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 आदमी क्या करे
 
ये तहलका-फुलका कोना रोज़मर्रा की पत्रकारिता से इतर तहलकाइयों की कोमल-कठोर, छुपी-उघड़ी हर तरह की भावनाओं को ज़ुबान देने का प्रयास है...ये करे तो मरे वो करे तो मरे आदमी क्या करे ये नहीं सूझता वो नहीं बूझता ये नहीं काम का ...
 खिलाफ़त
 
ये तहलका-फुलका कोना रोज़मर्रा की पत्रकारिता से इतर तहलकाइयों की कोमल-कठोर, छुपी-उघड़ी हर तरह की भावनाओं को ज़ुबान देने का प्रयास है...इन्सान और बन्दर में एक बहुत गहरा फर्क है। इन्सान के हाथ में पांच उंगलियां नहीं होती। पांच में से एक अंगूठा ...
 प्रेस* ( * कंडीशन अप्लाई)
 
ये तहलका-फुलका कोना रोज़मर्रा की पत्रकारिता से इतर तहलकाइयों की कोमल-कठोर, छुपी-उघड़ी हर तरह की भावनाओं को ज़ुबान देने का प्रयास है...टाइम्स ऑफ इंडिया की एक उड़ती पड़ती ख़बर पर एक मित्र ने बातों ही बातों में सबका ध्यान खींचा। वाकया कुछ यूं ...
 पिताजी ठीक ही कहते थे...
 
ये तहलका-फुलका कोना रोज़मर्रा की पत्रकारिता से इतर तहलकाइयों की कोमल-कठोर, छुपी-उघड़ी हर तरह की भावनाओं को ज़ुबान देने का प्रयास है...रेडियो पर किसी कार लोन वाले विज्ञापन में कोई गला फाड़ रहा था—“और मैं कार इसलिए भी नहीं लेता क्योंकि ऑफिस देर से पहुंचने ...
 लखनवी से अजनबी आज का लखनऊ
 
ये तहलका-फुलका कोना रोज़मर्रा की पत्रकारिता से इतर तहलकाइयों की कोमल-कठोर, छुपी-उघड़ी हर तरह की भावनाओं को ज़ुबान देने का प्रयास है...उन्नीसवी सदी के एक दिन दो नवाबो की ट्रेन छूटी थी पहले आप-पहले आप के चक्कर में और सारी दुनिया में लखनऊ की ...
 नेवर माइंड कर दे!
 
ये तहलका-फुलका कोना रोज़मर्रा की पत्रकारिता से इतर तहलकाइयों की कोमल-कठोर, छुपी-उघड़ी हर तरह की भावनाओं को ज़ुबान देने का प्रयास है...रात को नींद आती नहीं और सुबह आंख खुल पाती नहीं आज भी लेट, बॉस फिर किल्सेगा फुल स्पीड पर कार भगाऊं ...
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