खिलाफ़त
ये तहलका-फुलका कोना रोज़मर्रा की पत्रकारिता से इतर तहलकाइयों की कोमल-कठोर, छुपी-उघड़ी हर तरह की भावनाओं को ज़ुबान देने का प्रयास है... |
इन्सान और बन्दर में
एक बहुत गहरा फर्क है।
इन्सान के हाथ में पांच उंगलियां नहीं होती।
पांच में से एक अंगूठा होता है,
जो चारों उँगलियों के खिलाफ खड़ा होता है।
एक अकेले अंगूठे की खिलाफत पे
देखिए तो, इंसानियत कायम है।
कला, संस्कृति, औज़ार, हथियार, चिढ़, धर्म, तहज़ीब, ऐसे ही एक
ठेंगे के मोहताज हैं
जो किसी दूसरी ऊँगली को अपनी तरफ
खींचने की कोशिश नहीं करता
लेकिन खुद भी अपनी खिलाफ़त नहीं छोड़ता।
इंसानियत की जड़ यही है।
एनी जैदी
अपनी राय दें
कुल टिप्पणियां: 4
-
प्रेषक : kaduvasach.blogspot.comबन्दर और इंसान के फर्क को छोडिये , समानता को देखिये - दोनो गुलाटी मारना नहीँ छोडते ,इसके अलावा और भी समानताएँ हैँ .........।
-
प्रेषक : Bankelal YadavAmurt Kavita Ka Shaandaar Udaaharan!Yaani Jo Man main Aayega Lekhenge, Bigad le jise jo Bigadnaa Ho. . . Great Lage raho India!!
-
प्रेषक : pravinbhawana or bimb me aasantulan hai
-
प्रेषक : Rakeshबड़ा अजीब सा दर्शन है जी...






















