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   एक नगरवधू की आत्मकथा
कभी-कभार कुछ घटनाएं एक सुखद आश्चर्य की तरह घटती हैं...रोजाना की आपाधापी में कुछ ऐसा हो जाता है जो क्षण भर ठहरने का मौका देता है। इस बार यह घटना एक किताब के रूप में आई और सच कहूं, अंग्रेजी की शब्दावली में, तो कवर-टू-कवर यह किताब मोह गई। कभी राजस्थान पत्रिका और धर्मयुग में पत्रकारिता करने वालीं और अब पिछले 25 साल से भारतीय सूचना सेवा में काम कर रहीं राजस्थान की गुमनाम कवियित्री अजन्ता देव की लिखी एक छोटी-सी पुस्तिका मिली 'एक नगरवधू की आत्मकथा'। अजन्ता देव का अब तक सिर्फ एक ही कविता संग्रह आ सका है 'राख का किला'। शायद संकोचवश उन्होंने कविताएं न छपवाई हों, लेकिन नई कविताएं देख कर यही लगता है कि हीरा सदा के लिए होता है।
किताब में आवरण के बाद भर्तृहरि का एक श्लोक नीतिशतक से उद्धृत है...अगले पन्ने पर ग़ालिब का शेर देखें-
बू-ए-गुल, नाल:-ए-दिल, दूद-ए-चराग़-ए-महफि़ल
जो तिरी बज्म से निकला, सो परीशां निकला।
अगले ही पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य लिखा है- 'सारी कलाएं अनुकरण हैं'। इसका क्या औचित्य और संदर्भ है, यह पुस्तक पढ़ने के बाद तक समझ नहीं आता। इसके बाद जो बात आती है, वह चौंकाती है--अजबगढ़-भानगढ़ के उस 'बेवड़े', 'मवाली' या 'बावरा-अहेरी' के लिए, जिसके लिए (रेणु की भाखा में) मैंने लाखों के बोल सहे। एक बहुत पुराना शेर जाने याद्दाश्त के किस तहखाने से कौंध पड़ता है जो अब तक गूंज रहा है- जैसे कोई चंचल नारी घूंघट में शरमाए/पीतम प्यारे त्याग चलें तो चंचलता मर जाए। कहीं न कहीं से तो यह शेर अजन्ता देव की कविताओं से जाकर जुड़ता है।
यह जाने कौन-सा रहस्य है जिस पर इस पुस्तक को समर्पित किया गया है, पता नहीं, लेकिन जैसे-जैसे आप पुस्तक की परतों को हटाने में जुटते हैं, रहस्य सघन होता जाता है।
पूरे संग्रह की 23 छोटी-बड़ी कविताओं-क्षणिकाओं पर नजर डाल लेने के दौरान और बाद में औचक मीर का लिखा एक बहुत पुराना शेर जाने याद्दाश्त के किस तहखाने से कौंध पड़ता है जो अब तक गूंज रहा है- जैसे कोई चंचल नारी घूंघट में शरमाए/पीतम प्यारे त्याग चलें तो चंचलता मर जाए। कहीं न कहीं से तो यह शेर अजन्ता देव की कविताओं से जाकर जुड़ता है।
सभी कविताएं एक नगरवधू का आख्यान हैं...आधी दुनिया की एक ऐसी प्रतिनिधि प्रजाति का, जिसकी चंचलता का रस सूख चुका है...बची है तो सिर्फ वास्तविकता की मुट्ठी भर राख और याद करने को वे रूमानी भाव जो हर रात अलग-अलग रूपों में उसके करीब आकर फना हो जाते हैं। देखें एकाध बानगी-
आमन्त्रण निमन्त्रण नहीं/अनायास खींच लेता है अपनी ओर/मेरा मिथ्यालय
श्रेष्ठ जनों के बीच/यहीं रचा जाता है/कलाओं का महारास
मेरे द्वार कभी बंद नहीं होते/ये खुले रहेंगे/तुम्हारे जाने के बाद भी। (मेरा मिथ्यालय)
एक और बेहतरीन बानगी-
स्त्रियां नहीं बन सकतीं शराबी/यह कहा होगा कवि ने/मेरे हाथ से पीकर/अगर बन जातीं स्त्रियां शराबी/तो पिलाता कौन
मेरे प्याले भरे हैं मद से/केसर कस्तूरी झलझला रही है/वैदूर्यमणि सी/कीमियागर की तरह/मैं मिला रही हूं/दो विपरीत रसायन/विस्फोट होने को है/मैं प्रतीक्षा करूंगी तुम्हारे डगमगाने की। (विपरीत रसायन)
इन कविताओं की सिर्फ कुछ पंक्तियां उद्धृत करना संभव नहीं क्योंकि कविता का अंत ही उसका पूरा अर्थ देता है...हालांकि कुछ क्षणिकाएं भी हैं जो उतना ही असर डालती हैं-
ये अब्र पुराने हैं/बरसेंगे यहीं आकर/मेरा घर जाने हैं। (एक माहिया)
एक नवगीत की छटा लिए इसे भी सुनें- एक सिलसिला है, जो देह से शुरू होकर देह पर ही खत्म होता है और आत्मा हर रात देह बदलती है- एक झूठा आवरण जिसे पहनने को एक नगरवधू का जीवन अभिशप्त होता है...किसी उपन्यास या कहानी से कहीं बेहतर ये दो दर्जन कविताएं उसे चित्रित करती हैं।
