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   "हम कोई पश्चिम के कूड़ेदान थोड़े ही हैं"
एक सीढ़ी चढ़कर सांस लेना, ज़मीन पर बैठ जाना। कुर्सी में धंसे रहना। एक समय ऐसा था जब सामान्य जिंदगी बिताना भी मेरे लिए असंभव था। ये वो समय था जब मैं दिन में छह-छह दर्द की गोलियां खा जाती थी और उसके बाद भी कुछ ठीक नहीं होता था। ये 1996 की बात है जब मेरा वज़न 160 किलो था और मैं बहुत-बहुत मोटी थी।
क्या मैं मोटी पैदा हुई थी? क्या मेरे साथ हॉरमोन्स में कोई गड़बड़ी थी? बिल्कुल नहीं। पैदा होने के वक्त मेरा वजन 6 पौंड था और मैं एक बहुत ही सामान्य और सक्रिय बच्ची थी।। तैरना मेरा सबसे पसंदीदा शगल था। लेकिन खेल के बाद मेरे हाथ में हमेशा फ्रेंच फ्राइज़, आलू के चिप्स, मिल्क शेक और बटर में डूबे सैंडविच हुआ करते थे। छह साल की उम्र में ही मुझे जंक फूड और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों--जिनमें तरह-तरह के केमिकल्स होते हैं—की आदत पड़ चुकी थी।
ढेर सारी चीज़ें खाने के बाद भी मैं डिनर जरूर करती थी, फिर चाहे भूख हो या न हो। लिहाजा ठूंस-ठूंस कर खाना मेरी आदत बन गई। जिस तरह से एक ड्रग एडिक्ट मादक पदार्थों के लिए पागल रहता है, ज़्यादा खाने का आदी तले-भुने खाने के लिए वैसी ही तड़प महसूस करता है। जो खाना मैं खाती थी वो इतना गरिष्ठ था कि उसने मुझे आलसी बना दिया था। नतीजतन मैं कभी सुबह उठ ही नहीं पाती थी। मुझे बिस्तर छोड़ने के लिए ही बहुत सारी मीठी और घी में डूबी चीज़ें खानी पड़ती थीं। जैसे जैसे स्कूल का समय बढ़ता गया मेरे खेलने का समय कम होता गया और इसका नतीजा ये निकला कि मेरा वजन लगातार बढ़ने लगा। मेरा टिफिन बॉक्स तली-भुनी चीजों और क्रीम बिस्किट्स से भरा रहता था और दस साल की उम्र में ही मैं 50 किलो की हो गई।ढेर सारी चीज़ें खाने के बाद भी मैं डिनर जरूर करती थी, फिर चाहे भूख हो या न हो। लिहाजा ठूंस-ठूंस कर खाना मेरी आदत बन गई। जिस तरह से एक ड्रग एडिक्ट मादक पदार्थों के लिए पागल रहता है, ज़्यादा खाने का आदी तले-भुने खाने के लिए वैसी ही तड़प महसूस करता है।
12 साल की होते होते मैं पूरी तरह से मोटापे की जकड़ में आ गई थी। मैं एक प्राकृतिक चिकित्सक के पास गई। उन्होंने मेरी काफी सहायता की। लेकिन मैं उस वक्त एक बच्ची थी। नियमित रूप से उनकी बताई डाइट के हिसाब से खाना, मालिश कराना या भाप लेना मेरे लिए संभव नहीं हो पाया। 13 साल की उम्र में मेरा वजन 70 किलो हो गया और मुझे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। मैंने अपने दोस्तों से झूठ बोला कि मैं छुट्टी मनाने जा रही हूं। अगले दस दिनों तक मैं गोलियां निगलने, भूखे रहने और एनीमा जैसी यातनाओं से गुजरी। मेरा वजन दस किलो कम हुआ लेकिन घर वापस लौटने के छह महीने के अंदर ही मैंने इसका दोगुना वजन बढ़ा लिया। पेट साफ करने वाली दवाईयां लेते-लेते मुझे हमेशा के लिए कब्ज़ की समस्या ने घेर लिया था।
18 साल की होते होते मेरा वजन 96 किलो हो गया, तब मैंने फैसला किया कि क्यों न ज़िंदल हेल्थ फॉर्म में एक बार कोशिश करके देखा जाय। मुझे सुबह पांच बजे उठना पड़ता था और दस बजे तक इलाज चलता रहता था। वहां टीवी नहीं था, कमरे भी बहुत साधारण थे और खाना तो निहायत ही बेस्वाद होता था। शहरी लड़की होने की वजह से वहां की दिनचर्या मेरे लिए बिल्कुल अजीब थी। जैसे ही मैं वहां से निकली, मैंने वहां के खानपान का तरीका भी छोड़ दिया। मैं फिर पुराने ढर्रे पर चल पड़ी और जल्द ही मेरा वजन बढ़कर 145 किलो हो गया। मैं शेरी लुइस नाम के एक वजन घटाने वाले कार्यक्रम से जुड़ गई जो खाने की जगह ज़्यादा प्रोटीन देने पर आधारित था। मैं बीमारू महसूस करने लगी और मेरा पेट काफी खराब रहने लगा। इसकी वजह से मुझे अपना एक ऑपरेशन भी करवाना पड़ा।
