & GREW UP IN GUJRAT.UP TO SECONDRY SCHOOL, WE DONOT KNOW WHAT IS RACISM.WE CONSIDER US MUSLIM, BUT IT WAS NOT APROBLEM BETWEEN OUR HINDU FRIENDS. BUT WHEN I WENT IN SIR K.P.COLLEGE OF COMERCE IN SURAT, WE RECEIVED 'WARM'! WELCOME FROM OUR SATHI AS MIAN(?). IN 1971.EVEN TODAY MODI PUBLICALY ADRESSING US IN HIS SPEECH WITH MIAN.YOU ARE IN KASHMIR AND THERE IS NATURAL PROBLEM AS YOU DESCRIBE BUT VERY FAR FROM YOU WE IN GUJRAT FACING SAME PROBLEMS SINCE 1971(SORRY 'ME')IN 1981 I WAS INSULTED IN MY GOVT. SERVICE BECAUSE OF MY RELEGION.THEY HATE US JUST BECAUSE AS THEY SAY, THEY ARE WITH KASHMIRI PANDIT. UP TO NOW NONE OF GUJRATI WENT TO KASHMIR TO RESTORE PANDIT IN KASHMIR. IF THEY DID IT WE WILL HAPPY.EACH SINGLE INDIAN NATIONAL IS SAME AS ME AND YOU.BUT UNFORTUNATELY PEOPLE WHO REFUSE OUT CONSTITUTION ARE BEING CONSIDER AS DESHBHAKT.AND JUST BECAUSE OF OUR MAZHAB WE ARE GADDAR. KABIRKHAN TRIED TO SAY THAT.THAT WAS THE IDEA OF HIS FILM. BUT CARFULLY IT WAS NOT DISCUSSED INSTEAD.THERE IS LOT OF TO SAY BUT WHO CARES?!!!!! HUBB UL WATAN JUZ LIL IMAN. LOVING YOUR COUNTRY IS PART OF ISLAM. WE ARE MUSLIM. SO WE WILL LOVE ,WE LOVE OUR COUNTRY, REGARDLESS WHAT GADDAR ARE SAYING. WE NEVER HARM OUR COUNTRY AND WILL PRACTICE IN OUR MAZHAB. INSHA ALLAH...........
