रात अंधेरी तारे गुम/इस पल सबसे प्यारे तुम
जितना हमसे दूर हुए/उतने हुए हमारे तुम
घास फूल चिडि़या आकाश/सबमें नदी किनारे तुम
अनजाने में जीत गए/जानबूझ कर हारे तुम
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा/मेरे पंज पियारे तुम।
लोभ तो सभी कविताएं सुनाने का है, लेकिन संभव नहीं। एक नगरवधू की पीड़ा को बयान करते जाने कितने आख्यान इस पुस्तिका में हैं, लेकिन जहां स्त्री होने का दर्प है वहीं पुरुष जाति के प्रति घृणा काफी सघन और सूक्ष्म है, ऐसी एक कविता देखें-
सब कुछ समझ कर आते हैं दर्शकगण/मेरी इच्छा पर हंसने-रोने/जानते हैं अभिनय है/मानते हैं जीवन/पहचानते हैं मुझे/परन्तु स्वयं भी अभिनेता बनकर/छल करते हैं नहीं जानने का।
हम सब मिलकर कर देते हैं वह/जो कभी नहीं हुआ/घटित कर देते हैं घटना/जो कभी नहीं होगी।मैं रचती हूं सत्याभास/वे देते हैं विश्वास का भ्रम/मैं बोलती हूं संवाद/जो बोले जा सकते होंगे/किसी अनहुए जीवन में/भूत, वर्तमान और भविष्य से परे/किसी चतुर्थ काल में।
मूर्ख बनने का अद्भुत स्वाद लेने/सभागार में आते हैं श्रेष्ठजन/जो बनता है सबसे अधिक मूढ़/कहलाता है सर्वाधिक विद्वान/सभागार के बाहर।
कुछ पंक्तियां पुरानी कविताओं की याद दिलाती हैं, जैसे- तुम्हें देखे बिना चैन नहीं/किन्तु देख सकूं तुम्हें पूरा/मेरे पास ऐसे नैन नहीं...।
नगरवधू की जिंदगी की त्रासदी आखिरी कविता की आखिरी दो पंक्तियों में देख सकते हैं- मृत्यु भी पूर्ण नहीं कर सकी/एक अर्द्धसमाप्त जीवन।
एक सिलसिला है, जो देह से शुरू होकर देह पर ही खत्म होता है और आत्मा हर रात देह बदलती है- एक झूठा आवरण जिसे पहनने को एक नगरवधू का जीवन अभिशप्त होता है...किसी उपन्यास या कहानी से कहीं बेहतर ये दो दर्जन कविताएं उसे चित्रित करती हैं।
अजन्ता देव को लम्बे समय बाद इतने बेहतर शिल्प और कल्पना से गुंथे एक महाकाव्यात्मक लेकिन संक्षिप्त कविता संग्रह के लिए धन्यवाद। लेकिन उससे भी ज्यादा उस व्यक्ति को जिसने यह पुस्तक भिजवाई- कवि कृष्ण कल्पित को, जिन्होंने इससे पहले भी 'एक शराबी की सूक्तियां' भिजवाई थी। चूंकि उस वक्त यह स्तंभ शुरू नहीं हुआ था, इसलिए हम अपने पाठकों को उस पुस्तक से रूबरू नहीं करवा सके।
इस पुस्तिका को कहीं से जुगाड़ कर जरूर पढ़ें।
अभिषेक श्रीवास्तव
पुस्तक- एक नगरवधू की आत्मकथा लेखिका- अजंता देव प्रकाशक- कलमकार प्रकाशन, 68/179, प्रताप नगर, सांगानेर, जयपुर-302030, राजस्थान |
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कुल टिप्पणियां: 4
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प्रेषक : RakeshBahut Badhiya
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प्रेषक : kamleshApki samiksha padkar to yahi lagta hai ki is pustak ka jugad jarur karna parega.
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प्रेषक : sparshpustak pathneeya hai, samast kavya premiyon ko ise avashaya padhna chahiye,,,, Dhanyavad Abhi
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प्रेषक : vyalokसमीक्षा की सबसे बड़ी कसौटी मेरे नजरिए से यह है कि उसके बाद पाठक उस किताब को पढ़ने के प्रयास करे. साथ ही समीक्षा कम-अज-कम उस पुस्तक का एक खाका तो खींच ही दे. अभिषेक की समीक्षा इन दोनों कसौटियों पर खरी है..हालांकि भर्तृहरि का श्लोक उन्होंने क्यों नहीं उद्धृत किया और गालिब को क्यों चुना, यह समझ में नहीं आया. साथ ही यदि एकाध कविताएं कम भी होतीं और विश्लेषण थोड़ा अधिक तो मजा दोगुना होता. वैसे कुल मिलाकर मामला वही है कि अजंता देव की कविताओं के साथ ही अभिषेक की समीक्षा भी पठनीय है औऱ साथ ही प्रतिक्रियाओं के जरिए इसको एक जीवंत मंच का शक्ल देने की भी जरूरत है. फिलहाल इतना ही.
