इस समय तक मैं 32 साल की हो चुकी थी और मेरा वजन 160 किलो हो गया था। लगातार दर्द और अपने आकार की वजह से बंधनों भरी ज़िंदगी बिताते-बिताते मैं पूरी तरह टूट चुकी थी। अपने पुराने अनुभवों से एक बात मैं जान चुकी थी कि अगर मुझे इस लड़ाई में जीतना है तो मुझे ये लड़ाई अपने ही शहर में, अपने घर में अपने जाने-पहचाने खाने के साथ जीतनी होगी। मेरी दोस्त बीनू ने डॉ. धुरंधर से मुलाकात का समय दिलवाया और उन्होंने मेरे खानपान की एक व्यवस्थित योजना तैयार की। सितंबर 1996 में मेरा उत्साह बढ़ाने वाले तीन दोस्तों के साथ मैंने वजन घटाने वाली अपनी निर्णायक यात्रा की शुरुआत की।
नियंत्रित खानपान और एक्सरसाइज़ के जरिए अगले दो सालों में ही मैंने करीब 60 किलो वजन कम कर लिया। लेकिन वजन तो कम हुआ पर मेरी त्वचा ढीली होकर लटकने लगी थी और साथ ही मुझे भूख लगनी भी बंद हो गई थी। मुझे एमेनोरिया (मासिक चक्र का बंद होना) हो गया, जिसकी वजह से मेरा चेहरा ऐसा दिखने लगा जैसे मैं नाजी यातना शिविर से निकली होऊं। ऑपरेशन करके मेरे शरीर से 12 किलो अतिरिक्त चमड़ी हटाई गई।
अभी मैं इससे उबरने में ही लगी ही थी कि मुझे कब्ज की पुरानी समस्या फिर से पैदा हो गई और मुझे एक और ऑपरेशन से गुजरना पड़ा। मैं मानसिक तौर पर बुरी तरह से टूट चुकी थी। मैं पतली हो गई थी, फिर मुझे परेशानी क्यों हो रही थी? मेरे डाइटीशियन के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
मैंने प्रकृति चिकित्सक और योग गुरू जहांगीर पालखीवाला का दरवाजा खटखटाया। धीरे-धीरे मैंने असल खाना खाना सीखा। इतने सालों तक उल्टे सीधे खाने की वजह से मेरे गॉलब्लैडर में पथरी हो गई थी। लेकिन इस बार किसी ऑपरेशन की बजाय मैंने प्राकृतिक चिकित्सा का सहारा लिया। जंक फूड का जो असर मेरे शरीर और मन पर हुआ था उससे मैं डर गई थी। मैं जान गई थी कि डिब्बाबंद खाने में उपयोग होने वाले रसायन हमारे शारीरिक तंत्र को तहस-नहस कर देते हैं। अक्सर इसका दुष्प्रभाव मोटापे से लेकर रक्तचाप और कैंसर तक के रूप में सामने आता है। मानसिक समस्याओं को तो छोड़ ही दीजिए।
जिन यातनाओं से मैं गुजरी हूं मैं चाहती हूं कि कोई भी इनसे न गुजरे। आज मैं मुंबई में अपना हेल्थ क्लीनिक चलाती हूं जहां लोगों को समझदारी और व्यवस्थित तरीके से वज़न कम करने के तरीके बताए जाते हैं। मैं स्कूलों और दूसरी संस्थाओं के लिए स्वस्थ जीवनचर्या और खानपान से संबंधित कार्यशालाएं भी आयोजित करती रहती हूं। मैं चाहती हूं कि हमारे यहां जागरूकता बढ़े, हम खान-पान की अमेरिकी शैली को नहीं अपनाएं और न ही वहां के मोटापा, मानसिक और तमाम दूसरे खतरनाक रोगों को, जो महामारी जैसा रूप ले चुके हैं। हम कोई पश्चिम के कूड़ेदान थोड़े ही हैं। हमें डिब्बाबंद खाने को छोड़ कर असली खाने की तरफ लौटना होगा।
ऐसे लोग जो मेरी तरह मोटापे की समस्या से जूझ रहे हैं, उनके लिए मैं बस इतना ही कहना चाहती हूं कि मैं उन्हें समझ सकती हूं, मैं इससे गुजर चुकी हूं, मैं इसके दर्द और दुश्वारियों से वाकिफ हूं। मुझे पता है, ऐसा वक्त आता है जब लालच से पार पाना मुश्किल होता है। लेकिन मेरे पास इस लड़ाई से जीतकर बाहर निकलने का अनुभव भी तो है।
ये संभव है।
नैनी सीतलवाड़
(44 साल की सीतलवाड़, मुंबई में अपना हैल्थ क्लीनिक चलाती हैं।)
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कुल टिप्पणियां: 1
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प्रेषक : manoj pamarkahte hai koshish karne wale ki kabhi har nahi hoti. aapne koshish ki safalta mili. vaweight kam karne ke achche tarike batae. with thanks
























